बौद्ध धम्म को आसान हिंदी में समझने के लिए निम्न वीडियो सीरीज देखो सुनो , इसमें बौद्ध धम्म का सार या निचोड़ आसान हिंदी में मोहक वीडियो और संगीत सहित समझाया गया है , कृपया इस चैनल को ज्वाइन और सब्सक्राइब भी करें

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गौतम बुद्ध और उनके धम्म पर विदेशी विद्वान और फिलोसोफर के विचार (असल में बौद्ध धम्म बुद्धिजीवियों के लिए महान है क्योंकि वो समझ सकते हैं , आम आदमी के लिए समझना कठिन है क्यों की वो उतनी बौद्धिक संगर्ष नहीं कर पाते)

*क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:*

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1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*
“बुद्ध और उनका धर्म ही एक दिन दुनिया पर राज करेगा, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है। जो समता और बन्धुत्व का मार्गदर्शन करता है”।
2. *हर्बर्ट वेल्स (1846 – 1946):*
” बुद्धिज्म का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया बुद्ध और बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही मानवता का असली विकास शुरू होगा और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । प्रणाम हो उस दिन को। जब बुद्ध हँसेगा। और दिन दुनिया के सारे नकली भगवान् उनके चरणों में दिखाई देंगे “।
3. *अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 – 1955):*
“मैं समझता हूँ कि बुद्ध ही ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो दुनिया का कोई भी खुद को भगवान् माननेवाले न कर सके । बोधिसत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती वर्ना सारे धर्मो में उच्च नीच और काले गोरे का भेदभाव है। येशु के गुरु भी भगवान् बुद्ध थे। येशु ने 13 साल तक  काश्मीर में रहकर बुद्ध धर्म को सीखा। और यूरोप में भगवान् को पुत्र कहकर बुद्ध की बाते जन जन तक पहुचाई। ये बात और है की। यूरोपीयन अब इस बात से इनकार करते है। पर सत्य यही है”।
4. *हस्टन स्मिथ (1919):*
“जिसने खुद पर विश्वास करना सिखाया है। वो बौद्ध धर्म है। वरना कई लोग धर्म पंडितो और पथ्थर की मूर्तियो पर अंधविश्वास कर अन्धकार में भटकते रहे। इसलिए बौद्ध धर्म से सरल और शान्ति देने वाला दुनिया में बेहतर कोई धर्म ही नहीं है। जो भी दुनिया में है तो वो बुद्धिज्म है। जिसे लाइट ऑफ़ आशिया कहा जाता है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी। वरना अंधकार में भटकते रह जाओगे जैसे आज भी भारतीय अन्धकार में भटक रहे है। और बुद्ध का ज्ञान लेकर चायना जापान और यूरोप आगे बढ़ रहा है।”
5. *माइकल नोस्टरैडैमस (1503 – 1566):*
” बौद्ध धर्म ही यूरोप में शासक धर्म बन जाता। खुद को बुद्ध के पुत्र कहलानेवाले येशु जो बुद्ध धर्म का ज्ञान लेकर यूरोप आये थे। उन्हें सूली पर न चढ़ाया जाता। तो आशिया ही नहीं बल्कि यूरोप का हर प्रसिद्ध शहर बौद्ध धर्म की राजधानी बन जाता। पर बुद्ध का प्रभाव अभी खत्म नहीं हुआ। अब तक आधी दुनिया बौद्धमय हो गई है।”।
6. *बर्टरेंड रसेल (1872 – 1970):*
“मैंने बुद्ध और बुद्धिज्म को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । बुद्ध धर्म पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में बौद्ध को दुनिया के सामने लाने वाले बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि बुद्ध धर्म ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना का केंद्र होगा “।
7. *गोस्टा लोबोन (1841 – 1931):*
” बुद्ध ही सुलह और सुधार की बात करता है। सुलह और सुधार ही के विश्वास की सराहना के लिये में दुनिया सभी लोगो को बौद्ध धर्म में आमंत्रित करता हूँ”।
8.  *बरनार्ड शा (1856 – 1950):*
“सारी दुनिया एक दिन बुद्ध धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन बुद्धिज्म स्वीकार कर लेगा और बुद्ध धर्म ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा। जो आज विकास का धर्म बना है। बौद्ध धर्म दुनिया का पहला धर्म है। जो व्यक्ति को विज्ञान सिखाता है। ना की अंधविश्वास में रखकर मानवता को सरेआम घायल करता है। बौद्ध धर्म में नारी और नर एक समान है। बौद्ध धर्म में तो पशुओ को तक प्रेम से रखने की शिक्षा दी जाती है”
9. *जोहान गीथ (1749 – 1832):*
“हम सभी को अभी या बाद मे बौद्ध धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही दुनिया का असली धर्म है ।मुझे कोई बुद्धिस्ट कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।”

लेख का शीर्षक- यशवंतराव सच बोलता था| बाबासाहेब अम्बेडकर [ 1891-1956] को जानते होंगे पर आपने कभी उनके पुत्र यशवंतराव अम्बेडकर [1912-1977]  का नाम नही सुना होगा| इसका कारण यह है कि यशवंतराव अम्बेडकर ने स्वयम को बहुजन आंदोलन से अलग रखा| वो अपने पिता से खिन्न थे और घर मे पिता पुत्र के बीच बहुत विवाद होते थे| 

लेख का शीर्षक- यशवंतराव सच बोलता था|
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आप मे से ज्यादातर लोग बाबासाहेब अम्बेडकर [ 1891-1956] को जानते होंगे पर आपने कभी उनके पुत्र यशवंतराव अम्बेडकर [1912-1977]  का नाम नही सुना होगा| इसका कारण यह है कि यशवंतराव अम्बेडकर ने स्वयम को बहुजन आंदोलन से अलग रखा| वो अपने पिता से खिन्न थे और घर मे पिता पुत्र के बीच बहुत विवाद होते थे|
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1935 मे माता  रमा बाई की म्रत्यु के बाद विवाद इतना बढा कि बाबासाहेब दुखी हो गये और फिर  उन्होने यशवंतराव जी को व्यस्त रखने  के लिये के लिये उनके नाम पे  एक निजी प्रिंटिंग प्रेस खोल दिया|  उस प्रिंटिंग प्रेस के संचालन मे यशवंतराव जी ने स्वयम को  पुरी तरह झोंक दिया और  दूसरे घर मे रहने लगे|
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आखिर क्या वजह थी कि बाबासाहेब का  एकमात्र पुत्र  यशवंतराव अम्बेडकर उनसे नफरत करता था? वजह जान के आप भी मानने लगोगे कि यशवंतराव अम्बेडकर का गुस्सा ज़ायज़ था और वो सच बोलता था|
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बाबासाहेब का विवाह 1907 मे हुआ था और विवाह के 5 वर्ष बाद 1912 मे यशवंतराव अम्बेडकर जी पैदा हुये थे|
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यशवंतराव ने अपनी आंखो के सामने अपने तीन भाईयो गंगाधर,रामादेश, राजरतन और एक बहन इंदु को भूख और बीमारी से दम तोडते देखा| वह रोकता था अपने पिता को और कहता था कि क्यु करते हो व्यर्थ मेहनत|  ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और दिन रात मंदिर मे घुसने के सपने देखेंगे | और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव ने देखा कि उसके भाई राजरतन की लाश को शमशान ले जाने की जगह उसके पिता दलितो के लिये बनाये गये साईमन कमीशन की मीटिंग अटेंड करने चले गये|  राजरतन की लाश को शमशान उसके चाचा और दूसरे लोग ले गये थे|
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यशवंतराव ने देखा कि उसके भाई राजरतन की लाश को ढांकने के कफन के लिये उनके पास पेसा नही था| उसने देखा कि  उसकी माता ने अपनी साडी का एक छोटा टुकडा  फाड के कफन की व्यवस्था की|   वह कोसता था अपने पिता को और कहता था कि इन एहसान फरामोश दलितो की भलाई के  लिये क्यु मेरी माता को रुला रहे हो| ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और उपवास रखने मे सवर्नो से होड करेंगे  | और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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 यशवंतराव ने बचपन से ही देखा कि किस तरह उसके पिता अपने परिवार को नज़र अंदाज़ करके दलितो के उत्थान के लिये प्रयासरत थे| बाबासाहेब सन 1917 से ही अंग्रेज सरकार को भारत मे दलितो को अधिकार दिलाने के लिये हर महीने पत्र लिखते थे| 1917 से ले के 1947 तक , 30 साल तक लिखे पत्रो का ही असर था कि आजादी देते वक़्त अंग्रेजो ने शर्त रख दी कि सम्विधान बाबासाहेब से लिखाया जायेगा और दलितो को आरक्षण दिया जायेगा |
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यशवंतराव ने अपनी आंखो से देखा कि उसका पिता तो स्कोलरशिप पे कोलम्बिया मे पढ रहा है और  मुम्बई जेसे बडे शहर मे अपना खर्च चलाने के लिये  उसकी माता गोबर के उपले बना बना के बेचती है| उसने देखा कि उसकी मां अपने बच्चो के इलाज़ के लिये अपने रिश्तेदारो से बार बार वित्तीय सहायता हेतु विनती करती है और रिश्तेदार इधर उधर के बहाने बना के टाल देते हैं | वह कोसता था अपने पिता को और कहता था कि इन एहसान फरामोश दलितो के लिये क्यु अपने परिवारजनो को दुखी कर रहे हो, ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और दिन रात देवी देवताओ के भजन गायेंगे | और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव ने अपनी आंखो से अपनी माता रमाबाई को सन 1935 मे भूख और बीमारी से दम तोडते देखा| 
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इन सब अनुभवो ने छोटी उम्र मे ही यशवंतराव को दुनिया की कडवी हक़ीकत से वाकिफ करा दिया| वो जानता था कि बाबासाहेब चाहे अपनी जान न्योछावर कर  दे दलितो के उत्थान के लिये, ये एहसान फरामोश दलित कभी उनका बलिदान ना समझेंगे| ये गद्दार लोग बासाहेब को भूल जायेंगे और बढ चढ के जगराता आदि करायेंगे| और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव जानता था कि यही दलित बाबासाहेब की जयंती मे 10 रुपये का चंदा देने मे नाक भौ सिकोडेंगे और मंदिर बनाने के लिये 5000-10,000 रुपये आसानी से देंगे| और बाद मे यही हुआ |  यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव जानता था कि जब किसी शहर मे बाबासाहेब की जयंती मनायी जायेगी तो शहर के 20-30 हजार दलितो मे से केवल 100-150 लोग ही जयंती मनाने आयेंगे ताकि कोई उन्हे महार/चमार/भंगी ना समझ बैठे| और बाद मे यही हुआ | यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव जानता था कि आरक्षण का फायदा उठा के यही दलित लोग सबसे पहले अपने लिये केवल गाडी और बंगले का इंतेज़ाम करेंगे और दुसरे दलित भाईयो की परछाई से भी दूर रहेंगे| एक बंगला बन जाने के बाद दुसरे बंगले का इंतेज़ाम करेंगे| और दूसरा बंगला बन जाने के बाद तीसरे बंगले का इंतेज़ाम करेंगे|  और बाद मे यही हुआ | यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव सच बोलता था|
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यशवंतराव सच बोलता था|
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अगर बाबासाहेब का ज़रा भी सम्मान करते हो तो इस मेसेज को फैलायें और समाज के गद्दारो तक ज़रूर पहुचाये ताकि उन्हे भी पता चले कि बाबासाहेब ने उनके लिये कितनी कुर्बानिया दी है|