आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है,आज के दिन ही तथागत बुद्ध ने सारनाथ (इसि पत्तन मृगदाव), वाराणसी में बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय का प्रथम उपदेश पञ्चवर्गीय भिक्खुओं को दिया और इस प्रकार आज के दिन ही भिक्खु संघ की स्थापना हुई…D***T Dastak

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है. बोधिसत्व राजकुमार सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में इसी दिन अपना गृह त्याग किया था और सत्य की खोज में निकल पड़े थे. 6 साल की कठिन तपस्या के बाद उनको वैसाख पूर्णिमा के दिन ज्ञान प्राप्त हुआ. 49 दिनों तक निर्वाण सुख में डूबे रहने के बाद सिद्धार्थ गौतम ने यह तय किया कि उन्होंने जो ज्ञान हासिल किया है, उसे लोगों तक पहुंचाना है. लोगों को धम्म सिखाना है.

भगवान बुद्ध महाकारुणिक थे और करुणा से ओत प्रोत होकर उन्होंने निर्णय लिया कि सबसे पहले मुझे अपने पुराने साथियों को उपदेश देना है. इसके बाद वह बोधगया से निकल कर सारनाथ के ऋषिपत्तन मृगदाय वन में पहुंचे जहां उनके पांच पुराने साथी थे, जिन्होंने लगभग छह वर्षों तक उनके साथ कठोर तप किया था और उस दौरान बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम की सेवा करते थे.

हालांकि तथागत बुद्ध उन पांचों को नहीं भूले थे. वैसाख पूर्णिमा को ज्ञान प्राप्ति के बाद और निर्वाण सुख पूरा करने के बाद 11 दिनों में लगातार पैदल चल कर वह वाराणसी के ऋषिपत्तन मृगदाय वन में पहुंचे. और अपने पुराने पांचों साथियों को धम्म उपदेश दिया. तथागत बुद्ध का उपदेश प्राप्त करने के बाद वो पांचों शिष्य अर्हत हो गए. वहीं ऋषिपत्तन मृगदाय वन में वह बुद्ध की सेवा करने लगे. इसी वन में तथागत बुद्ध ने अपने पांचों शिष्यों के साथ अपना पहला वर्षावास किया.

यहीं पर वाराणसी के बहुत बड़े व्यापारी का पुत्र यशकुलपुत्त भी बुद्ध से प्रभावित होकर उनका शिष्य बन गया. यशकुलपुत्त के चार अन्य धनाढ्यों ने जब यह सुना कि हमारा मित्र बुद्ध के शरणागत हो गया है तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि वहां कोई बड़े व्यवसायिक गतिविधि को अंजाम दे रहा है? यदि हम वहां नहीं गए तो हम पीछे रह जाएंगे. तब वो चारो मित्र भी वहां पहुंचें, और बुद्ध का उपदेश सुनने के बाद वे भी प्रव्रजित हो गए यानि बुद्ध के शिष्य बन गए. यहीं पर इनके पचास अन्य मित्र भी आएं और बुद्ध का उपदेश सुनने के बाद भिक्षु बन गए.

इस वर्षावास के समाप्ति पर जब बुद्ध के ये साठों शिष्य अर्हत हो गए तब बुद्ध ने उन्हें बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उपदेश दिया. जिस दिन तथागत बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे धम्म चक्क पवत्तन सुत्त कहते हैं. चूंकि भगवान बुद्ध गुरुओं के भी गुरु थे, इसलिए हमारे देश में इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. पूर्णिमा का दिन भगवान बुद्ध के जीवन में विशेष महत्व रखता है.

http://www.dalitdastak.com/dhammchakra-pravaratn-divas-tathagat-bauddh/

आज गुरु पूर्णिमा है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गौतम बुद्ध ने सारनाथ पहुँचकर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पाँच शिष्यों को सर्वप्रथम शिक्षा प्रदान की थी। वह दिन आज है। इसे धम्म – चक्क – पवत्तन कहा जाता है।…Dilip C Mandal

आज गुरु पूर्णिमा है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गौतम बुद्ध ने सारनाथ पहुँचकर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पाँच शिष्यों को सर्वप्रथम शिक्षा प्रदान की थी। वह दिन आज है। इसे धम्म – चक्क – पवत्तन कहा जाता है।

बौद्ध परंपरा में आषाढ़ पूर्णिमा से वर्षावास प्रारंभ होता है और आश्विन की पूर्णिमा को समाप्त होता है। यह वर्षावास 4 माह का होता है। इसलिए इसे चतुर्मास भी कहते हैं।

चतुर्मास में बौद्ध भिक्षु किसी एक बौद्ध विहार में रहकर अध्ययन – अध्यापन करते हैं, ध्यान – साधना करते हैं। फिर वर्ष के शेष महीनों में चारिका के लिए निकल पड़ते हैं।

पालि में वस्स का अर्थ साल भी होता है, वर्षा भी होता है। तब वर्षाकाल से ही वर्ष की नाप होती थी। इसीलिए वस्स का अर्थ साल और वर्षा दोनों होता है। वर्ष इसी वस्स का अपभ्रंश है।

विश्वगुरु गौतम बुद्ध को गुरु पूर्णिमा के दिन नमन!!!

 

 

धम्म चक्क पवत्तन दिवस
आज धम्म चक्क पवत्तन दिवस है और कुछ लोग इसे आषाढि पुर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जानते है। बौद्ध धम्म मे आज का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज से वर्षावास प्रारम्भ हो रहा है। आज के दिन ही तथागत बुद्ध ने सारनाथ (इसि पत्तन मृगदाव), वाराणसी में बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय का प्रथम उपदेश पञ्चवर्गीय भिक्खुओं को दिया और इस प्रकार आज के दिन ही भिक्खु संघ की स्थापना हुई। तब से लेकर अपने महापरिनिर्वाण तक तथागत बुद्ध रुके नहीं हमेशा चारिका करते रहे और धम्मदेशना देते रहे । केवल वर्षावास के लिए तथागत बुद्ध रुकते थे नहीं तो हमेशा बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के लिए चारिका करते रहे। इसलिए बाबा साहब डा अंबेडकर को तथागत बुद्ध की चलती हुई प्रतिमा(Walking Buddha) सबसे पसंद थी क्योकि तथागत बुद्ध पूरे जीवन भर चलते रहे और रुके नहीं।
आज के ही दिन तथागत बुद्ध ने भिक्खुओ को धम्मदेशना करते हुये यह गाथा सारनाथ मे (धम्म चक्क पवत्तन सूत्र) कही कि,
चरथ भिक्कवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।।
लोकांनुकंपाय, अत्थाय हिताय, सुखाय देव मनुस्सान।।
देसेथ भिक्खवे धम्म… आदि कल्याण…. मज्झे कल्याण।।
परियोसान कल्याण। सात्थं सव्यज्जनं केवल
परिपुण्णं परिशुद्ध ब्रम्हचरियं पकासेथ।।
अर्थात ऐ भिक्खुओ जाओ चरिका करो। उस विचारधारा के लिए जो बहुजनो के हित में है, जिस विचारधारा में बहुजनों का सुख है, जो विचारधारा शुरू में बहुजनो का हित चाहती है, जो मध्य में बहुजनों का हित चाहती है और अन्त में भी जिस विचारधारा मे बहुजनों का हित है, उसी विचारधारा को स्थापित करो। दो एक दिशाओं मे मत जाओ। अलग अलग दिशाओ मे और जिस धम्म मे सबका कल्याण है उस धम्म को सबको बताओ।
भिक्खुओ ! “कामवासना” और “शरीरपीड़ा” इन दो अतियों से बचो । मैंने नया मध्यम मार्ग खोज निकाला है, जो नई दृष्टि देनेवाला है। वह यही “आर्य आष्टांगिक मार्ग” है।
1- सम्यक दृष्टि
2. सम्यक संकल्प
3 सम्यक वाचा
4 सम्यक कर्म
5 सम्यक आजीविका
6 सम्यक व्यायाम
7-सम्यक स्मृति
8 सम्यक समाधी:
“मेरे धम्म का उद्देश्य विश्व की निर्मिती करना नही है, उसकी पुनर्रसंरचना करना है, बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, लोकानुकम्पाय, आदि कल्याण, मध्य कल्याण और अन्त्य कल्याण करना है तथा जो असामान्य (देव (मुनि), बुद्धिमान) और सामान्य (श्रमण, गृहस्थ, अनाड़ी) इन लोगों के लिए सुखकर है…वह दुख निरोध गामिनी, प्रतिपदा सत्य, “आर्य अष्टांगिक मार्ग” है.”

इस महान अवसर पर सभी बौद्ध उपासकों को धम्म चक्क पवत्तन दिवस के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं…..!!!

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।

त्रिशरण

बुद्धं सरणं गच्छामि ।
धम्मं सरणं गच्छामि ।
संघं सरणं गच्छामि ।

दुतियम्पि बुद्धं सरणं गच्छामि ।
दुतियम्पि धम्मं सरणं गच्छामि ।
दुतियम्पि संघं सरणं गच्छामि ।

ततियम्पि बुद्धं सरणं गच्छामि ।
ततियम्पि धम्मं सरणं गच्छामि ।
ततियम्पि संघं सरणं गच्छामि ।

पंचसील
पाणातिपाता वेरमणि, सिक्खापदं समादियामि ।
अदिन्नादाना वेरमणि, सिक्खापदं समादियामि ।
कामेसु मिच्छाचारा वेरमणि, सिक्खापदं समादियामि ।
मुसावादा वेरमणि, सिक्खापदं समादियामि ।
सुरा-मेरय-मज्ज पमादठ्ठाना वेरमणि, सिक्खापदं समादियामि ।

बौद्ध धर्म दुनियाँ का अनोखा धर्म है, जो भारत में उत्पन्न हुआ, पूरे विश्व मे फैला, फूला, और फला, चाहे सम्राट अशोक का युग रहा हो, कनिष्क, हर्ष वर्धन या बौद्ध पाल का शासन युग रहा हो, भारत सोने की चिड़िया कहलाया, और जब – जब जाति या वर्ण वादी – कट्टर पंथियों का शासनकाल रहा, भारत गुलाम बना ! बौद्ध धर्म भारत को छोड़ कर दूसरे देशों में फैला, फूला और फला, 24 देशों का राष्ट्रीय धर्म बना और इसके प्रचार-प्रसार के लिये ऐक बूँद भी रक्त नहीँ बहा। इसका कारण है कि बौद्ध धर्म – त्याग , करुणा , दया , भाईचारा और मेत्री का धर्म है ! बौद्ध धर्म की विशेषता है कि यह विज्ञान सम्मत धर्म है, ज्ञान, चिंतन की इसमें प्रधानता है ! – बौद्ध धर्म वर्ण , जाति , ऊंच नीच – छूआ छूत आदि सामाजिक बुराइओ से दूर है। दुनियाँ के बैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बुद्ध और उनका धर्म ही इस कराहती हुई मानवता को बचा सकता है और विनाश की औऱ बढ़ रहे संसार की रक्षा कर सकता है ! बौद्ध विकसित देश जापान इसका जीता – जागता उदहारण है ! भारत इससे सबक ले !

एक बार पुनः सभी बौद्ध उपासकों एवं उपासिकाओं को धम्म चक्क पवत्तन दिवस के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं…..!!!
नमो बुद्धाय

 

आप नौकरी का एक ही बायो डाटा अलग अलग नेम, सरनेम से कंपनियों के पास भेजिए.यह प्रयोग 5,000 बायोडाटा के साथ दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव की आईटी कंपनियों पर किया जा चुका है.अगर आपका सरनेम हिंदू सवर्ण जातियों वाला है, तो समान शैक्षणिक योग्ताय और अनुभव के बावजूद, इंटरव्यू का कॉल आने और नौकरी मिलने के मौके ज्यादा हैं….Dilip C MANDAL

आप नौकरी का एक ही बायो डाटा अलग अलग नेम, सरनेम जैसे दिलीप पांडे, दिलीप सिंह राणा, दिलीप यादव, दिलीप पटेल, दिलीप मौर्य, दिलीप बिंद मुहम्मद अरमान, अरमान अंसारी, दिलीप जाटव, दिलीप पासी, दिलीप मेश्राम, दिलीप कुजूर नाम से कंपनियों के पास भेजिए.

यह प्रयोग 5,000 बायोडाटा के साथ दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव की आईटी कंपनियों पर किया जा चुका है.

अगर आपका सरनेम हिंदू सवर्ण जातियों वाला है, तो समान शैक्षणिक योग्ताय और अनुभव के बावजूद, इंटरव्यू का कॉल आने और नौकरी मिलने के मौके ज्यादा हैं.

वैसे, यह प्रयोग आप खुद भी करके देख सकते हैं.

तो जब तक देश ऐसा है, तब तक आरक्षण जाति के आधार पर ही रहेगा.

आर्थिक आधार धोखा है!

रविवार को अब हम देर तक नहीं सोएंगे बल्कि स्वयं भी जल्दी जगेंगे और  समाज को भी जगायेंगे।समय आ गया है कि नींद से हम स्वयं भी जगें और समाज को भी जगाएं, आओ हम भी अब प्रत्येक रविवार को अपनी शक्ति दिखायें।…ANAND SRIKRISHAN

dalit harijan
*रविवार को अब हम देर तक नहीं सोएंगे बल्कि स्वयं भी जल्दी जगेंगे और  समाज को भी जगायेंगे।*
▶रविवार को सिक्ख धर्म के लोग जल्दी उठते हैं और गुरुद्वारा जाकर मत्था टेकते हैं और वहाँ पर मानव सेवा के साथ साथ सामाजिक चिंतन और मनन करते हैं।
▶पंजाब के अलावा पूरे भारत में यहां तक की विदेशों में भी सरदार लोग इस परम्परा को वर्षों से जारी रखे हुए हैं।
▶ऐसा करने से हर सप्ताह सिक्खों की शक्ति का प्रदर्शन पूरी दुनिया देखती है जिसका नतीजा यह है कि सिक्ख बहुत ही कम संख्या में होने के बाउजूद उन पर कभी अत्याचार नहीं होते हैं।
▶रविवार को ईसाई धर्म के लोग सवेरे जल्दी उठते हैं और तैयार होकर चर्च में जाते हैं वहां पर प्रभु यीशु मसीह की प्रार्थना करते हैं साथ ही सामाजिक चिंतन और मनन करते हैं।
▶ इस परम्परा को भारत के अलावा शेष पूरी दुनिया में वर्षों से निभाया जा रहा है।
▶ऐसा करने से प्रति सप्ताह ईसाईयों की एकजुटता का अच्छा खासा प्रदर्शन हो जाता है और शिक्षा का जबरदस्त विस्तार देखने को मिलता है उसका असर यह होता है कि ईसाइयों पर बहुत ही कम यानी कि नाम मात्र के जुल्म ढाये जाते हैं।
▶रविवार की भाँति शुक्रवार को मुस्लिम समाज के लोग दिन में 5 बार जुम्मे की नमाज अदा करते हैं और एक दूसरे से गले मिलते हैं, मुस्लिम समुदाय के लोग इस परम्परा को भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में निभाते हैं।
हर शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय की ताकत का जोरदार प्रदर्शन देखने को मिलता है जिसका असर यह होता है कि मुस्लिम समाज की बहन बेटियों पर जुल्म ढाने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती है।
▶ब्राह्मण समाज के बुजुर्ग लोग मन्दिरों में आरती और पूजा अर्चना के बहाने से सदैव ही सवेरे शीघ्र उठकर अपने मिशन में जुट जाते हैं और नोजवान लाठी लेकर संघ की शाखा में पहुंच जाते हैं  विदेशी होकर भी साम दाम दंड भेद नीति से सभी साधन और संसाधनों पर कब्जा जमाये बैठे हैं।
▶SC, ST के लोग रविवार के एक दिन पहले से ही घर वालों से रट लगाना शुरू कर देते हैं कि कल रविवार है इसलिए मुझे बिलकुल भी मत जगाना क्योंकि मुझे कल देर तक सोना है और वे सच में ही रविवार वाले दिन देर तक बिस्तर पर पड़े रहते हैं।
▶बड़ी मुश्किल से वर्ष में एक दिन 14 अप्रैल को घरों से निकलते हैं और अलग अलग जगह संगठनों में बंटकर अम्बेडकर जयन्ती मनाते हैं लेकिन अपनी ताकत का एहसास उस दिन भी नहीं करा पाते हैं जिसके परिणाम खतरनाक रूप से सबके सामने आते हैं समाज की बहन बेटियों की इज्जत दिन दहाड़े लोग लूटकर चले जाते हैं रोजाना किसी न किसी व्यक्ति की हत्या जाति को आधार बनाकर कर देते हैं और ऐसे ऐसे घोर निंदा वाले जुल्म ढाते हैं कि सुनकर ही लोग घबरा जाते हैं।
▶माना कि नींद स्वास्थ्य के लिए जरूरी है लेकिन देर तक सोना भी तो एक बीमारी है।
▶समाज के हर व्यक्ति को अब समझना होगा,बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा स्थापित समता सैनिक दल,,,, बहुजन समाज पार्टी ,,,,एवं बामसेफ,,,,,द्वारा आयोजित सुबह की संघायन में सबको जाना होगा। किसी निर्धारित जगह एकत्रित होकर बाबा साहेब के भाषणों और साहित्य को पढ़ना होगा
बामसेफ जैसे संगठनों के कैडर को सुनना होगा।
▶समय आ गया है कि नींद से हम स्वयं भी जगें और समाज को भी जगाएं,
आओ हम भी अब प्रत्येक रविवार को अपनी शक्ति दिखायें।

 

Anand Srikrishan

बौद्ध धम्म को आसान हिंदी में समझने के लिए youtube चैनल HINDIBUDDHISM सब्स्क्राइब/ज्वाइन करे व अपने सभी सामाजिक भाइयों को भी ज्वाइन करवाएं , लिंक इस प्रकार है : https://www.youtube.com/c/HINDIBUDDHISM कृपया सब्स्क्राइब/ज्वाइन करना न भूलें

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बौद्ध धम्म  को शुद्ध और मानवहितकारी  बनाये रखने के लिए  समय समय पर कॉन्फ्रेंस या सन्घ्यान या संगीति की जातीं हैं , आइये अब तक हुई छह बड़ी संगतिओं को जाने

बौद्ध  संघयान या संगीति का तात्पर्य उस ‘संगोष्ठी’ या ‘सम्मेलन’ या ‘महासभा’  या कॉन्फ्रेंस  से है, जो  बौद्ध धम्म  को शुद्ध और मानवहितकारी  बनाये रखने के लिए  समय समय पर की जतिन हैं , इनका मुख्या लक्षये बौद्ध धम्म में गैरजरूरी हो चली बातों को निकालके नयी मानव हितकारी बातों को जोड़ने का एक संगठित प्रयास और मान्यता हैी

गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद, बौद्धों ने समय-समय पर संघयान या मीटिंग या कॉन्फ्रेंस  बौद्ध धम्म में उभरे  सैद्धांतिक और अनुशासनात्मक विवादों को सुलझाने और सूत्रों  को संशोधित और सही  करते आ रहे हैं ।

1 पहली बौद्ध परिषद (5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व)

2 दूसरी बौद्ध परिषद (383 ईसा पूर्व)

3 तीसरी बौद्ध परिषद (सी। 250 ईसा पूर्व)

4 चौथी बौद्ध परिषद (सी। 100 ईस्वी)

5 5 वीं बौद्ध परिषद (1871)

6 6 वीं बौद्ध परिषद (1 9 54)

पहली बौद्ध परिषद (5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व)

पहली बौद्ध  संगीति बुद्ध की मृत्यु के तुरंत बाद आयोजित की गई थी, इसका   आयोजन 483 ई.पू. में राजा अजाताशत्रु के संरक्षण में राजगृह (आधुनिक राजगिरि), बिहार की ‘सप्तपर्णि गुफ़ा’ में किया गया था। गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद ही इस संगीति का आयोजन हुआ था। इसमें बौद्ध स्थविरों (थेरों) ने भाग लिया और बुद्ध के प्रमुख शिष्य ‘महाकस्यप’ (महाकश्यप) ने उसकी अध्यक्षता की। चूँकि बुद्ध की  शिक्षाओं को अब तक  लिपिबद्ध नहीं किया  गया था, इसीलिए संगीति में उनके तीन शिष्यों- महाकाश्यप’, सबसे वयोवृद्ध ‘उपालि’ तथा सबसे प्रिय शिष्य ‘आनन्द’ ने उनकी शिक्षाओं का संगायन किया। इसमें  गौतम बुद्ध के सूत्रों या पदों को  संकलित किया गया और बौद्ध  भंतों  के लिए विनय नियम तय किये गए

दूसरी बौद्ध परिषद (383 ईसा पूर्व)

दूसरी बौद्ध परिषद राजा कालसोका द्वारा आयोजित की गई थी और संघ के रूढ़िवादी और उदार तत्वों के बीच संघर्ष के बाद वैसाली में आयोजित की गई थी।

रूढ़िवादी स्कूलों ने मठवासी नियमों (विनाया) के सख्ती से पालन करने पर जोर दिया। अलगाववादी महासंघिकों ने अधिक आराम से मठवासी नियमों के लिए तर्क दिया, जो मठों के बड़े पैमाने पर अपील कर सकते हैं और लोगों को ले सकते हैं (इसलिए उनका नाम “बहुमत” असेंबली)।

परिषद महासंघिकों को अस्वीकार कर समाप्त कर दी। उन्होंने काउंसिल छोड़ दिया और ओक्सस के पास खारोशी शिलालेखों और दिनांकित सी के अनुसार उत्तर-पश्चिमी भारत और मध्य एशिया में कई शताब्दियों तक खुद को बनाए रखा। पहली शताब्दी ईस्वी।

समय के साथ, पारंपरिक बौद्ध विचारों के 18 स्कूलों तक उभरा, केवल शेष ही एक प्राचीन थेरावाड़ा स्कूल है। अन्य स्कूलों में नॉर्थवेस्टर्न इंडिया में सर्वस्तिवद्दीन और धर्मगुप्तका शामिल थे।

 

तीसरी बौद्ध परिषद (सी। 250 ईसा पूर्व)

तीसरी बौद्ध परिषद को मौर्य सम्राट अशोक महान (260-218 ईसा पूर्व) पाटलीपुत्र (आज के पटना) में आयोजित किया गया था, इस अध्यक्षता भिक्षु मोगगलिपुट्टा तिसा द्वारा की गयी  था। इसका उद्देश्य बौद्ध धर्म के विभिन्न स्कूल या विचरधाराओं  के आपसी मतभेदों को सुलझाना था, और बौद्ध आंदोलन को शुद्ध करना था, खासतौर पर अवसरवादी गुटों से जो शाही संरक्षण से आकर्षित हुए थे। थर्ड काउंसिल में तैयार सैद्धांतिक प्रश्नों और विवादों के जवाब अभिधम्म  पिताक  की किताब  ‘कथवत्तु’  में मोगगलिपुट्टा तिसा द्वारा दर्ज किए गए थे।

पाली कैनन त्रिपिटक जो परंपरागत बौद्ध धर्म के संदर्भ के ग्रंथ हैं और जिन्हें बुद्ध से सीधे प्रेषित माना जाता है, उस समय औपचारिक रूप से लागू किया गया था। उनमें सिद्धांत (सूत्र पितका), मठवासी अनुशासन (विनया पितका) और सूक्ष्म दर्शन (अभिधर्म पितक) में एक अतिरिक्त नया हिस्सा  शामिल है।

इसके अलावा, बौद्ध धर्म फैलाने के लिए विभिन्न देशों में मंत्रियों को भेजा गया था, जहां तक पश्चिम में ग्रीक साम्राज्य (विशेष रूप से पड़ोसी ग्रीको-बैक्ट्रियन साम्राज्य, और संभवतः भूमध्यसागरीय से आगे भी अशोक द्वारा पत्थर के खंभे पर छोड़े गए शिलालेखों के अनुसार )।

 

चौथी बौद्ध परिषद (सी। 100 ईस्वी)

चौथी बौद्ध परिषद कुशान सम्राट कनिष्क, लगभग 100 ईस्वी जालंधर या कश्मीर में आयोजित की गई थी, और आमतौर पर महायान बौद्ध धर्म के औपचारिक वृद्धि से जुड़ी हुई है। थेरावा बौद्ध धर्म इस परिषद की प्रामाणिकता को नहीं पहचानता है, और इसे कभी-कभी “विवादास्पद भिक्षुओं की परिषद” कहा जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि कनिष्क ने कश्मीर में 500 भिक्खस इकट्ठा किया, जिसका नेतृत्व वसुमित्र ने किया, त्रिपिताका को संपादित करने और संदर्भ और टिप्पणियां करने के लिए। ऐसा कहा जाता है कि परिषद के दौरान, तीन सौ हजार छंद और नौ मिलियन से अधिक वक्तव्य संकलित किए गए थे, और इसे पूरा करने में बारह साल लगे।

यह परिषद मूल पाली कैनन (टिपिताका) पर भरोसा नहीं करती थी। इसके बजाय, नए ग्रंथों का एक सेट अनुमोदित किया गया था, साथ ही महायान सिद्धांत के मौलिक सिद्धांत भी थे। नए ग्रंथों, आमतौर पर गांधीारी स्थानीय भाषा और खारोस्ती लिपि में, संस्कृत की शास्त्रीय भाषा में फिर से लिखे गए थे,

बौद्ध विचारों के प्रचार में कई विद्वान  दवरा इसे एक बड़ा बदलाव का  मोड़।कहा गया है , यहीं से महायान की शुरुआत मणि जाती है जिसमे  बौद्ध धर्म का नया रूप  में प्रचारित हुआ और बुद्ध को लगभग ईश्वरीय पद  और  विशेषता में स्थापित किया गया था। इसके बात बौद्ध धम्म का महायानी रूप  मध्ये एशिया  कोरिया जापान  चीन अदि में  फैला

 

5 वीं बौद्ध परिषद (1871)

पांचवीं  संगायन या संगती या परिषद १८७१  में मंडलय बर्मा  (जिसे अब  में म्यांमार के नाम से जाना जाता  है )में   राजा मिंडन के शासनकाल में हुई थी था। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य बुद्ध की सभी शिक्षाओं को पढ़ना था और उन्हें देखने के लिए थोड़ी देर में जांच करनी थी कि उनमें से कोई भी बदल दिया गया है, विकृत हो गया है या गिरा दिया गया है। इसकी अध्यक्षता तीन बुजुर्गों, आदरणीय महाथ्रा जगरभिवम्सा, आदरणीय नरेंद्रभाजाजा और दो हजार चार सौ भिक्षुओं (2,400) की संघ  में आदरणीय महाथ्रा सुमंगलासामी की अध्यक्षता में हुई थी। उनका संयुक्त धम्म पठन पांच महीने तक चला। म्यांमार लिपि में पढ़ाई पूरी होने और सर्वसम्मति से स्वीकार  होने के बाद म्यांमार लिपि में सात सौ पच्चीस संगमरमर स्लैब पर अंकित किया गया । यह बड़ा कार्य कुछ (2,400)eruditeभिक्षुओं और कई कुशल कारीगरों द्वारा किया गया था, जो प्रत्येक स्लैब के पूरा होने पर उन्हें किंग मिंडन के कुथोडो पगोडा के मैदान में एक विशेष साइट पर सुंदर लघु ‘पिटाका’ पगोडों में रखा गया था। मंडले हिल की तराई में जहां यह और दुनिया में तथाकथित ‘सबसे बड़ी किताब’ कहा जाता है, आज भी खड़ा है।

 

6 वीं बौद्ध परिषद (1 9 54)

छठी परिषद को 1954  म्यांमार या बर्मा के यागों (रंगून) के  काबा ऐ में बुलाया गया था, पूर्व में 1 9 54 में रंगून, पांचवें व्यक्ति मंडले में आयोजित होने के अठारह साल बाद। इसे तत्कालीन प्रधान मंत्री माननीय यू नु के नेतृत्व में बर्मी सरकार द्वारा प्रायोजित किया गया था। उन्होंने महा पासाना गुहा, ‘महान गुफा’, भारत की सट्टापनी गुफा की तरह एक कृत्रिम गुफा के निर्माण को अधिकृत किया जहां पहली बौद्ध परिषद आयोजित की गई थी। जैसा कि पिछली परिषदों के मामले में, इसका उद्देश्य पहला उद्देश्य वास्तविक धम्म और विनय को प्रमाणित करना और संरक्षित करना था। हालांकि यह अब तक अद्वितीय था क्योंकि भिक्षुओं ने इसमें भाग लिया था, जो आठ देशों से आये  थे । ये दो हजार पांच सौ ज्ञानी थेरावाड़ा भिक्षु म्यांमार, कंबोडिया, भारत, लाओस, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम से आए थे। दिवंगत आदरणीय महासी सयादाव को आदरणीय भद्दाता विकितरसरभिवम्मा के धम्म के बारे में आवश्यक प्रश्न पूछने का महान कार्य नियुक्त किया गया था, जिन्होंने उन सभी को जानबूझकर और संतोषजनक उत्तर दिया। जब तक इस परिषद ने सभी भाग लेने वाले देशों से मुलाकात की थी, भारत के अपवाद के साथ पाली टिपितका ने अपनी मूल लिपियों में प्रस्तुत किया था।

बौद्ध शास्त्रों के पारंपरिक पठन में दो साल लगे और सभी लिपियों में टिपितका और उसके सहयोगी साहित्य की गंभीरता से जांच की गई और उनके मतभेदों को ध्यान में रखा गया और आवश्यक सुधार किए गए और सभी संस्करणों को फिर से एकत्रित किया गया। खुशी से, यह पाया गया कि किसी भी ग्रंथ की सामग्री में बहुत अंतर नहीं था। आखिरकार, परिषद ने आधिकारिक तौर पर उन्हें मंजूरी मिलने के बाद, टिपितका और उनकी टिप्पणियों की सभी पुस्तकों को आधुनिक प्रेस पर छपाई के लिए तैयार किया गया और म्यांमार (बर्मीज़) लिपि में प्रकाशित किया गया। यह उल्लेखनीय उपलब्धि दो हजार पांच सौ भिक्षुओं और कई लोगों के समर्पित प्रयासों के माध्यम से संभव हो गई थी। भगवान बुद्ध की परिनिबाना के बाद मई, 1 9 56 में ढाई सहस्राब्दी में उनका काम खत्म हो गया। यह परिषद का काम पूरे बौद्ध दुनिया के प्रतिनिधियों की अद्वितीय उपलब्धि थी। टिपितका का संस्करण जो इसे उपक्रम के लिए शुरू किया गया है, को बुद्ध गोतामा की प्राचीन शिक्षाओं और आज तक के सबसे आधिकारिक प्रतिपादन के लिए सच माना गया है।

बाबा साहेब डॉ आंबेडकर इसी संगीति में गए थे जहाँ से लौटकर १९५६ में उन्होंने अपने खुद के बौद्ध धम्म के वापसी की धम्मक्रांति की थी

Source

http://www.buddhism-guide.com/buddhism/buddhist_councils.htm

http://www.urbandharma.org/udharma/councils.html