जीवक कौमारभच्च बौद्ध भारत के प्रसिद्ध चिकित्सक थे, आइये बौद्ध धम्म के और मानवता के इतिहास के ऐसे चमकते सितारे की कथा जानते हैं


जीवक, एक कूड़े के ढेर पर मिला था | कूड़े के ढेर पर निजात शिशु को देख कर वहॉ भीड़ एकत्र हो गई, उसी समय पर वहॉ से राजा बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय कि सवारी गुजर रही थी | राजकुमार अभय ने भीड़ को देख कर एकत्र लोगों से प्रकरण कि जानकारी ली, तो पता चला कि नवजात शिशु जीवित है, अभय ने नवजात शिशु को इस कारण ‘जीवक’ नाम उसको देकर उसे गोद लेकर उसका अपने पुत्र कि तरह लालन पालन किया |

जीवक कि आयु बढने पर, उसे पता चला कि वह कूड़े के ढेर पर मिला था व अभय ने करूणावस उसका लालन पालन किया है | जीवक को लगा सभी बच्चे बडे होकर कोई न कोई सिप्प सीखकर कोई व्यवसाय करते हैं, अत: जीवक ने अभय से चिकित्सक (वैद्य) बनने कि इच्छा प्रकट की | अभय का आशीर्वाद प्राप्त करके जीवक तक्षसिला चिकित्सक बनने के लिए चला गया |

शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने गुरू से पूछा, “अभी कितने दिनों तक और शिक्षा प्राप्त करनी होगी|” ! गुरू ने कहा, “जीवक!  तक्षसिला कि गलियों में जाओ व जंगलो में भी जाओं और वहा पर जो भी ऐसा पौधा या वृक्ष मिले जिसकी औषधी न बनाई जा सकती हो, उसे तोडकर मेरे पास ले आओ|” जीवक ने सारा क्षेत्र ढूंढ मारा ऐसा कोई पौधा या वृक्ष नहीं मिला जिससे औषधि न बनाई जा सके और यही बात उसने अपने गुरू को बता दी | गुरू ने कहा, “तेरी शिक्षा पूर्ण हुई|” तब जीवक राजगृह अपने पिता अभय के पास पहुंचने के लिए निकल पडा|

लेकिन रास्ते में उसका यात्रा-व्यय समाप्त हो गया, इस स्थिति में जीवक ने पता किया कि यहा कोई यदि किसी असाध्य रोग से ग्रस्त है तो उसकी जानकारी उसे दे, एक सरेनी कि पत्नी माइग्रेन से पीडित थी, उस सरेनी कि पत्नी से जीवक बोला, “क्या मै आपका उपचार कर सकता हूँ?” सरेनी-पत्नी बोली बडे-बडे दीर्घायु को प्राप्त वैद्य तो मेरा उपचार कर न सके, तू तो नवयुवक है, तू क्या कर पायेगा? जीवक बोला कि एक अवसर प्रदान करे जिसका मुझे कोई शुल्क भी नहीं चाहिए, यदि आप स्वस्थ होने पर कुछ देना चाहे तो दे देना अन्यथा कोई बात नही | यह सुनकर सरेनी-पत्नी ने उपचार करने की अनुमति दे दी | वह कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गई, प्रसन्न होकर उसने उसे सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दीं |

यह सुचना प्राप्त होने पर सरेनी-पूत्री ने अपनी मॉ से दुगनी सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दी, सरेनी ने सुना कि उसकी पत्नी स्वस्थ हो गई है, रोगग्रस्त रहते हमेसा घिर-घिर करती रहती थी तो उसने अपनी पुत्री से भी दुगुना सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दे दी | अब जीवक के पास हजारों सुवर्ण मुद्रायें हो गई, इन्हें लेकर राजगृह के लिए प्रस्थान किया | राजगृह पहुच कर सारी सुवर्ण मुद्रायें जीवक ने अपने पिता अभय को दे दी, पिता अभय ने जीवक को समस्त मुद्रायें लोटाते हुये कहा कि अब इस क्षेत्र में अपना मकान बना कर रह | तब राजा बिम्बिसार बवासीर से ग्रस्त था व सभी उपचार व्यर्थ हो रहे थे, अभय के कहने पर बिम्बिसार ने अपने उपचार हेतु जीवक को बुलवा भेजा | जीवक के उपचार से राजा बिम्बिसार स्वस्थ हो गया तो राजा ने जीवक को क्षेत्रपति बना दिया व उस क्षेत्र में जीवक का बनाया ओषधालय आज भी पुरातत्व विभाग को प्राप्त है |

राजा बिम्बिसार ने दूसरे राजाओं के उपचार हेतु भी जीवक को भेजा व तथागत गोतम बुद्ध के उपचार करने का उत्तरदायित्व जीवक को प्रदान किया | जीवक ने तथागत गोतम बुद्ध के लिए जीवकाराम बनवाया | जीवक के कारण तथागत गोतम बुद्ध ने कई विनय पिटक में संशोधन भी किया था | आयुर्वेद में एक ओषधि का नाम आज भी “जीवक” है | जीवक को राजा बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय ने पाला पोसा इस कारण उसे “जीवक कौमारभृत्य” के नाम से समस्त जम्बूद्विप में जाना गया |

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