बाबासाहब डॉ आंबेडकर ने कहा था ” हमारा संघर्ष सत्ता संपत्ती के लिए नही बल्की संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए है ” संपूर्ण व्यवस्था के पांच अंग हैं राजनैतिक,सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक, हमें इन में से हर अंग पे काम करना होगा

” हमारा संघर्ष सत्ता संपत्ती के लिए नही बल्की संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए है ” ऐसा बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकरजी ने क्यू कहा ? पढिये और समझीये.

भारत के बहुजनो मे आजकल राजनीतिक आस्था जादा बढ गई हैं। राजनीतिक परिवर्तन के माध्यम से वे अपनी सभी समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। लेकिन पिछले पचास सालों से राजनीति करने के बावजूद भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है, बल्कि उनकी समस्याएं दिन ब दिन बढती ही जा रही हैं। ऐसा क्यों??

क्योंकि, राजनीति और व्यवस्था में मूलभूत फर्क है। व्यवस्था के जो पांच अंग होते हैं, उनमें से एक अंग राजनीती है। अगर आप अपना संपूर्ण समय, बुद्धि और संपत्ति केवल राजनीति के लिए ही इस्तेमाल करोगे, तो व्यवस्था के बाकी चार अंग (सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक) आपके खिलाफ हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में बहुजनो को जब सत्ता मिल गई थी, तब प्रतिक्रिया में जातिय अत्याचारों मे भी वृद्धि हो गई थी। अर्थात, व्यवस्था का राजनीतिक अंग हमारे समर्थन में होने के बाद सामाजिक अंग हमारे खिलाफ हो गया था। इसलिए, केवल राजनीति करने से समस्याओं का समाधान होनेवाला नहीं है।

समस्याओं के समाधान के लिए संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का उद्देश्य महत्वपूर्ण है। बाबासाहेब आंबेडकर जी ने इसीलिए कहा था कि, हमारा संघर्ष सत्ता या संपत्ति के लिए नहीं है बल्कि संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए है।

वर्तमान भारत में व्यवस्था ब्राह्मणों के कब्जे में है, इसलिए उनकी कोई भी समस्या नहीं है। क्योंकि वे King makers हैँ। यही कारण है कि, भारत में सत्ता तो बदलती रहती है लेकिन व्यवस्था कायम रहती है। जिनका व्यवस्था पर नियंत्रण होता है, उन्हीं लोगों का राजनिती पर भी नियंत्रण रहता है। वर्तमान भारत की व्यवस्था पर ब्राम्हणों का नियंत्रण होने के कारण उन्होंने उनकी व्यवस्था को संभालने वाले राजनेताओं को नियुक्त किया है। अगर एक नेता इस काम में असफल होता है, तो उस काम पर दुसरा नियुक्त कर दिया जाता है। बौद्ध धर्म के पतन के बाद से भारत में यही खेल चल रहा है। राजाओं को ब्राह्मणवादी ढांचे में बनाया जाता था और अगर किसी राजाने उस ढांचे को बदलने की कोशिश की, तो उसकी जगह पर दुसरे कट्टरपंथी राजा को नियुक्त किया जाता था और उस राजा के माध्यम से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को और जादा मजबूत किया जाता था। यही कारण है कि, बुद्ध के बाद भारत में सफल क्रांति नहीं हुई।

*बहुजनो ने इस ऐतिहासिक तथ्य को समझना जरूरी है। केवल राजनीति में ही पीढियां बरबाद करना मुर्खता है। अधिकांश लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन के महानतम कार्य में हिस्सा लेना चाहिए और King बनने की बजाए King makers बनने की कोशिश करनी चाहिए, तभी व्यवस्था पर हमारा कब्जा होगा। अगर आप व्यवस्था परिवर्तन का महत्तम कार्य सफल करोगे, तो सत्ता, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा, नोकरी, आरक्षण यह सब बातें आपको व्यवस्था के साथ बोनस के रूप में मिलेगी और हमारी सभी समस्याओं का समाधान भी होगा। क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन ही सभी समस्याओं का मुख्य उपाय है।,,

“बाबा साहेब ने कहा था”

इंसान जीता है , पैसे कमाता है, खाना खाता है और अंत में मर जाता है. जीता इसलिए है ताकि कमा सके. कमाता इसलिए है ताकि खा सके और खाता इसलिए है ताकि जिंदा रह सके लेकिन फिर भी मर जाता है अगर सिर्फ मरने के डर से खाते हो तो अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जाएगी. मरना तो सबको एक दिन है ही
समाज के लिए जीयो, जिंदगी का एक उद्देश्य बनाओ. गुलामी की जंजीर मे जकड़े समाज को आजाद कराओ. अपना और अपने बच्चो का भरण पोषण तो एक जानवर भी कर लेता है मेरी नजर में इंसान वही है जो समाज की भी चिंता करे और समाज के लिए कार्य करे.

…डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर

 

फ्रांसिस बेकन ने जब मिथकों के खिलाफ झंडा बुलंद किया तो घोषणा की थी कि साइंस इंसानियत को भविष्य में ले जाएगा। इस बात को कोपरनिकस, गेलिलियो और खास तौर से न्यूटन ने गंभीरता से लिया। इसके बाद पश्चिम ने विज्ञान पैदा किया।

बाद में समाजशास्त्र और एंथ्रोपोलॉजी ने मिथकों को नए ढंग से पढ़ना समझना शुरू किया और “मिथकों का विज्ञान” खोज निकाला।

इधर भारत मे न बेकन जन्मे न न्यूटन जन्मे। नतीजा ये कि हम साइंस पैदा नहीं कर सके। अब पश्चिमी साइंस हमने उधार तो ले लिया लेकिन उस साइंस को साइंटिफिक ढंग से इस्तेमाल करने की बुद्धि विकसित नहीं कर पाए।

पश्चिम ने जिस तरह “साइंस” और “साइंस ऑफ मिथ” पैदा किया भारत ने साइंस की नसबंदी करते हुए “मिथ ऑफ साइंस” पैदा किया। आज हम इसी दौर में जी रहे हैं।

केन विलबर्स ने ठीक ही लिखा है, जिन समाजों ने विज्ञान और लोकतन्त्र के जन्म की प्रसव पीड़ा खुद नहीं झेली उन्हें उधार में मिले विज्ञान और लोकतन्त्र की न तो समझ है न तमीज है। वे विज्ञान और लोकतंत्र को भी झाड़ फूंक की तरह ही इस्तेमाल करते हैं।

– संजय श्रमण

आपका मिशन ,सारी बातें,सारा अम्बेडकरवाद बुद्धिज़्म और सारा ज्ञान आदि जीरो हो जाएगा अगर आपमें सही जगह वोट डालने का काम नहीं किया, जागो और 2019 में सही चुनो , अबकी बार आपके शाशक और गुलाम बनने की लड़ाई है, चुन लो आपको जो भी बनना है . “संविधान बचाओ अपनी आज़ादी बचाओ “

संविधान बचाओ अपनी आज़ादी बचाओ

सभी भारतवासियों को 1 जनवरी बहुजन शौर्ये दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएं ,भीमा कोरेगाव का विजय स्तम्भ ही महार रेजिमेंट की रेजिमेंट बैच और टोपी पर अंकित होता है , जो महारों या बहुजनों को उनकी वीरता की याद दिलाता रहता है

 

प्रश्न :बुद्ध धम्म (धर्म ) मे अगर आत्मा नही है तो पुनर्जन्म जन्म किसका होता है❓*…Anil Gautam

प्रश्न 1 :बुद्ध धम्म (धर्म ) मे अगर आत्मा नही है तो पुनर्जन्म जन्म किसका होता है❓*

*उत्तर:*
*विषय गंभीर और कठिन है उत्तर घ्यान से पढ़िये*
पुनर्जन्म शरीर का नही चेतना के प्रवाह का होता है। शरीर का केवल पुनर्गठन होता है। उसी शरीर को जला दिए जाने पर पुनः उन्ही सेल,हड्डियों से निर्मित होना संभव ही नही है।
भगवान बुद्ध ने किसी सनातन (सदा रहने वाली) स्थाई आत्मा को स्वीकार नही किया उन्होंने केवल चेतना के प्रवाह (धारा) को स्वीकार किया है। भगवान बुद्ध इसे कोई नाम नही देते । बुध्द ने इसे अनतत्ता अर्थात आत्मा का न होना कहा।
जन्म या पुनर्जन्म चेतना(उर्जा) का होता है। यह जन्म आभासी( महसूस होने वाला,अस्थायी, temporary) होता है। जिसमे स्व अर्थात मैं (आत्म) का भाव उत्पन्न होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कपास को रुई का आभास होने लगे रुई से जब सूत काता जाए तो उसी कपास को धागे का आभास होने लगे। फिर उसी धागे से जब कपड़ा बनाया जाए तो उसे कपडे का आभास होने लगे और जब कपड़े की कमीज बनाई जाए तो कमीज का आभास होने लगे बाद में पुरानी कमीज से झाड़न और फिर पोछे का आभास और इस तरह अंत मे जलने के बाद राख का आभास होने लगे। इनमे से कुछ भी स्थाई नही है। भगवान बुध्द ने इसी को पुनर्जन्म कहा है। इस चेतना के प्रवाह को हम जीवन चक्र के कई आभासों में देखते हैं जैसे कभी मानव होने का आभास तो कभी पक्षी ,कभी किट,कभी,वनस्पति, कभी पशु आदि होने का आभास। परंतु इसमे कुछ भी स्थाई नही है। परंतु इस आभासी स्व (मैं, आत्म) के चक्र से मुक्ति सम्भव है ।
परंतु आज विज्ञान का युग है यहां थ्योरी नही चलती हमें साक्षात प्रमाण चाहिए।
पुनर्जन्म और चेतना के प्रवाह के साक्षात दर्शन को बुद्ध ने क्षणिकवाद में बहुत अच्छी तरह समझाया है। मानव शरीर को बुध्द चेतना का प्रवाह कहते हैं। इस प्रवाह के समय व्यक्ति शिशु से लड़कपन ,किशोरावस्था से युवावस्था, युवावस्था से प्रौढ़ावस्था, प्रौढ़ावस्था से वर्द्धवस्था में पुनर्जीवित होता है। व्यक्ति वही होते हुए भी वही नही होता। क्योंकि उसके शरीर का हर पल पुनर्गठन हो रहा है। परंतु चेतना की स्मृति(यादें) वही होती है। 60 साल का बुजुर्ग कभी भी खुद को बच्चा नही कह सकता क्योंकि अब वह बुढ़ापे में पुनर्जीवित हो चुका है। यह तर्क वैज्ञानिक रूप से भी सत्य है क्योंकि हमारे शरीर के सेल और हड्डियां हर क्षण नष्ट और बनते रहते हैं। जिस कारण हम वही व्यक्ति होते हुए भी वही नही होते। और यह पुनर्जन्म हम स्वयं महसूस भी करते है और जीते भी हैं। यह चेतना के पुनर्जन्म का एक अंश मात्र है।

इसे भगवान बुद्ध नदी के उदाहरण से भी समझाते हैं। अगर आप नदी के एक किनारे बैठे है। कुछ क्षण पहले जो नदी आपने देखी थी अगले ही क्षण नदी वही होते हुए भी वही नही होती। यह नदी का प्रवाह है जो हर पल बदल रहा है। परंतु फिर भी नदी वही है।यह क्षणिकवाद है। ठीक इसी प्रकार टिमटिमाती दीपक की लो हर क्षण जलती और बुझती है ।यह सब बहुत तेजी से होता है।परंतु यह लो वही होते हुए भी वही नही होती। हर क्षण दीपक की लौ का पुनर्जन्म हो रहा है लेकिन वह हमें दिखाई नही देता । बस एक लौ दिखाई देती है।

*🙏🏻नमो बुद्धाय🙏🏻*

 

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