भक्ति और धर्म का नशा कर के अगर भेड़ बनोगे तो ऊन तो उतरी ही जायेगी , खाल तो खींची जाएगी और मार के खाया ही जाएगा । हे शाशकों तुम्हारी मुक्ति खुद को पहचानने में है कब तक भेड़ बने रहोगे ?


एक शेर का बच्चा भटक के भेड़ों के झुण्ड में चला गया। वो उन्हीं के साथ पलने बढ़ने लगा और खुद को भेड़ समझने लगा। वो भूल ही गया कि वो शेर है भेड़ नहीं।

फिर एक दिन एक शेर ने उसे भेड़ों के बीच देखा तो आश्चर्य किया ये शेर भेड़ों के बीच घास चर रहा है?? वो उससे बात करने को उसकी ओर बढ़ा तो वो शेर को देख भागने लगा।

आखिर उस शेर ने उसे भाग के पकड़ लिया और उससे बोला, “अबे गधे तू इन भेड़ों के बीच क्या कर रहा है। तो वो खुद को भेड़ समझकर अपनी जान की भीख मांगने लगा।

उसको बहुत समझाया की तू भेड़ नहीं शेर है लेकिन वो न समझा। फिर आखिर शेर ने उसको उसका बिम्ब पानी में दिखाया तब जाकर उसकी आँखे खुलीं।

धार्मिक परिवार में पैदा होने वाला हर बच्चा उस शेर की तरह ही है जिसे प्रकृति ने पूर्ण स्वतंत्रता दी है पर वो भेड़ बन जाता है क्योंकि वो उन लोगों के बीच पैदा हुआ है जो खुद को भेड़ समझकर बैठे हैं। धर्मगुरुओं ने इनको धर्म नामक बाड़े में बंद किया हुआ है और लोक परलोक सुधारने के नाम पर इन मूर्खों से तरह तरह की मूर्खतापूर्ण कसरतें करवा रहे हैं, इनको अपने इशारों पर हांक रहे हैं, आपस में लड़वा रहे हैं और इनकी ऊन उतार कर अपना घर भर रहे हैं।

One thought on “भक्ति और धर्म का नशा कर के अगर भेड़ बनोगे तो ऊन तो उतरी ही जायेगी , खाल तो खींची जाएगी और मार के खाया ही जाएगा । हे शाशकों तुम्हारी मुक्ति खुद को पहचानने में है कब तक भेड़ बने रहोगे ?

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