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मुंशी प्रेमचंद ने 1934 में एक फिल्म “मिल मज़दूर” लिखी पर मिल मालिकों ने उसे चलने नहीं दी तब मुंबई छोड़ते हुए उन्होंने कहा था “शराब के धंधे की तरह ही फिल्म का धंधा भी बिज़नेस माफिया चलाता है, क्या दिखाना है क्या नहीं दिखाना सब वही तय करते हैं। ” क्या ये बात आज भी लागू है? ….Krishan Rumi

मुंशी प्रेमचंद को 1934 में एक फिल्म लिखने का ऑफर मिला।

फिल्म का नाम था “मिल मज़दूर”
ये प्रेमचंद की लिखी एक मात्र फिल्म है इतिहास की,
प्रेमचंद को इस फिल्म के लिए उस समय 8000 रुपये मिले थे जो बहुत बड़ी रकम थी तब के हिसाब से ।
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प्रेमचंद ने ना केवल फिल्म लिखी थी बल्कि इसमें मजदूरों के नेता का एक छोटा सा रोल भी किया था।

फिल्म बना रहा था अजंता प्रोडक्शन नाम का स्टूडियो।
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फिल्म 1934 में बनकर तैयार हो गयी,
प्रेमचंद इस दौर में मुंबई में ही रहे।
1934 से 1935 तक।

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फिल्म की कहानी ये थी के एक टेक्सटाइल मिल का मालिक मर जाता है, और उसके बेटे को मिल चलाने के लिए मिल जाती है,अब वो नए विचारों का लड़का होता है, और बिज़नेस की बढ़ोत्तरी के लिए इंसान को इंसान नहीं समझता होता है। लोगों को निकालना उन्हें प्रताड़ित करना ये सब मिल में होने लग जाता है। फिल्म की हीरो उसकी बहन है, जो पिता को मिल चलाते देख रही थी मरने से पहले,वो मजदूरों के हकों के लिए खड़ी हो जाती है, उनसे हड़तालें करवाती है।एन्ड में भाई जेल जाता है, और लड़की मिल को वापस शुरू करती है।
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अब फिल्म में लड़की का डायलाग बताते हैं की इतना असरदार था की उस से मुंबई जो उस समय टेक्सटाइल का हब माना जाता था वहां मजदूरों की क्रांति होने लग गयी।

उस समय जिसने फिल्म देखि थी उसका कहना था की प्रेमचंद ने बेहतरीन फिल्म लिखी है।
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1935 में फिल्म को रिलीज़ करने की मेहनत शुरू हुई,बोर्ड ने इसे बैन कर दिया,फिल्म को दुबारा नए नाम “सेठ की लड़की” से रिलीज़ करने की कोशिश की,लेकिन बिज़नेस लॉबी ने इसे फिर बैन करवा दिया।

मिल मालिकों ने फिल्म सिनेमा हाल से हटवा दी। कई जगह जोर जबरदस्ती से।

प्रेमचंद फिर मुंबई छोड़कर चले गए, उन्हें लगा की अब कोई फायदा नहीं है यहां रहने का।
उन्होंने जाते हुए बयान दिया था की “शराब के धंधे की तरह ही फिल्म का धंधा भी बिज़नेस माफिया चलाता है, क्या दिखाना है क्या नहीं दिखाना सब वही तय करते हैं। ”
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और प्रेमचंद की बात सही भी थी।
इंडस्ट्री उस समय बदहाली से गुजर रही थी,
मजदूरों के हकों का कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा था,
1929 के ग्रेट डिप्रेशन ने पूरी दुनिया के बिज़नेस को डब्बा कर रखा था।
मजदूरों को तनख्वां नहीं मिल रही थी, भूखे मर रहे थे मजदूर, घर जाएँ कैसे उसके भी पैसे नहीं थे उनके पास!
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1936 में फिल्म को कांट छांट के रिलीज़ किया गया “दया की देवी” नाम से।
फिल्म इक्का दुक्का किसी ने देखि होगी।
फिल्म लाहौर, दिल्ली, और लखनऊ में रिलीज़ हुई थी, लेकिन वहाँ से भी वो फिर हटवा दी गयी।
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फिल्म को बार बार बैन करवाने में बिज़नेस लॉबी का हाथ था,
और उस लॉबी का उस समय लीडर था भयरामजी जीजाभाई, जो उस समय ना केवल सेंसर बोर्ड के मेंबर थे, बल्कि टेक्सटाइल मिल एसोसिएशन के प्रेजिडेंट भी थे !
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इस से केवल प्रेमचंद ही मुंबई से वापस नहीं गए, फिल्म को बनाने वाला अजंता प्रोडक्शन भी दिवालिया हो गया।
फिल्म की अब कोई कॉपी नहीं है दुनिया में। सब लॉस्ट हो चुकी हैं, अब इसके बारे में केवल उस समय की ख़बरों में पढ़ा जा सकता है।
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इस समय ये शेयर करने का मकसद ये है के इस से आपको बिज़नेस लॉबी की मीडिया पर पकड़ का अंदाजा हो जाएगा की ये film/news मीडिया अभी नहीं बिका है, हमेशा से बिका रहा है।
बिज़नेस लॉबी इसे शुरू से ड्राइव कर रही है, खबरें फिल्में आप तक फ़िल्टर होकर ही पहुँचती है, उनमे से आपको कम बुरा और ज्यादा बुरा में से कुछ चूज़ करना होता हो।

आज जिस तरह से मज़दूरों की सडकों पर मौत हो रही है और उन्हें घर नहीं जाने दे रही सरकार, ऐसे समय में परदे के पीछे के विलन पहचानना जरूरी हो जाता है, की क्यों नहीं बस और ट्रैन में भेजे गए मजदूर जबकि देश में बस और ट्रैन दोनों इस समय खाली खड़ी हैं।
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फिल्म से जुडी एक इंटरेस्टिंग बात ये और है की प्रेमचंद की फिल्म से ना केवल मुंबई की मिलों में हड़ताल हुई, बल्कि बनारस में खुद प्रेमचंद की प्रेस में हड़ताल हो गयी थी।

Krishan Rumi

श्रमिकों मजदूरों की रक्षा वाले कानूनों को ससपेंड करने के खिलाफ बौद्ध भंते सुमित रतन जी भूख हड़ताल पर है,बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने लेबर मिनिस्टर के रूम में इनमे से कोई कानून बनाये थे

 

श्रमिकों मजदूरों की रक्षा वाले कानूनों को ससपेंड होने का क्या मतलब है इससे आपपर क्या असर होगा जाने के लिए देखिये रविश कुमार का ये वीडियो

 

 

https://www.thehindu.com/news/national/trade-unions-to-go-on-strike-on-may-22-to-protest-against-labour-laws-suspension/article31594022.ece

 

 

 

 

 

अपने दुःख के सही कारन समझे बिना जब तक पूजा कर्मकांड में लगे रहोगे तब तक पीड़ित रहोगे, चाहे कितनी ही सादिया बीत जाएँ। घाव अगर पैर में है तो सर की तेल मालिश से वो कैसे ठीक होगा, औषदि तो पैर के घाव पर ही लगनी होगी ।…OSHO

कोरोना जैसी महामारी के इलाज के लिए रिसर्च तभी हो पाएगी जब आप यह नहीं मानोगे कि इसको कोई इश्वरिये शक्ति करा रही है,इसीलिए बौद्ध लोग सदा कहते रहते हैं की बुद्धिवादी या वैज्ञानिक सोच से ही मानवता का भला होगा ,बुद्धिवादी या वैज्ञानिक सोच के जनक गौतम बुद्ध को नमन…एडवोकेट आर0 आर0 बाग (Supreme Court)

बुद्ध ज्ञान की एक अवस्था है। ज्ञान प्राप्ति करके कोई भी उसी अवस्था को प्राप्त कर सकता है। सिद्धार्थ गौतम ने अपने बुद्धि को जागृत कर , ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध बने थे। सिद्धार्थ गौतम से पहले भी 28 बुद्ध हो चुके हैं।

चीन परिव्राजक चीनी यात्री हीउन सांग ने भी अपनी किताब में तीन बुद्ध का जिक्र किया है।

बुद्ध के मूर्ति एक सिंबॉलिक है। बुद्ध की मूर्ति को बुद्ध या भगवान मान लेना मूर्खता है।

यीशु मसीह ने कहा कि मैं परमेश्वर का बेटा हूं।मेरी माध्यम से ही आप परमेश्वर को प्राप्त कर सकते हैं।
मोहम्मद साहब ने कहा मैं अल्लाह द्वारा भेजा गया आखिरी पैगंबर हूं। मेरे बगैर कोई दूसरा रास्ता नहीं है। जहन्नुम की आग से बचना है तो “ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूल अल्लाह” ।

उसके बाद लॉर्ड कृष्णा ने आगे जाकर कहा कि मैं ईश्वर ओं का ईश्वर हूं धरती में जो कुछ भी हो रहा है वही मैं ही करा रहा हूं। “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानम अधर्मस्या तादात्मनम सुरजा में हम” जब तक धरती में दुख पाप बढ़ेगा तो मैं धरती पर अवतार होता हूं और सब कुछ खत्म करता हूं। मेरी शरण में आए बैगर तुम्हें मोक्ष नहीं मिलेगी।

मगर बुद्ध ने ऐसा नहीं कहा उन्होंने अपनी वाणी को चैलेंज करने की पूरी छूट दी। उन्होंने कहा कि कोई कुछ भी कहे जब तक उस चीज को आप अपने तर्क की कसौटी पर खरा उतरे नहीं देखे तो उसके ऊपर यकीन मत करो उसको संदेह की दृष्टि में देखो। मैं मोक्षदाता नहीं हूं मैं मार्गदाता हूं।

आज दुनिया के जितने भी साइंटिफिक रिवॉल्यूशन हुए हैं वह सारे के सारे बुद्ध द्वारा बताए गए सिद्धांत से ही हो पाई है। खोज या कोई भी चीज का इंवेंशन होती है उसके पीछे जो रिसर्च है वह उसी को आगे लेकर जाने से ही संभव होती है । इलाज समाधान की लिए रिसर्च तभी हो पाएगी जब आप यह नहीं मानोगे कि यह किसी भगवान या किसी अल्लाह या कोई देवी शक्ति करा रही है।

बुद्ध ने प्राणी हिंसा से बचने के लिए कहा। उसी चीज को नहीं मानने की वजह से ,चाहे ईबोला, swine flu हो या आज के कोरोना बीमारी सारे के सारे जीव जंतु से इंसान के अंदर आए हैं। आज पूरे दुनिया करोना कि चपेट में है। धर्म का धंधा सब ठप है । वैज्ञानिक कोरोना बीमारी के कारण और इलाज के लिए वैक्सीन बनाने में लगे हैं । अगर ये वैज्ञानिक धार्मिक सोच वाले होते तो कोरोना को भी देवीए आपदा मानकर बाकि धर्म वालों के साथ मरते होते। इसलिए बुद्धि वादी बनो, अपने अंदर वैज्ञानिक सोच को डिवेलप करें। अपने अंदर धार्मिक की जगह वैज्ञानिक सोच पैदा करना हमारा संवैधानिक कर्त्तव्य भी है।

“दुख है तो दुख का कारण है कारण है तो कारण का निवारण है। ” किसी चीज का कारण ढूंढे बगैर वैज्ञानिक अध्ययन संभव नहीं है। संसार के प्रथम वैज्ञानिक बुद्ध का यह सिद्धांत आगे भी मानवता का हित के लिए कार्य करेगा।

सबका मंगल हो

एडवोकेट आर0 आर0 बाग (Supreme Court)

आज 7 मई 2020 को गौतम बुद्ध जयंती या वैशाख पूर्णिमा है ये बौद्धजनो का प्रिये उत्सव है, भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति /बुद्धत्व और महापरिनिर्वाण ये तीनों वैशाख पूर्णिमा के ही दिन हुए थे। आइये उनके कुछ कथन देखें और अपने साथियों में शेयर करें

बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों का एक प्रमुख त्यौहार है। यह बैसाख माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, इसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था।

५६३ ई.पू. बैसाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध का जन्म लुंबिनी, शाक्य राज्य (आज का नेपाल) में हुआ था। इस पूर्णिमा के दिन ही ४८३ ई. पू. में ८० वर्ष की आयु में, कुशीनगर में उन्होने निर्वाण प्राप्त किया था। वर्तमान समय में कुशीनगर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद का एक कस्बा है। कुशीनगर का इतिहास में कुुशनारा नाम से उल्लेेख मिलता है। इस वर्ष 2020 में बुद्ध पूर्णिमा 7 मई को है

बुद्ध का मकसद किसी धर्म का अविष्कार या ईश्वरवाद फैलाना नहीं बल्कि उनकी रिसर्च और प्रचार का लक्ष्य इंसानी जीवन के दुखों के असल कारन और उनका समाधान है। उन्होंने ‘अनुभवों’ पे आधारित ऐसे ‘सूत्र’ दिए जिनसे व्यक्ति की आंख खुलती है और वो आत्मनिर्भर और सुखी बनता है

ये बुद्ध कथन आप अपने साथियों में शेयर करें

बौद्धों को बुद्धू इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये सब बाते करते हैं पर शक्ति की बात न जानते न करते है- चार प्रकार की शक्ति हैं :- धन शक्ति , शस्त्र शक्ति, संगठन शक्ति और निति शक्ति,परिणाम दलितीकरण

बौद्धों को बुद्धू इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये सब बाते करते हैं पर शक्ति की बात न जानते न करते है- चार प्रकार की शक्ति हैं :- धन शक्ति , शस्त्र शक्ति, संगठन शक्ति और निति शक्ति