एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के कुछ प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के विरोध में 2 अप्रैल के भारत बंद का आवाहन । सभी बहुजन इसके लिए जुटे , अब तो जागो वरना कल देर हो जाएगी , बढ़ते ब्राह्मणवाद के खतरे को समझो और बचाव में जुट जाओ

कविता -इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गए।

जी करता है दिखा दूँ सीना चीर के ।
कलेजा छलनी हुआ पड़ा है मनुवाद के तीर से ।।
हमारे पूर्वज राक्षस और इनके अवतार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

ये आर्य भारत में शरणार्थी बन कर आये थे ।
रोटी भी हम लोगों से माँग कर खाये थे ।।
फिर धीरे-धीरे वो हमारे कबीलों के सरदार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

हमारी संस्कृति और सभ्यता को मिटाया था ।
जान ना ले हकीकत इसलिए हमारा इतिहास भी जलाया था ।।
रहते थे जो फिरंगी मेहमान बन कर
वो राजा,वजीर और सूबेदार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

वैदिक सभ्यता थी इनकी सनातन धर्म था ।
जो इंसान को इंसान ना समझे वो धर्म नही अधर्म था ।।
वर्णवाद और जातिवाद के कारण समाज के टूकड़े हजार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

सरेआम बहन,बेटियों की इज्ज़त को नीलम करवा दिया ।
बांध कर गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू आत्मसम्मान भी हमारा खत्म करवा दिया ।।
देख-देख हाल अपने समाज का हम शर्मसार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

जिह्वा कटवाते थे,कानों में शीशा ढलवाते थे ।
मर जाता था प्यासा एक अछूत,मगर ना उसको पानी पिलाते थे ।।
ऐसा गुलामी भरा जीवन पाकर,हम कुत्तों से भी बेकार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

“अपना दीपक खुद बनो” महात्मा बुद्ध ने सत्य की राह दिखाई ।
क्या होती है तर्क और विवेक की शक्ति,हम सब को बतलायी ।।
लेकर बुद्ध की शिक्षा सम्राट अशोक अरब देशों के पार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

कह गये सतगुरु रविदास “मन चंगा कठौती में गंगा” पढ़े हमारे समाज का हर एक बंदा ।
मधुमक्खियों की तरह रहो मिलकर ताकि ले ना सके कोई तुमसे पंगा ।।
पाकर ऐसा रहबर,पाकर ऐसा सतगुर परमात्मा के भी साक्षात्कार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

बाबा साहेब ने शिक्षा,संघर्ष और संगठन का गहरा नाता बताया था ।
लिख संविधान हर गुलाम को गुलामी से मुक्त कराया था ।।
पर अब भूलकर बाबा साहेब को देवी-देवता तुम्हारे अपार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गये ।।

कहे सुनील कभी अपने संतों-महापुरुषों की बात ना मानी ।
खोकर इस मनुवाद के अंधेरे में करते रहे मनमानी ।।
पढ़-लिखकर भी जो ना समझे वही समाज के गुनाहगार हो गये ।
इस तरह हम चक्रवर्ती से चमार हो गए।

नोट:-अगर आपको ये कविता पसन्द आयी हो तो इसे अधिक से अधिक शेयर करे ।

SC/ST एट्रोसिटी एक्ट कानून (गांव में लोग हरिजन एक्ट के नाम से जानते हैं ) उसको प्रभावहीन और कमजोर करने की साजिश पर सुप्रीम कोर्ट के वकील एडवोकेट आर0 आर0 बाग़ जी की लेखनी से ये कानूनी विश्लेषण प्रस्तुत है

SC/ST एक्ट में माननीय न्यायलय ने जिस प्रकार से परिवर्तन किये है उससे अब SC/ST पर जुल्म करने वालों की गिरफ़्तारी नहीं होगी मतलब उनका हौसला और बढ़ जाएगा|सुप्रीम कोर्ट कि  इस आदेश के बाद पिछड़ों के साथ दलित और आदिवासी को जातीय संघर्ष कराने में देशद्रोही दंगेबाज जातीवादियों को  बहुत मदद मिलेगी..
मेरा मानना है कि यह बहुत बड़ी साजिश चल रही है देश में l जो काम राजनीतिक पार्टी नहीं कर सकती वह मीडिया और जुडिशरी के माध्यम से न्यायपालिका के माध्यम से कराई जा रही है l सुप्रीम कोर्ट का आज एससी एसटी एक्ट के ऊपर जो जजमेंट आई है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भविष्य में आदिवासी और दलितों के ऊपर  कत्लेआम बढ़ेगी और जो दलित और आदिवासी ऑफिसर होंगे उनके ऊपर डिसिप्लिनरी एक्शन बढ़ेगा क्योंकि कोई रोक-टोक नहीं है !!
हालांकि अदालत का इरादा स्पष्ट रूप से अधिकारियों को “मनमानी गिरफ्तारी” से बचाने के लिए और “निर्दोष नागरिकों” को मामलों में झूठा फंसाया जाने से बचाने के लिए स्पष्ट रूप से था, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और गृह मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि अगर सजा इस अधिनियम के तहत दरें कम हैं, इस तरह के प्रावधान के दुरुपयोग के साथ ऐसा किया जा सकता है कि जिस तरह से जांच की जाती है और अदालतों में मुकदमे चलने वाले मामलों के साथ।
‘बिना किसी गिरफ्तारी की अनुमति’
अपने आदेश में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को उनके नियुक्ति प्राधिकारी की लिखित अनुमति के साथ ही गिरफ्तार किया जा सकता है। निजी कर्मचारियों के मामले में, उसने कहा था, संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को इसे अनुमति देना होगा।
यह देखा गया था कि सार्वजनिक प्रशासन अधिनियम के दुरुपयोग से सावधान थे और अधिकारियों को कर्मचारियों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां देना मुश्किल हो पाया था कि इस अधिनियम के तहत आरोप उनके खिलाफ लाए जा सकते हैं।
जैसे, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि प्राथमिकी दर्ज करने से पहले एक प्रारंभिक जांच भी की जानी चाहिए कि मामला अत्याचार अधिनियम के मापदंडों के भीतर आता है या नहीं, यह मामूली या प्रेरित था या नहीं। अदालत ने यह भी माना था कि अगर अग्रिम जमानत की अनुमति दी जानी चाहिए तो आरोपी यह साबित करने में सक्षम है कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण थी।
जातिवाद पर टिप्पणी
अदालत ने इस अवसर पर जोर देने का अवसर भी इस्तेमाल किया था कि यह कैसे महसूस करता है कि यह कानून “जातिवाद को सशक्त बनाएगा” और “जातिवाद पर निर्दोष नागरिकों के झूठे निषेध” को रोकने की आवश्यकता कैसे हो सकती है।
हालांकि, जो लोग अधिनियम के तहत कठोर मानदंडों की मांग कर रहे हैं, उनका कहना है कि इसके तहत कम अभिरक्षा दर वास्तव में इस बात पर प्रतिबिंब है कि मामले कैसे पंजीकृत हैं और पीछा करते हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट “हिडन अपैथीड: कास्ट डिस्रिमिनेशन विद इंडिया के ‘अस्पृश्यता’ नामक एक रिपोर्ट ने नोट किया था कि” दलित अक्सर न्याय के प्रशासन में भेदभावपूर्ण उपचार के शिकार होते हैं। अभियोजक और न्यायाधीश सख्ती से विफल रहते हैं और दलितों द्वारा लाए गए शिकायतों का विश्वासपूर्वक पालन करते हैं, जो इस तरह के मामलों में उच्चतम दर से निष्कासित होता है “।
यह ध्यान देने के साथ कि पुलिस आम तौर पर “दलितों के खिलाफ अपराधों को पंजीकृत या ठीक से पंजीकृत करने में असफल” थे, उन्होंने नोट किया था कि “न्याय के प्रशासन के अंगों से पहले दलितों के समान इलाज करने का अधिकार शुरू में समझौता हुआ है”।
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने एक और अध्ययन में कहा था कि अधिनियम के तहत दायर 50% मामले अदालत में नहीं जाते हैं और पुलिस द्वारा बंद कर दिया जाता है। यह भी कहा गया था कि “जांच अधिकारियों के बीच जाति के पूर्वाग्रह” होने के चलते
नए संशोधनों में सख्त प्रावधानों की आवश्यकता दिखाई गई
वास्तव में, गृह मंत्रालय ने 2017 में अपनी वार्षिक रिपोर्ट में यह नोट किया था कि “पीओए अधिनियम में किए गए निवारक प्रावधानों के बावजूद, अनुसूचित जातियों और एसटी के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार बढ़ाना सरकार के लिए चिंता का कारण था”। गृह मंत्रालय ने कहा था, “इसलिए, इस अधिनियम को मजबूत करने और अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए उचित माना गया था।”
इसके बाद, यह उल्लेख किया गया था कि पीओए कानून के मौजूदा वर्गों के पुन: वाक्यांश के लिए और संस्थागत सुदृढ़ीकरण, अपील (एक नया खंड) से संबंधित अनुमानों का विस्तार करने के लिए, पीड़ितों और गवाह (एक नया अध्याय) और मजबूत बनाने के अधिकारों की स्थापना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2015 को लोकसभा ने 4 अगस्त 2015 को और राज्यसभा द्वारा 21 दिसंबर, 2015 को पारित कर दिया था। यह अधिनियम 26 जनवरी, 2016।
अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें आम तौर पर “अन्य आईपीसी अपराधों” के अधीन आती हैं
एससी / एसटी (पीओए) अधिनियम के खिलाफ एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2017 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 में मामलों की संख्या 40,401 थी, लेकिन वे 2015 में मामूली रूप से 4.3% की गिरावट के साथ 38,670 पर बंद हुए, लेकिन बढ़ी 2016 में 40.801 तक पहुंचने के लिए 5.5% की वृद्धि हुई थी। इसमें “अन्य आईपीसी अपराधों” के तहत अधिकारियों और कर्मचारियों के सदस्यों के खिलाफ शिकायतों में अधिकतर शिकायतों को शामिल किया गया था, जो दुरुपयोग और आपराधिक धमकी से संबंधित वर्गों को शामिल किया था।
2016 में, उत्तर प्रदेश (10,426 मामले) में अनुसूचित जातियों (एससी) के खिलाफ अत्याचार के मामले दर्ज किए गए, जिनमें कुल 25.6% के लिए बिहार था, बिहार के बाद 14.0% (5,701 मामले) और राजस्थान में 12.6% (5,134 मामले) थे 2016।
संयोग से, अपराध सिर-वार तिथि से पता चला है कि इन मामलों का सबसे बड़ा अनुपात महिलाओं के लिए 7.7% (3172 मामले) में बलात्कार के साथ-साथ 6.2% (2,541 मामलों) पर बलात्कार के आक्रोश के साथ महिलाओं पर हमला था।
अनुसूचित जनजातियों के मामले में, 2014 में 6,827 मामलों की संख्या दर्ज की गई, 2015 में 6,276 तक पहुंचने के लिए 8.1% की गिरावट आई, और फिर 2016 में 4.7% बढ़कर 6,568 हो गई। एसटी के मामले में, मध्य प्रदेश (1823 मामले) 27.8% पर अत्याचारों के मामले में सबसे अधिक संख्या दर्ज की गई, इसके बाद राजस्थान में 18.2% (11 9 मामले) और ओडिशा में 10.4% (681 मामले) दर्ज किए गए।
एसटीएस के मामले में, 9 74 बलात्कार के मामले सामने आए जिनमें से 14.8% उनके खिलाफ अपराध थे, इसके बाद 12.7% (835 मामले) और 2.5% (163 मामले) के अपहरण और अपहरण के मामले में महिलाओं पर हमला करने के इरादे से महिलाओं पर हमला किया गया था। ।
आरोपपत्र दर 77%, सजा दर 15.4%
पुलिस और अदालतों के मामलों के निपटान से पता चला है कि 1 9 8 9 के तहत, 2016 में जांच के लिए 11,060 मामले सामने आए और आरोप पत्र की दर 77% थी।
आंकड़ों के मुताबिक यह भी कहा गया है कि 2016 में, एससी / एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1 99 8 के तहत पिछले वर्ष से 45233 मामले लंबित थे, जबकि 5124 मामले में परीक्षण के लिए भेजा गया था जिसके परिणामस्वरूप कुल 50,357 वर्ष के दौरान मामलों हालांकि सरकार द्वारा कोई भी मामलों को वापस नहीं लिया गया था और कोई भी मामला याचिका सौदेबाजी द्वारा नहीं सुलझाया गया था, 49 मामले जटिल थे।
वर्ष 4546 के मामलों में, परीक्षण पूरा हो गया था। जबकि 701 मामलों में दोषी पाए गए, 3845 में आरोपी को निर्दोष या छुट्टी दे दी गई। इसलिए सजा की दर 15.4% थी, जबकि लंबित प्रतिशत 90.5% पर था।
पुलिस को कई मामलों में ‘गलत’, ‘गलती की तथ्य’
वर्ष के दौरान पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट में पता चला कि पुलिस को 2150 मामलों को “सच है लेकिन (के साथ) अपर्याप्त साक्ष्य”, 5,347 मामले “झूठे” होने और 869 मामले “तथ्य की गलती” होने के लिए मिलते हैं।
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक भारत में अनुसूचित जाति की कुल जनसंख्या 20.13 करोड़ थी। इसमें कहा गया है कि अत्याचारों में गैर अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति द्वारा अनुसूचित जाति के खिलाफ किए गए अपराधों का उल्लेख है और यह कि केवल भारतीय दंड संहिता (एससी / एसटी अधिनियम के बिना) के आंकड़ों के दायरे से बाहर रखा गया है, क्योंकि वे एससी / एसटी ।
हालांकि, अतीत में कुछ अध्ययनों ने पुलिस को मामलों पर ठीक से दर्ज करने या जांच करने के आरोपों का आरोप लगाया है, एनसीआरबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 में पिछले साल की जांच लंबित मामलों 15498 पर थी, वर्ष के दौरान दर्ज मामलों 40801 थे और इसलिए जांच के लिए कुल मामलों 56,29 9 थे इसमें से कहा गया है कि सरकार द्वारा वापस ले जाने वाले 16 मामले, 40 अन्य पुलिस स्टेशनों या मजिस्ट्रेट को हस्तांतरित किए गए थे और छह को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 157 (1) (बी) के तहत जांच नहीं हुई थी।
Regards
Adv RR BAG
Supreme court

बहुजनों जानो कैसे आपके पैरों तले जमीन खिसक रही है, ऐसे कानून बन रहे हैं की अब न आपका आरक्षण बचा ,न ही अब आपको बचाने वाला कोई कानून बचा है , सब तरफ प्राइवेटजेशन मतलब ब्राह्मणवादियों को मलिक बनाया जा रहा है आपको आपकी गुलामी की शुरुआत मुबारक हो।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 21-mar-2018 की फ्रंट पेज की खबर है की SC/ST एक्ट में माननीय न्यायलय ने जिस प्रकार से परिवर्तन किये है उससे अब SC/ST पर जुल्म करने वालों की गिरफ़्तारी नहीं होगी मतलब उनका हौसला और बढ़ जाएगा , पर आपको क्या आप तब तक इन बातों को नहीं समझोगे की जब तक खुद नहीं पीटेंगे/मरेंगे ,आप तो मन्दिरबाजी पूजा पाठ मौज मस्ती जारी रखो ।

SC/ST एक्ट में माननीय न्यायलय ने जिस प्रकार से परिवर्तन किये है उसे उदाहरण के रूप में समझिये।
1. एक गरीब दलित अपनी फरियाद लेकर तहसील जाता है और वहाँ जग्गा ठा*र नाम का अधिकारी मिलता है, जग्गा ठा*र फरियाद सुनकर उसे उल्टा एक थप्पड़ मारकर यह कहता है की भाग साले चमार/भँगी के यहाँ से, उसके बाद जब पुलिस में शिकायत होगी तब पुलिस जग्गा ठाकुर को गिरफ्तार करने से पहले जग्गा ठा*र के अधिकारी जो की पक्का आईएएस, आईपीएस या फिर पीसीएस की रैंक का होगा से यह परमीशन लेगी की जग्गा को गिरफ्तार करे या नहीं। अब अगर उच्च अधिकारी भी ठाकुर, श्रीवास्तव, शर्मा, अग्रवाल होगा तो समझ जाए की उस गरीब दलित को एक थप्पड़ और मार दिया जाता तो भी कुछ नहीं होगा।
2. दूसरी व्यवस्था यह की गयी है की जग्गा ठा*र दलित को सार्वजनिक स्थान पर थप्पड़ बजाता है, जातिसूचक शब्द कहे जाते है, खूब पिटाई की जाती है तो भी FIR दर्ज होने के बाद पहले डिप्टी एसपी जांच करेगा, उसके बाद ही केस आगे बढ़ पायेगा। अब डिप्टी एसपी की मानसिकता पर यह निर्भर करेगा की केस दर्ज होना चाहिए या नहीं।
3. तीसरी व्यवस्था यह की गयी की जग्गा ठा*र दलित को थप्पड़ व गालियां देने के बाद न्यायलय में जाकर अग्रिम जमानत ले सकता है, जिसके बाद आराम से बाहर घूमेगा व जांच को प्रभावित कर सकता है।
अत: अब एससी एसटी एक्ट का कोई औचित्य नहीं रहा ऐ।  चलो मान लिया की दुरूपयोग हो रहा था, लेकिन इसका यह मतलब नही की एक्ट को एक तरह से निष्प्रभावी ही कर दिया जाए।
इसलिए दलितों को अब समझ लेना चाहिए की पूजा करने या व्रत रखने के बाद भी हजारो सालो से कोई भगवान बचाने नही आया है आपको अपनी सुरक्षा स्वयं करनी पड़ेगी। इसलिए अब मन्दिर में घण्टा वजाने की जगह, शोषण करने वाले के सर पर घण्टा बजाने का जज्बा लाइये।  तभी एट्रोसिटी कम होगी। नही तो “ओ साले चमार के, ओ साले भँगी के” सुनते रहे।
*SC और ST (अत्याचार निरोधक~ एट्रोसिटी ) अधिनियम 1989 प्रभाव शून्य बनाने का मनुवादी न्यायपालिका का षड्यंत*
जो काम मनुवादी सरकार नहीं कर पा रही है, वह न्यायपालिका द्वारा करवाया जा रहा है और मीडिया इन सबके लिए माहौल बना रही है ! न्यायालय का काम केवल सरकार को निर्देश देने का है न कि कानून बनाने का, पर यहाँ तो न्यायपालिका जिसमे सवर्ण बैठे है खुद अपने लाभ के लिए संविधान को बदल दे रहे है !
●-  SC-ST एक्ट को कमजोर करना
● – प्रमोशन में आरक्षण को खत्म करना
● – यूनिवर्सिटी की नियुक्तियों में SC-ST-OBC
.    आरक्षण को खत्म करना
 ●- SC-ST-OBC की स्कॉलरशिप को खत्म करना
*SC /ST activities prevention act 11 sept 1989 में बना, आजादी के 42 वर्ष बाद।*
इसको बनाने की मांग *न* आदिवासियों  *न* की थी,  न दलितों ने। इसे ब्राह्मण और द्विज बहुमत वाली संसद और सरकार ने बनाया था।
*सवाल है क्यों बनाया था?*
इसलिये बनाया था कि दलित आदिवासी का शोषण किया था उससे उसका दिल जीता जा सके, दुनिया को यह बताया जा सके कि हम शोषक नहीं हैं, हम दलित आदिवासी शोषण के प्रति कितना संवेदनशील है।
यह एक्ट केवल दिखाने का दांत है,  खाने का दांत यह है कि जो सुप्रीम कोर्ट में बैठा जज कह रहा है। उसने पूरे कानून को अधिकारी की मर्जी का रखैल बना दिया एक झटके में। पहले यह अधिकारी की मनमर्जी से होता था, अब उसे सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्टिव के रूप में कानूनी सहारा मिल गया।
जब ये सब हो रहा है तो केंद में बीजेपी/ आरएसएस की सरकार है
देश का कौन सा ऐसा कानून है जिसका छिटपुट दुरुपयोग नहीं होता. ऐसा दावा कौन कर सकता है कि किसी कानून के तहत हर अपराधी को सजा मिल जाती है और कोई निर्दोष कभी नहीं फंसता. इस बहाने से SC-ST एक्ट को कमजोर करने की कोशिश बेहद गलत कार्रवाई है.
मात्र 29-30 साल में उनका ही बनाया कानून, उनके लिये बोझ हो गया।  अब वे इससे निजात पाना चाहते हैं.
लेकिन अब क्या दलित -पिछड़े एक कानून के चक्कर में नहीं है, वह तो कानून बनाने वाली राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर लेना चाहता है, कहां और कब तक रोक लेंगे आप?
कांशीराम से बीबीसी हिंदी वालों ने पूछा था कि ~ *आप अगर सरकार में आयेंगे तो दलित हित के लिये क्या -क्या कानून बनायेंगें?*
तब कांशीराम ने कहा था कि अभी हमें नये कानून बनाने की जरूरत क्या है, कांग्रेस और अन्य मनुवादी सरकार ने इतने कानून बनाया है कि~  हम उसे केवल लागू भर कर दे तो आधा सामाजिक परिवर्तन हो जायेगा।
भ्रष्टाचार पर तो एक बार ऐसा लगा कि (लोकपाल नामक सुपर पावर ) आयेगा, और कोई एक पाई भी रकम चुरा न पायेगा।
जब से *दलित वर्ग कानून के प्रति जागरूक हुआ* है *कानून को इंपलीमेंट करवाने* और *करने लगा* है.
तब से *न्यायालय* उन *कानूनों को डायलूट करने* का कोई न कोई *बहाना ढूंढ़ लेती है*
 1) आरक्षण का कोई मामला कोर्ट में चला जाय, क्या मजाल आरक्षण के पक्ष में कोई फैसला आ जाये।
2) दलित -पिछड़े का नरसंहार पर सारे के सारे आरोपी बरी हो गये।
3) एस सी /एस टी अत्याचार निवारण कानून भी अब बिना दांत और आंत का हो गया है ।
SC/ST एक्ट की धार कम करने के सारे नुकसानों के बावजूद ~ एक बड़ा फायदा जरूर होगा की~ जो बचे खुचे SC, ST स्वयं को अभी तक~ हिन्दू मानते आए हैं, उन्हें भी लिंगायतों की तरह समझ आ जायेगी कि~  वे हिन्दू नहीं हैं! हिन्दू धर्म के गुलाम हैं

बौद्ध धम्म को आसान हिंदी में समझने के लिए ये चैनल HINDIBUDDHISM सब्स्क्राइब/ज्वाइन करे व अपने सभी सामाजिक भाइयों को भी ज्वाइन करवाएं , लिंक इस प्रकार है : https://www.youtube.com/c/HINDIBUDDHISM

बौद्ध धम्म को आसान हिंदी में समझने के लिए ये चैनल HINDIBUDDHISM सब्स्क्राइब/ज्वाइन करे व अपने सभी सामाजिक भाइयों को भी ज्वाइन करवाएं , लिंक इस प्रकार है :
https://www.youtube.com/c/HINDIBUDDHISM