छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती विशेष -छत्रपती शाहूजी महाराज एक ऐसे मातृह्रदयी राजा थे जिन्होंने मनुवादी व्यवस्था से पीड़ित पिछड़े समाज को अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर लिया था । उन्होंने पिछड़े समाज के दुःख-दर्द तथा जरूरतों को समझते हुए निवारण करने का बीड़ा उठाया ।…आजाद

छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती—*

छत्रपति शिवाजी के वंशज कोल्हापुर के शासक कुर्मी कुल गौरव छत्रपति शाहूजी महाराज के जन्मदिवस पर सादर नमन प्रणाम ।।

छत्रपती शाहूजी महाराज एक ऐसे मातृह्रदयी राजा थे जिन्होंने मनुवादी व्यवस्था से पीड़ित पिछड़े समाज को अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर लिया था । उन्होंने पिछड़े समाज के दुःख-दर्द तथा जरूरतों को समझते हुए निवारण करने का बीड़ा उठाया ।

इसलिए डा बाबा साहब अम्बेडकर ने उन्हें “The Pillar Of Social Democracy.” अर्थात सामाजिक लोकतंत्र का आधार स्तम्भ कहा था ।

बाबा साहब कहते थे कि, “शाहूजी महाराज का जन्मदिवस त्योंहार के रूप में मनाना चाहिए ।”

बाबा साहब अम्बेडकर से उनके भावनात्मक सम्बन्ध थे, वे बाबा साहब के सबसे बड़े हितैषी और सहयोगी थे, उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर को पिछड़ों के लिए उनका अपना हितैषी नेता घोषित किया था ।

छत्रपति शाहूजी महाराष्ट्र राज्य की कोल्हापुर रियासत के राजा थे । ये शूद्र कुर्मी जाति से थे । मूलनिवासियों (शूद्रां एवं अतिशूद्रों) के लिए शिक्षा का दरवाजा खोलकर उन्हें मुक्ति की राह दिखाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था । बहुजनों की हिस्सेदारी के जनक #_छत्रपति_शाहूजी_महाराज का जन्म #_26_जून_1874 को कोल्हापुर में हुआ था ।

उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबा साहब घाटगे तथा उनकी माता का नाम राधाबाई साहिबा था । छत्रपति शाहूजी के जन्म का नाम यशवंतराव था । आबा साहब; यशवंतराव के दादा थे । चौथे शिवाजी का अंत होने के बाद शिवाजी महाराज की पत्नी महारानी आनंदी बाई साहिबा ने 1884 में यशवंत राव को गोद लिया था । इसके बाद यशवंतराव का नाम शाहू छत्रपति रखा गया ।
इन्हें कोल्हापुर रियासत का वारिस भी बना दिया गया था ।

शिक्षा
छत्रपति शाहू महाराज की शिक्षा राजकोट में स्थापित राजकुमार महाविद्यालय में हुई । राजकोट की शिक्षा समाप्त करके शाहूजी को आगे की शिक्षा पाने के लिए 1890 से 1894 तक धाराबाड़ में रखा गया । छत्रपति शाहू महाराज ने अंग्रेजी, इतिहास और राज्य कारोबार चलाने की शिक्षा ग्रहण की ।

विवाह
अप्रैल 1897 में राजा शाहू का विवाह खान बिलकर की कन्या श्रीमंत लक्ष्मी बाई से संपन्न हुआ। विवाह के समय लक्ष्मी बाई की उम्र महज 11 वर्ष की ही थी ।

राज्याभिषेक
जब छत्रपति शाहूजी महाराज की आयु । 20 वर्ष थी तब इन्हांने कोल्हापुर रियासत के अधिकार ग्रहण करके सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली तथा शासन करने लगे । कहा जाता है कि जब 1894 में इनका राज्यभिषेक समारोह हुआ तो उनके शूद्र होने की वजह (हिन्दू धर्म के अनुसार) से ब्राह्मणों ने पैर के अँगूठे से उनका राजतिलक किया । इससे उन्हें बहुत पीड़ा हुई ।

आमतौर पर सभी राजाआें की छवि जनता की आमदनी को कर(Tex) के माध्यम से हड़पने एवं जबरन वसूली की थी लेकिन छत्रपति शाहू ने ऐसा नहीं किया । उन्होंने सबसे बड़ा काम राजव्यवस्था में परिवर्तन करके किया । उनका मानना था कि संस्थान की वृद्धि में उन्नति के लिए प्रशासन में हर जाति के लोगाें की सहभागिता जरूरी है ।

उस समय उनके प्रशासन में ज्यादातर ब्राह्मण जाति के लोग ही थे । जबकि बहुजन समाज के केवल 11 अधिकारी थे । ब्राह्मणों ने एक चाल के तहत बहुजन समाज को शिक्षा से दूर रखा था, ताकि पढ़-खिकर ये सरकार में शामिल न हो सकें। छत्रपति शाहूजी इस बात से चिंतित रहते थें । उन्हांने प्रशासन में ब्राह्मणों के इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए बहुजन समाज की भागीदारी के लिए #आरक्षण कानून बनाया ।

छत्रपति शाहूजी महाराज ने राजा बनते ही 28 साल की उम्र में 1902 में में वंचितों के लिए 50% आरक्षण लागू कर दिया । यह सामाजिक न्याय की दिशा में पहला बड़ा क़दम था ।

इस क्रान्तिकारी कानून के अंतर्गत बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी । जो देश में आरक्षण की यह पहली व्यवस्था थी । तब तक बहुजन समाज के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे । उन्हें तिरस्कार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था ।

गंगाधर काम्बले जो कि अछूत जाति के थे ।जिनकी चाय की दुकान खुलवाकर स्वयं महाराज चाय पीने जाते थे ताकि जाति प्रथा और ऊंच नीच को जड़ से मिटाया जा सके, इसलिए उन्हें सबसे बड़ा समाज सुधारक भी माना जाता है ।

उनका कहना था

“कल न मै होंऊगा, न आप होंगे, न राजा होंगे, न रजवाड़े होंगे । मगर यह राष्ट्र हमेशा रहेगा और हमे इसको आगे बढ़ाने का काम करते रहना है । समाज मे सबको सम्मान मिले, सभी शिक्षित होकर राष्ट्र के उत्थान मे भागीदार बनें । तभी हमारा जीवन सफल माना जायेगा ।”

छत्रपति शाहूजी के जीवन पर राष्ट्रपिता जोतिराव फुले का काफी प्रम्भाव था । राष्ट्रपिता फुले के देहांत के बाद महाराष्ट्र में चले सत्यशोधक समाज आन्दोलन का कारवां चलाने वाला कोई नायक नहीं था । 1910 से 1911 तक शाहूजी महाराज ने इस सत्यशोधक समाज आन्दोलन का अध्ययन किया ।
1911 मे राजा शाहूजी ने अपने संस्थान में सत्यशोधक समाज की स्थापना की ।

कोल्हापुर रियासत में शाहूजी महाराज ने गाँव-गाँव में सत्यशोधक समाज की शाखाओं का विस्तार किया । जिससे राष्ट्रपिता की विचारधारा गांव-गांव तक पहुंचाई जा सके । 18 अप्रैल 1901 में मराठा स्टूडेंट्स इंस्टीट्यूट एवं विक्टोरिया मराठा बोर्डिंग संस्थान की स्थापना की और 47 हजार रूपये खर्च करके इमारत बनवाई ।

1904 में जैन होस्टल, 1906 में मॉमेडन हॉस्टल और 1908 में अस्पृश्य मिल क्लार्क हॉस्टल जैसी संस्था का निर्माण करके छत्रपति शाहूजी महाराज ने शिक्षा फैलाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया । जो मील का पत्थर साबित हुआ ।

छत्रपति साहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे ।

इस पर उन्होंने कहा था कि –
“वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते ।”

साहू महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि –

“उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये । उनका स्पष्ट कहना था कि – “छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा । उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए । जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है ।”

छत्रपति शाहूजी महाराज का कार्यकाल 1892 से 1922 तक रहा । छत्रपति शाहूजी महाराज का शासनकाल बहुजन समाज के उत्थान का स्वर्णिम काल रहा ।
कुछ उल्लेखनीय कार्य इस प्रकार से हैं –

1. 1901 में कोल्हापुर स्टेट की जनगणना कराकर अछूतों की दयनीय दशा को सार्वजनिक कराया ।
2. मंत्री पद एवं नौकरियों में पिछड़ा वर्ग की भागीदारी न के बराबर थी, जिसे आरक्षण कानून के माध्यम से 50% कराया और सख्ताई से लागू करवाया ।
3. नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान ।
4. अस्पृश्यता निवारण कानून एवं व्यवहारिक कार्य ।
5. घोषित अपराधिक जातियों की प्रतिदिन पुलिस थानों में हाजिरी देने की प्रथा को बंद कराया ।
6. 1920 में बंधुआ मजदूरी की समाप्ति का कानून ।
7. 1900-1905 तक वेदोक्त प्रकरण में धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणों की वर्चस्वता को चुनौती दी ।
8. सत्यशोधक समाज (1897 से) के अध्ययन से राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के इस निष्कर्ष तक पहुंचे की जाति व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था मानव निर्मित है व पिछड़े वर्ग को अपना अलग संगठन बनाना चाहिए जिसमें उच्च वर्णों का प्रवेश निषेध हो क्योंकि उच्च वर्णों का नेतृत्व पिछड़े वर्ग के लिए हितकारी नहीं है ।
9. मजदूर, किसानों के हित कार्य जैसे ग्राम अधिकारी पिछड़े वर्ग से चुने गए, सहकारी समिति गठन आदि ।
10. हिंदू विधि संहिताकरण से अंतर्जातीय व अंतरवर्ण विवाह को अनुमति, विधवा विवाह कानून 1917, महिला दूर्व्यवहार समाप्त करने संबंधी कानून 1919, जगतीन व देवदासी प्रथा प्रतिबंधित कानून 1920, समान दंड प्रक्रिया संहिता 1909 से लागू की ।

दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने दो ऐसी विशेष प्रथाओं का अंत किया जो युगांतरकारी साबित हुई ।

पहला,1917 में उन्होंने उस ‘बलूतदारी-प्रथा’ का अंत किया,जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गांव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थीं ।
इसी तरह 1918 में उन्होंने कानून बनाकर राज्य की एक और पुरानी प्रथा ‘वतनदारी’ का अंत किया तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया । इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई ।

दलित हितैषी उसी कोल्हापुर नरेश ने 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था-

‘मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हे तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है । मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे । ’उन्होंने दलितों के मुक्तिदाता की महज जुबानी प्रशंसा नहीं की बल्कि उनकी अधूरी पड़ी विदेशी शिक्षा पूरी करने तथा दलित-मुक्ति के लिए राजनीति को हथियार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किया । किन्तु वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों के हित में किये गए ढेरों कार्यों के बावजूद इतिहास में उन्हें जिस बात के लिए खास तौर से याद किया जाता है, वह है उनके द्वारा किया गया आरक्षण का प्रावधान ।

15 अप्रैल, 1920 को नासिक में ‘उदोजी विद्यार्थी’ छात्रावास की नीव का पत्थर रखते हुए साहू महाराज ने कहा था कि-

“जातिवाद का अंत ज़रूरी है । जाति को समर्थन देना अपराध है । हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है । जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं । निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए ।”

अज्ञानी और पिछड़े बहुजन समाज को ज्ञानी, संपन्न एवं उन्नत बनाने हेतु छत्रपति राजा ने अपने जीवन का एक एक क्षण दिया है ।

छत्रपति साहूजी महाराज का निधन 10 मई, 1922 मुम्बई में हुआ । महाराज ने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी थी । उनका समाज के किसी भी वर्ग से किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं था । साहू महाराज के मन में दलित वर्ग के प्रति गहरा लगाव था । उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये थे, वह इतिहास में याद रखे जायेंगे ।

~आजाद

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गौतम बुद्ध और उनके धम्म पर विदेशी विद्वान और फिलोसोफर के विचार (असल में बौद्ध धम्म बुद्धिजीवियों के लिए महान है क्योंकि वो समझ सकते हैं , आम आदमी के लिए समझना कठिन है क्यों की वो उतनी बौद्धिक संगर्ष नहीं कर पाते)

*क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:*

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1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*
“बुद्ध और उनका धर्म ही एक दिन दुनिया पर राज करेगा, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है। जो समता और बन्धुत्व का मार्गदर्शन करता है”।
2. *हर्बर्ट वेल्स (1846 – 1946):*
” बुद्धिज्म का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया बुद्ध और बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही मानवता का असली विकास शुरू होगा और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । प्रणाम हो उस दिन को। जब बुद्ध हँसेगा। और दिन दुनिया के सारे नकली भगवान् उनके चरणों में दिखाई देंगे “।
3. *अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 – 1955):*
“मैं समझता हूँ कि बुद्ध ही ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो दुनिया का कोई भी खुद को भगवान् माननेवाले न कर सके । बोधिसत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती वर्ना सारे धर्मो में उच्च नीच और काले गोरे का भेदभाव है। येशु के गुरु भी भगवान् बुद्ध थे। येशु ने 13 साल तक  काश्मीर में रहकर बुद्ध धर्म को सीखा। और यूरोप में भगवान् को पुत्र कहकर बुद्ध की बाते जन जन तक पहुचाई। ये बात और है की। यूरोपीयन अब इस बात से इनकार करते है। पर सत्य यही है”।
4. *हस्टन स्मिथ (1919):*
“जिसने खुद पर विश्वास करना सिखाया है। वो बौद्ध धर्म है। वरना कई लोग धर्म पंडितो और पथ्थर की मूर्तियो पर अंधविश्वास कर अन्धकार में भटकते रहे। इसलिए बौद्ध धर्म से सरल और शान्ति देने वाला दुनिया में बेहतर कोई धर्म ही नहीं है। जो भी दुनिया में है तो वो बुद्धिज्म है। जिसे लाइट ऑफ़ आशिया कहा जाता है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी। वरना अंधकार में भटकते रह जाओगे जैसे आज भी भारतीय अन्धकार में भटक रहे है। और बुद्ध का ज्ञान लेकर चायना जापान और यूरोप आगे बढ़ रहा है।”
5. *माइकल नोस्टरैडैमस (1503 – 1566):*
” बौद्ध धर्म ही यूरोप में शासक धर्म बन जाता। खुद को बुद्ध के पुत्र कहलानेवाले येशु जो बुद्ध धर्म का ज्ञान लेकर यूरोप आये थे। उन्हें सूली पर न चढ़ाया जाता। तो आशिया ही नहीं बल्कि यूरोप का हर प्रसिद्ध शहर बौद्ध धर्म की राजधानी बन जाता। पर बुद्ध का प्रभाव अभी खत्म नहीं हुआ। अब तक आधी दुनिया बौद्धमय हो गई है।”।
6. *बर्टरेंड रसेल (1872 – 1970):*
“मैंने बुद्ध और बुद्धिज्म को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । बुद्ध धर्म पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में बौद्ध को दुनिया के सामने लाने वाले बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि बुद्ध धर्म ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना का केंद्र होगा “।
7. *गोस्टा लोबोन (1841 – 1931):*
” बुद्ध ही सुलह और सुधार की बात करता है। सुलह और सुधार ही के विश्वास की सराहना के लिये में दुनिया सभी लोगो को बौद्ध धर्म में आमंत्रित करता हूँ”।
8.  *बरनार्ड शा (1856 – 1950):*
“सारी दुनिया एक दिन बुद्ध धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन बुद्धिज्म स्वीकार कर लेगा और बुद्ध धर्म ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा। जो आज विकास का धर्म बना है। बौद्ध धर्म दुनिया का पहला धर्म है। जो व्यक्ति को विज्ञान सिखाता है। ना की अंधविश्वास में रखकर मानवता को सरेआम घायल करता है। बौद्ध धर्म में नारी और नर एक समान है। बौद्ध धर्म में तो पशुओ को तक प्रेम से रखने की शिक्षा दी जाती है”
9. *जोहान गीथ (1749 – 1832):*
“हम सभी को अभी या बाद मे बौद्ध धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही दुनिया का असली धर्म है ।मुझे कोई बुद्धिस्ट कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।”

लेख का शीर्षक- यशवंतराव सच बोलता था| बाबासाहेब अम्बेडकर [ 1891-1956] को जानते होंगे पर आपने कभी उनके पुत्र यशवंतराव अम्बेडकर [1912-1977]  का नाम नही सुना होगा| इसका कारण यह है कि यशवंतराव अम्बेडकर ने स्वयम को बहुजन आंदोलन से अलग रखा| वो अपने पिता से खिन्न थे और घर मे पिता पुत्र के बीच बहुत विवाद होते थे| 

लेख का शीर्षक- यशवंतराव सच बोलता था|
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आप मे से ज्यादातर लोग बाबासाहेब अम्बेडकर [ 1891-1956] को जानते होंगे पर आपने कभी उनके पुत्र यशवंतराव अम्बेडकर [1912-1977]  का नाम नही सुना होगा| इसका कारण यह है कि यशवंतराव अम्बेडकर ने स्वयम को बहुजन आंदोलन से अलग रखा| वो अपने पिता से खिन्न थे और घर मे पिता पुत्र के बीच बहुत विवाद होते थे|
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1935 मे माता  रमा बाई की म्रत्यु के बाद विवाद इतना बढा कि बाबासाहेब दुखी हो गये और फिर  उन्होने यशवंतराव जी को व्यस्त रखने  के लिये के लिये उनके नाम पे  एक निजी प्रिंटिंग प्रेस खोल दिया|  उस प्रिंटिंग प्रेस के संचालन मे यशवंतराव जी ने स्वयम को  पुरी तरह झोंक दिया और  दूसरे घर मे रहने लगे|
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आखिर क्या वजह थी कि बाबासाहेब का  एकमात्र पुत्र  यशवंतराव अम्बेडकर उनसे नफरत करता था? वजह जान के आप भी मानने लगोगे कि यशवंतराव अम्बेडकर का गुस्सा ज़ायज़ था और वो सच बोलता था|
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बाबासाहेब का विवाह 1907 मे हुआ था और विवाह के 5 वर्ष बाद 1912 मे यशवंतराव अम्बेडकर जी पैदा हुये थे|
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यशवंतराव ने अपनी आंखो के सामने अपने तीन भाईयो गंगाधर,रामादेश, राजरतन और एक बहन इंदु को भूख और बीमारी से दम तोडते देखा| वह रोकता था अपने पिता को और कहता था कि क्यु करते हो व्यर्थ मेहनत|  ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और दिन रात मंदिर मे घुसने के सपने देखेंगे | और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव ने देखा कि उसके भाई राजरतन की लाश को शमशान ले जाने की जगह उसके पिता दलितो के लिये बनाये गये साईमन कमीशन की मीटिंग अटेंड करने चले गये|  राजरतन की लाश को शमशान उसके चाचा और दूसरे लोग ले गये थे|
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यशवंतराव ने देखा कि उसके भाई राजरतन की लाश को ढांकने के कफन के लिये उनके पास पेसा नही था| उसने देखा कि  उसकी माता ने अपनी साडी का एक छोटा टुकडा  फाड के कफन की व्यवस्था की|   वह कोसता था अपने पिता को और कहता था कि इन एहसान फरामोश दलितो की भलाई के  लिये क्यु मेरी माता को रुला रहे हो| ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और उपवास रखने मे सवर्नो से होड करेंगे  | और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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 यशवंतराव ने बचपन से ही देखा कि किस तरह उसके पिता अपने परिवार को नज़र अंदाज़ करके दलितो के उत्थान के लिये प्रयासरत थे| बाबासाहेब सन 1917 से ही अंग्रेज सरकार को भारत मे दलितो को अधिकार दिलाने के लिये हर महीने पत्र लिखते थे| 1917 से ले के 1947 तक , 30 साल तक लिखे पत्रो का ही असर था कि आजादी देते वक़्त अंग्रेजो ने शर्त रख दी कि सम्विधान बाबासाहेब से लिखाया जायेगा और दलितो को आरक्षण दिया जायेगा |
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यशवंतराव ने अपनी आंखो से देखा कि उसका पिता तो स्कोलरशिप पे कोलम्बिया मे पढ रहा है और  मुम्बई जेसे बडे शहर मे अपना खर्च चलाने के लिये  उसकी माता गोबर के उपले बना बना के बेचती है| उसने देखा कि उसकी मां अपने बच्चो के इलाज़ के लिये अपने रिश्तेदारो से बार बार वित्तीय सहायता हेतु विनती करती है और रिश्तेदार इधर उधर के बहाने बना के टाल देते हैं | वह कोसता था अपने पिता को और कहता था कि इन एहसान फरामोश दलितो के लिये क्यु अपने परिवारजनो को दुखी कर रहे हो, ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और दिन रात देवी देवताओ के भजन गायेंगे | और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव ने अपनी आंखो से अपनी माता रमाबाई को सन 1935 मे भूख और बीमारी से दम तोडते देखा| 
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इन सब अनुभवो ने छोटी उम्र मे ही यशवंतराव को दुनिया की कडवी हक़ीकत से वाकिफ करा दिया| वो जानता था कि बाबासाहेब चाहे अपनी जान न्योछावर कर  दे दलितो के उत्थान के लिये, ये एहसान फरामोश दलित कभी उनका बलिदान ना समझेंगे| ये गद्दार लोग बासाहेब को भूल जायेंगे और बढ चढ के जगराता आदि करायेंगे| और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव जानता था कि यही दलित बाबासाहेब की जयंती मे 10 रुपये का चंदा देने मे नाक भौ सिकोडेंगे और मंदिर बनाने के लिये 5000-10,000 रुपये आसानी से देंगे| और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव जानता था कि जब किसी शहर मे बाबासाहेब की जयंती मनायी जायेगी तो शहर के 20-30 हजार दलितो मे से केवल 100-150 लोग ही जयंती मनाने आयेंगे ताकि कोई उन्हे महार/चमार/भंगी ना समझ बैठे| और बाद मे यही हुआ | यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव जानता था कि आरक्षण का फायदा उठा के यही दलित लोग सबसे पहले अपने लिये केवल गाडी और बंगले का इंतेज़ाम करेंगे और दुसरे दलित भाईयो की परछाई से भी दूर रहेंगे| एक बंगला बन जाने के बाद दुसरे बंगले का इंतेज़ाम करेंगे| और दूसरा बंगला बन जाने के बाद तीसरे बंगले का इंतेज़ाम करेंगे|  और बाद मे यही हुआ | यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव सच बोलता था|
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अगर बाबासाहेब का ज़रा भी सम्मान करते हो तो इस मेसेज को फैलायें और समाज के गद्दारो तक ज़रूर पहुचाये ताकि उन्हे भी पता चले कि बाबासाहेब ने उनके लिये कितनी कुर्बानिया दी है|