26 सितंबर 2019 दो दलित बच्चों को खुले में शौच के कारन पीट पीट के मार डालने वाली घटना ने ये साबित किया है की जातिवादिओं के मन में किस कदर आज भी घृणा भरी हुई है,आखिर ये लोग इतनी घृणा लाते कहाँ से हैं , जबकि आये दिन प्रताड़ित होने वाले दलित आज तक इनके लिए अपने मन में घृणा नहीं ला पाए

जातिवाद है सबसे बड़ा आतंकवाद, इस बात को धीरे धीरे भारत का एक बड़ा तबका समझने लगा है, नीचे दिए हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के कार्टून में ये बताने की कोशिश की गयी है की आतंकवाद को जरूरत से ज्यादा ही बढ़ा खतरा प्रचारित किया जाता है जबकि जातिवाद इससे कहीं बड़ा खतरा है

दो दलित बच्चों को खुले में शौच के कारन पीट पीट के मार डालने वाली घटना ने ये साबित किया है की जातिवादिओं के मन में किस कदर आज भी घृणा भरी हुई है,आखिर ये लोग इतनी घृणा लाते कहाँ से हैं , जबकि आये दिन प्रताड़ित होने वाले दलित आज तक इनके लिए अपने मन में घृणा नहीं ला पाए

मध्यप्रदेश के शिवपुरी में दो दलित बच्चों को कुछ लोगों ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया।पूछताछ में एक आरोपी ने बोलै है की भगवन का आदेश हुआ है की राक्षशों का सर्वनाश कर दो|

मध्यप्रदेश के शिवपुरी ज़िले में खुले में शौच कर रहे दो दलित बच्चों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई है.

मामला ज़िले के सिरसौद थाना क्षेत्र के भावखेड़ी गांव का है. जहां पर बुधवार की सुबह वाल्मीकि समाज के दो बच्चे, रोशनी जिसकी उम्र 12 साल और अविनाश जिसकी उम्र 10 साल बताई जा रही है, पंचायत भवन के सामने सड़क पर शौच कर रहे थे.

पुलिस के मुताबिक़ हाकिम ने दोनों बच्चों को सड़क पर शौच करने से मना किया और कहा कि सड़क को गंदा कर रहे हो. उसके बाद उसने रामेश्वर के साथ मिलकर हमला कर दिया.

पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है. जानकारी के मुताबिक़ दोनों नाबालिग रिश्ते में बुआ और भतीजे थे.

घटना के बाद तनाव की वजह से क्षेत्र में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है. अविनाश के पिता मनोज वाल्मीकि ने दावा किया, “दोनों सुबह 6 बजे शौच के लिये निकले थे. हाकिम और रामेश्वर यादव ने उनकी लाठियों से पिटाई की. उन्होंने दोनों को तब तक मारा जब तक उनकी मौत नहीं हो गई. जब मैं वहा पहुंचा तो दोनों वहा से भाग गये थे.”

https://www.bbc.com/hindi/india-49832690

 

दलित बच्चों की पीट-पीटकर हत्या पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्य सरकारों पर हमला बोला है। मायावती ने इसको लेकर एक ट्वीट किया और सरकार पर हमला बोला। मायावती ने ट्वीट में लिखा, ‘देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों व धार्मिक अल्पसंख्यकों को सरकारी सुविधाओं से काफी वंचित रखने के साथ-साथ उन्हें हर प्रकार की द्वेषपूर्ण जुल्म-ज्यादतियों का शिकार भी बनाया जाता रहा है और ऐसे में मध्य प्रदेश के शिवपूरी में 2 दलित युवकों की नृशंस हत्या अति-दुःखद व अति-निन्दनीय।’

मानव जीवन में दुखों की मुक्ति का रास्ता है सिर्फ बौद्ध दर्शन का मध्यम मार्ग – अरविन्द आलोक

जब हम बुद्ध द्वारा कही गई बातों का मनन करते हैं , तो जो बात सबसे पहले हमारे मन को छूती है , वह है उनके द्वारा मानव मन को दी गई स्वतंत्रता। मन की प्रधानता पर जितना जोर बुद्ध ने दिया , उतना शायद ही किसी और ने दिया हो। उन्होंने कहा कि जैसे गाड़ी का पहिया बैल के पैरों के पीछे-पीछे घूमता है , उसी तरह हमारे जीवन का कार्य व्यापार हमारे मन के पीछे-पीछे चलता है। ‘ इसका आशय यह है कि मन के मुताबिक ही हर कार्य संपन्न होता है।

कर्म पर आप कितना भी बल दें , उससे क्या लाभ , जब मन ही स्वस्थ और स्वच्छ न हो। सुमार्ग पर जाना बहुत ही कठिन है , यदि मन गुस्सा या मैला हो। मन के द्वारा ही मानवीय गुणों को सीखा और सींचा जा सकता है। जीवन के आदर्शों को अपनाने में मन का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि मन की बुराइयों को दूर कर मन लायक संस्कार गढ़ें।

बौद्ध दर्शन में ऐसे मूल्यों को प्राप्त करना और उन्हें अपनी दिनचर्या में लागू करने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता होती है- वह है अष्टांगिक मार्ग। अष्टांगिक मार्ग का अर्थ है आठ अंगों वाला मार्ग , आठ तत्वों वाला मार्ग। ऐसी राह जिस पर चलने के लिए आठ बातों का ध्यान रखना है। वे आठ बातें कौन कौन सी हैं ? वे हैं सम्यक दृष्टि , सम्यक वचन , सम्यक काम , सम्यक आजीव , सम्यक व्यायाम , सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इन्हीं को मिला देने से अष्टांगिक मार्ग बन जाता है। अष्टांगिक मार्ग पर चलने से सभी मानवीय मूल्यों का स्वयं ही मन में विकास हो जाता है।

व्यक्ति मानव के सबसे अच्छे संस्कारों से ओतप्रोत हो कर सम्यक जीवन जीना सीखता है। इस अष्टांगिक मार्ग को ही बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा , जिस पर चलना बहुत कठिन नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस मार्ग पर चल सकता है और चलकर सुखी जीवन जी सकता है।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग का रास्ता दिखा कर मानव का बहुत बड़ा हित किया। जब सभी लोग और सभी देश अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और कोई भी किसी से कम नहीं होने की बात कर रहा है- ऐसे में ‘ मध्यम मार्ग ‘ एक बहुत बड़ा समाधान हो सकता है मानव और विश्व की सारी परेशानियों को दूर करने का। बीच का रास्ता अपनाओ और सभी बाधाओं को पार कर जाओ-यही मूल मंत्र है सम्यक जीवन जीकर परम लक्ष्य को प्राप्त करने का। मध्यम मार्ग अपनाने से व्यक्ति के मन को कोई ठेस नहीं पहुंचती। उसका सम्मान रह जाता है और टकराव तथा संताप की स्थिति भी पैदा नहीं होती। इसके विपरीत हमें मैत्री और सद्भाव का लाभ मिलता है।

इसी भाव से तो विश्व में शान्तिपूर्ण मानव समाज के विचार को साकार करने में सफलता मिलेगी। नई पीढ़ी के लिए तो बुद्ध का यह दर्शन सबसे ज्यादा उपयोगी है। उसे मन की स्वतंत्रता देकर भविष्य के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। कुंठाओं में डूबे युवा न तो अपने आप का विकास कर सकते हैं और न देश का। स्वतंत्र मन के माध्यम से ही स्वतंत्र समाज और संपन्न राष्ट्र की बात की जा सकती है।

बंधा हुआ और विचलित मन कभी पर्याप्त परिणाम और परिमाण नहीं दे सकता। इसलिए जरूरी है कि नई पीढ़ी को हम आजादी दें , बंधन मुक्त करें। लेकिन कितनी स्वतंत्रता दें ? क्या पूरी तरह से छोड़ दें ? नहीं , मध्य मार्ग पर रहें- वीणा के तार को थोड़ा कसें , थोड़ा ढील दें। लेकिन आजाद हो कर युवा पीढ़ी भी क्या करे ? इस स्वतंत्रता के उपभोग में भी मध्यम मार्ग का अनुसरण उपयोगी है। क्योंकि मध्यम मार्ग जहां हमारे मन के मान की रक्षा करता है , वहीं अनेकानेक कुविचारों से भी बचाता है। अच्छे कर्मों का संचय और बुरे कार्यों का त्याग-मध्यम मार्ग के माध्यम से ही सम्भव है।

इसके लिए ‘ मिलाजुला कर ‘ कह सकते हैं कि ‘ मध्यम मार्ग ही मानव की मुक्ति का मार्ग है! ‘ वही मानव को जीवन सागर पार कराने वाला यान भी है , चाहे आप संसारी की तरह जीवन का सुख पाना चाहें या निर्वाण ही प्राप्त करना चाहें।

Source

https://hindi.speakingtree.in/article/content-246850

 

 

आज शिक्षक दिवस पर आओ जाने पहली शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले को जिन्होंने भारत के हजारों साल के इतिहास में पहली बार महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोले…सिद्धार्थ

आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र. बंगाली पुनर्जागरण मूलत: हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुवा उच्च जातियों और उच्च वर्गों के लोग थे. इसके विपरीत महाराष्ट्र के पुनर्जागरण ने हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं को चुनौती दी. वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया. महाराष्ट्र के पुनर्जागरण की अगुवाई शूद्र और महिलाएं कर रही थीं. इस पुनर्जागरण के दो स्तंभ थे- सावित्री बाई फुले और उनके पति जोतिराव फुले.

हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों और महिलाओं को एक समान माना गया है. ग्रंथों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि – स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं. हिंदू धर्मशास्त्र ये भी कहते हैं कि – स्त्री और शूद्र अध्ययन न करें. ये स्थापित मान्यताएं थीं और सभी वर्णों के लोग इनका पालन करते आए थे.

हिंदू धर्म, समाज व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए तय स्थान को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने संगठित रूप से चुनौती दी, उनका नाम सावित्री बाई फुले है. वे आजीवन शूद्रों-अति शूद्रों की मुक्ति और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करती रहीं.

ईसाई मिशनरियों से मिली पढ़ने की सीख

उनका जन्म नायगांव नाम के गांव में 3 जनवरी 1831 को हुआ था. यह महाराष्ट्र के सतारा जिले में है, जो पुणे के नजदीक है. वे खंडोजी नेवसे पाटिल की बड़ी बेटी थीं, जो वर्णव्यस्था के अनुसार शूद्र जाति के थे. वे जन्म से शूद्र और स्त्री दोनों एक साथ थीं, जिसके चलते उन्हें दोनों के दंड जन्मजात मिले थे.

ऐसे समय में जब शूद्र जाति के किसी लड़के के लिए भी शिक्षा लेने की मनाही थी, उस समय शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए शिक्षा पाने का कोई सवाल ही नहीं उठता. वे घर के काम करती थीं और पिता के साथ खेती के काम में सहयोग करती थीं. पहली किताब उन्होंने तब देखी, जब वे गांव के अन्य लोगों के साथ बाजार शिरवाल गईं. उन्होंने देखा कि कुछ विदेशी महिला और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह की प्रार्थना करते हुए गाना गा रहे थे. वे जिज्ञासावश वहां रुक गईं, उन महिला-पुरुषों में किसी ने उनके हाथ में एक पुस्तिका थमायी. सावित्रा बाई पुस्तिका लेने में हिचक रही थीं. देने वाले ने कहा कि यदि तुम्हे पढ़ना नहीं आता, तब भी इस पुस्तिका को ले जाओ. इसमें छपे चित्रों को देखो, तुम्हें मजा आयेगा. वह पुस्तिका सावित्री बाई अपने साथ लेकर आईं.

जब 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी 13 वर्षीय जोतिराव फुले के साथ हुई और वे अपने घर से जोतिराव फुले के घर आईं, तब वह पुस्तिका भी वे अपने साथ लेकर आई थीं.

फातिमा शेख और सावित्री बाई बनी शिक्षिका: 1 जनवरी को खोला स्कूल

जोतिराव फुले सावित्री बाई फुले के जीवनसाथी होने के साथ ही उनके शिक्षक भी बने. जोतिराव फुले और सगुणा बाई की देख-रेख में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करन के बाद सावित्री बाई फुले ने औपचारिक शिक्षा अहमदनगर में ग्रहण की. उसके बाद उन्होंने पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लिया. इस प्रशिक्षण स्कूल में उनके साथ फातिमा शेख ने भी अध्यापन का प्रशिक्षण लिया. यहीं उनकी गहरी मित्रता कायम हुई. फातिमा शेख उस्मान शेख की बहन थीं, जो जोतिराव फुले के घनिष्ठ मित्र और सहयोगी थे. बाद में इन दोनों ने एक साथ ही अध्यापन का कार्य भी किया.

फुले दंपत्ति ने 1 जनवरी 1848 को लड़कियों के लिए पहला स्कूल पुणे में खोला. जब 15 मई 1848 को पुणे के भीड़वाडा में जोतिराव फुले ने स्कूल खोला, तो वहां सावित्री बाई फुले मुख्य अध्यापिका बनीं. इन स्कूलों के दरवाजे सभी जातियों के लिए खुले थे. जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए खोले जा रहे स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही थी. इनकी संख्या चार वर्षों में 18 तक पहुंच गई.

फुले दंपत्ति के ये कदम सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती थे. इससे उनके एकाधिकार को चुनौती मिल रही थी, जो समाज पर उनके वर्चस्व को तोड़ रहा था. पुरोहितों ने जोतिराव फुले के पिता गोविंदराव पर कड़ा दबाव बनाया. गोविंदराव पुरोहितों और समाज के सामने कमजोर पड़ गए. उन्होंने जोतिराव फुले से कहा कि या तो अपनी पत्नी के साथ स्कूल में पढ़ाना छोड़ें या घर. एक इतिहास निर्माता नायक की तरह दुखी और भारी दिल से जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले ने शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए घर छोड़ने का निर्णय लिया.

जब सावित्री बाई पर फेंका गया गोबर और पत्थर

परिवार से निकाले जाने बाद ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सावित्री बाई फुले का पीछा नहीं छोड़ा. जब सावित्री बाई फुले स्कूल में पढ़ाने जातीं, तो उनके ऊपर गांव वाले पत्थर और गोबर फेंकते. सावित्री बाई रुक जातीं और उनसे विनम्रतापूर्वक कहतीं, ‘मेरे भाई, मैं तुम्हारी बहनों को पढ़ाकर एक अच्छा कार्य कर रही हूं. आप के द्वारा फेंके जाने वाले पत्थर और गोबर मुझे रोक नहीं सकते, बल्कि इससे मुझे प्रेरणा मिलती है. ऐसे लगता है जैसे आप फूल बरसा रहे हों. मैं दृढ़ निश्चय के साथ अपनी बहनों की सेवा करती रहूंगी. मैं प्रार्थना करूंगी की भगवान आप को बरकत दें.’ गोबर से सावित्री बाई फुले की साड़ी गंदी हो जाती थी, इस स्थिति से निपटने के लिए वह अपने पास एक साड़ी और रखती थीं. स्कूल में जाकर साड़ी बदल लेती थीं.

शिक्षा के साथ ही फुले दंपत्ति ने समाज की अन्य समस्याओं की ओर ध्यान देना शुरू किया. सबसे बदतर हालत विधवाओं की थी. ये ज्यादातर उच्च जातियों की थीं. इसमें अधिकांश ब्राह्मण परिवारों की. अक्सर गर्भवती होने पर ये विधवाएं या तो आत्महत्या कर लेतीं या जिस बच्चे को जन्म देती, उसे फेंक देतीं. 1863 में फुले दंपत्ति ने बाल हत्या प्रतिबंधक गृह शुरू किया. कोई भी विधवा आकर यहां अपने बच्चे को जन्म दे सकती थी. उसका नाम गुप्त रखा जाता था.

इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह का पोस्टर जगह-जगह लगाया गया. इन पोस्टरों पर लिखा था कि ‘विधवाओं! यहां अनाम रहकर बिना किसी बाधा के अपना बच्चा पैदा कीजिए. अपना बच्चा साथ ले जाएं या यहीं रखें, यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा.’ सावित्री बाई फुले बालहत्या प्रतिबंधक गृह में आने वाली महिलाओं और पैदा होने वाले बच्चों की देखरेख खुद करती थीं. इसी तरह की एक ब्राह्मणी विधवा काशीबाई के बच्चे को फुले दंपत्ति ने अपने बच्चे की तरह पाला. जिनका नाम यशवंत था.

सत्यशोधक समाज का नेतृत्व

सामाजिक परिवर्तन के लिए जोतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी. उनकी मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्री बाई फुले के हाथों में सौंपी गई. 1891 से लेकर 1897 उन्होंने इसका नेतृत्व किया. सत्यशोधक विवाह पद्धति को भी अमलीजामा पहनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

सावित्री बाई फुले आधुनिक मराठी की महत्वपूर्ण कवयित्री भी थीं. उनका पहला काव्य संकलन 1854 में काव्य फुले के रूप में प्रकाशित हुआ, जब उनकी उम्र 23 वर्ष थी. 1892 में उनकी कविताओं के दूसरा संग्रह ‘बावन काशी सुबोध रतनाकर’ प्रकाशित हुआ. यह बावन कविताओं का संग्रह है. इसे उन्होंने जोतिराव फुले की याद में लिखा है और उन्हीं को समर्पित किया है. सावित्री बाई फुले के भाषण भी 1892 में प्रकाशित हुए. इसके अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे पत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. ये पत्र उस समय की परिस्थितियों, लोगों की मानसिकता, फुले के प्रति सावित्री बाई की सोच और उनके विचारों को सामने लाते हैं.

1896 में एक एक बार फिर पुणे और आस-पास के क्षेत्रों में अकाल पड़ा. सावित्री बाई फुले ने दिन-रात अकाल पीड़ितों को मदद पहुंचाने लिए एक कर दिया. उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि अकाल पीड़ितों को बड़े पैमाने पर राहत सामग्री पहुंचाए. शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की शिक्षिका और पथप्रदर्शक मां सावित्री बाई का जीवन अनवरत अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते और न्याय की स्थापना के लिए बीता. उनकी मृत्यु भी समाज सेवा करते ही हुई.

1897 में प्लेग की वजह से पुणे में महामारी फैल गई. वे लोगों की चिकित्सा और सेवा में जुट गईं. स्वंय भी इस बीमारी का शिकार हो गईं. 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हुई. उनकी मृत्यु के बाद भी उनके कार्य और विचार मशाल की तरह देश को रास्ता दिखा रहे हैं.

(लेखक हिंदी साहित्य में पीएचडी हैं और फ़ॉरवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक हैं.)

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पहली बार महिलाओं के लिए शिक्षा का द्वार खोलने वाली सावित्री बाई फुले

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