यह पोस्ट मैं उस माताएं बहनें एवं बेटियों के लिए लिख रहा हूं जिनको लगता है कि यह सारी सुविधाएं और अधिकार मुफ्त में मिले हैं ,किसी देवीए शक्ति पूजा पाठ व्रत से मिलते हैं..Kailash Das

जय भीम जय संविधान
मनुस्मृति और संविधान
यह पोस्ट मैं उस माताएं बहनें एवं बेटियों के लिए लिख रहा हूं जिनको लगता है कि यह सारी सुविधाएं और अधिकार मुफ्त में मिले हैं ,किसी देवीए शक्ति पूजा पाठ व्रत से मिलते हैं :-
ब्राह्मणवादी धर्मग्रन्थ और संविधान ” मनुस्मृति” में लिखा हुआ है:
नारी को पूजा पाठ व्रत उपवास करने का कोई अधिकार नहीं है
शिक्षा प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है श्रृंगार करने का कोई अधिकार नहीं है ,,
और एक शूद्र बाबा साहब डॉ आंबेडकर के द्वारा लिखे गए संविधान में लिखा हुआ है
नारी का भी उतना ही अधिकार है जितना एक पुरुष का,,
नारी को भी शिक्षा लेने का अधिकार है नारी को भी शिक्षित होकर समाज में पूर्ण रूप से जिने का अधिकार है ,,
तुम जो अच्छे कपड़े पहनती हो अच्छे शिक्षा हासिल करती हो अपने इच्छा से हर जगह स्वतंत्र घुमती हो यह सब सारी सुविधाएं संविधान के बदौलत तुम्हें मिली मगर जिस संविधान की बदौलत यह अधिकार तुम्हें मिला है,,
उस महापुरुष का एक भी फोटो तुम्हारे घरों में नहीं मिलेंगे उस महापुरुष का कितने तारीख कौन सा महीने में जन्म हुआ वह भी तुम्हें पता नहीं ,,
मगर बरहामणो के द्वारा बनाए गए रूढ़ी वादी परम्परा तुम्हें हमेशा याद होते हैं व्रत त्योहार के बारे में हमेशा याद रहते हैं जो हमेशा खर्चीले होते हैं और वह रूढ़ी वादी परम्परा का नाम त्योहारो के रूप में दिया गया है
जैसे,, देवी पूजा दीपावली छठ पूजा रामनवमी होली तो देहात क्षेत्र में अखारी पूजा अगहनी पूजा ठकुराही पूजा सुरजाही पूजा इत्यादि और यह सब बरहामणो के द्वारा बनाए गए रूढ़ी वादी परम्परा है अगर घर में पैसे नहीं होते तो कर्जा करके इस रुढ़ी वादी परम्परा को निभाते हैं और जब तुम्हारे बच्चे की विद्यालय में दाखिला के लिए पैसे लगते हैं तो उसके लिए पैसों की बदोवश्त नहीं कर पाते हो उसे टाल बटोल कर देते हो अगर पूजा पाठ उपवास व्रत करने से तुम्हारे बच्चो को शिक्षा मिलती है तो शौक से निभाओ रूढ़ी वादी परम्परा को
पर एक बात जरूर याद रखें कि शिक्षा मंदिरों में पूजा अर्चना से नहीं बल्कि विद्यालय में पुस्तक पढ़ने से मिलती है।
बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए मंदिरों में पुतलों के सामने कभी हाथ जोड़कर विनती नहीं किया था उन्होंने स्कूल कोलेज को ही भगवान का मंदिर माना था
और शिक्षा प्राप्त करके उन्होंने रूढ़ी वादी परम्परा को खत्म करके यह सब अधिकार तुम्हें दिलाया न कि पूजा पाठ उपवास व्रत करके ,,

जय संविधान जय विज्ञान
Kailash Das

बाबा साहब डॉo भीमराव आंबेडकर महान की मूर्ती में इशारा करती उंगली का महत्व क्या है आइये समझें

बाबा साहब डॉo भीमराव आंबेडकर महान की मूर्ती में इशारा करती उंगली का महत्व क्या है आइये समझें

एक बार एक लड़का अपने पिता के साथ डाँo भीमराव आम्बेडकर जयंतीे की रैली में गया और घर वापस आने पर अपने पापा से प्रश्न पूछने लगा ।

लड़का : पापा बाबा साहब हमेशा सुटबुट में क्यों रहते थे ?
पापा : बेटा, क्योंकि उन्हें लगता था कि मेरा समाज भी अच्छे कपडे पहने , यदि मैं सुटबुट में रहूंगा तो मेरा समाज मुझे आदर्श मानकर वह खुद भी सुटबुट में रहेंगे।

लडका : ठीक है पापा, बाबा साहब के जेब को हमेशा पेन क्यों रहता था ?
पापा : बहुत अच्छा प्रश्न पूछा बेटा, पेन होने का मतलब है पढ़ने लिखने ही सबसे जरूरी काम है, अरे वो सिर्फ पेन नहीं पीड़ितों शोषित,  लोगों को गुलामी से मुक्त करने की वह आधुनिक तलवार है।।।।।।उसी पेन से बाबा साहब ने भारतीय संविधान लिखा है।
बेटा : पापा मैं भी अपनी जेब में पेन लगाऊंगा ।
पापा आखरी प्रश्न पूछ रहा हूँ ।
बाबा साहब ने उंगली कहा दिखाई और उनके हाथ में कौन सी किताब हैं ?
पापा : बहुत अच्छा बेटा ऐसे ही  प्रश्न पूछा करो।।।
बेटा उनके हाथ में जो किताब है उसका नाम है ” भारतीय संविधान ” इस संविधान से पुरा भारत देश चलता है, इसी संविधान से सभी को स्वत्रंता , समता बंधुत्व  और सबसे बड़ी बात न्याय मिलता है। वार्ना खुलेआम ब्राह्मणवादी मनुवादी शोषण और अत्याचार करेंगे ।
डॉ बाबा साहब ने जो उंगली दिखाई है उसका मतलब ” तुम इस देश के शाशक बन सकते हो, अगर इस संविधान को सही मायने में अमल में लाना है तो योग्य लोग संसद में आने चाहिए, वह उंगली से यह संबोधन करते हैं कि ” अपने भले के लिए पूजाघरों में नहीं स्कूल कॉलेज और संसद में जाओ।

बेटा : धन्यवाद पापा, मैं भी बाबा साहब के विचारों पर चलूँगा और इस देश को बहुत आगे ले जाऊंगा।
अगर इसी प्रकार हर पापा अपने बच्चे को बाबा साहब के बारे समझाये तो वो दिन दूर नहीं, जब संसद क्या ? पुरे विश्व में बाबा साहब के बच्चे अपना नाम रोशन करेंगे। हर पिता से यही उम्मीद की जाती है।

*जय भीम जय भारत जय संविधान*

कालाम सुत्त (केसमुत्ति सुत्त) सत्ये की कसौटी है , ये वो बात है जो तय करती है की इतने बड़े बौद्ध साहित्य में क्या सही है और क्या विरोधियों की मिलावट है ये बौद्ध धम्म की जड़ है। यही से आप बौद्ध धम्म को जानना शुरू करो।

केसमुत्ति सुत्त या कालाम सुत्त तिपिटक के अंगुत्तर निकाय में स्थित भगवान बुद्ध के उपदेश का एक अंश हैं। [1] बौद्ध धर्म के थेरवाद और महायान सम्प्रदाय के लोग प्रायः इसका उल्लेख बुद्ध के ‘मुक्त चिन्तन’ के समर्थन के एक प्रमाण के रूप में करते हैं।केसमुति सुत्त अधिक बड़ा नहीं है, किन्तु इसका अत्यन्त महत्त्व है। ये सत्ये की कसौटी है , ये वो बात है जो तय करती है की इतने बड़े बौद्ध साहित्य में क्या सही है और क्या विरोधियों की मिलावट है , ये बौद्ध धम्म की जड़ है। यही से आप बौद्ध धम्म को जानना शुरू करो।

इस सूत्र में गौतम बुद्ध कहते हैं:

किसी बात को सिर्फ इसलिए मत मानो की ऐसा सदियों से होता आया है, परम्परा है, या सुनने में आई है। इसलिए मत मानो की किसी धर्म शास्त्र, ग्रंथ में लिखा हुआ है या ज्यादातर लोग मानते है। किसी धर्मगुरु, आचार्य, साधु-संत, ज्योतिषी की बात को आंख मूंदकर मत मान लेना। किसी बात को सिर्फ इसलिए भी मत मान लेना कि वह तुमसे कोई बड़ा या आदरणीय व्यक्ति कह रहा है, बल्कि हर बात को पहले बुद्धि, तर्क, विवेक, चिंतन व अनुभूति की कसौटी पर तौलना, कसना, परखना और यदि वह बात स्वयं के लिए, समाज व सम्पूर्ण मानव जगत के कल्याण के हित लगे, तो ही मानना।

“अपना दीपक स्वयं बनो”।।।।।।

गौतम बुद्ध के अनुयायी उनको को प्रसन्न करने के लिए, उनसे कुछ मांगने के लिए, स्वर्ग के लालच और नरक के भय से डरकर पूजा नहीं करते हैं.बल्कि सच ये है की पूजा ही नहीं करते वो उनकी वंदना करते हैं, उनकी वंदना बुद्ध के प्रति आभार प्रकट करने के लिए होती है, ठीक वैसे जैसे आप अपने स्कूल के शिक्षक का आभार प्रकट करें |

स्कुलो में शिक्षक हमें पढाते हैं, जिसके लिए उनको वेतन मिलता है, हम उनको नमस्कार करके तथा चरण-स्पर्श करके अपना आभार और आदर प्रकट करते हैं, आभार प्रकट न करना अशिष्टता माना जाता है| गौतम बुद्ध तो ऐसे आनोखे शिक्षक थे, जो बुद्धत्व प्राप्ति के बाद पैंतालिस वर्षो तक धम्म्चारिका करते रहे और लोगो को धम्म सिखाते रहे. वह चाहते तो बुद्धत्व प्राप्ति के बाद किसी आश्रम में या हिमालय पर जाकर शेष जीवन निर्वाण का आनंद लेते हुए बिता सकते थे. लेकिन उन्होंने अनंत करुना और मैत्री के साथ लोगो को धम्म बांटा .

अगर वो ऐसा नहीं करते तो आज यह अदभुत धम्म कैसे मिलता ? …..इसलिए धम्म मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक व्यक्ति भागवान बुद्ध के प्रति कृतज्ञता से भर उठाता है और उसी कृतज्ञता और आभार को प्रकट करने के लिए पूजा करता है. बुद्ध का ज्ञान इतना प्रभावी है की, आज भी बैज्ञानिक युग में उतना ही प्रभाव है, जितना की भागवान बुद्ध ने २६०० वर्ष पहले उपदेशित किया था…… तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशो में सबसे बड़ी बात कही है की किसी बात को इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी है, या किसी साधू संत ने कही है, किसी बात को इसलिए भी मत मानो की आपको प्रिय लगने वाले किसी व्यक्ति ने कही है. किसी भी बात को मानने से पहले उसे तर्क की कसौटी पर कास कर देखो की वह स्वं के हित के साथ मानवमात्र के हित में है या नहीं अर्थात किसी व्यक्ति या वर्ग के हित के लिए किसी दुसरे व्यक्ति या वर्ग का अहित करना घोर सामाजिक अन्याय है .

बुद्ध ने अपने अनुयाईयो को जबरदस्त स्वत्रन्त्रता दी है जो किसी और धर्म प्रवर्तक ने नहीं दी| संसार के किसी भी धर्म के प्रवर्तक ने अपने मत को जाच परख करने की किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता नही दी है संसार के सारे धर्मो में बुद्ध ने ही अपने मत को जांच परख करने के बाद ही अपनाने या स्वीकार करने की स्वतंत्रता दी है ये उनके**बुद्ध धम्म** के अपने अनुयायियों की लिए दिमाक को खुला रखने का महान सन्देश है . ****** बुद्ध दीघ निकाय १/१३मे अपने शिष्य कलामों उपदेश देते हुए कहते है ……….. ;-

 

” हे कलामों , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह तूम्हारे सुनने में आई है , किसी बात को केवल ईसलिए मत मानो कि वह परंपरा से चली आई है -आप दादा के जमाने से चली आई है , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी हुई है , किसी बातको केवल इसलिए मत मानो की वह न्याय शास्त्र के अनुसार है किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की उपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होतीहै , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह हमारे विश्वास या हमारी दृष्टी के अनुकूल लागती है,किसि बात को इसलिए मत मनो की उपरीतौर पर सच्ची प्रतीत होती है किसीबात को इसलिए मत मानो की वह किसी आदरणीय आचार्य द्वारा कही गई है . कालामों ;- फिर हमें क्या करना चाहिए …….???? बुद्ध ;- …..कलामो , कसौटी यही है कीस्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्याये बात को स्वीकार करना हितकर है…..???? क्या यह बात करना निंदनीय है …??? क्या यह बात बुद्धिमानों द्वारा निषिद्ध है , क्या इस बात से कष्ट अथवा दुःख ; होता है कलमों, इतना ही नही तूम्हे यह भी देखना चाहिए कि क्या यह मत तृष्णा, घृणा ,मूढता ,और द्वेष की भावना की वृद्धि में सहायक तो नहीहै , कालामों, यह भी देखना चाहिए किकोई मत -विशेष किसी को उनकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नही बनाता, उसे हिंसा में प्रवृत्त तोनही करता , उसे चोरी करने को प्रेरित तो नही करता , अंत में तुम्हे यह देखना चाहिए कि यह दुःख; के लिए या अहित के लिए तो नही है ,इन सब बातो को अपनी बुद्धि से जांचो, परखो और तूम्हे स्वीकार करने लायक लगे , तो ही इसे अपनाओ…….

 

उड़ीसा पुरी में भगवान बुद्ध का दांत की आज भी पूजा किया जाता है,भगवान बुद्ध का दांत को स्थापित करना को नवकलेवर कहते है ।…R R Bag Bauddh

मैं उड़ीसा का हूं याने आदि बौद्ध भूमि कलिंगा का हूं । मेरा जो सरनेम है वह बाग है और बाग जो है वो नाग शब्द की अपभ्रंश हो सकता है । क्योंकि उड़ीसा में नाग राजाओं ने बुद्धिज्म को उनका राज्य के धम्म के रूप में स्वीकार किया था । पुरी जगन्नाथ मंदिर में भगवान बुद्ध का दांत की आज भी पूजा किया जाता है । अगर हम देखेंगे जो नबकलेबर जगन्नाथ जी का होता है वह और कुछ नहीं एक मूर्ति से दूसरे मूर्ति में भगवान बुद्ध का दांत को स्थापित करना उसी को नवकलेवर कहते है ।

इसी विषय में विश्व विख्यात साहित्यकार प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद जी विशेष रूप इस चीज का उल्लेख किया है।ओड़िसा के खुर्दा जिले के गोविंदपुर गाँव से बुद्ध की जो प्रतिमा मिली है और जिस प्रतिमा की रक्षा सातमुखी नाग कर रहे हैं, वह सातमुखी नाग वस्तुतः नव नाग वंश के सात राजाओं के प्रतीक हैं।

नव नाग वंश की स्थापना दूसरी सदी के मध्य में नव नाग ने की थी, जिस वंश के सर्वाधिक प्रतापी राजा वीरसेन नाग थे और अंतिम तथा सातवें राजा भव नाग थे। कोई दो सौ साल बाद चौथी सदी के मध्य में नव नाग वंश का पतन हो गया।

नव नाग वंश के पतन के बाद सात नाग राजाओं द्वारा की गई बौद्ध सभ्यता की सुरक्षा के स्मृतिस्वरूप कलाकारों द्वारा सातमुखी नाग के सुरक्षा घेरे में बुद्ध की यह प्रतिमा बनाई गई है।

यहीं कारण है कि चौथी सदी के पहले इस प्रकार की बुद्ध-प्रतिमा कहीं से नहीं मिलती है और जिस इतिहासकार ने इस प्रतिमा की उम्र 1400 साल बताई है, वह सही बताई है।

इसी बात से यह सिद्ध होता है की उड़ीसा में बुद्धिज्म और नाग राजाओं का पतन के बाद या ब्राह्मणवाद ने छल कपट से यहां पर हिन्दुवाद को स्थापित किया लिया

 

जीवक कौमारभच्च बौद्ध भारत के प्रसिद्ध चिकित्सक थे, आइये बौद्ध धम्म के और मानवता के इतिहास के ऐसे चमकते सितारे की कथा जानते हैं

जीवक, एक कूड़े के ढेर पर मिला था | कूड़े के ढेर पर निजात शिशु को देख कर वहॉ भीड़ एकत्र हो गई, उसी समय पर वहॉ से राजा बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय कि सवारी गुजर रही थी | राजकुमार अभय ने भीड़ को देख कर एकत्र लोगों से प्रकरण कि जानकारी ली, तो पता चला कि नवजात शिशु जीवित है, अभय ने नवजात शिशु को इस कारण ‘जीवक’ नाम उसको देकर उसे गोद लेकर उसका अपने पुत्र कि तरह लालन पालन किया |

जीवक कि आयु बढने पर, उसे पता चला कि वह कूड़े के ढेर पर मिला था व अभय ने करूणावस उसका लालन पालन किया है | जीवक को लगा सभी बच्चे बडे होकर कोई न कोई सिप्प सीखकर कोई व्यवसाय करते हैं, अत: जीवक ने अभय से चिकित्सक (वैद्य) बनने कि इच्छा प्रकट की | अभय का आशीर्वाद प्राप्त करके जीवक तक्षसिला चिकित्सक बनने के लिए चला गया |

शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने गुरू से पूछा, “अभी कितने दिनों तक और शिक्षा प्राप्त करनी होगी|” ! गुरू ने कहा, “जीवक!  तक्षसिला कि गलियों में जाओ व जंगलो में भी जाओं और वहा पर जो भी ऐसा पौधा या वृक्ष मिले जिसकी औषधी न बनाई जा सकती हो, उसे तोडकर मेरे पास ले आओ|” जीवक ने सारा क्षेत्र ढूंढ मारा ऐसा कोई पौधा या वृक्ष नहीं मिला जिससे औषधि न बनाई जा सके और यही बात उसने अपने गुरू को बता दी | गुरू ने कहा, “तेरी शिक्षा पूर्ण हुई|” तब जीवक राजगृह अपने पिता अभय के पास पहुंचने के लिए निकल पडा|

लेकिन रास्ते में उसका यात्रा-व्यय समाप्त हो गया, इस स्थिति में जीवक ने पता किया कि यहा कोई यदि किसी असाध्य रोग से ग्रस्त है तो उसकी जानकारी उसे दे, एक सरेनी कि पत्नी माइग्रेन से पीडित थी, उस सरेनी कि पत्नी से जीवक बोला, “क्या मै आपका उपचार कर सकता हूँ?” सरेनी-पत्नी बोली बडे-बडे दीर्घायु को प्राप्त वैद्य तो मेरा उपचार कर न सके, तू तो नवयुवक है, तू क्या कर पायेगा? जीवक बोला कि एक अवसर प्रदान करे जिसका मुझे कोई शुल्क भी नहीं चाहिए, यदि आप स्वस्थ होने पर कुछ देना चाहे तो दे देना अन्यथा कोई बात नही | यह सुनकर सरेनी-पत्नी ने उपचार करने की अनुमति दे दी | वह कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गई, प्रसन्न होकर उसने उसे सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दीं |

यह सुचना प्राप्त होने पर सरेनी-पूत्री ने अपनी मॉ से दुगनी सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दी, सरेनी ने सुना कि उसकी पत्नी स्वस्थ हो गई है, रोगग्रस्त रहते हमेसा घिर-घिर करती रहती थी तो उसने अपनी पुत्री से भी दुगुना सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दे दी | अब जीवक के पास हजारों सुवर्ण मुद्रायें हो गई, इन्हें लेकर राजगृह के लिए प्रस्थान किया | राजगृह पहुच कर सारी सुवर्ण मुद्रायें जीवक ने अपने पिता अभय को दे दी, पिता अभय ने जीवक को समस्त मुद्रायें लोटाते हुये कहा कि अब इस क्षेत्र में अपना मकान बना कर रह | तब राजा बिम्बिसार बवासीर से ग्रस्त था व सभी उपचार व्यर्थ हो रहे थे, अभय के कहने पर बिम्बिसार ने अपने उपचार हेतु जीवक को बुलवा भेजा | जीवक के उपचार से राजा बिम्बिसार स्वस्थ हो गया तो राजा ने जीवक को क्षेत्रपति बना दिया व उस क्षेत्र में जीवक का बनाया ओषधालय आज भी पुरातत्व विभाग को प्राप्त है |

राजा बिम्बिसार ने दूसरे राजाओं के उपचार हेतु भी जीवक को भेजा व तथागत गोतम बुद्ध के उपचार करने का उत्तरदायित्व जीवक को प्रदान किया | जीवक ने तथागत गोतम बुद्ध के लिए जीवकाराम बनवाया | जीवक के कारण तथागत गोतम बुद्ध ने कई विनय पिटक में संशोधन भी किया था | आयुर्वेद में एक ओषधि का नाम आज भी “जीवक” है | जीवक को राजा बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय ने पाला पोसा इस कारण उसे “जीवक कौमारभृत्य” के नाम से समस्त जम्बूद्विप में जाना गया |

भारत में चार प्रकार के बौद्ध: एक विश्लेषण -राजेश चन्द्रा-

।।चार प्रकार के बौद्ध: एक विश्लेषण।।   -राजेश चन्द्रा-

भारत में चार प्रकार के बौद्ध हैं।

एक, पारम्परिक बौद्ध हैं जो कि अधिकांशतः लद्दाख, अरुणाचल, सिक्किम, असम, नागालैण्ड, पश्चिम बंगाल आदि प्रांतों में रहते हैं- चकमा, बरुआ, ताई इत्यादि। ये वह बौद्ध हैं जो भारत के बुद्ध धम्म के विपत्तिकाल में अपने आप को बचा सके और बुद्ध धम्म की धरोहर को मुसीबतों में संरक्षित रख सके। इन बौद्धों के पास बुद्ध धम्म की बड़ी अनमोल धरोहरें संरक्षित हैं- परम्पराओं के रूप में, दुर्लभ ग्रंथों के रूप में। जैसे इसाईयों ने जीसस क्राइस्ट के सूली पर चढ़ाए जाने के समय का रक्तरंजित वस्त्र, जिसे श्राउड ऑफ ट्यूरिन कहते हैं, संरक्षित किया हुआ है, ऐसे इन पारम्परिक बौद्धों के पास भगवान बुद्ध के वास्तविक चीवर तक संरक्षित हैं, पूरे के पूरे भी और टुकड़ों में भी, भगवान के द्वारा प्रयुक्त वस्तुएं जैसे पात्र, आसन, नख इत्यादि भी। ऐसे पारम्परिक बौद्धों के बहुत निकट रह कर मैंने बड़ी सामग्रियां इकट्ठा की है। भारत के संविधान के अंतर्गत उनमें से अधिकांश पारम्परिक बौद्ध अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में सूचीबद्ध हैं। वे पैदायशी बौद्ध होते हैं। उनके सारे रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, पूजा-संस्कार, आस्था-विश्वास सब के केन्द्र में भगवान बुद्ध और बुद्ध धम्म होता है। उनकी नैतिक कथाओं, कहानियों और कहावतों में भी सिर्फ बुद्ध होते हैं। उनके सपनों में भी बुद्ध और उनका धम्म होता है। तात्पर्य यह कि उनकी कल्पना और भावजगत का ताना बाना भी बुद्धमय होता है। इन बौद्धों की संख्या सिन्धी, सिक्ख, जैन, पारसी, ईसाइयों की तरह अल्पसंख्या है लेकिन फिर भी इन समुदायों का राजनैतिक मूल्य न के बराबर है क्योंकि इनमें राजनैतिक जागरूकता बहुत कम है। यद्यपि कि पूर्वोत्तर राज्यों में इनके मत निर्णायक होते हैं।

दूसरे, वे बौद्ध हैं जो ओशो के अनुयायी अथवा अध्येता हैं। वे घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन बौद्धिक तल पर भगवान बुद्ध के प्रति उनकी गहरी स्वीकार्यता है। उनके मन में भगवान बुद्ध के प्रति गर्व की भावना है। वे भगवान बुद्ध को और बौद्ध धर्म को भारत का गौरव मानते हैं।

तीसरे, वे बौद्ध हैं जो गुरु सत्य नारायण गोयनका जी के साधना शिविरों में विपस्सना साधक हैं। विपस्सना के निष्ठावान ये साधकगण भी घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन भगवान बुद्ध के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा है। मानें तो मानस तल पर वे परिपूर्ण बौद्ध हैं लेकिन अभिलेखों में वे सवर्ण-अवर्ण, हिन्दू-मुस्लिम इत्यादि सब लोग हैं।

चौथे प्रकार के बौद्ध हैं जो बोधिसत्व बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के कारण स्वयं को बौद्ध मानते हैं। उनमें से भी अधिसंख्य अभिलेखों में अनुसूचित जाति के हैं, धार्मिक कोष्ठक में हिन्दू हैं, लेकिन मौखिक घोषणा में वे सर्वाधिक निष्ठावान बौद्ध हैं।

इस प्रकार अघोषित रूप भारत की एक बहुत बड़ी जनसंख्या बौद्ध है अथवा बुद्धानुयायी है।

चारों प्रकार के बौद्धों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं।

पारम्परिक बौद्ध भाषा-बोली-क्षेत्रीयता-रीति-रिवाजों के नाते शेष बुद्धानुरागियों से असम्पृक्त रहते हैं तथा शेष बुद्धानुरागियों के लिए भी ये पारम्परिक बौद्ध कौतुहल और विस्मय का विषय भर हैं। उनके साथ शेष बौद्धों की न सघन मैत्री है और न घुलने-मिलने वाला सम्पर्क।

ओशो से प्रभावित बुद्धानुरागियों के लिए बुद्ध व धम्म एक दार्शनिक चर्चा-परिचर्चा का विषय भर है। संस्कारिक तल पर वे अपनी-अपनी मान्यताओं व आस्थाओं में उतने ही कट्टर हैं जितना कि कथित कट्टर कट्टर होते हैं। भारत की सामाजिक-साम्प्रदायिकता-धार्मिक विषमताओं इत्यादि से उनका सरोकार न के बराबर है। बुद्ध प्रेमी-ओशो प्रेमी नामक एक समुदाय-सा है जिनके बीच उनकी गहरी मैत्री है। शेष बुद्धानुरागियों से उनकी मैत्री लगभग शून्य है।

विपस्सना करने वाले ध्यानी बौद्धों के जीवन केन्द्र में केवल विपस्सना है। दस दिवसीय-बीस दिवसीय-सतिपट्ठान इत्यादि शिविर करना उनके सरोकार की पराकाष्ठा है। विपस्सना के प्रति उनकी लगन कमाल की है। एक तरह से वे धम्म को व्यवहारिक तल पर जीने का चरम प्रयास कर रहे हैं। वे मन के गहनतम तल पर रूपान्तरण की कीमिया में लगे हैं। ये विपस्सी साधक स्वयं को बौद्ध घोषित नहीं करते लेकिन घोषित बौद्धों से अधिक निष्ठावान बौद्ध हैं। लेकिन सामाजिक सरोकारों से इनका भी कोई वास्ता नहीं है या है भी तो नगण्य है।

अब चौथे प्रकार के बौद्ध हैं जो बोधिसत्व बाबा साहेब के प्रभाव में स्वयं को बौद्ध मानते हैं। उनके लिए सामाजिक सरोकार प्राथमिक है, प्रिऑरटी है। यह समुदाय 14 अक्टूबर’1956 के बाद अस्तित्व में आया है। कुछ लोग इस नवजन्मित समुदाय को भीमयानी अथवा नवयानी भी कहने लगे हैं। भारत की सामाजिक-राजनैतिक-धार्मिक विसंगतियों के निराकरण के लिए यह नवयान सर्वाधिक उत्साही और सक्रिय है। जनगणना सन् 2011 के अनुसार भारत के बौद्धों की कुल जनसंख्या में 13 प्रतिशत पारम्परिक बौद्ध हैं और शेष 87% में नवयानी बौद्ध हैं। भारत को बुद्धमय बनाने का सबसे प्रबल सपना इन्हीं नवयानियों का है। जाति विहीन समाज बनाना उनकी प्राथमिकता है। लेकिन इन नवयानियों में भी चार प्रकार के बौद्ध हैं:

1. पड़े हुए बौद्ध
2. खड़े हुए बौद्ध
3. बढ़े हुए बौद्ध
4. चढ़े हुए बौद्ध

पड़े हुए बौद्ध

पड़े हुए बौद्ध वे हैं जो वास्तव में बिल्कुल भी बौद्ध नहीं हैं। बस बाबा साहेब की जयंती और बुद्ध जयंती के अवसर पर उत्सव-समारोह में वे ‘नमो बुद्धाय जय भीम’ का सम्बोधन प्रयोग करते हैं। साल के शेष दिनों में वे सब उन्हीं संस्कारों में लिप्त रहते हैं जिन संस्कारों से बाबा साहेब ने मुक्त करने का आह्वान किया था।

खड़े हुए बौद्ध

खड़े हुए बौद्ध सबसे ज्यादा मुखर हैं। हिन्दुत्व, ब्राह्मणवाद, मनुवाद, अंधविश्वास, पाखण्ड इत्यादि की मुखर निन्दा-आलोचना करना, कर्मकाण्ड की शल्यक्रिया करना, उपहास करना उनकी प्राथमिकता में है लेकिन बुद्ध धम्म के बारे में उनकी जानकारी लगभग शून्य है। उनकी दिनचर्या, संस्कार, आचार में बुद्ध धम्म की छाया भी नहीं है। बस निन्दा-आलोचना-शल्यक्रिया-विश्लेषण इत्यादि को ही वे बुद्ध धम्म समझते हैं। उन्हें मालूम है कि रामचरितमानस में कौन-कौन सी चौपाइयाँ निन्दनीय हैं लेकिन यह नहीं मालूम की धम्मपद की कौन-सी गाथाएँ प्रशंसनीय हैं। उन्हें तिरतन वन्दना तक नहीं आती है। उन्हें विपस्सना आरएसएस का एजेण्डा दिखता है, त्रिपिटक की अट्ठकथाओं में भी ब्राह्मणवाद दिखता है, ध्यान-साधना-सुत्तपाठ इत्यादि सब कुछ मनुवाद लगता है, उनका सारा सरोकार 22 प्रतिज्ञाओं से है, उनमें भी सिर्फ पहली तीन प्रतिज्ञाओं पर सारा जोर रहता है, शेष प्रतिज्ञाओं का वे स्वयं भी पालन नहीं करते हैं। उन्हें यह तो अच्छे से मालूम है कि गलत क्या है, लेकिन सही क्या इस बात की जानकारी लगभग नहीं ही है या है तो पालन नहीं करते।

ऐसा मुस्लिम ढूढ़ना मुश्किल है जिसे नमाज़ न आती हो, ऐसा सिक्ख ढूँढ़ना मुश्किल है जिसे गुरूग्रंथ साहेब के शबद न याद हों, ऐसा इसाई ढूंढ़ना लगभग नामुमकिन है जिसे बाइबिल के कुछ सानेट न याद हों, ऐसा हिन्दू तो ढूँढ़ना असम्भव है जिसे कोई आरती-चालीसा-स्तुति-भजन न आता हो लेकिन ऐसे कथित बौद्ध लाखों की संख्या में मिल जाएंगे जिन्हें त्रिशरण-पंचशील-बुद्धपूजा-तिरतन वन्दना कुछ नहीं आता लेकिन ताल ठोक कर अपने को बौद्ध कहते हैं। इन खड़े हुए बौद्धों की सोच क्रान्तिकारी है, तार्किक है। ये ही बौद्ध बाबा साहेब की और भगवान बुद्ध की जयंती मनाने के प्रति सर्वाधिक सक्रिय हैं।

बढ़े हुए बौद्ध

बढ़े हुए बौद्ध वे हैं जो निन्दा-आलोचना-शल्यक्रिया-विश्लेषण से थोड़ा आगे बढ़ कर सच्चे अर्थों में धम्म का व्यवहारिक रूप से पालन कर रहे हैं। उन्हें त्रिशरण-पंचशील-बुद्धपूजा-त्रिरत्न वन्दना-सुत्तपाठ आता है। जन्मदिन, विवाह, गृहप्रवेश इत्यादि अवसरों पर पूज्य भन्ते या बोधाचार्यों से संस्कार सम्पन्न कराते हैं। पुराने संस्कारों को छोड़ कर उन्होंने बौद्ध संस्कारों को जीवन में आत्मसात करना शुरू कर दिया है। वे सच्चे अर्थों में बुद्धमय भारत बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि सिर्फ निन्दा-आलोचना करते रहने भर से बुद्धमय भारत नहीं बनेगा। सकारात्मक विकल्प पर व्यावहारिक काम करने से भारत बुद्धमय होगा। नवयानी बौद्धों में यह बढ़े हुए बौद्ध ही उम्मीद की मशाल हैं।

चढ़े हुए बौद्ध

चढ़े हुए बौद्ध, इन्हें धम्म के वास्तविक नायक कहिये, जो धम्म के मूल तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। ध्यान-साधना-विपस्सना करते हैं, बुद्ध वचनों को मूल रूप में अध्ययन करते हैं, त्रिपिटक में धम्म खंगालते हैं, शून्यागारों में ध्यान करते हैं। उपोसथ धारण करते हैं। धम्म के आध्यात्मिक पक्ष को सर्वोपरि प्राथमिकता देते हैं और सामाजिक सरोकारों में भी सकारात्मक व रचनात्मक योगदान देते हैं। उन्हें धम्म का मर्मज्ञ कहा जा सकता है। सातवीं संगीति भारत में आयोजित करना इन बौद्धों का सपना और महत्वाकांक्षा है। वे इसके लिए प्रयासरत भी हैं। शेष बौद्धों के मन में यह बात अभी कल्पना में भी नहीं है। भारत को सच्चे अर्थों में बुद्धमय यही बौद्ध बनाएंगे, चढ़े हुए बौद्ध।

और विशिष्ट रूप से कहें तो ये चार अलग-अलग समूह अथवा व्यक्ति नहीं हैं। चारों एक ही हैं। पड़ा हुआ बौद्ध ही एक दिन खड़ा हुआ बौद्ध बनता है। खड़ा हुआ बौद्ध ही कभी बढ़ा हुआ बौद्ध बनता है और यह बढ़ा हुआ बौद्ध ही एक दिन चढ़ा हुआ बौद्ध बनता है। यह भी सम्भव है कि अभी कोई पड़ा बौद्ध और खड़ा बौद्ध के बीच संक्रमण अवधि, ट्रांजीसनल पीरियेड, से गुजर रहा हो। यह परस्पर उत्तरोत्तर विकास की प्रक्रिया, प्राॅसेस आफ वोल्यूशन, है। यह विकास स्वयं के प्रयास से भी होता है तथा प्रशिक्षण से भी होता है। जबरन कुछ नहीं होता। स्वैच्छिक विकास बहुत क्रांतिकारी परिणाम देता है।

जो खड़े हुए हैं उन्हें पड़े हुए लोगों पर कटाक्ष नहीं करना है बल्कि याद यह रखना है कि कभी वे स्वयं भी वहीं थे। बढ़े हुए लोगों को खड़े हुए लोगों को बढ़ने के लिए प्रेरित करना है, उपाय कौशल करना है। चढ़े हुए बौद्धों को शेष तीन के प्रति भी मैत्री भाव से बर्ताव करना है। बढ़े और चढ़े हुए बौद्धों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी, भारत बुद्धमय होता जाएगा।

भारत तीव्र गति से बुद्धमय होगा जैसे-जैसे भारत के सभी प्रकार के बौद्धों में सघन मैत्री व आपसी समझ, म्युचुअल अण्डरस्टैण्डिंग, बढ़ती जाएगी, क्योंकि बुद्ध वचन हैं- मैत्री सम्पूर्ण धम्म है!

बाबा साहब डॉ आंबेडकर के मशहूर कथन जो हम सब का रोजमर्राह की जिंदगी में मार्गदर्शन करती है

स्वाभिमानी लोग ही संघर्ष की परिभाषा समझते हैं,जिनका स्वाभिमान मरा होता है वह गुलाम होते हैं I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
मेरी जय जय कार करने से अच्छा है, मेरे बताए हुए मार्ग पर चलें I
-बाबा साहब डॉ आंबेडकर
राजनीति में हिस्सा ना लेने का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करने लगते हैं I
-बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
जो कौम अपना इतिहास भूल जाती है,वह कौम कभी अपने इतिहास का निर्माण नहीं कर सकती I
-बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पिएगा वह दहाड़ेगा I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर

हमारा यह आंदोलन तब तक सफलता की चोटी पर नहीं पहुंच सकता जब तक हमारी महिलाएं भी इसमें सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेंगी
– बाबा साहब डॉ आंबेडकर

जिस समाज में हमारा जन्म हुआ है,उस समाज का उद्धार करना हमारा मुख्य कर्तव्य है I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर

मैं उसे ही शिक्षित मानता हूं,जो अपने दुश्मन को पहचानता है I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
राजनीतिक सत्ता के बिना हमारे लोगों को उद्धार संभव नहीं
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर

 

जिस घर में महिला शिक्षित हो जाती है उस घर में सारा परिवार शिक्षित हो जाता है I
– राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले