छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती विशेष -छत्रपती शाहूजी महाराज एक ऐसे मातृह्रदयी राजा थे जिन्होंने मनुवादी व्यवस्था से पीड़ित पिछड़े समाज को अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर लिया था । उन्होंने पिछड़े समाज के दुःख-दर्द तथा जरूरतों को समझते हुए निवारण करने का बीड़ा उठाया ।…आजाद


छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती—*

छत्रपति शिवाजी के वंशज कोल्हापुर के शासक कुर्मी कुल गौरव छत्रपति शाहूजी महाराज के जन्मदिवस पर सादर नमन प्रणाम ।।

छत्रपती शाहूजी महाराज एक ऐसे मातृह्रदयी राजा थे जिन्होंने मनुवादी व्यवस्था से पीड़ित पिछड़े समाज को अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर लिया था । उन्होंने पिछड़े समाज के दुःख-दर्द तथा जरूरतों को समझते हुए निवारण करने का बीड़ा उठाया ।

इसलिए डा बाबा साहब अम्बेडकर ने उन्हें “The Pillar Of Social Democracy.” अर्थात सामाजिक लोकतंत्र का आधार स्तम्भ कहा था ।

बाबा साहब कहते थे कि, “शाहूजी महाराज का जन्मदिवस त्योंहार के रूप में मनाना चाहिए ।”

बाबा साहब अम्बेडकर से उनके भावनात्मक सम्बन्ध थे, वे बाबा साहब के सबसे बड़े हितैषी और सहयोगी थे, उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर को पिछड़ों के लिए उनका अपना हितैषी नेता घोषित किया था ।

छत्रपति शाहूजी महाराष्ट्र राज्य की कोल्हापुर रियासत के राजा थे । ये शूद्र कुर्मी जाति से थे । मूलनिवासियों (शूद्रां एवं अतिशूद्रों) के लिए शिक्षा का दरवाजा खोलकर उन्हें मुक्ति की राह दिखाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था । बहुजनों की हिस्सेदारी के जनक #_छत्रपति_शाहूजी_महाराज का जन्म #_26_जून_1874 को कोल्हापुर में हुआ था ।

उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबा साहब घाटगे तथा उनकी माता का नाम राधाबाई साहिबा था । छत्रपति शाहूजी के जन्म का नाम यशवंतराव था । आबा साहब; यशवंतराव के दादा थे । चौथे शिवाजी का अंत होने के बाद शिवाजी महाराज की पत्नी महारानी आनंदी बाई साहिबा ने 1884 में यशवंत राव को गोद लिया था । इसके बाद यशवंतराव का नाम शाहू छत्रपति रखा गया ।
इन्हें कोल्हापुर रियासत का वारिस भी बना दिया गया था ।

शिक्षा
छत्रपति शाहू महाराज की शिक्षा राजकोट में स्थापित राजकुमार महाविद्यालय में हुई । राजकोट की शिक्षा समाप्त करके शाहूजी को आगे की शिक्षा पाने के लिए 1890 से 1894 तक धाराबाड़ में रखा गया । छत्रपति शाहू महाराज ने अंग्रेजी, इतिहास और राज्य कारोबार चलाने की शिक्षा ग्रहण की ।

विवाह
अप्रैल 1897 में राजा शाहू का विवाह खान बिलकर की कन्या श्रीमंत लक्ष्मी बाई से संपन्न हुआ। विवाह के समय लक्ष्मी बाई की उम्र महज 11 वर्ष की ही थी ।

राज्याभिषेक
जब छत्रपति शाहूजी महाराज की आयु । 20 वर्ष थी तब इन्हांने कोल्हापुर रियासत के अधिकार ग्रहण करके सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली तथा शासन करने लगे । कहा जाता है कि जब 1894 में इनका राज्यभिषेक समारोह हुआ तो उनके शूद्र होने की वजह (हिन्दू धर्म के अनुसार) से ब्राह्मणों ने पैर के अँगूठे से उनका राजतिलक किया । इससे उन्हें बहुत पीड़ा हुई ।

आमतौर पर सभी राजाआें की छवि जनता की आमदनी को कर(Tex) के माध्यम से हड़पने एवं जबरन वसूली की थी लेकिन छत्रपति शाहू ने ऐसा नहीं किया । उन्होंने सबसे बड़ा काम राजव्यवस्था में परिवर्तन करके किया । उनका मानना था कि संस्थान की वृद्धि में उन्नति के लिए प्रशासन में हर जाति के लोगाें की सहभागिता जरूरी है ।

उस समय उनके प्रशासन में ज्यादातर ब्राह्मण जाति के लोग ही थे । जबकि बहुजन समाज के केवल 11 अधिकारी थे । ब्राह्मणों ने एक चाल के तहत बहुजन समाज को शिक्षा से दूर रखा था, ताकि पढ़-खिकर ये सरकार में शामिल न हो सकें। छत्रपति शाहूजी इस बात से चिंतित रहते थें । उन्हांने प्रशासन में ब्राह्मणों के इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए बहुजन समाज की भागीदारी के लिए #आरक्षण कानून बनाया ।

छत्रपति शाहूजी महाराज ने राजा बनते ही 28 साल की उम्र में 1902 में में वंचितों के लिए 50% आरक्षण लागू कर दिया । यह सामाजिक न्याय की दिशा में पहला बड़ा क़दम था ।

इस क्रान्तिकारी कानून के अंतर्गत बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी । जो देश में आरक्षण की यह पहली व्यवस्था थी । तब तक बहुजन समाज के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे । उन्हें तिरस्कार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था ।

गंगाधर काम्बले जो कि अछूत जाति के थे ।जिनकी चाय की दुकान खुलवाकर स्वयं महाराज चाय पीने जाते थे ताकि जाति प्रथा और ऊंच नीच को जड़ से मिटाया जा सके, इसलिए उन्हें सबसे बड़ा समाज सुधारक भी माना जाता है ।

उनका कहना था

“कल न मै होंऊगा, न आप होंगे, न राजा होंगे, न रजवाड़े होंगे । मगर यह राष्ट्र हमेशा रहेगा और हमे इसको आगे बढ़ाने का काम करते रहना है । समाज मे सबको सम्मान मिले, सभी शिक्षित होकर राष्ट्र के उत्थान मे भागीदार बनें । तभी हमारा जीवन सफल माना जायेगा ।”

छत्रपति शाहूजी के जीवन पर राष्ट्रपिता जोतिराव फुले का काफी प्रम्भाव था । राष्ट्रपिता फुले के देहांत के बाद महाराष्ट्र में चले सत्यशोधक समाज आन्दोलन का कारवां चलाने वाला कोई नायक नहीं था । 1910 से 1911 तक शाहूजी महाराज ने इस सत्यशोधक समाज आन्दोलन का अध्ययन किया ।
1911 मे राजा शाहूजी ने अपने संस्थान में सत्यशोधक समाज की स्थापना की ।

कोल्हापुर रियासत में शाहूजी महाराज ने गाँव-गाँव में सत्यशोधक समाज की शाखाओं का विस्तार किया । जिससे राष्ट्रपिता की विचारधारा गांव-गांव तक पहुंचाई जा सके । 18 अप्रैल 1901 में मराठा स्टूडेंट्स इंस्टीट्यूट एवं विक्टोरिया मराठा बोर्डिंग संस्थान की स्थापना की और 47 हजार रूपये खर्च करके इमारत बनवाई ।

1904 में जैन होस्टल, 1906 में मॉमेडन हॉस्टल और 1908 में अस्पृश्य मिल क्लार्क हॉस्टल जैसी संस्था का निर्माण करके छत्रपति शाहूजी महाराज ने शिक्षा फैलाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया । जो मील का पत्थर साबित हुआ ।

छत्रपति साहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे ।

इस पर उन्होंने कहा था कि –
“वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते ।”

साहू महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि –

“उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये । उनका स्पष्ट कहना था कि – “छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा । उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए । जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है ।”

छत्रपति शाहूजी महाराज का कार्यकाल 1892 से 1922 तक रहा । छत्रपति शाहूजी महाराज का शासनकाल बहुजन समाज के उत्थान का स्वर्णिम काल रहा ।
कुछ उल्लेखनीय कार्य इस प्रकार से हैं –

1. 1901 में कोल्हापुर स्टेट की जनगणना कराकर अछूतों की दयनीय दशा को सार्वजनिक कराया ।
2. मंत्री पद एवं नौकरियों में पिछड़ा वर्ग की भागीदारी न के बराबर थी, जिसे आरक्षण कानून के माध्यम से 50% कराया और सख्ताई से लागू करवाया ।
3. नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान ।
4. अस्पृश्यता निवारण कानून एवं व्यवहारिक कार्य ।
5. घोषित अपराधिक जातियों की प्रतिदिन पुलिस थानों में हाजिरी देने की प्रथा को बंद कराया ।
6. 1920 में बंधुआ मजदूरी की समाप्ति का कानून ।
7. 1900-1905 तक वेदोक्त प्रकरण में धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणों की वर्चस्वता को चुनौती दी ।
8. सत्यशोधक समाज (1897 से) के अध्ययन से राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के इस निष्कर्ष तक पहुंचे की जाति व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था मानव निर्मित है व पिछड़े वर्ग को अपना अलग संगठन बनाना चाहिए जिसमें उच्च वर्णों का प्रवेश निषेध हो क्योंकि उच्च वर्णों का नेतृत्व पिछड़े वर्ग के लिए हितकारी नहीं है ।
9. मजदूर, किसानों के हित कार्य जैसे ग्राम अधिकारी पिछड़े वर्ग से चुने गए, सहकारी समिति गठन आदि ।
10. हिंदू विधि संहिताकरण से अंतर्जातीय व अंतरवर्ण विवाह को अनुमति, विधवा विवाह कानून 1917, महिला दूर्व्यवहार समाप्त करने संबंधी कानून 1919, जगतीन व देवदासी प्रथा प्रतिबंधित कानून 1920, समान दंड प्रक्रिया संहिता 1909 से लागू की ।

दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने दो ऐसी विशेष प्रथाओं का अंत किया जो युगांतरकारी साबित हुई ।

पहला,1917 में उन्होंने उस ‘बलूतदारी-प्रथा’ का अंत किया,जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गांव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थीं ।
इसी तरह 1918 में उन्होंने कानून बनाकर राज्य की एक और पुरानी प्रथा ‘वतनदारी’ का अंत किया तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया । इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई ।

दलित हितैषी उसी कोल्हापुर नरेश ने 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था-

‘मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हे तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है । मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे । ’उन्होंने दलितों के मुक्तिदाता की महज जुबानी प्रशंसा नहीं की बल्कि उनकी अधूरी पड़ी विदेशी शिक्षा पूरी करने तथा दलित-मुक्ति के लिए राजनीति को हथियार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किया । किन्तु वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों के हित में किये गए ढेरों कार्यों के बावजूद इतिहास में उन्हें जिस बात के लिए खास तौर से याद किया जाता है, वह है उनके द्वारा किया गया आरक्षण का प्रावधान ।

15 अप्रैल, 1920 को नासिक में ‘उदोजी विद्यार्थी’ छात्रावास की नीव का पत्थर रखते हुए साहू महाराज ने कहा था कि-

“जातिवाद का अंत ज़रूरी है । जाति को समर्थन देना अपराध है । हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है । जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं । निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए ।”

अज्ञानी और पिछड़े बहुजन समाज को ज्ञानी, संपन्न एवं उन्नत बनाने हेतु छत्रपति राजा ने अपने जीवन का एक एक क्षण दिया है ।

छत्रपति साहूजी महाराज का निधन 10 मई, 1922 मुम्बई में हुआ । महाराज ने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी थी । उनका समाज के किसी भी वर्ग से किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं था । साहू महाराज के मन में दलित वर्ग के प्रति गहरा लगाव था । उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये थे, वह इतिहास में याद रखे जायेंगे ।

~आजाद

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