आदिवासी और शूद्रों अतिसूद्रो को नास्तिक नहीं बल्कि बौद्ध बनना है. ये नोट करके रखिये मित्रों| व्यवहार और आचरण में बौद्ध हो जाइए ,इससे बड़ी कोई क्रान्ति नहीं…..लेखक संजय जोठे/मुकेश बौद्ध भवतुसब्बमंगलम्

“बौद्ध धम्म की तरफ चल पड़े लोगों में एक बड़ी बहस छिड़ी है आस्तिक और नास्तिक पर, ध्यान रहे हम न नास्तिक हैं न आस्तिक हैं हम वास्तविक हैं। जो हमारा भला करे उसे हम अपनाते हैं जो हमारा बुरा करे उसे त्याग देते हैं , हम किसी धर्म परंपरा या देवी देवता के पिछलग्गू नहीं है, अपनी बुद्धि विवेक को बढ़ाना और इस्तेमाल करना ही हमारा लक्ष्ये है। बुद्ध का धम्म बाकि के धर्मों से अलग है, धम्म का मकसद आपके जीवन के दुखों को दूर करना है, न की आपको नास्तिक और नकारात्मक बनाना।”…समयबुद्धा

बाबा साहब ने बहुजन समाज को बुद्ध का धम्म दिया है जिसमे पाखण्ड अन्धविश्वास और अंध भक्ति का निषेध है।उस मार्ग पर धीरे धीरे बढ़ना होगा। अभी भारतीय अंबेडकराईड बुधिष्ट हर दृष्टि से कमजोर हैं फिर भी काम में लगे हैं परिणाम धीरे धीरे आएंगे। आ भी रहे हैं।
सोचिये कि हिन्दू या मुस्लिम या ईसाई इतने सम्पन्न और स्वतन्त्र होकर भी अपने धर्मों की बुराइयों को दूर न कर सके, उन्हें कोई दोष नहीं देता, लेकिन बहुजन जब बौद्ध धर्म की बात करते हैं तब हजारों दिशाओं से सलाहें आने लगती हैं कि बौद्ध धर्ममें ये खराबी है या वो खराबी है। हम जानते हैं इसमें कमियां हैं। लेकिन उन कुछ कमियों के बावजूद ये सर्वाधिक तार्किक धर्म है।

आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारने वाला और अप्प दीपो भव की बात करने वाला ये एकमात्र धर्म है। ये केंद्रीय बात है। और इस बात में वो क्षमता है, वो संभावना है कि सारे अन्धविश्वास पाखण्ड औरभेदभाव मिटाये जा सकें। परमात्मा और आत्मा ही सब बुराइयों की जड़ है। सारा सम्मोहन इन्हीं दो से आता है। बुद्ध इन्हें एकदम उखाड़ फेंकते हैं। इस दशा में न सिर्फ सामाजिक समता और सौहार्द बल्कि लोकतन्त्र और विज्ञान भी फलता फूलता है।बहुजन जब बौद्ध धर्म की तरफ मुड़ता है तब वह अनात्म की तरफ मुड़ रहा है। वह ईश्वर या सृष्टिकर्ता के निषेध की तरफ मुड़ रहा है। सृष्टिकर्ता में भरोसा रखना अव्वल दर्जे की मूर्खता है, जो ये मूर्खता करते हैं उनसे पूछा जाये कि उनका सृष्टिकर्ता आजकल क्या कर रहा है, यदि वो कुछ कर रहा है तो उसे ही करने दो आप किस हैसियत से उसकी मदद कर रहे हैं? क्या वो कमजोर है जो उसे आपकी मदद की दरकार है?

धर्म के जगत में समाज परिवर्तन की धारणा और उसका औचित्य केवल बौद्ध धर्म मे ही संभव है। केवल बुद्ध के साथ ही समाज में बदलाव के लिए मेहनत संभव है। जो भगवान या ईश्वर अल्लाह या किसी अन्य सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता को मानते हैं वे दोगली बातें करते हैं। उन्हें समाज में बदलाव लाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अगर उनका ईश्वर अल्लाह या सृष्टिकर्ता सच में ही है तो वो आपसे बेहतर जानता है कि कब क्या बदलाव करना है, तब उसी पर भरोसा रखो न क्यों इतना कष्ट उठाते हैं ?
लेकिन सारे परमात्मा, आत्मा वादी दोगले होते हैं। वे परम् चैतन्य, शक्तिमान, दयावान परमात्मा और सृष्टिकर्ता में भरोसा रखेंगे और लोगों को समाज सुधार की बात भी सिखाएंगे। अरे भाई, गरीब इंसानों को क्यों दुःख दे रहे हो? अपने दयावान परमात्मा की दया का इस्तेमाल करो न? वो कब और किसके काम आएगी? अगर बदलाव नहीं आ रहा तो मतलब ये कि आपका दयावान ईश्वर या सृष्टिकर्ता या तो है ही नहीं या आपकी बजाय आपका शोषण करने वालों से मिला हुआ है। दोनों स्थितियों मे आपको उसे निकाल बाहर करना चाहिए।

बुद्ध इस समस्या का सुन्दरतम हल देते हैं।वे कहते हैं कि कोई परमात्मा या सृष्टिकर्ता नहीं होता और न उसकी दया या शक्ति ही होती है। इसलिए उससे उम्मीद करना बेकार है। अपनी मेहनत से ही खुद में या समाज में बदलाव संभव है। अन्य धर्म सिखाते हैं कि मेहनत भी करो और ईश्वर की दया में भरोसा भी रखो, दया उसी को मिलती है जो मेहनत करता है, इत्यादि। अब ये जलेबी जैसी बात है, गोल गोल घूमती है। मेहनत से दया मिलती है तो ऐसी दया दो कौड़ी की हुई। जो मेहनत न कर सके उसको क्या मरने के लिए छोड़ देंगे?

अब ये सब सवाल अन्य धर्मों के ईश्वर पर उठते हैं। फिर भी उन धर्मों के लोगों से सवाल नहीं पूछे जाते। लेकिन बहुजन जब बुद्ध की तरफ जाते हैं तब लंबे लंबे दार्शनिक सवाल पूछकर उन्हें भटकाने की कोशिश होती है। ऐसे सवाल उठाने वालों से मेरा एक निवेदन है कि ये सवाल आप पहले अपने सुशिक्षित परिवार में, अपने संपन्न समाज मे उठाइये। तब आपको पता चलेगा अभी उन्ही को हजारों साल लगेंगे आपके प्रश्नो का उत्तर देने में, ऐसे में अगर आप ये उम्मीद गरीब अनपढ़ शोषित कमजोरो से करते हैं तो आप षड्यंत्रकारी हैं, आप अपराधी हैं। और संपन्न समाजों सहित कमजोरो की लाचारी का कारण बस इतना है कि वे गलत धर्मों से और आत्मा परमात्मा से जुड़े हैं। जैसे ही वे निर्णयपूर्वक इन धर्मों से दूर होंगे और अंबेडकर के बताये ढंग से धम्म में प्रवेश करेंगे, वैसे ही बहुत कुछ होने लगेगा।

बहुजनो के बुद्ध धर्म स्वीकार को इस तरह देखिये। जानबूझकर उन्हें भटकाने की कोशिश न कीजिये। जो सुविधाभोगी और सवर्ण संपन्न लोग सलाह देते हैं उनसे निवेदन है कि आपके दार्शनिक प्रश्न या सुझाव पहले अपने परिवार में लागू करके देखिये तब आपको पता चलेगा हकीकत क्या है।
दूसरी बात ये कि कई हिन्दू और सवर्ण शुभचिंतक ये सलाह देते हैं कि शूद्रों अति सुद्रो को आदिवासियों को हिन्दू धर्म में ही रुके रहकर संघर्ष करना चाहिए और इस धर्म और समाज की बुराइयों को दूर करना चाहिए. इसका मतलब हुआ कि दलितों शूद्रों आदिवासियों को हिन्दू धर्म में सुधार करना चाहिए.ऐसे सलाहकार मित्र सलाह देते हैं कि धर्म परिवर्तन न करके इसी धर्म और समाज में रहकर इसे बदलो. लेकिन ये असंभव है क्योंकि शूद्रों और अति सूद्र की तरफ से धर्म या समाज में सुधार के किसी भी प्रयास का स्वागत नहीं होगा. क्योंकि अतिसुद्रो आदिवासियों को हिन्दू माना ही नहीं गया है. अब जिन्हें हिन्दू ही नहीं माना जाता वे हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज में कैसे सुधार करेंगे? क्या कोई मुसलमान या पारसी हिन्दू धर्म में सुधार कर सकता है?

क्या कोई हिन्दू इसाई धर्म में सुधार कर सकता है? उसी तरह अति सूद्र आदिवासी भी हिन्दू धर्म को नहीं सुधार सकता. वो केवल हिन्दू धर्म को छोड़ सकता है.
इन सलाहों में एक भयानक षड्यंत्र भी छिपा है. ये सलाहकार कहते हैं खालिस इंसान या नास्तिक बन जाओ. ऊपर ऊपर ये अच्छी लगती है. लेकिन इस सलाह में भयानक शातिर षड्यंत्र छिपा है. एक गरीब कौम कभी भी नास्तिक नहीं बन सकती. उसे कोई न कोई महापुरुष शास्त्र या धर्म चाहिए. आप नास्तिकता पर जोर देंगे तो ये गरीब नास्तिक होने का साहस और बुद्धि तो अर्जित नहीं कर पायेंगे लेकिन धर्म के सबसे घटिया रूपों के गुलाम जरुर हो जायेंगे.
साम्यवादी नास्तिकता ने भारत गरीबों बहुजनों की चेतना में में धेले भर का भी प्रभाव नहीं पैदा किया है. उनकी वजह से ये गरीब बहुजन लोग नास्तिक तो नहीं बने लेकिन मूर्ख और लम्पट कथाकार और प्रवचनकारों और बलात्कारी बाबाओं के गुलाम जरुर बनते गये हैैं.

धर्म की बहस को “धर्म एक अफीम है” कहकर सीधे नकारने से कोई फायदा नहीं होता, उलटा नुक्सान ही होता है. अगर समाज का समझदार वर्ग धर्म की बहस से बिना संघर्ष किये बाहर निकल जाए तो फिर धर्म में मूर्खों और पोंगा पंडितों का ही राज चलता है. इसमें समझदारों की ही गलती है, मूर्ख पोंगा पंडित तो इसका लाभ उठायंगे ही उनकी क्या गलती है, उनका काम ही यही है. आँख खोलकर देखिये भारत में यही हो रहा है.

धर्म को अफीम मानते हुए भी समझदारों को इस अफीम की वादी में घुसकर इसे साफ़ करना होगा. यही बौद्ध धर्म का प्रयास है. यही बुद्ध अंबेडकर और कृष्णमूर्ति की शिक्षा है.नाले को साफ़ करने के लिए आपको नाले में घुसना होता है.अफीम के खेत में घुसकर अफीम को साफ़ करने का तरीका बौद्ध धर्म है, कोरा साम्यवादी चिंतन या नास्तिकता इस खेत से पलायन सिखाता है. इस पलायन से ये खेत और ये खेती खत्म नहीं होती बल्कि इसे मिलने वाली चुनौती ही खत्म हो जाती है. हकीकत ये है कि लोगों को धर्म के नुक्सान से अवगत कराये बिना उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता.वामपंथी चैम्पियन खुद अपने ब्राह्मणी कर्मकांड पूरे विधि विधान से करते हैं. बंगाल और केरल में वामपंथी मित्रों की शादियों और मृत्यु के कर्मकांड देख लीजिये आपको सब समझ में आ जायेगा. शूद्रो अति सूद्रोको खालिस इंसान या नास्तिक बनने की सलाह देने से पहले इस देश के संपन्न वर्ग को नास्तिक बनाकर देखिये, वो कभी नहीं बनेगा. नास्तिकता की सलाह देने वालों के घरों में झांककर देखिये वे सामान्य से भी बड़े कर्मकांडी अन्धविश्वासी और भक्त निकलेंगे.

आदिवासी और शूद्रों अतिसूद्रो को नास्तिक नहीं बल्कि बौद्ध बनना है. ये नोट करके रखिये मित्रों. औपचारिक धर्म परिवर्तन की अभी आवश्यकता नहीं अभी सिर्फ व्यवहार और आचरण में बौद्ध हो जाइए बाद में अनुकूल समय पर विशाल संख्या में परिवर्तन होना ही है. इससे बड़ी कोई क्रान्ति नहीं. भारत को सभ्य बनाने का यही एक तरीका है.
लेखक संजय जोठे/मुकेश बौद्ध
भवतुसब्बमंगलम्

https://www.facebook.com/groups/buddhistnetwork/permalink/10156489026096397/?__xts__%5B0%5D=68.ARA-ODFTLdiYJXB8Trv0EJrjaJLHF4-yJJSOxi13mJNr-iEy3zriVeNeZXaaC7MLiGMtq2JCKQxyZJZ8_hInvwzx0dwXD1yN55QTdXnZl1za0MdLoJC1EnIAHjvuMOVUZtxa-Do&__tn__=-R

प्रोफेसर रिचार्ड गोम्ब्रिक, जिन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अपने जीवन के 40 बरस बुद्ध धम्म एवं पालि भाषा के अध्ययन में व्यतीत किये हैं, बुद्ध धम्म के बारे में अपनी समझ को साझा कर रहे हैं….Rajesh Chandra

कितनी सत्य बात है :

प्रोफेसर रिचार्ड गोम्ब्रिक, जिन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अपने जीवन के 40 बरस बुद्ध धम्म एवं पालि भाषा के अध्ययन में व्यतीत किये हैं, बुद्ध धम्म के बारे में अपनी समझ को साझा कर रहे हैं:

01. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि मैं दूसरे लोगों से शुद्धतर और बेहतर हूँ। बल्कि इसका अर्थ यह होता है कि मुझमें अत्यधिक अज्ञानता और मिटाने के लिए अत्यधिक मानस विकार हैं। मुझे बुद्ध की प्रज्ञा की जरूरत है।

02. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि मुझमें दूसरों से अधिक प्रज्ञा है। बल्कि इसका अर्थ यह होता है कि मैं अत्यधिक मूढ़ता से भरा हुआ हूँ। मुझे विनम्र होना सीखना है और व्यापक नज़रिया विकसित करना है।

03. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ तो इसलिये नहीं कि दूसरे लोगों से बेहतर अथवा बदतर हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं जानता हूँ कि सभी प्राणी समान हैं।

04. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, मुझे मालूम है कि मैं सिर्फ उन्हें प्रेम करता हूँ जो हमारी अभिरुचि के अनुरूप होते हैं, लेकिन बुद्ध उन लोगों को भी प्रेम करते हैं जिन्हें वह पसंद नहीं करते, प्रज्ञा व करुणा की परिपूर्ण अवस्था तक उनका मार्गदर्शन करते हैं। यही कारण है कि मैंने बुद्ध की शिक्षाओं का अनुगमन करने का चयन किया है!

05. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ , तो इसका लक्ष्य यह नहीं है कि मैं वह हासिल करना चाहता हूँ जो मेरे हित में है। बल्कि अपनी समस्त व्यक्तिगत सांसारिक इच्छाओं की लिप्साओं की उपेक्खा कर देना है।

06. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं एक सुखद जीवन के लिए लालायित हूँ। बल्कि लालायित हूँ अनित्यता की शान्त स्वीकृति के लिए और कैसी भी विपरीत परिस्थितियों में सम्राट की भांति शान्त रहना व आत्मविश्वास से परिपूर्णता बने रहने के लिए।

07. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, तो मेरा यह अर्थ नहीं है कि मैं अपने हित के इरादे से और लोगों को रूपांतरित करना चाहता हूँ। बल्कि प्रज्ञा का सदुपयोग करते हुए स्वयं का तथा प्राणीमात्र के प्रति समानुभूतिपूर्ण रहते हुए लोगों का हित करना।

08. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं जगत से पलायन करना और शून्यता को तलाशना चाहता हूँ। बल्कि यह जानना कि दिन-प्रतिदिन का जीवन धम्म में है, और वर्तमान में रहना ही साधना है।

09. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मेरा जीवन अब झटके अनुभव नहीं करेगा। बल्कि धम्म के साथ, झटके मेरे विकास के कारकरूप में रूपान्तरित हो जाएंगे।

10. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, तो मेरा ह्रदय अनन्त आभार से भर जाता है। बस यह सोच कर कि मैं एक मनुष्य के रूप में जन्मा और विद्वान गुरुओं का सान्निध्य लाभ का अवसर पाने के कारण व बुद्ध की शिक्षाएं सुन कर इस जीवन में साधना करने में समर्थ हो सका, इस अविश्वसनीय कार्मिक साम्यता को देख कर मैं गहराई तक भावुक हो जाता हूँ।

11. जब मैं कहता हूँ कि मैं बौद्ध हूँ, तो इसलिये नहीं कि मुझसे बाहर कहीं ईश्वर विद्यमान है। बल्कि इसलिए कि सच्चे बुद्ध-चित्त को मैं अपने ह्रदय में पाता हूँ।

————–

So true:

Professor Richard Gombrich, who dedicated 40 years of his life to studying Buddhism and Pali language at Oxford University, shares his understanding of Buddhism.

01. When I say I’m a Buddhist, it doesn’t mean I’m purer and nicer than others. But it means I have too much ignorance and mental defilement to remove. I need Buddhas’ wisdom.

02. When I say I’m a Buddhist, it doesn’t mean I have more wisdom than others. But it means I have been occupied by too much arrogance. I need to learn to be humble and to develop a broader perspective.

03. When I say I’m a Buddhist, it is not because I am better or worse than others, but because I understand all beings are equal.

04. When I say I’m a Buddhist, I know I only love those to my taste, but Buddha loves even people he does not like, guiding them to be full of wisdom and compassion. That’s why I choose to follow Buddha’s teachings!

05. When I say I’m a Buddhist, it is not with the goal of getting what’s in my interest. But for letting go of my personal clinging to all worldly desires.

06. When I say I am a Buddhist, it is not because I pursue a smooth life. But for the calm acceptance of impermanence, and be calm and confident like a king in any adverse circumstances.

07. When I say I am a Buddhist, I do not mean to manipulate others with the motivation of self-interest. But with good use of wisdom, to benefit self and others while being empathetic to all sentient beings.

08. When I say I am a Buddhist, it is not because I want to escape from the world and pursue nothingness. But to know everyday life is within Dharma, and to live in the present is to practice.

09. When I say I am a Buddhist, it does not mean that my life will no longer experience setbacks.
But with the Dharma, setbacks are transformed into a cause for my growth.

10. When I say I am a Buddhist, my heart is filled with endless gratitude. Just thinking I was born as a human and have the ability to practice in this life, with the opportunity to meet wise teachers and hear the Buddha’s teachings, I am deeply moved by this unbelievable karmic affinity.

11. When I say I am a Buddhist, it is not because there is a God outside me. But that I find the true Buddha-nature of my own heart.