बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936 कुल भाग -22-एक समीक्षा , हम सभी को ये किताब अपने जीवन में जरूर पढ़नी चाहिए


“हर आदमी जो मिल के इस सिद्धांत को दोहराता है की एक देश किसी दूसरे देश पर शासन करने के लिए उपयुक्त नहीं है, उसे यह भी मानना होगा की एक जाति भी दूसरी जाति पर शासन करने के लिए उपयुक्त नहीं है” बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर
स्त्रोत – आंबेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936

आंबेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936 कुल भाग -22

इस किताब की शुरवात 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल में बाबासाहेब को अध्यक्ष बनाने के वाले निमंत्रण से होती है जिस में बाबा साहेब को “जाति प्रथा का विनाश” इस विषय पे बोलना था ,जिस में पहले बाबासाहेब मना करते है फिर बाद में मान जाते है लेकीन आखिर में 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की सभा कैंसिल हो जाती है क्यों की वह बाबा साहेब के हिन्दू धर्म छोड़ने ,हिन्दू धर्म ग्रंथो की श्रेष्ठा नस्ट करना आदि विषय पर सहमति नहीं होती लाहौर के जात पात तोड़क मंडल सभा ख़त्म कर देता है , बाबा साहेब इस जात पात तोड़क मंडल से नाराज़ होते है उन को जो सम्बोधन जात पात तोड़क मंडल में करना था उस की किताब छप चुकी होती है , इस लिए बाबा साहेब इसे बेचने का फैसला लेते है ,”जाति प्रथा का विनाश” बाबा साहेब को जो सभा में बोलना था वही कुछ है

भाग 1

इस भाग में बाबा साहेब सभा का आभार जताते है कुछ ख़ास नहीं है इस भाग में

भाग 2
इस भाग में बाबासाहेब कांग्रेस की बात करते है , वह बताते है कांग्रेस का जन्म एक ऐसे समय हुआ जब समाज को लग रहा था की समाज में प्रगति जब तक नहीं की जा सकती जब तक की हम अपने समाज में व्यापत बुरी प्रथाओं को ख़तम न कर दे ,और इसी उदेश्य के साथ एक सामाजिक सम्मेलन में कांग्रेस की नीव पड़ते है , कांग्रेस के दो हिस्से थे पहला कांग्रेस जो एक देश के राजनीतिक संगठन में कमजोर बिंदुओं को परिभाषित करने के लिए चिंतित थी, और दूसरा हिस्सा था कांफ्रेंस वाला जो समाज में व्यापत बुरी प्रथाओं को खतम करने के लिए कोशिश कर रहा था , पहले कुछ साल दोनों ने मिल के काम किया ,दोनों एक ही पंडाल के नीचे सम्मलेन करते थे ,लेकीन जल्द दोनों में मदभेद नज़र आने लगे जिस का कारण था क्या समाजिक सुधारो के बाद राजनीतिक सुधार किये जाने चाहिए ? सालो से कांग्रेस के यह दोनों धड़े आपस में संतुलन बनाये हुए थे ,लेकिन जल्द ही समाजिक सुधारो वाला धड़ा ख़तम हो गया ,और राजनीतिक सुधारो की तरफ जाने वालो की सख्या बढ़ाने लगी ,ऐसे लोगो की कमी नहीं थी जो राजनीतिक पार्टी से सहानुभूति रखते थे ,समाजिक सुधारो की कोफेस्स को आने वाले कुछ लोग ही बचे ,जल्द ही स्वर्गीय तिलक के नेतृत्व में एक ही पंडाल के नीचे कांफ्रेंस करने की आज्ञा को तिलक ने वापस ले लिया ,और दोनों धड़ो में दुश्मनी बढ़ाने लगी , नौबत यहां तक आ गई की जब सामाजिक कांफ्रेंस वाले हिस्से ने जब अपने पंडाल में कांफ्रेंस करने की कोशिश की तो पंडाल को जलाने की धमकी मिलने लगी , समय के साथ कांग्रेस का राजनीतिक धड़ा जीत गया और सामाजिक सुधारो वाला धड़ा ख़तम हो गया जिसे कांग्रेस के आठवें सेशन जो इलहाबाद में हुआ था सन 1892 में उस में कांग्रेस अध्यक्ष उमेश चन्द्र बनर्जी के इस भाषण से समझा जा सकता है,जिस ने समाजिक कांफ्रेंस की ताबूत में कील का काम किया ,

मुझे उन लोगो के लिए कोई सहनशीलता नहीं है जो कहते है की हम सामाजिक सुधारो से पहले राजनीतिक सुधारो में फिट नहीं होंगे ,मैं दोनों के बीच कोई संबंध देखने में विफल हूं …..क्या हम (राजनीतिक सुधार के लिए) फिट नहीं हैं क्योंकि हमारी विधवाएं अविवाहित रहती हैं और हमारी लड़कियों की अन्य देशों की तुलना में जल्दी शादी कर दी जाती है ,हम क्योंकि हमारी पत्नी और बेटियां अपने दोस्तों के साथ हमारे साथ नहीं चलती हैं?क्योंकि हम हमारी बेटियों को ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज भेजते नहीं हैं?

इस जीत से कई लोग खुश को दुखी भी हुए , इस के बाद बाबासाहेब पेशवा काल आछूतो की स्थिति का वर्णन करते है की पेशवा काल में मराठा राज्य में आछूतो को सड़को पे नहीं चलने देते थे ,क्यों की उनकी परछाई से कोई अपवित्र न हो जाये ,उस समय आछूतो को हाथ या गले में काला धागा पहनना आवश्य था ,ताकि कोई गलती से उन्हें छू न ले और अपवित्र न हो जाये पेशवा की राजधानी पूना में आछूतो को गले में मटका बाँधना पड़ता था ताकि किसी का थूक ज़मीन पर न गिरे और कोई ब्राह्मण उस पर पैर रख अपवित्र न हो जाये ,आछूतो को अपने पीछे बाँधना पड़ता था ताकि उन के पैरो के निशान मिट जाये कोई ब्राह्मण उस पर पैर रख अपवित्र न हो जाये ,इस के बाद इंदौर में बलाई जाति सामाजिक बहिस्कार का जिक्र करते है , गुजरात में एक दलित समुदाय की महलओ पर हुए हमले का जिक्र करते है जिस में दलित महिलाओ को केवल इस लिए मारा जाता है क्यों की उन के पास धातु के बर्तन थे ,गुजरात में एक दलित समुदाय के बच्चो को किस प्रकार सरकरी स्कूल में फरमान जारी कर रोका गया , इलहाबाद में कैसे घी की दावत देने पर दलितों पर हमला किया गया क्यों की दलित घी कैसे खा सकता है

फिर वह बात करते है कांग्रेस की राजनीतिक सुधारो वाला धड़ा क्यों हरा ,वह कहते है की उन्हें हिन्दू समाज में सुधार से कोई मतलब नहीं था वह तो केवल घर में सुधार करना चाहते थे , उच्च समाज की बुरी प्रथाओं को ख़त्म करना चाहते थे इस लिए वह हारे उन्हें जाति प्रथा से कोई ज्यादा लेना देना न थावह केवल उच्च समाज की बुरी प्रथा जैसे बाल विवाह ,विधवा विवाह आदि को समाप्त करना चाहते थे जिस से वह स्वय पीड़ित थे ,उन्हें जाति प्रथा समापत करने से कोई मतलब न था

मुझे लगता है कि राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है ,मुझे लगता है राजनीतिक संविधान सामाजिक सुधार की अनदेखी कर नहीं बन सकता ,फिर इस के लिए वह फर्डीनांड लससले कहे शब्दों का इस्तमाल करते है ,फिर वह पूछते है देश में कम्युनल अवार्ड की क्या उपयोगिता है जो विभिन्न वर्गों और समुदायों के लिए निश्चित अनुपात में राजनीतिक सत्ता का आवंटन करता है ,मुझे लगता है की समाजिक सुधार ही देश के राजनीतिक सविधान की नीव रख रहे है और यह एक तरह से उन की हार है जो राजनीतिक सुधारो को सामजिक सुधारो से ज्यादा महत्त्व देते है ,कम्युनल अवार्ड को देख मुझे ऐसा ही लगता है ,कुछ लोग कह सकते है कम्युनल अवार्ड अल्पसंख्यकों और नौकरशाही के बीच गठबंधन का नतीजा है और अप्रकृतिक है ,तो इस बात को साबित करने के लिए की राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है मेरे पास और उदहारण है , आइए आयरलैंड की ओर चले आयरिश होम रूल का इतिहास हमे क्या बताता है ,जब उत्तरी आयरलैंड और दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि आयरिश होम रूल पर बात करने मिले और श्री रेडमंड, जो दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि थे वह उत्तरी आयरलैंड को हर हाल में आयरिश होम रूल में शामिल करना चाहते थे उत्तरी आयरलैंड के प्रतिनिधि से पूछते है “आप की तरह किसी भी राजनीतिक सुरक्षा उपायों चाहते है हम वह आप को देंगे ,उत्तरी आयरलैंड के प्रतिनधि कहते है भाड़ में जाये तुम्हारे राजनीतिक सुरक्षा उपाय हम बस चाहते है की तुम हम पर हुकूमत न करो किसी भी कीमत पर और आज आप देखे आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड नाम के दो देश आप को एक छोटे दीप पर दिखेंगे ,सवाल उठता है की उत्तरी आयरलैंड के इस रवैये का कारण क्या था उन दोनों का ईसाई धर्म के अलग समुदाय से होना कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट होना यह साबित करता है राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है कुछ लोग इस में भी कह सकते है उन दोनों के बीच साम्राज्यवादी ताकत थी इस लिए वार्ता विफल हुई , तो रोम चलते है वाह जब राजा को ख़तम कर दिया गया तब साम्राज्य कंसोल्स और पोंटिफेक्स मैक्सिमस के बीच विभाजित किया गया था।कॉन्सल में राजा की धर्मनिरपेक्ष प्राधिकारी निहित थी,जबकि उत्तरार्द्ध ने राजा के धार्मिक अधिकार को ग्रहण किया। इस गणतंत्रवादी संविधान ने दो कॉन्सल बनाई एक पेट्रीशियन और दूसरी प्लीबियन ,दूसरी और उसी संविधान ने पोंटिफेक्स मैक्सिमस के तहत पुजारिओं को भी दो भागो में बाटा प्लेबियां और पेट्रीसियन जो कम्युनल राइट के सामान ही था ऐसा क्यों की रोम के गणतंत्रवादी संविधान ने कम्युनल राइट दिए क्यों की प्लेबियां और पेट्रीसियन में जातीय मदभेद था इसलिए ,दोनों अलग अलग जातियों से थे जो दृष्टांत मैंने लिया है वह साबित करते है सामाजिक और धार्मिक समस्याओं का राजनीतिक संविधान पर असर पड़ता है लेकिन यह नहीं माना जाना चाहिए कि दूसरे पर एक का असर सीमित है।

ऐसे इतिहास में कई उदाहरण है की राजनीतिक क्रांतियों को हमेशा सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों से पहले किया गया है,लूथर की सामाजिक क्रांति ने यूरोपीय लोगों के राजनीतिक मुक्ति को जन्म दिया इंग्लैंड में धर्मनिरपेक्षतावाद ने राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना की,यह धर्मनिरपेक्षता थी जिस ने अमेरिकी स्वतंत्रता के युद्ध जीता और धर्मनिरपेक्षता धार्मिक आंदोलन थी।मुस्लिम साम्राज्य के बारे में भी यही सच है। इस से पहले अरब राजनीतिक शक्ति बने वह पैगंबर मोहम्मद द्वारा शुरू की गई से धार्मिक क्रांति से गुजरे थे।यहां तक कि भारतीय इतिहास भी इस निष्कर्ष का समर्थन करता है चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति से पहले बुद्ध की धार्मिक और सामाजिक क्रांति ने इस राजनीतिक क्रांति की नीव रखी, शिवाजी के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति से पहले महाराष्ट्र के संतों द्वारा धार्मिक और सामाजिक क्रांति की गई ,सिखों की राजनीतिक क्रांति से पहले गुरु नानक ने धार्मिक और सामाजिक क्रांति की यह उदहारण बताते है की मन और आत्मा की मुक्ति आवश्यक है लोगों के प्रारंभिक राजनीतिक विस्तार के लिए

भाग 3

अब हम खुद को समाजवादियों की तरफ ले चलेंगे,क्या समाजवादी सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न होने वाली समस्या को नजरअंदाज कर सकते हैं?भारत में समाजवादियों ने यूरोप में अपने साथियो का अनुसरण किया है और उन्होंने यूरोप के इतिहास के आर्थिक व्याख्या को भारत में लागू करने की कोशिश की है ? उनका मानना है की इंसान केवल एक आर्थिक प्राणी है , और उस की गतिविधियों और आकांक्षाएं आर्थिक तथ्यों से बंधी है ,वह मानते है की संपत्ति शक्ति का एकमात्र स्रोत है , इस लिए वह मानते है की सामाजिक और राजनीतिक सुधार एक बड़ा भ्रम है , इस के स्थान पर आर्थिक सुधार जिस में संपत्ति को सब में बराबर बाँट दिया जाये सबसे पहले लागु किया जाना चाहिए , कुछ लोग कह सकते है इन का कहना सही है ऐसा सुधार सबसे पहले लागु किया जाना चाहिए ,कुछ लोग यह भी कह सकते है की आर्थिक मकसद केवल एकमात्र उद्देश्य नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य क्रियाशील होता है।आर्थिक शक्ति ही एकमात्र शक्ति है मानव समाज शास्त्र का कोई भी छात्र स्वीकार नहीं कर सकता, अक्सर एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति शक्ति और अधिकार का एक स्रोत बन जाती है ,हम इस महात्माओं के आम आदमी पर प्रभाव को देख कर समझ सकते है , वरना भारत में करोड़पति साधुओ और फाकिरों की बातो का पालन क्यों करते हैं?क्यों लाखों दरिद्र अपनी थोड़ी सम्पति को बेच कर बनारस और मक्का चले जाते है ? क्युकी ,भारत के इतिहास में धर्म शक्ति का एक मात्र स्रोत है जहा पुजारी आम आदमी पर अपना प्रभाव रखता है जो किसी मैजिस्ट्रेट से अधिक है और हर चीज़ से आधिक है ? इसलिए हड़तालों और चुनावों जैसे चीज़े भी हमारे देश में धार्मिक मोड़ ले लेती है या उन्हें आसानी से धार्मिक मोड़ दिया जा सकता है ,मनुष्य के ऊपर धर्म की शक्ति का प्रभाव समझने के लिए हम उदाहरण के रूप में रोम के प्लेबियंस (आम लोग ) का मामला लें। यह इस बिंदु पर प्रकाश डालता है,प्लेबियंस (आम लोग ) ने अपने अधिकारों के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी और रोमन गणराज्य के तहत सर्वोच्च कार्यकारी में आपने आधिकारो को प्रपात किया और जिस में वे रोम की संसद में आम मतदाताओं द्वारा चुने जा सकते थे और प्लेबियंस कौंसिल में अपना स्थान पा सकते थे। उन लोगो ने कौंसिल में चुने जाने का अधिकार इस लिए प्राप्त किया क्यों की उन्हें लगता था पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) उन के खिलाफ प्रशासन में भेदभाव करते है। लेकिन क्या उन्होंने इस अधिकार को प्राप्त कर कुछ हासिल किया ? नहीं क्यों नहीं क्यों की वह अपना कोई मजबूत प्रतिनिधि रोम की संसद में नहीं भेज पाए , ऐसा क्यों की जब वह खुद वोट कर अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे जो मजबूत प्रतिनिधि रोम की संसद में नहीं भेज पाए ,इस प्रश्न का उत्तर है धर्म का प्रभुत्व मनुष्य के प्रभुत्व से ऊपर होना। क्यों की प्लेबियंस (आम लोग ) उसे ही अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे जो डेल्फी नाम की देवी को स्वीकार हो , और इस डेल्फी नाम की देवी के मंदिर के सभी पुजारी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) वर्ग के थे , और यह देवी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) के माध्यम से ही अपना सन्देश प्लेबियंस (आम लोग ) तक पहुँचती थी। इस लिए प्लेबियंस (आम लोग ) सामान प्रतिनिधित्व होते हुए कभी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) जितने ताकतवर न हो पाए। क्यों की जब कभी कोई ताकतवर प्लेबियंस (आम लोग ) चुन कर संसद पहुंच जाता तो पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) कह देता की यह आदमी डेल्फी देवी को स्वीकार नहीं है यह है धर्म की शक्ति का प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक शक्ति पर धर्म को छोड़ने के बजाय, प्लीबेन (आम लोग ) ने भौतिक लाभ को छोड़ दिया, जिसके लिए वे इतनी मेहनत से लड़े थे भारत के सन्दर्भ में भी यही बात है ? क्या यह यह नहीं दिखाता है कि धर्म शक्ति का एक स्रोत हो सकता है पैसा जितना बड़ा नहीं तो उस के बरारबर । समाजवादियों का भ्रम यह मानने में है कि जैसे यूरोपीय सोसाइटी के वर्तमान स्तर में संपत्ति प्रमुख सत्ता का स्त्रोत है , क्या भारत के संदर्भ में भी यही बात सही है ,क्या इस से पहले भी यूरोप में सम्पति सत्ता का स्रोत थी ?धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति यह शक्ति और अधिकार दोनों स्रोत हैं, जिस के द्वारा एक आदमी , दूसरे की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए समक्ष है। इन में से एक एक स्तर पर हावी हो सकती है और दूसरी , दूसरी स्तर पर यही यह एकमात्र अंतर है दोनों में. यदि स्वतंत्रता आदर्श है,अगर स्वतंत्रता का मतलब है एक आदमी के दूसरे पर प्रभाव का विनाश तो आर्थिक सुधार से इसे पाया जा सकता है लेकीन , अगर वह प्रभुत्व धर्म और समाज के आधार पर स्थापित किया गया हो तो उस के लिए सामाजिक और राजनीतिक सुधार जरूरी होंगे जैसे समाजवादी नहीं मानते। इस प्रकार भारत के समाजवादियों द्वारा अपनाई गई आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत पर हमला किया जा सकता है।लेकिन मैं समझता हूं कि समाजवादी विवाद की वैधता के लिए इतिहास की आर्थिक व्याख्या आवश्यक नहीं है जो कहती है संपत्ति का बराबर बटवारा करने से सब कुछ ठीक हो जायेगा ? मै अपने समजवादी दोस्तों से पूछना चाहुगा क्या आर्थिक सुधार सामजिक सुधर से पहले लागु किये जा सकते है ? लगता है समजवादी दोस्तों ने इस पर विचार ही नहीं किया मैं उनके साथ अन्याय नहीं करना चाहता?मै पत्र का उदहारण देना चाहूंगा जो एक प्रमुख समाजवादी ने मेरे एक मित्र को लिखा था जिसमें उसने कहा था,मुझे नहीं लगता है कि हम भारत जब तक एक स्वतंत्र समाज का निर्माण कर सकते हैं, जब तक कि एक वर्ग दूसरे का दुर्व्यवहार और दमन करता रहेगा एक समाजवादी होने के कारण में विभिन्न वर्गों और समूहों के सामान उपचार में विशवास करता हु ,जिसे सामजवाद के द्वारा ही पाया जा सकता है। मै समजवादी दोस्त से पूछना चाहूंगा क्या यह कहने मात्र से की ” एक समाजवादी होने के कारण में विभिन्न वर्गों और समूहों के सामान उपचार में विशवास करता हु ” क्या इतना कहना समाजवाद के पुरे सिद्धांत को समझाता है नहीं , अब मै अपने विचार समाजवाद पर रखना चाहूंगा , जिस आर्थिक सुधर की बात समाजवाद करता है है वह तभी लागु की जा सकती है जब सत्ता पर समाजवाद का पूरा कब्ज़ा हो ,और वह कब्ज़ा श्रमजीवी वर्ग का हो। मै सवाल पूछता हु की क्या भारत का श्रमजीवी वर्ग मिल के ऐसी कोई क्रांति करेगा। यह क्रांति तभी संभव है जब सभी को यह विशवास हो की दूसरा जो उस के साथ है वह सत्ता हासिल होने के बाद उस के साथ धर्म या जाति के नाम पर भेदभाव नहीं करेगा , ऐसी कोई क्रांति भारत में तो संभव नहीं है ,चलिए हम मान ले समाजवादीओ ने किसी तरह सत्ता हासिल कर भी ली तो तो वह सामाजिक भेदभाव को मिटाये बिना इसे चला पाएंगे नहीं समाजवाद कुछ नहीं मन को संतुष्ट करने वाला वाकय भर है

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