टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 21-mar-2018 की फ्रंट पेज की खबर है की SC/ST एक्ट में माननीय न्यायलय ने जिस प्रकार से परिवर्तन किये है उससे अब SC/ST पर जुल्म करने वालों की गिरफ़्तारी नहीं होगी मतलब उनका हौसला और बढ़ जाएगा , पर आपको क्या आप तब तक इन बातों को नहीं समझोगे की जब तक खुद नहीं पीटेंगे/मरेंगे ,आप तो मन्दिरबाजी पूजा पाठ मौज मस्ती जारी रखो ।


SC/ST एक्ट में माननीय न्यायलय ने जिस प्रकार से परिवर्तन किये है उसे उदाहरण के रूप में समझिये।
1. एक गरीब दलित अपनी फरियाद लेकर तहसील जाता है और वहाँ जग्गा ठा*र नाम का अधिकारी मिलता है, जग्गा ठा*र फरियाद सुनकर उसे उल्टा एक थप्पड़ मारकर यह कहता है की भाग साले चमार/भँगी के यहाँ से, उसके बाद जब पुलिस में शिकायत होगी तब पुलिस जग्गा ठाकुर को गिरफ्तार करने से पहले जग्गा ठा*र के अधिकारी जो की पक्का आईएएस, आईपीएस या फिर पीसीएस की रैंक का होगा से यह परमीशन लेगी की जग्गा को गिरफ्तार करे या नहीं। अब अगर उच्च अधिकारी भी ठाकुर, श्रीवास्तव, शर्मा, अग्रवाल होगा तो समझ जाए की उस गरीब दलित को एक थप्पड़ और मार दिया जाता तो भी कुछ नहीं होगा।
2. दूसरी व्यवस्था यह की गयी है की जग्गा ठा*र दलित को सार्वजनिक स्थान पर थप्पड़ बजाता है, जातिसूचक शब्द कहे जाते है, खूब पिटाई की जाती है तो भी FIR दर्ज होने के बाद पहले डिप्टी एसपी जांच करेगा, उसके बाद ही केस आगे बढ़ पायेगा। अब डिप्टी एसपी की मानसिकता पर यह निर्भर करेगा की केस दर्ज होना चाहिए या नहीं।
3. तीसरी व्यवस्था यह की गयी की जग्गा ठा*र दलित को थप्पड़ व गालियां देने के बाद न्यायलय में जाकर अग्रिम जमानत ले सकता है, जिसके बाद आराम से बाहर घूमेगा व जांच को प्रभावित कर सकता है।
अत: अब एससी एसटी एक्ट का कोई औचित्य नहीं रहा ऐ।  चलो मान लिया की दुरूपयोग हो रहा था, लेकिन इसका यह मतलब नही की एक्ट को एक तरह से निष्प्रभावी ही कर दिया जाए।
इसलिए दलितों को अब समझ लेना चाहिए की पूजा करने या व्रत रखने के बाद भी हजारो सालो से कोई भगवान बचाने नही आया है आपको अपनी सुरक्षा स्वयं करनी पड़ेगी। इसलिए अब मन्दिर में घण्टा वजाने की जगह, शोषण करने वाले के सर पर घण्टा बजाने का जज्बा लाइये।  तभी एट्रोसिटी कम होगी। नही तो “ओ साले चमार के, ओ साले भँगी के” सुनते रहे।
*SC और ST (अत्याचार निरोधक~ एट्रोसिटी ) अधिनियम 1989 प्रभाव शून्य बनाने का मनुवादी न्यायपालिका का षड्यंत*
जो काम मनुवादी सरकार नहीं कर पा रही है, वह न्यायपालिका द्वारा करवाया जा रहा है और मीडिया इन सबके लिए माहौल बना रही है ! न्यायालय का काम केवल सरकार को निर्देश देने का है न कि कानून बनाने का, पर यहाँ तो न्यायपालिका जिसमे सवर्ण बैठे है खुद अपने लाभ के लिए संविधान को बदल दे रहे है !
●-  SC-ST एक्ट को कमजोर करना
● – प्रमोशन में आरक्षण को खत्म करना
● – यूनिवर्सिटी की नियुक्तियों में SC-ST-OBC
.    आरक्षण को खत्म करना
 ●- SC-ST-OBC की स्कॉलरशिप को खत्म करना
*SC /ST activities prevention act 11 sept 1989 में बना, आजादी के 42 वर्ष बाद।*
इसको बनाने की मांग *न* आदिवासियों  *न* की थी,  न दलितों ने। इसे ब्राह्मण और द्विज बहुमत वाली संसद और सरकार ने बनाया था।
*सवाल है क्यों बनाया था?*
इसलिये बनाया था कि दलित आदिवासी का शोषण किया था उससे उसका दिल जीता जा सके, दुनिया को यह बताया जा सके कि हम शोषक नहीं हैं, हम दलित आदिवासी शोषण के प्रति कितना संवेदनशील है।
यह एक्ट केवल दिखाने का दांत है,  खाने का दांत यह है कि जो सुप्रीम कोर्ट में बैठा जज कह रहा है। उसने पूरे कानून को अधिकारी की मर्जी का रखैल बना दिया एक झटके में। पहले यह अधिकारी की मनमर्जी से होता था, अब उसे सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्टिव के रूप में कानूनी सहारा मिल गया।
जब ये सब हो रहा है तो केंद में बीजेपी/ आरएसएस की सरकार है
देश का कौन सा ऐसा कानून है जिसका छिटपुट दुरुपयोग नहीं होता. ऐसा दावा कौन कर सकता है कि किसी कानून के तहत हर अपराधी को सजा मिल जाती है और कोई निर्दोष कभी नहीं फंसता. इस बहाने से SC-ST एक्ट को कमजोर करने की कोशिश बेहद गलत कार्रवाई है.
मात्र 29-30 साल में उनका ही बनाया कानून, उनके लिये बोझ हो गया।  अब वे इससे निजात पाना चाहते हैं.
लेकिन अब क्या दलित -पिछड़े एक कानून के चक्कर में नहीं है, वह तो कानून बनाने वाली राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर लेना चाहता है, कहां और कब तक रोक लेंगे आप?
कांशीराम से बीबीसी हिंदी वालों ने पूछा था कि ~ *आप अगर सरकार में आयेंगे तो दलित हित के लिये क्या -क्या कानून बनायेंगें?*
तब कांशीराम ने कहा था कि अभी हमें नये कानून बनाने की जरूरत क्या है, कांग्रेस और अन्य मनुवादी सरकार ने इतने कानून बनाया है कि~  हम उसे केवल लागू भर कर दे तो आधा सामाजिक परिवर्तन हो जायेगा।
भ्रष्टाचार पर तो एक बार ऐसा लगा कि (लोकपाल नामक सुपर पावर ) आयेगा, और कोई एक पाई भी रकम चुरा न पायेगा।
जब से *दलित वर्ग कानून के प्रति जागरूक हुआ* है *कानून को इंपलीमेंट करवाने* और *करने लगा* है.
तब से *न्यायालय* उन *कानूनों को डायलूट करने* का कोई न कोई *बहाना ढूंढ़ लेती है*
 1) आरक्षण का कोई मामला कोर्ट में चला जाय, क्या मजाल आरक्षण के पक्ष में कोई फैसला आ जाये।
2) दलित -पिछड़े का नरसंहार पर सारे के सारे आरोपी बरी हो गये।
3) एस सी /एस टी अत्याचार निवारण कानून भी अब बिना दांत और आंत का हो गया है ।
SC/ST एक्ट की धार कम करने के सारे नुकसानों के बावजूद ~ एक बड़ा फायदा जरूर होगा की~ जो बचे खुचे SC, ST स्वयं को अभी तक~ हिन्दू मानते आए हैं, उन्हें भी लिंगायतों की तरह समझ आ जायेगी कि~  वे हिन्दू नहीं हैं! हिन्दू धर्म के गुलाम हैं

One thought on “टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 21-mar-2018 की फ्रंट पेज की खबर है की SC/ST एक्ट में माननीय न्यायलय ने जिस प्रकार से परिवर्तन किये है उससे अब SC/ST पर जुल्म करने वालों की गिरफ़्तारी नहीं होगी मतलब उनका हौसला और बढ़ जाएगा , पर आपको क्या आप तब तक इन बातों को नहीं समझोगे की जब तक खुद नहीं पीटेंगे/मरेंगे ,आप तो मन्दिरबाजी पूजा पाठ मौज मस्ती जारी रखो ।

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