मानव जीवन में दुखों की मुक्ति का रास्ता है सिर्फ बौद्ध दर्शन का मध्यम मार्ग – अरविन्द आलोक


जब हम बुद्ध द्वारा कही गई बातों का मनन करते हैं , तो जो बात सबसे पहले हमारे मन को छूती है , वह है उनके द्वारा मानव मन को दी गई स्वतंत्रता। मन की प्रधानता पर जितना जोर बुद्ध ने दिया , उतना शायद ही किसी और ने दिया हो। उन्होंने कहा कि जैसे गाड़ी का पहिया बैल के पैरों के पीछे-पीछे घूमता है , उसी तरह हमारे जीवन का कार्य व्यापार हमारे मन के पीछे-पीछे चलता है। ‘ इसका आशय यह है कि मन के मुताबिक ही हर कार्य संपन्न होता है।

कर्म पर आप कितना भी बल दें , उससे क्या लाभ , जब मन ही स्वस्थ और स्वच्छ न हो। सुमार्ग पर जाना बहुत ही कठिन है , यदि मन गुस्सा या मैला हो। मन के द्वारा ही मानवीय गुणों को सीखा और सींचा जा सकता है। जीवन के आदर्शों को अपनाने में मन का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि मन की बुराइयों को दूर कर मन लायक संस्कार गढ़ें।

बौद्ध दर्शन में ऐसे मूल्यों को प्राप्त करना और उन्हें अपनी दिनचर्या में लागू करने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता होती है- वह है अष्टांगिक मार्ग। अष्टांगिक मार्ग का अर्थ है आठ अंगों वाला मार्ग , आठ तत्वों वाला मार्ग। ऐसी राह जिस पर चलने के लिए आठ बातों का ध्यान रखना है। वे आठ बातें कौन कौन सी हैं ? वे हैं सम्यक दृष्टि , सम्यक वचन , सम्यक काम , सम्यक आजीव , सम्यक व्यायाम , सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इन्हीं को मिला देने से अष्टांगिक मार्ग बन जाता है। अष्टांगिक मार्ग पर चलने से सभी मानवीय मूल्यों का स्वयं ही मन में विकास हो जाता है।

व्यक्ति मानव के सबसे अच्छे संस्कारों से ओतप्रोत हो कर सम्यक जीवन जीना सीखता है। इस अष्टांगिक मार्ग को ही बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा , जिस पर चलना बहुत कठिन नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस मार्ग पर चल सकता है और चलकर सुखी जीवन जी सकता है।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग का रास्ता दिखा कर मानव का बहुत बड़ा हित किया। जब सभी लोग और सभी देश अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और कोई भी किसी से कम नहीं होने की बात कर रहा है- ऐसे में ‘ मध्यम मार्ग ‘ एक बहुत बड़ा समाधान हो सकता है मानव और विश्व की सारी परेशानियों को दूर करने का। बीच का रास्ता अपनाओ और सभी बाधाओं को पार कर जाओ-यही मूल मंत्र है सम्यक जीवन जीकर परम लक्ष्य को प्राप्त करने का। मध्यम मार्ग अपनाने से व्यक्ति के मन को कोई ठेस नहीं पहुंचती। उसका सम्मान रह जाता है और टकराव तथा संताप की स्थिति भी पैदा नहीं होती। इसके विपरीत हमें मैत्री और सद्भाव का लाभ मिलता है।

इसी भाव से तो विश्व में शान्तिपूर्ण मानव समाज के विचार को साकार करने में सफलता मिलेगी। नई पीढ़ी के लिए तो बुद्ध का यह दर्शन सबसे ज्यादा उपयोगी है। उसे मन की स्वतंत्रता देकर भविष्य के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। कुंठाओं में डूबे युवा न तो अपने आप का विकास कर सकते हैं और न देश का। स्वतंत्र मन के माध्यम से ही स्वतंत्र समाज और संपन्न राष्ट्र की बात की जा सकती है।

बंधा हुआ और विचलित मन कभी पर्याप्त परिणाम और परिमाण नहीं दे सकता। इसलिए जरूरी है कि नई पीढ़ी को हम आजादी दें , बंधन मुक्त करें। लेकिन कितनी स्वतंत्रता दें ? क्या पूरी तरह से छोड़ दें ? नहीं , मध्य मार्ग पर रहें- वीणा के तार को थोड़ा कसें , थोड़ा ढील दें। लेकिन आजाद हो कर युवा पीढ़ी भी क्या करे ? इस स्वतंत्रता के उपभोग में भी मध्यम मार्ग का अनुसरण उपयोगी है। क्योंकि मध्यम मार्ग जहां हमारे मन के मान की रक्षा करता है , वहीं अनेकानेक कुविचारों से भी बचाता है। अच्छे कर्मों का संचय और बुरे कार्यों का त्याग-मध्यम मार्ग के माध्यम से ही सम्भव है।

इसके लिए ‘ मिलाजुला कर ‘ कह सकते हैं कि ‘ मध्यम मार्ग ही मानव की मुक्ति का मार्ग है! ‘ वही मानव को जीवन सागर पार कराने वाला यान भी है , चाहे आप संसारी की तरह जीवन का सुख पाना चाहें या निर्वाण ही प्राप्त करना चाहें।

Source

https://hindi.speakingtree.in/article/content-246850

 

 

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