24 सितम्बर 2017, मावलंकर हॉल – राष्ट्रीय बहुजन समन्वय सम्मेलन में आप सब सादर आमंत्रित हैं| चार समाज(SC/ST/OBC/minorities) एक आवाज़। याद रहे 24 को मिलना है, आपके विचारों की दरकार है…….डॉ रतन लाल

 

 

 

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 19 सितम्बर की खबर के अनुसार बहुजन समाज पार्टी की मेरठ रैली में वर्तमान अध्यक्ष मायावती जी ने अपने भतीजे आकाश, जो की लन्दन से मैनेजमेंट पोस्टग्रेजुएट है को बसपा में शामिल करवाया, मायावती के भाई आनंद बसपा के वाईस प्रेजिडेंट बने रहेंगे। भतीजे आकाश और भाई आनंद बसपा की सभी कार्यवाही में बाद चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। ..TOI

सवर्णो को लगता है की जातिवाद अब ख़तम हो गया है इसलिए अब आरक्षण को ख़तम कर देना चाहिए ,आओ मेरे साथ मैं तुम्हें जातिवाद दिखाता हूँ….Sanjay Bouddh

*आओ मेरे साथ मैं तुम्हें जातिवाद दिखाता हूँ।*
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आजकल जहाँ भी दो चार जनरल केटेगरी वाले इक्कठे बैठते हैं वहाँ एक ही चर्चा होती है कि इस आरक्षण ने देश को बर्बाद कर दिया है, अब तो सभी बराबर हो गए हैं कोई जातिवाद नहीं है इसलिए अब इस आरक्षण को खत्म कर देना चाहिए।

अफशोस की बात यह की हमारे कई नेता भी बोलने लगे हैं कि आरक्षण की समीक्षा होती है तो क्या बुरा है।

जिन लोगों को सब कुछ ठीक ठाक लग रहा है और कहीं भी जातिवाद नजर नहीं आता है उनको आह्वान किया जाता है कि आओ मेरे साथ मैं तुम्हें जातिवाद दिखाता हूँ।

आओ चलें ईंट भट्ठों पर और देखो वहाँ जो ईंट पाथ रहें हैं या पक्की हुई ईंटों की निकासी कर रहे हैं जिनमें पुरुषों के साथ साथ उतनी ही संख्या में महिलाएं भी दिखाई दे रही हैं उनमें ब्राह्मण, राजपूत और बणिया कितने हैं ?

इसका जवाब यही होगा कि इनमें तो उन समाजों का एक भी व्यक्ति नहीं है तो फिर यह जातिवाद नहीं है तो फिर क्या है ?

अब आगे चलो मेरे साथ शहरों की गलियों में और ध्यान से देखो जो महिलाएं सड़कों पर झाड़ू लगा रही हैं और गंदी नालियाँ साफ कर रही हैं उनमें कितनी ब्राह्मणी, ठुकराईंन और सेठाणी जी दिखाई दे रही हैं ?

यहाँ भी वही जवाब की इनमे तो ब्राह्मणी, ठुकराएंन और सेठाणी एक भी नहीं है तो यह जातिवाद नहीं है क्या ?

अब आओ चलते हैं रेलवे स्टेशन, हमारे देश में कई हजारों की संख्या में रेलवे स्टेशन बने हुए हैं वहाँ जो रेलवे लाइनो पर शौच के ढेर के ढेर लगे हुए रहते हैं उनको रातों रात साफ करने के लिए पंडित जी आता है या सिंह साहब या फिर शाहूकार जी सेवा देते हैं।

इसका भी वही जवाब मिलेगा की उनमे से तो एक भी नहीं आता है तो फिर क्या यह जातिवाद नहीं है ?

अब रूख करते हैं भवन निर्माण कार्य करने वाले मिस्त्री और मजदूरों की ओर, जो पूरे दिन अपना हाथ चलाते रहते हैं जिन्हें मिस्त्री कहते हैं और जो पूरे दिन सिर पर काठड़ी ढोने में लगे रहते हैं उन्हें मजदूर कहा जाता है वैसे वे मजदूर नहीं बल्कि मजबूर हैं क्योंकि 50 डिग्री तापमान में कोई कूलर की हवा खा रहा होता है तो कोई ऐ सी में मौज कर रहा होता है उस वक्त भी ये लोग तेज गर्मी और लू के थपेड़े खा रहे होते हैं, अब इनमे भी नजर दौड़ाते हैं तो उनकी संख्या नदारद मिलती है तो क्या यह जातिवाद नहीं है क्या ?

अब अपना ध्यान जगह जगह बोरी बिछाकर बैठे हुए उन लोगों की ओर लेकर जाओ जो जूता पॉलिश करते हैं या जूतों की मरमत करते हैं उनमें पंडित जी और उनके साथियों की भागीदारी कितनी है, जवाब मिलेगा बिलकुल शून्य, तो पूरा का पूरा तो जातिवाद भरा पड़ा है ।

अब आजाओ बाजारों की ओर चारों ओर जो बड़े बड़े मॉल और बड़ी बड़ी दुकाने दिखाई दे रही है उनका मालिक कोई एस सी समाज वाला भी है या नहीं ?

यहाँ एकदम से ही पासा पलट गया है अब यहां एस सी का एक भी बन्दा नजर नहीं आएगा और सभी पर ब्राह्मण और बनिया व राजपूत का कब्जा मिलेगा।

अब सभी मिलकर सोचो कि क्या यह जातिवाद नही है ?

बिलकुल यह खुलं खुला जातिवाद हैं।

अब मंदिरों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहना चाहता हूँ कि मंदिरों में कितने पुजारी ब्राह्मण के अलावा देखने को मिलते हैं, शायद एक भी नहीं । क्या इसे आप जातिवाद नहीँ समझते हो।

आज भी हर कदम पर जातिवाद का जहर भरा हुआ है और लोग कहते हैं कि अब कोई जातिवाद नहीं है अब आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए।

आरक्षण होते हुए भी उच्च पदों पर हमारे समाज के लोगों को पहुंचने से रोका जाता है यदि जिस दिन आरक्षण खत्म हो जायेगा उस दिन से तो जातिवाद और अधिक पढ़ जायेगा ।
इसलिये जो ऐसी बात करता है उसे कहो कि आओ मेरे साथ तुम्हेँ जातिवाद दिखाता हूँ ।

…..भारत में 3% ब्राह्मण …..
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3% लोगों का हिस्सा देखिये….

लोकसभा में ब्राह्मण : 48 %
राज्यसभा में ब्राह्मण : 36 %
ब्राह्मण राज्यपाल : 50 %
कैबिनेट सचिव : 53 %
मंत्री सचिव में ब्राह्मण : 64%
अतिरिक्त सचिव ब्राह्मण : 62%
पर्सनल सचिव ब्राह्मण : 70%
यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण वाईस
चांसलर : 61%
सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मण जज: 85%
हाई कोर्ट में ब्राह्मण जज : 70 %
भारतीय राजदूत ब्राह्मण : 51%
पब्लिक अंडरटेकिंग ब्राह्मण :
केंद्रीय : 67%
राज्य : 82 %

बैंक में ब्राह्मण : 67 %
एयरलाइन्स में ब्राह्मण : 61%
IAS ब्राह्मण : 72%
IPS ब्राह्मण : 61%
टीवी कलाकार एव बॉलीवुड : 83%
CBI Custom ब्राह्मण 72%
यदि हमारा आरक्षण गलत है और उसका सवर्णों के द्वारा विरोध किया जाता है! तो ये क्या है इसका विरोध आज तक किसी ने क्यो नही किया गया ? कहाँ छुपे हैं आरक्षण विरोधी लोग।
एससी-एसटी और ओबीसी को जो आरक्षण मिला है वह जनसंख्या के अनुपातिक आधार पर मिला है जिसके तहत SC & ST को 22.5% नौकरी और राजनीति में मिला ह.

https://www.facebook.com/sanjay.meghwal.165685/posts/1970729793149019

ओशो का अमेरिका में दिया हुए प्रवचन, उन्होंने कहा ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे।…..Ashok Mann

ओशो का अमेरिका में दिया हुए प्रवचन, जिसने पोप और अमेरिका को विचलित कर दिया ओशो:
जब भी कोई सत्य के लिए प्यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है,जितने पुराने प्रमाण और उल्लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे।ईसामसीह के 13 से30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्लेख नहीं है।और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्मे,यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्द भी नहीं सुने थे।
फिर क्यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्योंकि इस व्यक्ति ने किसी को कोईनुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्पना की जा सकती है।पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्पष्ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्हें समझ आएगा कि क्यों वे बारा-बार कहते हैं- ‘ अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।’ यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है।
उन्होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।

Jesus Lived in India

ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।जीसस कहते हैं कि तीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था। कौन हैं ये पुराने पैगंबर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- कि ईश्वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्वर के मुंह से ये शब्द भी कहलवा दिए हैं कि मैं कोई सज्जन पुरुष नहीं हूं, तुम्हारा चाचा नहीं हूं।

मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं। पुराने टेस्टामेंट में ईश्वर के ये वचन हैं। और ईसा मसीह कहते हैं, मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्मा प्रेम है। यह ख्याल उन्हें कहां से आया कि परमात्मा प्रेम है?गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्मा को प्रेम कहने का कोई और उल्लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्त, भारत, लद्दाख और तिब्बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्यु भी भारत में हुई!और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्योंकि उनकी मृत्यु का तो कोई उल्लेख है ही नहीं !

सच्चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्वस्थ है तो 60 घंटे से भी ज्यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।यह एक मिलीभगत थी,जीसस के शिष्यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी।पोंटियस के दस्तखत के बगैर यह हत्या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है।चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए।जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलटदुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा।
और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्यक्ति की हत्या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।तो पोंटियस ने जीसस के शिष्यों के साथ मिलकर यह व्यवस्था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं,फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता,वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूलीदी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्थगित किया जाता रहा।ब्यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य मेंदेर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्त के पहले ही उन्हें जीवित उतार लिया गया।यद्यपि वे बेहोश थे, क्योंकि शरीर से रक्तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्हें पुन:सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्यगण उन्हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।जीसस ने भारत में आना क्यों पसंद किया? क्योंकि युवावास्था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे।

उन्होंने अध्यात्म और ब्रह्म का परम स्वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्वस्थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए। कश्मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, जोशुआ- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। जीसस जोशुआ का ग्रीक रुपांतरण है। जोशुआ यहां आए- समय,तारीख वगैरह सब दी है। एक महान सदगुरू, जो स्वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे। इसी वजह से वह स्थान भेड़ों के चरवाहे का गांव कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-पहलगाम, उसका काश्मीरी में वही अर्थ है-गड़रिए का गांव जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्होंने मरना भी यहीं चाहा, क्योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्यागी थी | इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्थान स्वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्यों कश्मीर में आकर मृत्यु में प्रवेश किया?

मूसा ईश्वर के देश इजराइल की खोज में यहूदियों को इजिप्त के बाहर ले गए थे। उन्हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्होंने घोषणा की कि, यही वह जमीन है, परमात्मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्हालो!मूसा ने जब इजिप्त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्होंने युवा लोगों शासन और व्यवस्था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्त्रों में भी, उनकी मृत्यु के संबंध में , उनका क्या हुआ इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।

मूसा भारत क्यों आना चाहते थे ? केवल मृत्यु के लिए ? हां, कई रहस्यों में से एक रहस्य यह भी है कि यदि तुम्हारी मृत्यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्हारी मृत्यु भी एक उत्सव और निर्वाण बन जाती है।सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।
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इस मुद्दे पर बीबीसी ने भी डाक्यूमेंट्री बनाई है यहाँ लिंक दिया है

जातिवादी मानसिकता के धनी एक लेखक गोविंद अग्रवाल ने अपनी मैली ,घृणित विचार शैली का प्रदर्शन किया है ,उनकी लिखी किताब ‘राजस्थानी लोककथाएं ‘ में उन्होने एक कहानी लिखी है -“चमारी बामणी बणी”,जिसे राजस्थानी ग्रन्थागार ,जोधपुर ने छापा है- भंवर मेघवंशी

चमारी बामणी बणी …!

राजस्थान के स्कूल कॉलेजों में अब ऐसी कहानियां पढ़ने को मिलेगी !!

हाल ही में पुणे से एक खबर आई कि एक महिला वैज्ञानिक ने अपनी नौकरानी पर मुकदमा दर्ज करवाया कि उसने मराठा हो कर फर्जी पंडिताइन बन कर उसके घर मे खाना बनाया ,जिससे असली पंडिताइन जो कि वैज्ञानिक है ,उसका धर्म भ्रष्ट हो गया ,भारतीय दंड संहिता की धारा 419 एवम 504 के तहत मराठा नौकरानी पर प्रकरण बनाया गया है ,जिसकी जांच जारी है .

इस खबर से यह साबित होता है कि आज भी भारतीय सवर्ण समाज मे जातिवाद ,छुआछूत और भेदभाव भयंकर रूप में हावी है तथा चाहे कोई वैज्ञानिक ही क्यों न हो ,उसकी मानसिकता उतनी ही दूषित ,मैली ,कूपमण्डूक और अवैज्ञानिक ही बनी रहती है .

दुःख की बात है कि आज भी एक मराठा नौकरानी को छद्म ब्राह्मणी बनकर रसोइये की नौकरी करनी पड़ती है और पकड़े जाने पर मुकदमा झेलना पड़ता है ,शर्म आती है ऐसी जातिवादी सोच की वैज्ञानिक पर और उस व्यवस्था पर जो ऐसे हास्यास्पद मामलों में मुकदमे दर्ज कर लेती है और उनकी जांच भी करती है ,दलितों के खिलाफ निकलने वाले मराठा मोर्चे इस अपमानजनक घटना पर मूक बने रहते है.

आखिर भारत की महान संस्कृति में ऐसी घटिया मानसिकता निर्मित कहाँ से होती है ? भारत के सवर्णों को ऐसा अवैज्ञानिक छुआछूत सिखाता कौन है ? यह भेदभाव की मानसिकता किसी फेक्ट्री में बनती है या किसी खेत मे उगती है ? शायद यह दूषितपन यहां की संस्कृति और संस्कार का हिस्सा है.यह मानसिकता अनपढ़ ग्रामीणों से लेकर कुपढ़ वैज्ञानिकों ,इंजीनियरों ,वकीलों आदि इत्यादि सबमे पाई जाती है और यह यहां की सभ्यता ,संस्कृति व साहित्य में भी घनघोर रूप में व्याप्त है.

ऐसी ही जातिवादी मानसिकता के धनी एक लेखक गोविंद अग्रवाल ने अपनी मैली ,घृणित विचार शैली का प्रदर्शन किया है ,उनकी लिखी किताब ‘राजस्थानी लोककथाएं ‘ में उन्होने एक कहानी लिखी है -“चमारी बामणी बणी”,जिसे राजस्थानी ग्रन्थागार ,जोधपुर ने छापा है .

इस कहानी को पढ़िये ..”पहाड़ी की घाटी में एक बुढ़िया ब्राह्मणी रहा करती थी ,वह यात्रियों के लिए खाना बना दिया करती थी.. वह मर गयी तो एक चमारी ने सोचा कि क्यों न मैं बुढ़िया का स्थान ले लूं ? अच्छी आय के साथ साथ सम्मान भी मिलेगा ! ..एक दिन दो दर्शनार्थी आये ,उनके लिये काचरों की साग व रोटी बनाई ..यात्रियों ने सराहना की ..ब्राह्मणी माई तूने साग तो बहुत अच्छी बनाई …तब उसने कहा ..आज मेरी रांपी ( चमारों का औजार ) नही मिली ,इसलिए दांत से काट कर काचरों का साग बनाया ..सुनकर यात्री सन्न रह गए और उन्हें निश्चय हो गया कि औरत ब्राह्मणी नही चमारी है “.

यह किताब राजस्थानी के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले प्रकाशन ने प्रकाशित ही नही की बल्कि इस कहानी को कार्ड पेपर पर बाकायदा लेमिनेटेड करके अपने सूचि पत्र के साथ राजस्थान की हर स्कूल तथा कॉलेज में भिजवाया है ,ताकि वहां के पुस्तकालयों में इस तरह की जातिवादी भेदभाव वाला साहित्य रखा जा सके और उसे हर विद्यार्थी पढ़े.

जैसे ही इसकी भनक मिली है लेखक गोविंद अग्रवाल तथा प्रकाशक राजस्थानी ग्रन्थागार का उनकी इस कुत्सित सोच के लिए कड़ी निंदा हो रही है तथा राजस्थान के दलित बहुजन संगठनों ने राज्य सरकार से यह मांग की है कि इस पुस्तक पर तुरंत रोक लगाई जाए और लेखक तथा प्रकाशक के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्यवाही की जाए अन्यथा आंदोलन किया जाएगा .

पुणे की घटना और राजस्थान में चल रहा यह प्रकरण साबित करता है कि पिछड़े और दलित वर्ग के प्रति आज भी भारतीय सवर्ण समाज कैसी सोच रखता है ?

वाकई गोविंद अग्रवाल जैसे लेखक और राजस्थानी ग्रन्थागार जैसे प्रकाशक इस तरह खुलेआम जातिवाद फैलाने और वर्ग विशेष के प्रति घृणा पैदा करने के जुर्म में जेल जाने के हकदार है ,उम्मीद है कि सरकार इस पर ध्यान देगी ,नही देगी तो अम्बेडकरवादी लोग उन्हें जरूर सबक सिखाएंगे ही ..

– भंवर मेघवंशी
( लेखक शून्यकाल के संपादक है )