महामानव तथागत गौतम बुद्ध का सारनाथ मे प्रथम धम्मोपदेश जो उन्होंने अपने उन पांच साथियो को दिया जो तपस्या करते समय निरज्जना नदी के तट पर उनके साथ थे पर काय-कलेश का पथ त्याग देने पर क्रोधित होकर उन्हे छोड्कर चले गए थे.


ज्ञान प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध ने  सारनाथ मे , अपने उन पांच साथियो को उपदेश देने का निर्णय किया,  जो तपस्या करते समय निरज्जना नदी के तट पर उनके साथ थे, और जो सिद्धार्थ गौतम द्वारा तपस्या और काय-कलेश का पथ त्याग देने पर क्रोधित होकर उन्हे छोड्कर चले गए थे..
  • कुशल क्षेम को बाते करने के बाद बुद्ध से परिव्राजकों ने प्रश्न किया कि क्या अब भी तपश्चर्या तथा कार्य-क्लेश में उनका विश्वास था।  बुद्ध का उत्तर नकारात्मक था।
  • बुद्ध ने कहा, दो सिरे की बाते थी, एक काम भोग का जीवन और दूसरा कार्य-क्लेश का जीवन।
  • एक का कहना है, खाओ पीयो मौज उड़ाओ क्योंकि कल तो मर ही जाना है। दूसरे का कहना है , सभी वासनाओं ( इच्छाओं ) का मूलोच्छेद कर दो क्योंकि वे पुनर्जन्म का कारण हैं। उन्होंने दोनों को मनुष्य के योग्य नहीं माना।
  • वे मध्यम – मार्ग ( मज्झिम पटिपदा ) को मानने वाले थे, जो कि न तो काम-भोग का मार्ग है और न कार्य- क्लेश का मार्ग है ।
  • बुद्ध ने परिव्राजकों से कहा,” मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि जब तक तुम्हारे मन में सांसारिक अथवा अलौकिक भोगों की कामना बनी रहेगी , क्या तुम्हारा समस्त कार्य – क्लेश व्यर्थ नहीं होगा ? उन्होंने उत्तर दिया, “जैसा आप कहते हैं वैसा ही है ।”
  • “काय – क्लेश का शोक – संतप्त जीवन गुजारने से आप काम- तृष्णा की अग्नि से कैसे मुक्त हो सकते हैं ?” उन्होंने उत्तर दिया , “जैसा आप कहते हैं वैसा ही है।”
  • “जब आप अपने आप पर विजय पा लेंगे तभी आप कामतृष्णा की अग्नि से मुक्त होंगे, तब आप में सांसारिक काम -भोग की कामना न रहेगी और तब आपकी स्वाभाविक इच्छाएं आपको दूषित नहीं करेंगी। आपको अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार ही खाना – पीना ग्रहण करना चाहिए। “
  • “सभी तरह की विषयासक्ति कमजोर बनाती है । विषयों में आसक्त प्राणी वासनाओं का गुलाम होता है । सभी काम – भोगों की इच्छा करना अपमानजनक और अभद्र है । लेकिन मैं तुम्हें कहता हूं कि शरीर की स्वाभाविक आवश्यकताओं की पूर्ति करना बुराई नहीं है । शरीर को स्वस्थ बनाए रखना एक कर्तव्य है। अन्यथा आप अपने मनोबल को दृढ़ और स्वच्छ नहीं बनाए रख सकेंगे और पज्जा ( प्रज्ञा ) रूपी प्रदीप भी प्रज्वलित नहीं कर सकेंगे।”
  • “हे परिव्राजको ! ये दो अंत की बातें हैं जिससे प्राणी को सदा बचना चाहिए – एक ओर उन चीजों में संलग्न रहने की आदत से जिनका आकर्षण वासनाओं एवं मुख्यतः विषयासक्ति पर निर्भर करता है – यह संतुष्टि प्राप्त करने का निम्नकोटि का तथा विधर्मी मार्ग है ; अयोग्य है , हानिकारक है तथा दूसरी ओर आदत के अनुसार इसका अभ्यास , तपश्चर्या अथवा काय – क्लेश जो दुखदायी है , अयोग्य है तथा हानिकर है ।
  • “इन दोनों सिरे की बातों से अलग एक मध्यम मार्ग है । यह समझ लो कि यही मार्ग है, जिसकी में देसना देता हूं ।”
  • पांचों परिव्राजकों ने उनकी बात ध्यान से सुनी । यह न जानते हुए कि बुद्ध के मध्यम मार्ग का क्या उत्तर दें , उन्होंने प्रश्न किया , ” जब हम आपको छोड़कर चले आए थे तो उसके बाद आप क्या करते रहे ?” तब बुद्ध ने उन्हें बताया कि किस प्रकार वह बोधगया पहुंचे, कैसे उस पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठे और किस प्रकार लगातार चार सप्ताह के ध्यान के बाद उन्हें वह सम्बोधि प्राप्त हुई जिससे वह नए मार्ग का आविष्कार कर सके ।
  • यह सुनकर परिव्राजक उस नए मार्ग के बारे में जानने के लिए अत्यंत अधीर हो उठे । उन्होंने बुद्ध से निवेदन किया कि वे उन्हें विस्तार से बताएं ।
  • बुद्ध ने स्वीकार किया ।
  • बुद्ध ने बात आरंभ करते हुए बताया कि, उनका मार्ग जो सद्धम्म है, उसे आत्मा और परमात्मा से कुछ लेना – देना नहीं है। उनके सद्धम्म को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि मरने के बाद जीवन का क्या होता है। उनके सद्धम्म को कर्म – कांड के क्रिया-कलापों से भी कुछ लेना-देना नहीं है। 
  • बुद्ध के धम्म का केंद्र बिंदु मनुष्य है और इस पृथ्वी पर अपने जीवन काल में एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ सम्बंध का होना है ।
  • बुद्ध ने कहा, यह उनका प्रथम आधारतत्त्व ( अभिधारणा ) है ।
  • उनका दूसरा आधारतत्त्व था कि प्राणी दुख, कष्ट और दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। संसार दुख से भरा है और धम्म का उद्देश्य मात्र यही है कि संसार के इस दुख को कैसे दूर किया जाए। इसके अतिरिक्त सद्धम्म और कुछ नहीं है।
  • दुख के अस्तित्व की स्वीकृति और दुख को दूर करने का मार्ग दिखाना ही उनके धम्म का आधार है ।
  • धम्म के लिए एकमात्र यही सही आधार और औचित्य हो सकता है । जो धर्म इस बात को स्वीकार नहीं करता, वह धर्म ही नहीं है ।
  • “ हे परिव्राजको ! वास्तव में जो भी समण ( धम्मोपदेशक ) यह नहीं समझते कि संसार में दुख है और उस दुख को दूर करना ही धम्म की प्रमुख समस्या है, मेरे विचार में उन्हें समण ही नहीं मानना चाहिए । न ही वे समझने वाले हैं और न ही यह जान पाए हैं कि इस जीवन में धम्म का सही अर्थ क्या है ।”
  • तब परिव्राजकों ने पूछा, “यदि आपके धम्म का आधार दुख का अस्तित्व और उसे दूर करना है, तब हमें बताइए कि आप का धम्म दुख का नाश कैसे करता है।”
  • तब बुद्ध ने उन्हें समझाया कि उनके धम्म के अनुसार यदि हर मनुष्य ( i ) पवित्रता के पथ पर चले, ( ii ) धम्म परायणता के पथ पर चले, ( iii ) सील-मार्ग पर चले, तो इससे सभी दुखों का अंत हो जाएगा। 
  • और उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने ऐसे धम्म का आविष्कार कर लिया है।
संदर्भ ः बाबासाहब डो. भीमराव आंबेड्कर लिखित “बुद्ध और उनका धम्म”

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