बाबा साहब डॉ अम्बेडकर द्वारा रचित भारतीय संविधान को आसान इंग्लिश और हिंदी वीडियो में जानने का कोर्स मटेरियल है निम्न यूट्यूब वीडियो में , जिनको कोर्स नहीं करना वो भी जरूर सुने और समझें की बाबा साहब की सोच कितनी ज्यादा बड़ी और दूरदर्शी थी जो भयानक विषमताओं से भरे भारत देश को एक साथ रख कर चला रहा है , ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग तो ऐसे जनकल्याणकारी संविधान की कल्पना तक नहीं कर सकते थे ।

ओशो के विचार में बाबा साहब डॉ अम्बेडकर
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स्त्री है दीन ! उसको पुरुष ने कह रखा है,कि तुम दीन हो ! और मजा यह है कि स्त्री ने भी मान रखा है कि वह दीन है!
असल में हजारों साल तक भारत  में शुद्र समझता था कि वह शुद्र है; क्योंकि हजारों साल तक ब्राहमणों ने समझाया था कि तुम शुद्र हो ! अम्बेडकर के पहले, शुद्रों के पांच हजार साल के इतिहास में कीमती आदमी शुद्रों में पैदा नहीं हुआ ! इसका यह मतलब नहीं कि शुद्रों में बुद्धि न थी और अम्बेडकर पहले पैदा नहीं हो सकता था ! पहले पैदा हो सकता था,लेकिन शुद्रों ने मान रखा था कि उनमें कभी कोई पैदा हो ही नहीं सकता ! वे शुद्र हैं, उनके पास बुद्धि हो नहीं सकती ! अम्बेडकर भी पैदा न होता, अगर अंग्रेजों ने आकर इस मुल्क के दिमाग में थोडा हेर-फेर न कर दिया होता तो आंबेडकर भी पैदा नहीं हो सकता था !

हालांकि जब हमको भारत का विधान बनाना पड़ा, कान्सिटटयूशन बनाना पड़ा, तो ब्राहमण काम नहीं पड़ा, वह शुद्र अम्बेडकर काम पड़ा ! वह बुद्धिमान से बुद्धिमान आदमी सिद्ध हो सका !
लेकिन दौ सौ साल पहले वह भारत  में पैदा नहीं हो सकता था ! क्योंकि शूद्रों ने स्वीकार कर लिया था, खुद ही स्वीकार कर लिया था कि उनके पास बुद्धि नहीं है ! स्त्रियों ने भी स्वीकार कर रखा है कि वे किसी न किसी सीमा पर हीन हैं !….ओशो नारी और क्रांति (पेज संख्या.१७)

 

जनता बहुत बेरहम होती है ये सत्तधारिओं की चापलूसी करती है और समाजसुधारकों का जबरदस्त बुरा। आईये जाने कैसे समाजसुधार की लत में दुनिये के तीन सबसे बड़े समाज सुधारक बुद्ध,कार्ल मार्क्स और डॉ आंबेडकर के परिवार को बेहद दुःख का सामना करना पड़ा …SBMT

इस आर्टिकल की शुरुआत खलील जिब्रान के निम्न वक्तव्य से करते हैं जो एक कहानी में उन्होंने लिखा है
“मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है|
कार्ल मार्क्स और जेनी कोरलीना की शादी हो गई थी,1847 मे उनको लड़का हुआ लड़के का नाम एडगर मार्क्स रखा था। कार्ल मार्क्स अपने परीवार की तरफ ख्याल नहीं देते थे। उनके दिमाग में बस सर्व हरा समाज की उन्नति के लिए कैसी क्रांन्ती  की जाय इसके ऊपर … संशोधन और..चिंतन.. मनन .करते.. थे। और आपने मिशन के लिए कार्यकरता जोड़ते थे। अपने तत्त्व क्रान्तीं की भाषा लोगो को समझाते थे। 1855 में एडगर मार्क्स ८साल का हो चुका था। एक दिन एडगर मार्क्स की तबियत थोड़ी खराब थी। कार्ल मार्क्स भी घर पर ही थे। एडगर मार्क्स अपने पिता के गोद में सोना चाहते थे। कार्ल मार्क्स ने भी मना नहीं किया। वो एडगर को लेकर सो गई पत्नी जेनी कोरलीना एक बाजु में सो गई। ठीक रात में कार्ल मार्क्स के गोद में उनका अकेला प्रिय पुत्र एडगर मर चुका था और कार्ल मार्क्स को पता भी नहीं था।
सुबह उठने के बाद जब पता चला एडगर की जान जा चुकी है तो दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे के गले पड़ ज़ोर ज़ोर से रोने लगे। हमारे साथ ये क्या हो गया। फिर कुछ साल बाद एक पत्रकार ने उनसे इंटरव्यू लिया और पुछा। आपका लडका एडगर मार्क्स आपकी गोद में मर गया आपको पता भी नहीं चला। आप क्या कर रहे थे? कार्ल मार्क्स ने जवाब दिया। मै सर्वहरा समाज के क्रान्तीं के लिए सिद्धांतों का विचार कर रहा था। मैं रात और दिन‌ बस परीवर्तन के सपने देखता था। अमीर लोगों के पास है वो सपंत्ती और देश की चल अचल (नैसर्गिक संपत्ति जमीन) संपत्ति का विकेंद्रीकरण करके गरीब समाज की उन्नति कैसी की जा सकती है? इसके लिए नया सिद्धांत ढूंढ रहा था। नयी क्रान्तीं की योजना बना  रहा था। इसलिए मुझे कुछ पता नहीं चला। वो नयी  क्रान्तीं का नाम था। ..समाजवादी..क्रान्तीं.. और इस नई क्रान्तीं की ओर आधी दुनिया झुक चुकी थी। आज के रशिया और चीन समाजवादी क्रांति की देन है।
बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के भी चार बेटे और एक बेटी थी, सभी अकाल मृत्यु मरे। जब बाबा साहेब के अंतिम बेटे राज रत्न की अचानक मृत्यु हुई। उसी दिन बाबा साहेब को प्रथम गोल मेज कांफ्रेन्स के लिये लन्दन जाना था, वो जाने की तैयारी में इस चिंतन में थे कि किस तरह गांधीजी और मालवीय की चाल को नाकाम किया जाये। कैसे मैं अपने समाज का प्रतिनिधित्व दिला सकता हूँ और भारत के तत्कालिक सात करोड़ बहिष्कृत लोगों को आत्मसम्मान और पहचान दिला सकता हूँ कि तभी बाबा साहेब के बड़े भाई भागकर आये और बोले “भीम” तू कहा जा रहा है। बेटा अब नही रहा।
बाबा साहेब स्तब्ध रह गये फिर अगले पल अपने आपको सभाला और भाई तथा अपनी पत्नी से कहा? आज अगर मैं लन्दन नही पहुंचा तो आज करोड़ो दलित, पिछड़ो, बहिष्कृतों, वंचितों और शोषितों के अधिकारो की गांधी एंड कम्पनी हत्या कर देगे मै मेरे एक बेटे के लिये करोड़ो बेटो को नही मार सकता हूँ और बाबा साहेब लंदन के लिए निकल गए जहाँ उन्होंने अपने भाषण और तर्क से दुनिया को चौंकाया और पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार करना पड़ा था। ऐसे थे “बाबा साहेब”। बाबा साहेब की जब मृत्यु हुई थी तब उनके पास सम्पत्ति के नाम पर 10 हजार का लोन था जो उन्होंने किताबें खरीदने के लिया था, उनके घर में संसार का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय था जिसमे उस समय 50000 किताबें थी। बाकि नेताओं की संपत्ति का विवरण आप खुद जानते हैं।

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्चा, उनका बैटा एक ही दिन का था। राहुल एक ही दिन का था। जब आए, तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्नी- यशोधरा, बहुत नाराज थी। स्वभावत:। और उसने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा।

उसने पूछा कि मैं इतना ही  जानना चाहती हूं;  क्या तुम्हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं| क्या तुम सोचते हो कि मैं तुम्हें रोकती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्हें भेज सकते है, तो सत्य की खोज पर नहीं भेज सकेते ? तुमने मेरा अपमान किया है। बुरा अपमान किया है। जाकर किया अपमान ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्लाती हूं, रूकावट डालती हूं।

कहते है बुद्ध से बहुत लोगों ने बहुत तरह के प्रश्न पूछे होंगे। मगर जिंदगी में एक मौका था जब वे चुप रह गए; जवाब न दे पाये। और यशोधरा ने एक के बाद एक तीर चलाए। और यशोधरा ने कहा कि मैं तुमसे दूसरी यह बात पूछती हूं कि जो तुमने जंगल में जाकर पाया, क्या तुम छाती पर हाथ रख कर कह सकते हो कि वह यहीं नहीं मिल सकता था? यह भी भगवान बुद्ध कैसे कहें – कि यहीं नहीं मिल सकता था। क्योंकि सत्य तो सभी जगह है। और भ्रम वश कोई अंजान कह दे तो भी कोई बात मानी जाये, अब तो उन्होंने खुद सत्य को जान लिया है, कि वह जंगल में मिल सकता है, तो क्या बाजार में नहीं मिल सकता? पहले बाजार में थे, तब तो लगता था, सत्य तो यहां नहीं है। वह तो जंगल में ही है। वह संसार में कहां, वह तो संसार के छोड़ देने पर ही मिल सकता है। पर सत्य के मिल जाने के बात तो फिर उसी संसार और बाजार में आना पडा; तब जाना यहां भी जाना जा सकता था सत्य को; नाहक भागे। पर यहां थोड़ा कठिन जरूर है, पर ऐसा कैसे कह दे की यहां नहीं है। वह तो सब जगह है।

भगवान बुद्ध ने आंखे झुका ली। और तीसर प्रश्न जो यशोदा ने चोट की, शायद यशोदा समझ न सकी की बुद्ध पुरूष का यूं चुप रह जाना अति खतरनाक है। उस पर बार-बार चोट कर अपने आप को झंझट में डालने जैसा है| सो इस आखरी चोट में यशोदा उलझ गई। तीसरी बात उसने कहीं, राहुल को सामने किया और कहा कि ये तेरे पिता है। ये देख, ये जो भिखारी की तरह खड़ा है, हाथ में भिक्षा पात्र लिए। यहीं है तेरे पिता। ये तुझे पैदा होने के दिन छोड़ कर भाग गये थे। जब तू मात्र के एक दिन का था। अभी पैदा हुआ नवजात। अब ये लौटे है, तेरे पिता, देख ले इन्हीं जी भर कर। शायद फिर आये या न आये।

तुझे मिले या न मिले। इनसे तू अपनी वसीयत मांग ले। तेरे लिए क्या है इनके पास देने के लिए। वह मांग ले। यह बड़ी गहरी चोट थी। बुद्ध के पास देने को था क्या। यशोधरा प्रतिशोध ले रही थी बारह वर्षों का। उसके ह्रदय के घाव जो नासूर बन गये थे। लेकिन उसने कभी सोचा भी नहीं था कि, ये घटना कोई नया मोड़ ले लेगी।

भगवान ने तत्क्षण अपना भिक्षा पात्र सामने खड़े राहुल के हाथ में दे दिया। यशोधरा कुछ कहें या कुछ बोले। यह इतनी जल्दी हो गया। कि उसकी कुछ समझ में नहीं आया। इस के विषय में तो उसने सोचा भी नहीं था। भगवान ने कहा,बेटा मेरे पास देने को कुछ और है भी नहीं, लेकिन जो मैंने पाया है वह तुझे दूँगा। जिस सब के लिए मैने घर बार छोड़ा तुझे, तेरी मां, और इस राज पाट को छोड़, और आज मुझे वो मिल गया है। मैं खुद चाहूंगा वही मेरे प्रिय पुत्र को भी मिल जाये। बाकी जो दिया जा सकता है। क्षणिक है। देने से पहले ही हाथ से फिसल जाता हे। बाकी रंग भी कोई रंग है? संध्या के आसमान की तरह,जो पल-पल बदलते रहते है। में तो तुझे ऐसे रंग में रंग देना चाहता हूं जो कभी नहीं छुट सकता।

तू संन्यस्त हो जा। बारह वर्ष के बेटे को संन्यस्त कर दिया। यशोधरा की आंखों से झर- झर आंसू गिरने लगे। उसने कहां ये आप क्या कर रहे है। पर बुद्ध ने कहा, जो मरी संपदा है वही तो दे सकता हूं। समाधि मेरी संपदा है, और बांटने का ढंग संन्यास है। और यशोधरा, जो बीत गई बात उसे बिसार दे। आया ही इसलिए हूं कि तुझे भी ले जाऊँ। अब राहुल तो गया। तू भी चल। जिस संपदा का मैं मालिक हुआ हूं। उसकी तूँ भी मालिक हो जा। और सच में ही यशोधरा ने सिद्ध कर दिया कि वह क्षत्राणी थी।

तत्क्षण पैरों में झुक गई और उसने कहा- मुझे भी दीक्षा दें। और दीक्षा लेकर भिक्षुओं में, संन्यासियों में यूं खो गई कि फिर उसका कोई उल्लेख नहीं है। पूरे धम्म पद में कोई उल्लेख नहीं आता। हजारों संन्यासियों कि भीड़ में अपने को यूँ मिटा दिया। जैसे वो है ही नहीं। लोग उसके त्याग को नहीं समझ सकते। अपने मान , सम्मान, अहंकार को यूं मिटा दिया की संन्यासी भूल ही गये की ये वहीं यशोधरा है। 

और आपको ये जान कर दुक्ख होगा की गौतम बुद्ध का एकलौता पुत्र सिद्धार्त गौतम अपने पिता से बहुत पहले ही चल बसा ।

बुद्ध का ममेरा भाई देवदत्त सदा ही बुद्ध को नीचा दिखाने की चेष्टा में लगा रहता था, मगर उसे हमेशा मुँह की ही खानी पड़ती थी।गौतम बुद्ध के पीछे उनके ममेरे भाई ने उनकी पत्नी यशोधरा को बहुत परेशान किया बुरी नज़र डाली, जलन के कारन बुद्ध की कई बार मार डालने की कोशिश की ।

एक बार बुद्ध जब कपिलवस्तु पहुँचे तो अनेक कुलीन शाक्यवंसी राजकुमार उनके अनुयायी बने। देवदत्त भी उनमें से एक था।

कुछ दिनों के बाद देवदत्त मगध से लौट कर जब संघ में वापिस आया तो उसने स्वयं को बुद्ध से श्रेष्ठ घोषित किया और संघ का नेतृत्व करना चाहा। भिक्षुओं को बुद्ध से विमुख करने के लिए उसने यह कहा हैं कि बुद्ध तो बूढ़े हो चुके थे और सठिया गये हैं। किन्तु भिक्षुओं ने जब उसकी कोई बात नहीं सुनी तो वह बुद्ध और संघ दोनों से द्वेष रखने लगा।

खिन्न होकर वह फिर वापिस मगध पहुँचा और अजात शत्रु को महाराज बिम्बिसार का वध करने के लिए प्रेरित किया क्योंकि बिम्बिसार बुद्ध और बौद्धों को प्रचुर प्रश्रय प्रदान करते थे। प्रारंभिक दौर में बिम्बिसार को मरवाने की उसकी योजना सफल नहीं हुई। अत: उसने सोलह धुनर्धारियों को बुद्ध को मारने के लिए भोजा। किन्तु बुद्ध के व्यक्तित्व से प्रभावित हो सारे उनके ही अनुयायी बन गये।

क्रोध में देवदत्त ने तब बुद्ध पर ग्रीघकूट पर्वत की चोटी से एक चट्टान लुढ़काया जिसे पहाड़ से ही उत्पन्न हो दो बड़े पत्थरों ने रास्ते में ही रोक दिया।

देवदत्त के क्रोध की सीमा न रही। उसने एक दिन मगध राज के अस्तबल में जाकर एक विशाल हाथी नालगिरी को ताड़ी पिलाकर बुद्ध के आगमन के मार्ग में भेज दिया। नालगिरी के आगमन से सड़कों पर खलबली मच गई और लोग जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। तभी बुद्ध भी वहाँ से गुजरे। ठीक उसी समय एक घबराई महिला अपने बच्चे को हाथी के सामने ही छोड़ भाग खड़ी हुई। जैसे ही नालगिरि ने बच्चे को कुचलने के लिए अपने पैर बढ़ाये बुद्ध उसके ठीक सामने जा खड़े हुए। उन्होंने हाथी के सिर को थपथपाया। बुद्ध के स्पर्श से नालगिरि उनके सामने घुटने टेक कर बैठ गया।

नालगिरि हाथी की इस घटना से देवदत्त मगध में बहुत अप्रिय हुआ और उसे तत्काल ही नगर छोड़ कर भागना पड़ा।