L: भारतवासियों पर मशहूर बुद्धिजीवियों के विचार

 

why BAHUJAN  revolution never happened in India, and cannot happen….by Guru shri OSHO RAJNEESH

So everybody is satisfied deep down, and that’s why revolution never

happened in India, and cannot happen. In every country where revolutionosho36

happens, it is the intelligentsia of the country which provokes it. They don’t

do the revolution, but they give the ideology. But in India the brahmin is the

intelligentsia. Every revolution will go against him; naturally, he cannot give

the ideology of revolution. He will give ideologies that prevent any dream of

revolution, of change. Of course the king, the warriors, cannot be in favor of

revolution because it is going to be against them. They will be thrown out of

their thrones. The businessmen cannot be for revolution, either, because all

revolutions are against the rich.

 

And the poor man cannot even imagine revolution, because he has not

been allowed any kind of education. He has been prohibited from any contact

with the society of the three higher classes. He lives outside the town: he

cannot live inside the town. The poor people’s wells are not deep, they

cannot put much money into making wells. The businessmen have big, deep

wells and the king has his own; but even in times when rains have not come

and his wells are dry, the sudra is not allowed to take water from any other

well. He may have to go ten miles to fetch water from a river.

 

He is so hungry that it is difficult to manage one meal a day, which has

no nourishment in it – how can he think of revolution? He knows that this is

his fate. He has been told and conditioned by the priest that this is his fate:

“God has given you an opportunity to show your trust. This poverty is

nothing, it is a question of a few years. If you can remain faithful, great is

the reward.” So on the one hand the priest goes on preaching to them

against any change, and on the other hand they cannot conceive of change

because they are undernourished.

 

And you have to understand one thing: that the undernourished person

loses intelligence. Intelligence blossoms only when you have everything that

your body needs, plus something more. That plus becomes your intelligence,

because intelligence is a luxury. A person who has only one meal a day has

nothing, no energy left for intelligence to grow. It is the intelligentsia that

creates the ideas, new philosophies, new ways of life, new dreams for the

future; but that intelligentsia is already on the top. In fact, India has done

something of tremendous importance: no other country has been able to

maintain the status quo in such a scientific way. And you will be surprised;

the man who did it was Manu. After five thousand years, his sutras are still

followed exactly.

 

In this century, only two persons outside India have appreciated Manu.

One is Friedrich Nietzsche, the other is Adolf Hitler. Adolf Hitler was a disciple

of Friedrich Nietzsche. Friedrich Nietzsche was the philosopher of Nazism:

Adolf Hitler was simply practicing what Nietzsche had preached. The

relationship is exactly as between Marx and Lenin. Marx was the philosopher

who gave the whole ideology of communism, and Lenin put it into reality.

The same was the relationship between Friedrich Nietzsche and Adolf Hitler.

It is not a coincidence that they should both appreciate a book written

five thousand years before in India. Both appreciated it because they could

see what a grand master-planner Manu must have been, to have made a

system that is still alive. He prevented revolution for five thousand years, and

perhaps he will prevent it forever. There may never be a revolution in India.

  

Source:

Book Title: The Last Testament, Vol. 2.       //  Chapter 6: The Intelligent Way

http://www.osho.com/library/online-library-revolution-lenin-india-f65a91d0-351.aspx

==========================हिंदी रूपांतरण ===========================================================

तो सब लोग तहे दिल से संतुष्ट होंगे, और यही वजह है कि भरत देश में कभी क्रांति नहीं हुई 
और न ही कभी हो सक्ति है। दुनियां में जिस भी देश में क्रन्ति होति है उस क्रन्ति 
कि शुरुआत उस देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग करते है, वो असल मे खुद 
क्रांति नहीं करते हैं, लेकिन वे इसकी विचारधारा देते है. भारत में ब्राह्मण 
बुद्धिजीवी वर्ग है, हर क्रांति स्वाभाविक रूप से उसके खिलाफ चली जायेगी , इसलिए वह कभी 
क्रांति की विचारधारा नहीं दे सकता| वो तो ऐसी विचारधारा देगा जो क्रन्ति के किसी भी सपने को रोक सके| 
बेशक राजा, योद्धा, क्षत्रिये भी क्रन्ति के पक्ष में नहीं हो सकते 
हर क्रांति उनके खिलाफ चली जायेगी. वे राज गद्दि से उतार दिये जायेंगे
व्यापारी भी क्रांति के पक्ष में नहीं हो सकता क्योंकि
सभी क्रांतियां अमीर के खिलाफ होतीं हैं|

गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि 
शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया 
वो शहर के बाहर रहता है
वो शहर के अंदर नहीं रह सकता.

गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं
वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है
और राजा के पास अपने कुँए है ही।
अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है
उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है.

वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है 
उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि
कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है|
“इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी 
कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा” 
तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है
है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं.

और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी
शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथ ‘कुछ और’ भी चाहिए. ये जो ‘कुछ और’ और है यही तो बुद्धि हो जाता है,
बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति
के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो
विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है|
लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है
विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि 
इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे
ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी 
वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं|
इस सदी में भारत से बाहर केवल दो व्यक्तियों ने मनु की सराहना की है.

एक फ्रेडरिक नीत्शे है, अन्य एडॉल्फ हिटलर है. एडोल्फ हिटलर फ्रेडरिक नीत्शे का एक शिष्य था
फ्रेडरिक नीत्शे फ़ासिज़्म के दार्शनिक था:
एडोल्फ हिटलर बस नीत्शे की सीख का अभ्यास कर रहा था.
रिश्ते बिल्कुल मार्क्स और लेनिन के बीच के रूप में है. मार्क्स दार्शनिक था
जिसने साम्यवाद की पूरी विचारधारा दे दी है, और लेनिन ने उसे साकार किया
उसी तरह फ्रेडरिक नीत्शे और एडॉल्फ हिटलर के बीच रिश्ता था.
यह एक संयोग नहीं है कि उन दोनों ने भारत में लिखित पुस्तक की सराहना की
. दोनों ने इसकी सराहना की क्योंकि दोनों ही देख सकते थे कि 
मनु कितना भव्य मास्टर योजनाकार रहा होगा जिसने एक ऐसी व्यवस्थ बना दी 
जो अभी भी जिंदा है। उसने हजारों साल के लिए क्रांति को रोका, और
शायद वह हमेशा के लिए इसे रोका पाएगा. शायद भारत में कभी क्रांति नहीं हो सकती है.

Source:

Book Title: The Last Testament, Vol. 2.       //  Chapter 6: The Intelligent Way

http://www.osho.com/library/online-library-revolution-lenin-india-f65a91d0-351.aspx

 

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अछूत समस्या…भगतसिंह (1923)काकीनाडा में 1923 मे कांग्रेस-अधिवेशन हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण मे आजकल की अनुसूचित जातियों को, जिन्हें उन दिनों ‘अछूत’ कहा जाता था, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बाँट देने का सुझाव दिया। हिन्दू और मुस्लिम अमीर लोग इस वर्गभेद को पक्का करने के लिए धन देने को तैयार थे।bhagat-singh1इस प्रकार अछूतों के यह ‘दोस्त’ उन्हें धर्म के नाम पर बाँटने की कोशिशें करते थे। उसी समय जब इस मसले पर बहस का वातावरण था, भगतसिंह ने ‘अछूत का सवाल’ नामक लेख लिखा। इस लेख में श्रमिक वर्ग की शक्ति व सीमाओं का अनुमान लगाकर उसकी प्रगति के लिए ठोस सुझाव दिये गये हैं। भगतसिंह का यह लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में विद्रोही नाम से प्रकाशित हुआ था।- सं.हमारे देश- जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए। यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है। समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे! कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा! ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है।हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलानेवाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज उठा रहा है। उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी। आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटा कर क्रांति के लिए कमर कसी हुई है। हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को लेकर चिन्तित होने तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं? हम उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता। अंग्रेजी शासन हमें अंग्रजों के समान नहीं समझता। लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का अधिकार है?सिन्ध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने, जो बम्बई कौंसिल के सदस्य हैं, इस विषय पर 1926 में खूब कहा-“If the Hundu society refuses to allow other human beings, fellow creatures so that to attend public school, and if।। the president of local board representing so many lakhs of people in this house refuses to allow his fellows and brothers the elementary human right of having water to drink, what right have they to ask for more rights from the bureaucracy? Before we accuse people coming from other lands, we should see how we ourselves behave toward our own people।। How can we ask for greater political rights when we ourselves deny elementary rights of human beings.”वे कहते हैं कि जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इनकार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की माँग करो? जब तुम एक इन्सान को समान अधिकार देने से भी इनकार करते हो तो तुम अधिक राजनीतिक अधिकार माँगने के अधिकारी कैसे बन गए?

बात बिल्कुल खरी है। लेकिन यह क्योंकि एक मुस्लिम ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो, वह उन अछूतों को मुसलमान बना कर अपने में शामिल करना चाहते हैं।

जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहाँ उनसे इन्सानों-जैसा व्यवहार किया जाएगा। फिर यह कहना कि देखो जी, ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुँचा रहे हैं, व्यर्थ होगा।

कितना स्पष्ट कथन है, लेकिन यह सुन कर सभी तिलमिला उठते हैं। ठीक इसी तरह की चिन्ता हिन्दुओं को भी हुई। सनातनी पण्डित भी कुछ-न-कुछ इस मसले पर सोचने लगे। बीच-बीच में बड़े ‘युगांतरकारी’ कहे जानेवाले भी शामिल हुए। पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय- जोकि अछूतों के बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं- की अध्यक्षता में हुआ, तो जोरदार बहस छिड़ी। अच्छी नोंक-झोंक हुई। समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवीत धारण करने का हक है अथवा नहीं? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने का अधिकार है? बड़े-बड़े समाज-सुधारक तमतमा गये, लेकिन लालाजी ने सबको सहमत कर दिया तथा यह दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रख ली। वरना जरा सोचो, कितनी शर्म की बात होती। कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है। हमारी रसोई में निःसंग फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है। इस समय मालवीय जी जैसे बड़े समाज-सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किये बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं! क्या खूब यह चाल है! सबको प्यार करनेवाले भगवान की पूजा करने के लिए मन्दिर बना है लेकिन वहाँ अछूत जा घुसे तो वह मन्दिर अपवित्र हो जाता है! भगवान रुष्ट हो जाता है! घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते हैं? तब हमारे इस रवैये में कृतघ्नता की भी हद पाई जाती है। जो निम्नतम काम करके हमारे लिए सुविधाओं को उपलब्ध कराते हैं उन्हें ही हम दुरदुराते हैं। पशुओं की हम पूजा कर सकते हैं, लेकिन इन्सान को पास नहीं बिठा सकते!

आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है। उन विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है। देश में मुक्ति कामना जिस तरह बढ़ रही है, उसमें साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ पहुँचाया हो अथवा नहीं लेकिन एक लाभ जरूर पहुँचाया है। अधिक अधिकारों की माँग के लिए अपनी-अपनी कौमों की संख्या बढ़ाने की चिन्ता सबको हुई। मुस्लिमों ने जरा ज्यादा जोर दिया। उन्होंने अछूतों को मुसलमान बना कर अपने बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए। इससे हिन्दुओं के अहम को चोट पहुँची। स्पर्धा बढ़ी। फसाद भी हुए। धीरे-धीरे सिखों ने भी सोचा कि हम पीछे न रह जायें। उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया। हिंदू-सिखों के बीच अछूतों के जनेऊ उतारने या केश कटवाने के सवालों पर झगड़े हुए। अब तीनों कौमें अछूतों को अपनी-अपनी ओर खींच रही है। इसका बहुत शोर-शराबा है। उधर ईसाई चुपचाप उनका रुतबा बढ़ा रहे हैं। चलो, इस सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत दूर हो रही है।

इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं तथा उन्हें हर कोई अपनी-अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग ही क्यों न संगठित हो जाएं? इस विचार के अमल में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा न हो लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार में सरकारी मशीनरी का काफी हाथ था। ‘आदि धर्म मण्डल` जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम हैं।

अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या का सही निदान क्या हो? इसका जबाब बड़ा अहम है। सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इन्सान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से। अर्थात् क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है।

इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी हो गयी। लोगों के मनों में आवश्यक कार्यों के प्रति घृणा पैदा हो गई। हमने जुलाहे को भी दुत्कारा। आज कपड़ा बुननेवाले भी अछूत समझे जाते हैं। यू. पी. की तरफ कहार को भी अछूत समझा जाता है। इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई। ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा हो रही हैं।

इन तबकों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहें और न समझें। बस, समस्या हल हो जाती है। नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है वह काफी अच्छा है। जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा उनसे अपने इन पापों के लिए क्षमायाचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा इन्सान समझना, बिना अमृत छकाए, बिना कलमा पढ़ाए या शुद्धि किए उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना,यही उचित ढंग है। और आपस में खींचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक न देना, कोई ठीक बात नहीं है।

जब गाँवों में मजदूर-प्रचार शुरू हुआ उस समय किसानों को सरकारी आदमी यह बात समझा कर भड़काते थे कि देखो, यह भंगी-चमारों को सिर पर चढ़ा रहे हैं और तुम्हारा काम बंद करवाएंगे। बस किसान इतने में ही भड़क गए। उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नहीं सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबों को नीच और कमीन कह कर अपनी जूती के नीचे दबाए रखना चाहते हैं। अक्सर कहा जाता है कि वह साफ नहीं रहते। इसका उत्तर साफ है- वे गरीब हैं। गरीबी का इलाज करो। ऊँचे-ऊँचे कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं रहते। गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएँ बच्चों का मैला साफ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं।

लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक कि अछूत कौमें अपने आपको संगठित न कर लें। हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की माँग करना बहुत आशाजनक संकेत हैं। या तो साम्प्रदायिक भेद को झंझट ही खत्म करो, नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो। कौंसिलों और असेम्बलियों का कर्तव्य है कि वे स्कूल-कालेज, कुएँ तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दिलाएं। जबानी तौर पर ही नहीं, वरन साथ ले जाकर उन्हें कुओं पर चढ़ाएं। उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाएं। लेकिन जिस लेजिस्लेटिव में बालविवाह के विरुद्ध पेश किए बिल तथा मजहब के बहाने हाय-तौबा मचाई जाती है, वहाँ वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकते हैं?

इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार माँगें। हम तो साफ कहते हैं कि उठो,अछूत कहलानेवाले असली जनसेवको तथा भाइयो! उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोविन्दसिंह की फौज की असली शक्ति तुम्हीं थे! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके, जिस कारण उनका नाम आज भी जिन्दा है। तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं। तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके और जिन्दगी संभव बना कर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो, उसे हम लोग नहीं समझते। लैण्ड-एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी जमीन नहीं खरीद सकते। तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती हैं- उठो, अपनी शक्ति पहचानो। संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा। (Those who would be free must themselves strike the blow.) स्वतन्त्रता के लिए स्वाधीनता चाहनेवालों को यत्न करना चाहिए। इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है। कहावत है- ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’। अर्थात् संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो… संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।

Date Written: 1923
Author: Bhagat Singh
Title: Problems of Untouchablity (Achoot Samasya)
First Published: in Kirti, a Punjabi Magazine published from Amritsar in June 1928.

भगतसिंह

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इस्लाम के बुद्धिजीवी वर्ग भी बौद्ध धम्म का कायल है, उदाहरण स्वरुप महान उर्दू लेखक/शायर अल्लामा इकबाल जी के द्वारा लिखी गयी एक ग़ज़ल प्रस्तुत है :

कौम ने पैग़ामगौतम की ज़रा परवा की

क़द्र पहचानी अपने गौहरयकदाना कीAllama-Iqbal-640x480

 

आह बदकिस्मत रहे, आवाज़हक़ से बेख़बर

ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

 

आशकार उसने किया जो ज़िन्दगी का राज़ था

हिन्द को लेकिन खयाली फलसफे पे नाज़ था

 

शमाहक़ से जो मुनव्वर हो ये वोह महफ़िल थी  

बारिशरहमत हुई, लेकिन ज़मीं काबिल थी

 

आह शूद्र के लिए हिंदोस्तां ग़मखाना है

दर्दइंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है

 

बरहमन सरशार है अब तक मयपिन्दार में

शमागौतम जल रही है महफ़िलअग्यार में

 

बुतकदा फिर बाद मुद्दत के मगर रोशन हुआ

नूरइब्राहीम से आज़र का घर रोशन हुआ

 

फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से

हिन्द को एक मर्दकामिल* ने जगाया ख़्वाब से

 

इस ग़ज़ल का हिंदी रूपांतरण इस प्रकार है:

 

इस देश ने गौतम बुद्धा के महान सन्देश की परवाह नहीं की

इन्होने अपने एकमात्र इकलौते मोती को बिलकुल भी नहीं सराहा

 

आह ये देश कितना दुर्भाग्यशाली है जो सत्य जानने के बुलावे से अनजान रहा

ये देश वो पेड़ है जो अपने ही फल की मिठास से अपरिचित रहा

 

उन्होंने जो भी प्रमाणित सत्य था सबको खुलकर बता दिया

पर इस देश को अपने काल्पनिक ढोंग पर नाज रहा

 

ये देश वो महफ़िल न बन सकी जो सत्य की रौशनी से जगमगाती

इस देश पर करुणा की बारिश हुई पर जमीन उसे लेने के काबिल न हुई

 

आह हिन्दुस्तान इन शूद्र(बहुजन)  के लिए असहनीय दुखों से भरा है

इंसान के दर्द और दुखों से इस बस्ती के ह्रदय पर कोई असर नहीं होता

 

आज भी ब्राह्मण अपने झूठे अभिमान के नशे में चूर है

भगवान् बुद्धा के ज्ञान की रेशनी अनजानों में फ़ैल रही है

 

जो भी हो अब युगों बाद फिर लगता है कि सत्य का मंदिर रौशन हुआ

इब्राहम कि रौशनी से एक बार फिर इस का दमन रौशन हुआ

 

आखिरकार पंजाब से फिर एक ही इश्वर/सत्य की लहर उठी है

इस महान इंसान या गुरु ने फिर लोगों को नींद से जगा दिया

मर्दकामिल= महान इंसान (यह संबोधन उन्होंने गुरु नानक देव जी के लिए किया है शायद उन्हें आंबेडकर के संगर्ष के बारे पता नहीं होगा पर अगर यहाँ उन्हें भी लिख देते तो कोई फर्क न था)

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डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर का उद्धेश क्या था? और हम कर क्या रहे है?
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डॉ. बाबासाहब आंबेडकरने फुल (आर्थिक जनतंत्र, एक व्यक्ति – एक मूल्य) के उद्धेश (मिशन) से देशसेवा की थी, मगर संविधान सभा में वर्णवादी कांग्रेसी नेताओ ने उनके हातो में सिर्फ फुल की पखडंडी (राजकीय जनतंत्र, एक व्यक्ति – एक मत) ही सौंप दिया. मनुवादी कांग्रेसियों के कारण ही देश का संविधान पूंजीवादी बना.

संविधान का मसौदा किसने बनाया? यह जितना महत्वपूर्ण नहीं, जितना उसे क़ानूनी स्वरुप प्रदान करनेवाले ‘संविधान सभा’ का है. मनुवादी कांग्रेसी जनप्रतिनिधियों के ‘बहुमतो’ के कारण भारत का ‘संविधान मनुवादी’ बना, न कि अम्बेडकरवादी बना, उसी का नतीजा है की, देश में बहुसंख्यक लोग भिकारी, लाचार, गरीब और चोर, बदमाश है.

जो देशवासी मित्रजन, जनतंत्र में विश्वास करते है, उन्होंने बाबासाहब अम्बेडकर के फुल (उद्देश) को प्राप्त करने के लिए जनान्दोलन करना जरुरी है, उसी में सबका फायदा है.

अन्यथा हजारो सालो तक चिल्लाते रहे, तो भी कोई राजनेता या भगवान हमारे उत्थान के लिए आगे नही आएगा. जैसे हमारे पुरखे गरीबी में जिए, हम गरीबी में जी रहे है और वैसे ही हमारे बाल-बच्चे भी गरीबी में ही जियेंगे. सोचो और उचित क्रांतिकारी जनान्दोलन के तयार हो जाओ.

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Why Reservation?….by S R Darapuri
Indianisation of Public Services and the claims of the Backward Classes
-Dr. B. R. Babasaheb Ambedkar
l(An extract from Dr. Babasaheb Ambedkar, Writings and Speeches Vol. 2, published by Education Department, Government of Maharashtra -1982, Part II, Dr. Ambedkar with the Simon Commission , Section V- Public Services, pp- 394 to 399)
128. (iii) Indianisation and the claims of the Backward Classes.—It is notorious that the Public Services of the country in so far as they are open to Indians have become by reason of various circumstances a close preserve for the Brahmins and allied castes. The Non-Brahmins, the Depressed Classes and the Mohammedans are virtually excluded from them. They are carrying on an intense agitation for securing to themselves what they regard as a due share of the Public Services. With that purpose in view they prefer the system of appointment by selection to the system of appointment by open competition. This is vehemently opposed by the Brahmins and the allied castes on the ground that the interests of the State require that efficiency should be the only consideration in the matters of appointment to public offices and that caste and creed should count for nothing. Relying upon educational merit as the only test which can be taken to guarantee efficiency, they insist that public offices should be filled on the basis of competitive examinations. Such a system it is claimed serves the ends of efficiency without in any way prohibiting the entry of the Backward Classes in the Public Services. For the competitive examination being open to all castes and creeds it leaves the door open to a candidate from these communities if he satisfied the requisite test.
129. The attitude of the Brahmin and allied castes towards this question has no doubt the appearance of fairness. The system of competitive examination relied upon may result in fairness to all castes and creeds under a given set of circumstances. But those circumstances presuppose that the educational system of the State is sufficiently democratic and is such that facilities for education are sufficiently widespread and sufficiently used to permit all classes from which good public servants are likely to be forthcoming to complete. Otherwise even with the system of open competition large classes are sure to be left out in the cold. This basic condition is conspicuous by its absence in India, so that to invite Backward Classes to rely upon the results of competitive examination as a means of entry into the Public Services is to practise a delusion upon them and very rightly the Backward Classes have refused to be deceived by it.
130. Assuming therefore that the entry of the Backward Classes in the Public Services cannot be secured by making it dependent upon open competition, the first question that arises for consideration is, have the Backward Classes a case for a favoured treatment ? Unless they can make good their case they cannot expect any modification of the accepted principles of recruitment by considerations other than those of efficiency pure and simple. In regard to this important question I have no hesitation in stating that the Backward Classes have a case which is overwhelming.
131. First of all those who lay exclusive stress upon efficiency as the basis for recruitment in public services do not seem to have adequate conception of what is covered by administration in modern times. To them administration appears to be nothing more than the process of applying law as enacted by the legislature. Beyond question that is a very incomplete understanding of its scope and significance. Administration in modern times involves far more than the scrutiny of statutes for the sake of knowing the regulations of the State. Often times under the pressure of time or from convenience a government department is now-a-days entrusted with wide powers of rule-making for the purpose of administering a particular law. In such cases it is obvious that administration cannot merely consist in applying the law. It includes the making up of rules which have the force of law and of working them out. This system of legislation by delegation has become a very common feature of all modern governments and is likely to be on the increase in years to come. It must be accepted as beyond dispute that such wide powers of rule-making affecting the welfare of large classes of people cannot be safely left into the hands of the administrators drawn from one particular class which as a matter of fact is opposed to the rest of the population in its motives and interests, does not sympathise with the living forces operating in them, is not charged with their wants, pains, cravings and desires and is inimical to their aspirations, simply because it comes out best by the test of education.
132. But even assuming that administration involves nothing more than the process of applying the law as enacted by the legislature it does not in the least weaken the case of the Backward Classes. For, officers who are drawn from a particular caste and in whose mind consciousness of caste sits closer than conscientious regard to public duty, may easily prostitute their offices to the aggrandisement of their community and to the detriment of the general public. Take the ordinary case of a Mamlatdar, administering the law relating to the letting of Government lands for cultivation. He is no doubt merely applying the law. But in applying he may pick and choose the lessees according to his predilection and very possibly may decide against lessees on grounds which may be communal in fact although they may be non-communal in appearance. Take another illustration of an officer placed in charge of the census department in which capacity he is called upon to decide questions of nomenclature of the various communities and of their social status. An officer in charge of this department by reason of his being a member of particular caste in the course of his administration may do injustice to a rival community by refusing to it the nomenclature or the status that belongs to it. Instances of favouritism, particularly on the grounds of caste and creed are of common occurrence though they are always excused on some other plausible ground. But I like to quote one which pertains to the Vishwakarmans of the Madras Presidency. It is related in their letter to the Reforms Enquiry Committee of 1924 in which they complained that ” a Brahmin member of the Madras Executive Council Sir (then Mr.) P. Siwaswami Ayyar—when he was in charge of the portfolio of law, issued a Government Order objecting to the suffix ‘ Acharya ‘ usually adopted by the Vishwakarmans in their names and seeking to enforce in its place the word ‘ Asry ‘, which is weighed with common odium. Though there was neither necessity nor authority to justify the action taken by the law member, the Government Order was published by the law department as if on the recommendation of the Spelling Mistakes Committee. It happened to our misfortune that the non-official members of this Committee were drawn largely from the Brahmin community, who never knew how to respect the rights of their sister communities and never informed us of the line of action that they were decided upon. It was dealt more or less as the stab in the dark.”
133. This is inevitable. Class rule must mean rule in terms of class interests and class prejudices. If such results are inevitable then it must raise a query in the minds of all honest people whether efficient government has also given us good government ? If not, what is the remedy ? My view is that the disadvantages arising from the class bias of the officers belonging to Brahmin and allied castes has outweighed all the advantages attending upon their efficiency and that on the total they have done more harm than good. As to the remedy, the one I see is a proper admixture of the different communities in the public service. This may perhaps import a small degree of inefficiency. But it will supply a most valuable corrective to the evils of class bias. This has become all the more necessary because of the social struggles that are now going on in the country. The struggles between the Brahmins and the non-Brahmins, between Hindus and Mohammedans, between Touchables and Untouchables for the destruction of all inequalities and the establishment of equality, with all their bitterness, cannot leave the judges, magistrates, civil servants and the police without being influenced in their judgement as to the right or wrong of these struggles. Being members of the struggling communities they are bound to be partisans, with the result that there may be a great loss in the confidence reposed by the public in their servants.
134. So far I have considered the case of the Backward Classes on grounds of administrative utility. But there are also moral grounds why entry into the public service should be secured to them. The moral evils arising out of the exclusion of a person from the public service were never so well portrayed as by the late Mr. Gokhale. In the course of a telling speech he observed, ” The excessive costliness of the foreign agency is not however its only evil. There is a moral evil, which, if anything, is even greater. A kind of dwarfing or stunting of the Indian race is going on under the present system. We must live all the days of our life in an atmosphere of inferiority and tallest of us must bend in order that the exigencies of the existing system may be satisfied. The upward impulse, if I may use such an expression, which every school-boy at Eton or Harrow may feel that he may one day be a Gladstone, a Nelson, or a Wellington, and which may draw forth the best efforts of which he is capable, is denied to us. The full height to which our manhood is capable of rising can never be reached by us under the present system. The moral elevation which every self-governing people feel cannot be felt by us. Our administrative and military talents must gradually disappear, owing to sheer disuse, till at last our lot, as hewers of wood and drawers of water in our own country, is stereotyped.” Now what one would like to ask those who deny the justice of the case of the Backward Classes for entry into the Public Service is whether it is not open to the Backward Classes to allege against the Brahmins and allied castes all that was alleged by the late Mr. Gokhale on behalf of Indian people against the foreign agency? Is it not open to the Depressed Classes, the non-Brahmins and the Mohammedans to say that by their exclusion from the Public Service a kind of dwarfing or stunting of their communities is going on ? Can they not complain that as a result of their exclusion they are obliged to live all the days of their lives in an atmosphere of inferiority, and that the tallest of them has to bend in order that the exigencies of the existing system may be satisfied? Can they not assert that the upward impulses which every school-boy of the Brahmanical community feels that he may one day be a Sinha, a Sastri, a Ranade or a Paranjpye, and which may draw forth from him the best efforts of which he is capable is denied to them ? Can they not indignantly assert that the full height to which their manhood is capable of rising can never be reached by them under the present system ? Can they not lament that the moral elevation which every self-governing people feel cannot be felt by them and that their administrative talents must gradually disappear owing to sheer disgust till at last their lot as hewers of wood and drawers of water in their own country is stereotyped ? The answers to these queries cannot but be in the affirmative. If to exclude the advanced communities from entering into public service of the country was a moral wrong, the exclusion of the backward communities from the same field must also be a moral wrong, and if it is a moral wrong it must be righted.
135. 135. These are the considerations which lead me to find in favour of the Backward Classes. It will be noticed that these considerations are in no way different from the considerations that were urged in favour of Indianisation. The case for Indianisation, it must be remembered, did not rest upon efficient administration. It rested upon considerations of good administration. It was not challenged that the Indian was inferior to the European in the qualities that go into the make-up of an efficient administrator. It was not denied that the European bureaucracy had improved their roads, constructed canals on more scientific principles, effected transportation by rail, carried their letters by penny post, flashed their messages by lightning, improved their currency, regulated their weights and measures, corrected their notions of geography, astronomy and medicine, and stopped their internal quarrels. Nothing can be a greater testimony to the fact that the European bureaucracy constituted the most efficient government possible. All the same the European bureaucracy, efficient though it was, was condemned as it was found to be wanting in those qualities which make for human administration. It is therefore somewhat strange that those who clamoured for Indianisation should oppose the stream flowing in the direction of the Backward Classes, forgetting that the case for Indianisation also includes the case for the Backward Classes. Be that as it may, I attach far more importance to this than I attach either to Provincial Autonomy or to complete responsibility in the Provincial Executive. I would not be prepared to allow the devolution of such large powers if I felt that those powers are likely to fall in the hands of any one particular community to the exclusion of the rest. That being my view I suggest that the following steps should be taken for the materialisation of my recommendations:—
(1) A certain number of vacancies in the Superior Services, Class I and Class II, and also in the Subordinate Services, should every year be filled by system of nomination with a pass examination. These nominations should be filled on the recommendation of a select committee composed of persons competent to judge of the fitness of a candidate and working in conjunction with the Civil Service officer referred to above. Such nominations shall be reserved to the Depressed Class, the Mohammedans and the Non-Brahmins in the order of preference herein indicated until their numbers in the service reach a certain proportion. (2) That steps should be taken to post an increasing number of officers belonging to these communities at the headquarters.
(3) That a Central Recruitment Board should be constituted as a central agency for registering all applications for appointments and vacancies and putting applicants in touch with the offices where vacancies exist or occur from time to time. It is essential to put the man and the job in touch if this desire is to be achieved. The absence of such a Board is the reason why the efforts of the Government of Bombay in this connection have not achieved the success which was expected of them.
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इंसान और जानवर मे क्या फरक हे? इंसान बचचे को जन्म देता है जानवर भी बचचे को जन्म देता है मानव का बच्चा छोटा है तब तक उसे दूध पीला कर बडा करता है जानवर भी वैसा हि करता है, जानवर का बच्चा जब चलने लगता है तो वह अपने मा के पीछे चलकर सिखता है कि कैसे उसे जिना है, मानव भी वही करता है बच्चा चलने लगता है तो जैसे वह खुद पढा, उसि तरह बच्चे को  स्कूल मे दाखिल कर देता है ताकी वह पढ कर कुछ काम कर सके और अपना पेट भर सके. तो इंसान और जानवर मे फर्क क्या है?
इंसान और जानवर मे फर्क है… और वह है “सोच” इंसान सोच सकता है और इसी सोच के आधारपर इंसान चाँद पर कदम रख चुका है आज हम हवाई जहाज, ट्रेन पनीमे नाव बोट जैसे सफर कर सकते है, यहासे चुटकीमे विदेश मे मोबाइल, इंटरनेट के जरिये बात कर सकते है, देख सकते है, क्या जानवर ऐसा कर सका है? क्युकी जानवर सोच नही सकता इसी लिये जानवर जानवर ही रहा और इंसान तरक्की कर सका. ये है इंसान और जानवर मे फर्क.
अब हम इंसानो मे भी दो तरहा के लोग होते है एक सोचते है और तरक्की करते है और दुसरे.. इंसान होकर भी जानवर की तरह जिंदगी बसर करते है या यु कहे जो मुट्ठी भर लोग है वे उन्हे जानवर ही बनाये रखना चाहते है, अगर तरक्की करनी है तो किसी एक दिशा मे निरंतर सोचना पडता है, उसी दिशा मे पढना पडता है और उसके लिये जितना जादा से जादा समय मिले उसे सिर्फ सोचना चाहिये ऐसा करे तो हर इंसान तरक्की कर सकता है, घर घर मे वैज्ञानिक, आय ए अस, डॉक्टर, वकील इंजीनियर जैसे लोग निर्माण हो सकते है. अगर ऐसा हुवा तो कोई निच ही ना रहेगा अगर कोई नीच ही न रहा तो वे मुट्ठीभर लोग उंच कैसे रहेंगे? अगर उन्हे उंचा रहना है तो दुसरो को निचा रहेना हि होगा तो उसके लिये क्या करना होता है, क्या तलवार, या बंदुक की डर से ऐसा हो सकता है? नहीं जो सोचने की शक्ती है उसे नष्ट किया जाय तो इंसान जिंदगी भर जानवर की तरह बडी खुशीसे रह सकता है, तो सोचने की शक्ती को नष्ट कैसे किया जाय? जिसका कोई अस्तीत्व ही नही है जैसे ईश्वर, भगवान, भूत, आत्मा उसीके बारेमे कहानिया लिखो, सिनेमा बनाओ बार बार वही देखनेसे इंसान उस् पर विश्वास करने लगता है उसि पर अपना पूरा समय जन्म से मृत्यू तक बरबाद कर देता है और उनका रास्ता साफ हो जाता है, और याही कारण है इस भारत देश मे 85% लोग गरीब,लाचार, बेकार होकर जानवर की जिंदगी बसर कर रहे है क्युकी वे रात दीन ईश्वर का जप करते रहते है, जिन्होने इस मायाजाल को पहेचान लिया वे सिर्फ और सिर्फ बुद्धिस्ट लोग है जिन्होने इन सभी बतो को नकार दिया और सोचने लगे और पढणे लगे नतिजी जो लोग जानवर से भी बद्तर जीवन जी रहे थे वे कुछ ही सालो मे त्तरक्की की वो उचाइ पर जा बैठे उसकी कोई कल्पना नही कर सकता है
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जबरदस्त व्यंग :

पप्पू के पापा ने ऑफिस में जब से सभी कर्मियों का अभिनंदन जय भीम से करना शुरू किया है. ज्यादातर साथी कर्मी या तो पापा की ओर मुहँ भी नहीं करते या फिर उनका कोई उत्तर ही नहीं रहता और तो और महिला कर्मियों ने तो उनसे बात करना भी लगभग खत्म सा कर दिया है. हद तो तब हो गयी जब बाबा की दी हुई भीख से सिर तान कर बैठने वाले उनके बॉस ने तो उलटा उन्हें ऑफिस में राजनीतिक माहोल उत्पन्न करने के लिए नोटिस भी दे डाला. जबकि स्वयं वे कभी पेट्रोल के दाम वृद्धि पर, सांप्रदायिक दंगों पर, तो कभी महिलाओं के उत्पीडन पर अलग अलग दलों को कोसते हुए ठाट से सभी पर रॉब झाड़ते रहतें हैं.पापा के चहरे की परेशानी भांपकर पप्पू ने पापा को हिन्दू कोड बिल पर आने वाले एपिसोड के बारे में बताया. तब पापा के चहरे की मुस्कान ने मुझे जय भीम से उनके अन्दर आयी ताकत के असर को समझा दिया.अगले ही दिन पापा ने ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर एपिसोड के प्रसारित होने की पूरी जानकारी लिख कर शेयर कर दी.एपिसोड के प्रसारित होने के अगले दिन ऑफिस की महिला कर्मियों ने बाबा साहेब की एक तस्वीर लेकर ऑफिस में लगा दी, जिस पर ऊपर कुछ इस प्रकार लिखा हुआ था.”For a successful revolution it is not enough that there is discontent. What is required is a profound and thorough conviction of the justice, necessity and importance of political and social rights.”-Dr Bhimrao Ramji Ambedkarपापा के ऑफिस पहुँचने पर आज उन्हीं महिलाओं ने पापा का जय भीम बोल कर अभिनंदन किया. फिर बॉस के आने पर पापा के साथ साथ सभी महिलाओं ने भी जोर से जय भीम बोल कर उनका भी अभिनंदन किया, तो पलट कर बॉस ने पूछा ये जय भीम का मतलब क्या है.पापा ने कहा जय भीम की खोज बाबा के एक सिपाही बाबू एल. एन. हरदास ने की थी, जिसका का मतलब है, समानता, स्वाभिमान, सम्मान, स्थापित करने वाला माउंट एवरेस्ट की तरह का शिखर.

महिलाओं ने भी कहा समस्त भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण को खत्म करने की ताकत का सूत्र.

बॉस के सिर पर इस हथोड़े की चोट ने तो उनका ही नहीं सभी साथियों का सिर हमेशा के लिए बाबा साहेब के सामने झुकने को मजबूर कर दिया, और मुझे अपना सिर ऊँचा रख कर बात करने लायक बना दिया.

घर पर भी पप्पू, अपनी छोटी बहन पिंकी को भी अब तुतलाती भाषा में दय भीम बोलने का अभ्यास कराने लगा है.

हाँ, इधर मेरे भी सभी दोस्तों ने मुझे पोस्ट पर जय भीम लिख कर एवं शेयर करके अपना सहयोग देना जारी रखा है. जय भीम

 

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पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गई
प्रतिक्रांति के संबंध में बाबासाहब 6 जून
1950 को कोलंबो (श्रीलंका) में दिये अपने
भाषण में कहते हैं, “पुरोहितवादी शासनाधिकार
की एक बहुत बड़ी घटना मौर्य साम्राज्य
का पतन होने में दिखायी देती है। भारतीय
इतिहासकारों ने इस महान घटना को महत्व
नहीं दिया, यह खेदजनक बात है। मूलत: यह
भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। अंतिम
मौर्य सम्राट महाराज बृहद्रथ मौर्य
का सेनापति पुष्यमित्र पुरोहित समुदाय से
था। पुष्यमित्र का गुरु पतंजली था।
पतंजली ने बौद्धों से ही योगविद्या ग्रहण
की थी, किन्तु बाद में वह बौद्धों का दुश्मन
बना। पतंजली की सलाह पर सेनापति शुंगवंशीय
पुष्यमित्र ने राजा बृहद्रथ की हत्या की (इस हत्या में उसे अपने पोते की, जो राजा का वफादार था, की हत्या करनी पड़ी।आखिर धर्म के पुनरुत्थान का सवाल था।)और
मौर्य वंश की जगह अपने शुंगवंश के नाम से
राज स्थापित किया। इस
पुरोहितवादी राजा द्वारा बौद्ध धर्म को बड़े
पैमाने पर नुकसान पहुँचाया गया। वैदिक
धर्म (वेद और हिंसायुक्त यज्ञवेदिकाओं का आडम्बर) की पुनर्स्थापना करने के लिए किये गये
कृत्यों में यह सबसे घिनौना कृत्य है। बौद्ध
धर्म भारत से लुप्त होने के लिए यह सबसे बड़ा कारण साबित
हुआ। यह एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी।(इन महापुरुष ने सम्राट अशोक द्वारा उस समय के प्रत्येक ग्राम में बनवाए लगभग 84000 बुद्ध स्तूपों को तुड़वाया, एक-दो गलती से बचे रह गए। एक बौद्ध भिक्षु की गर्दन उड़ाने का इनाम एक स्वर्ण मुद्रा रखा। लाखों भिक्षुओं की हत्या करवाई। घाघरा नदी अयोध्या के पास भिक्षुओं के सरों से युक्त होने के कारण ‘सरयू’ कहलाई। पाटलिपुत्र में बृहद्रथ की हत्या से नाराज पुरुषपुर (पेशावर) के राजा मिलिंद ने पुष्यमित्र पर आक्रमण कर दिया और पाटलिपुत्र में जनता का विद्रोह भड़क उठा, इससे घबरा कर पुष्यमित्र ने उज्जैन में शरण ली, और जब मामला शांत हुआ तब ‘साकेत’ को अपनी नई राजधानी बनाई। और बिना युद्ध के जीती हुई राजधानी होने के कारण उसका नाम ‘अयोध्या’ पड़ा।)

2 thoughts on “L: भारतवासियों पर मशहूर बुद्धिजीवियों के विचार

  1. this is all bullshits what is this required every person should know his responsibility.
    if every person will know his responsibility then there is no any problem.

    dileep shukla

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