उन्नति के सात नियम…राजेश चन्द्रा

।।उन्नति के सात नियम।।  -राजेश चन्द्रा-
(मित्र दिनेश कुमार जी ने पुनः उपकार किया है कि “मैत्री सम्पूर्ण धम्म है”, ग्रन्थ से यह लम्बा आलेख टंकित कर दिया है। उनके प्रति आभार सहित यह आलेख साझा कर रहा हूँ। मैंने किसी एक विषय पर अगर सर्वाधिक व्याख्यान दिये हैं तो वह यही विषय है।)

वैशाली में वज्जि गणराज्य के अमात्यों ने भगवान बुद्ध से स्वहित में एक प्रश्न किया था- हमारे वज्जि गणराज्य की उन्नति कैसे होगी?

एक अर्थ में प्रश्न नितांत व्यक्तिगत है, वज्जियों के संदर्भ में, प्रश्नकर्ता सीमित हैं, परिधिबद्ध हैं। वे अपने गणराज्य की उन्नति को लेकर चिंतित दिख रहे हैं, लेकिन दूसरे अर्थों में प्रश्न व्यापक है, सार्वभौमिक है। कौन है, जो उन्नति नहीं चाहता? हर व्यक्ति उन्नति चाहता है। हर समाज उन्नति का आकांक्षी है। हर संगठन उन्नतिप्रिय है। हर संस्था उन्नति की अपेक्षा करती है। यहाँ तक कि नकारात्मक व्यक्ति, संस्था, संगठन- जैसे आतंकवादी संगठन भी, उन्नति चाहते हैं।

भगवान बुद्ध वैशाली में वर्षावास कर रहे थे तब वज्जी गणराज्य के आमात्यगण शास्ता के दर्शन हेतु आए। उन्होंने यह प्रश्न किया- हमारे गणराज्य की उन्नति कैसे होगी? हमारा अभ्युदय कैसे होगा?

भगवान बुद्ध ने वज्जियों को उन्नति के सात नियम बताए।

वर्षों बाद जब दशबल राजगृह में गृद्धकूट पर्वत पर चारिका कर रहे थे, वर्षावास के प्रवास में थे, तब सम्राट अजातशत्रु ने अपने एक निजी गुप्त दूत वस्साक को भगवान के पास भेजा। आनन्द भगवान को पंखा झल रहे थे। वस्साक ने तथागत के सम्मुख सम्राट अजातशत्रु का गुप्त संदेश निवेदित किया- भगवान, सम्राट अजातशत्रु वज्जि गणराज्य पर आक्रमण की योजना बना रहे हैं…

वास्तव में अजातशत्रु ने अपने गुप्त दूत वस्साक को यही निर्देश देकर भेजा था कि भगवान के पास वज्जि गणराज्य पर आक्रमण की योजना वाली बात की चर्चा भर करना, उस पर भगवान क्या कहते हैं, यह मुझे बताना।

ध्यान देने की बात है कि बुद्ध के पास सिर्फ धार्मिक परामर्श के लिए ही लोग नहीं आते थे- व्यापारी व्यापारिक परामर्श के लिए भी आते थे, गृहस्थ, सम्राट राजनैतिक-प्रशासनिक परामर्श लेते थे, धार्मिक लोग धार्मिक जिज्ञासाएं करते थे, संपूर्ण त्रिपिटक ऐसे विविध प्रसंगों से भरे पड़े हैं। कहीं हम सीगाल, मीगारमाता विशाखा, अनाथपिण्डक सुदत्त, युवक दीघजाणु को बुद्ध के द्वारा उपदिष्ट सद्गृहस्थी के उपाय सुनते देखते हैं, कभी नखदत्त को कृषि पर संवाद करते देखते हैं, कभी महाकाश्यप-मोदगल्लायन के साथ गंभीर तात्विक चर्चा में निमग्न पाते हैं, तो कभी सम्राट बिम्बसार, प्रसेनजित, अजातशत्रु को भगवान से राजनैतिक, आर्थिक, प्रशासनिक परामर्श की प्रार्थना करते पाते हैं। यह तथागत के बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक है।

वस्साक का प्रसंग सुनकर भगवान बुद्ध ने आनन्द से पूछा- आनन्द, क्या वज्जी गणराज्य के लोग बार-बार एकत्रित होकर सभाएं करते हैं?

आनन्द ने उत्तर दिया- महाभदंत, ऐसा मैंने सुना है कि वज्जि गणराज्य के लोग बार-बार एकत्रित होकर सभाएं करते हैं।

भगवान ने अगला प्रश्न किया- आनन्द, क्या वज्जि लोग समग्र एकत्रित होते हैं? मैत्रीपूर्ण ढंग से बैठकें करते हैं? उनकी बैठकों का समापन मैत्रीपूर्ण ढंग से होता है? विवाद तो नहीं होता?

आनन्द ने कहा- भगवान, हमने ऐसा भी सुना है कि वज्जि लोग समग्र एकत्रित होते हैं। उनकी बैठकें मैत्रीपूर्ण होती हैं। बैठकों में विवाद नहीं होता और बैठकों का समापन भी मैत्रीपूर्ण होता है।

भगवान ने तीसरा प्रश्न किया- क्या वज्जि गणराज्य के लोग अपने बनाए विधानों का पालन करते हैं? अपने बनाए विधान स्वयं तोड़ते तो नही? इन विधानों के बारे में ऐसा तो नहीं कहते कि हमने बनाया ही नहीं?

आनन्द- भगवान, हमने यह भी सुना है कि वज्जी गणराज्य के लोग अपने बनाये विधानों का पालन करते हैं। अपने बनाये विधान स्वयं भंग नहीं करते और अपने बनाये विधानों के बारे में ऐसा नहीं कहते कि हमने नहीं बनाया।

भगवान ने चौथा प्रश्न किया- क्या वज्जी लोग अपने से वरिष्ठ आमात्यों से परामर्श लेते रहते हैं? उनसे निरंतर संपर्क रखते हैं? उनको यथोचित मान-सम्मान देते हैं?

आनन्द ने पुनः विनय पूर्वक कहा- मैंने ऐसा भी सुना है कि वज्जि लोग अपने से वरिष्ठ लोगों से निरंतर संपर्क में रहते हैं, उनसे राय-मशविरा लेते हैं, उन्हें यथायोग्य मान-सम्मान देते हैं।

भगवान-आनन्द, क्या वज्जियों के राज्य में अविवाहित कुमारियाँ और विवाहित स्त्रियाँ सुरक्षित हैं, उन पर अत्याचार तो नहीं होता? उनका अनादर तो नहीं होता?

आनन्द- भदंत, मैंने सुना है कि वज्जियों के राज्य में अविवाहित कुमारियाँ और विवाहित स्त्रियाँ सुरक्षित हैं, वज्जिगण उन पर अत्याचार नहीं करते और उनका अनादर नहीं करते।

भगवान ने छठा प्रश्न किया- आनन्द, क्या वज्जिगण अपने नगर और नगर के बाहर के देव स्थानों का संरक्षण करते हैं? अपने पूर्वजों की स्मृतियों में स्मारक-चैत्य-स्तूप बनवाते हैं? उनकी स्मृति में समारोह आयोजित करते हैं?

आनन्द ने सविनय कहा- परम पावन, मैंने ऐसा भी सुना है कि वज्जियों के राज्य में देवस्थान संरक्षित होते हैं, वे अपने पूर्वजों की स्मृतियों में चैत्य-स्तूप-स्मारक बनवाते हैं, उनकी स्मृति में समारोह आयोजित करते हैं।

भगवान ने सातवां प्रश्न किया- आनन्द, क्या वज्जिगण श्रमणों, भिक्खुओं, अर्हतों को पर्याप्त दान-मान-संरक्षण देते हैं? क्या उनके राज्य में श्रमण-भिक्खु-अर्हत आना-रहना चाहते हैं?

आनन्द ने विनम्रता पूर्वक कहा- हे महान, मैंने ऐसा भी सुना है कि वज्जियों के राज्य में श्रमण-भिक्खु-अर्हत आना-रहना चाहते हैं, उन्हें दान-मान संरक्षण मिलता है।

तब भगवान ने सम्राट अजातशत्रु के गुप्त दूत आमात्य वस्साक से कहा- एक बार वैशाली में मैंने वज्जियों को उन्नति के सात नियम बताए थे। जब तक वज्जि इन सात नियमों का पालन कर रहे हैं, उनकी उन्नति ही होगी, अवनति नहीं, तब तक उन्हें कोई अजातशत्रु पराजित नहीं कर सकता।

वस्साक ने  नमन करते हुए कहा- भगवान, ये सात नियम तो बहुत बड़ी बात है, यदि वज्जिगण आपके बताए इन सात नियमों में से एक नियम का भी पालन करते हैं, तो भी उनकी उन्नति होगी, अवनति नहीं, फिर सात नियमों की तो बात ही क्या है!

भगवान ने आगे कहा- वैशाली के दो ही शत्रु हैं, बाढ़ और आपसी फूट।

दरअसल, बाढ़ से उजड़ा नगर फिर बस सकता है, लेकिन आपसी फूट से उजड़ा घर, नगर, शहर, समाज, देश मुश्किल से बसता है।

इतिहास गवाह है कि अजातशत्रु के आमात्य वस्साक ने योजनाबद्ध उपाय से वज्जि संघ में फूट डालकर ही उसे पराजित किया। कालांतर में भगवान बुद्ध ने अपनी महापरिनिर्वाण भूमि कुशीनारा को प्रस्थान करने से पूर्व गृद्धकूट पर्वत पर ही भिक्षु संघ को एकत्रित कर धम्म की अभिवृद्धि के भी यही सात नियम बताए थे- बार-बार एकत्रित होना, मैत्रीपूर्ण ढंग से एकत्रित होना, एकत्रित होकर धम्मचर्चा, धम्माभ्यास करना अथवा आर्य मौन धारण करना, धम्म में वरिष्ठ लोगों से निरंतर संपर्क बनाए रखना, कल्याण मित्र बनाना इत्यादि।

साथ ही भगवान ने बताया कि जंगल में मरे हुए सिंह को भी दूसरे जानवर छूने का साहस नहीं करते। मरे हुए सिंह से भी जंगल के जानवर डरते हैं। उनको लगता है कि सिंह सो रहा है। सोए हुए सिंह को भी जगाने का साहस किसी के पास नहीं होता।

भगवान बुद्ध ने कहा- मरे हुए सिंह के बदन में पड़े हुए कीड़े ही सिंह को खत्म करते हैं। ऐसे ही आपसी फूट के कीड़े ही संघ को खत्म कर सकते हैं, धम्म का लोप कर सकते हैं। कोई बाहरी शक्ति संघ को विघटित नहीं कर सकती।

भगवान बुद्ध के द्वारा वज्जियों के लिए उपदिष्ट इन सात नियमों के आलोक में कहना चाहूंगा की उन्नति के ये सात नियम सिर्फ वज्जियों के लिए नहीं थे, सिर्फ भिक्खु संघ के लिए भी नहीं थे, बल्कि ये मानव मात्र को संबोधित हैं। इनको गुड मैनेजमेंट के सात नियम भी कह सकते हैं। इन सात नियमों को जहां कहीं भी क्रियान्वित किया जाएगा- घर, नगर, शहर, संस्था, संगठन, समाज, प्रांत, प्रदेश, देश वहां उन्नति ही होगी, अवनति नहीं।

भारत के विद्वान संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने भारतीय संविधान में भी इन सात नियमों का समावेश किया है। भारतीय संविधान के शिल्पी डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर से नवंबर, 1956 में कोलंबो, श्रीलंका के एक कार्यक्रम में पूछा गया था कि आपने भारत के संविधान में लोकतंत्र के सिद्धांत किस देश के संविधान से लिए हैं? बाबासाहेब ने बड़ी निर्भीकता से कहा था- मैंने भारत के संविधान में लोकतंत्र के सिद्धांत बुद्ध के संघ से लिए हैं।

विधानसभा, विधानपरिषद, लोकसभा, राज्यसभा की नियमित बैठकें, ग्रीष्मकालीन, शीतकालीन, आपातकालीन सत्र, मंत्रिपरिषदीय, मंत्रिमंडलीय चर्चाएं, कैबिनेट निर्णय इत्यादि सात नियमों में से पहले नियम का ही क्रियान्वयन हैं- बार-बार एकत्रित होना, बार-बार बैठकें करना।

संयुक्त निदेशक का निदेशक से, निदेशक का शासन सचिव से, सचिव का प्रमुख सचिव से परामर्श लेना, दिशा-निर्देश की प्रार्थना करना, क्रियान्वयन के पूर्व अनुमोदन लेना, प्रमुख सचिव का मुख्य सचिव से, मंत्री का मुख्यमंत्री से, मुख्यमंत्री का राज्यपाल से, प्रधानमंत्री का राष्ट्रपति से नियमित मुलाकातें करना, शिष्टाचार अथवा औपचारिक भेंट करना, परामर्श लेना, तदनुसार अनुपालन करना, मुख्यमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री की अगवानी, उच्चाधिकारी के आगमन पर अधीनस्थ द्वारा कुर्सी छोड़ देना, प्रोटोकॉल का निर्वहन करना इत्यादि, अपने से वरिष्ठ के निरंतर संपर्क में रहना, उनसे परामर्श लेना, उन्हें मान सम्मान देना, इस नियम का संवैधानिक क्रियान्वयन है।

भारतीय संविधान महिला हितों का कितना बड़ा हिमायती है, इसका सबसे बड़ा सबूत है कि मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति तक के सर्वोच्च पदों को भारत में महिलाओं ने सुशोभित किया है। अपनी धर्मनिरपेक्ष गरिमा के अनुरूप भारतीय संविधान देश में सभी धर्मावलंबियों के श्रद्धा स्थलों को संरक्षण प्रदान करता है, सभी की आस्थाओं को प्रश्रय देता है, सभी के पर्वों के लिए सार्वजनिक-राजपत्रित अवकाश देता है। सभी मतों-पंथों-धर्मों के साधु-संत-महात्मा इस देश में दान-मान-संरक्षण पाते हैं, वे यहां आना और रहना चाहते हैं।

कहने का तात्पर्य है कि भारत के संविधान में बुद्ध के द्वारा उपदिष्ट उन्नति के सातों नियमों का समावेश है। जातियों, उप जातियों, वर्गों, धर्मों, क्षेत्रों, समुदायों में बंटे देश को संविधान ने कम से कम वैधानिक रूप से एक कर दिया है, उन्हें मैत्री के सूत्र में बांध दिया है। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, जैन, पारसी, बौद्ध, सवर्ण, अवर्ण, पिछड़े-अगड़े-अति पिछड़े-आदिवासी आदि सरकारी तंत्र में सब एक साथ हैं।

अजातशत्रु के गुप्त दूत आमात्य वस्साक की बात में भी बल है- यदि एक नियम का भी वज्जिगण पालन कर रहे हैं, तो भी उनकी उन्नन्ति ही होगी, अवनति नहीं। कहने की आवश्यकता नहीं की संविधान के क्रियान्वयन के पश्चात आज भारत विश्व मंच पर एक बार फिर महाशक्ति के रूप में उभर रहा है- आर्थिक, सैन्य, तकनीकी व वैज्ञानिक हर क्षेत्र में भारत नायक बनने की ओर अग्रसर है।

यदि बुद्ध के द्वारा उपदिष्ट सात नियम आदर्श रूप में क्रियान्वित हों, तो वह दिन दूर नहीं जब देश सम्राट अशोककालीन भारत की तरह विश्ववंद्य, विश्व पूज्य हो।

असली समता-बंधुता-मैत्री की स्थापना में समस्या कहां है? समस्या है संवैधानिक आदर्श और सामाजिक व्यवहार के अंतर में। संवैधानिक रूप से देश में समता-बंधुता-मैत्री कायम है। सरकारी तंत्र में सब मैत्री के साथ कार्यरत हैं, लेकिन सामाजिक व्यवहार में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जातिवाद भी मौजूद है, भेदभाव भी कायम है, ऊंच-नीच भी अस्तित्व में है।

मुझे नहीं लगता कि इसे सिद्ध करने के लिए उदाहरणों और प्रमाणों की आवश्यकता है। यह एक कटु सच्चाई है जिससे देश का हर नागरिक परिचित है। नियम इंसान का व्यवहार बदल सकते हैं, उसको बाहरी तौर पर परिवर्तित कर सकते हैं, लेकिन उनका मन परिवर्तित नहीं कर सकते, नियमों का पालन करना मजबूरी हो सकती है, कमजोरी हो सकती है, भय अथवा जरूरत हो सकती है। मजबूरी, कमजोरी, भय अथवा जरूरत से व्यवहार परिवर्तित हो सकता है, मन नहीं।

और मन के परिवर्तन के बिना कोई सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। मन के परिवर्तन से ही संवैधानिक आदर्श और सामाजिक व्यवहार के अंतर की खाई पटेगी। यह खाई जितनी कम होगी उसी अनुपात में यह देश उतना ही अधिक सशक्त और समृद्ध होगा, देश के नागरिक सुखी और प्रसन्न होंगे। इस देश में बुद्ध धम्म की पुनर्स्थापना किसी जाति, समुदाय अथवा वर्ग के लिए ही हितकारी नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए हितकारी है।

दुनिया में बहुत कम देश होंगे, जिन्हें राज्य भी कहा जा सके और राष्ट्र भी संबोधित किया जा सके। भारत उनमें से एक अनूठा देश है- यह राज्य भी है और राष्ट्र भी है। राजनैतिक सीमा का नाम राज्य है और सांस्कृतिक विस्तार का नाम राष्ट्र।

भारत नामक राष्ट्र सिर्फ कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचल से गुजरात तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक परिधि में वह हर देश शामिल है जिसमें बुद्ध का धम्म मौजूद है- चीन, तिब्बत, भूटान, जापान, वियतनाम, कोरिया, थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका। यहां तक कि पाकिस्तान, बंग्लादेश, अफगानिस्तान भी भारत नामक राष्ट्र की सांस्कृतिक परिधि का अंग हैं। जिस किसी भी देश में बुद्ध धम्म का अल्पमात्र में भी अवशेष है, उसकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं। जहां तक बुद्ध का, बुद्ध के धम्म का विस्तार है वहां तक भारत नामक राष्ट्र का विस्तार है। भारत के सांस्कृतिक मानचित्र में लगभग दो-तिहाई दुनिया समाहित है। यदि भारत अपनी बौद्ध पहचान को पुनर्स्थापित करता है, जिसकी पहल आधी शताब्दी पूर्व बोधिसत्व बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने कर दी है, तो कम से कम दक्षिण पूर्व एशिया के समस्त देश भारत के स्वाभाविक मित्र हो जाएंगे।

यह ध्यान देने लायक तथ्य है कि विगत लगभग छः दशकों से कश्मीर हिंसा व आतंक की चपेट में है, लेकिन वहां आज तक मुस्लिम-बौद्ध दंगे सुनने में नहीं आए, जबकि कश्मीर के लद्दाख की पहचान ही बौद्धों के कारण है, यानी मुस्लिमों के मन में भी बौद्धों के लिए द्वेष नहीं है। यदि भारत की धार्मिक पहचान बुद्ध हों, तो पाकिस्तान-बांग्लादेश भी भारत के स्वाभाविक मित्र होंगे। पाकिस्तान में तक्षशिला विश्वविद्यालय के अवशेष संरक्षित हैं, अफगानिस्तान के संग्रहालय बुद्ध की मूर्तियों से भरे पड़े हैं। चीन की राजनैतिक पहचान आज भले ही कम्युनिस्ट देश के रूप में हो, लेकिन सांस्कृतिक रूप से वह भी बौद्ध देश है।

यदि भारत अपनी बौद्ध संस्कृति को पुनर्जाग्रत करता है, तो पड़ोसी देशों के साथ तनावपूर्ण संबंध स्वतः ही मैत्रीपूर्ण हो जाएंगे, भारत की सीमाएं सुरक्षित हो जाएंगी, आज की सबसे विकराल समस्या आतंकवाद से निजात मिल जाएगी और पूरे विश्व से ना सही, लेकिन कम से कम दक्षिण पूर्व एशिया के बौद्ध देशों यथा कोरिया, ताइवान, सिंगापुर जापान, वियतनाम, म्यानमार, थाईलैंड इत्यादि के साथ भारत का मित्र राष्ट्रों का एक समूह तैयार हो जाएगा।

संवैधानिक आदर्श और सामाजिक व्यवहार के अंतर की खाई जितनी पटेगी, उसी अनुपात में देश अधिकाधिक सशक्त व समृद्ध होगा।

इस खाई को पाटने की जिम्मेदारी सब की है, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनकी है, जो सामाजिक विभेद के सबसे बड़े शिकार हैं, सर्वाधिक पीड़ित हैं, आहत हैं, अपमानित हैं। उन पीड़ितों को बोधिसत्व बाबा साहब ने समस्या का समाधान दिया है- बुद्ध धम्म। जिम्मेदारी उनकी है, जो स्वयं को बौद्ध कहते हैं, जो स्वयं को बोधिसत्व बाबा साहब द्वारा प्रदर्शित बुद्ध धम्म का अनुयाई कहते हैं।

मुझसे यदि बुद्ध धम्म को एक पंक्ति में परिभाषित करने को कहा जाए, तो कहना चाहूंगा- मन के सकारात्मक परिवर्तन के विज्ञान का नाम बुद्ध धम्म है। धम्मपद की पहली ही गाथा है:

मनो पुब्बंगमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया- मन समस्त धर्मों का नायक है, सारी सृष्टि मनोमय है।

एक समय था जब परिभाषा थी कि, जो भगवान को नहीं मानता वह नास्तिक है, लेकिन अब परिभाषा है, जो विज्ञान को नहीं मानता, वह नास्तिक है। बौद्धों के लिए विज्ञान ही भगवान है। अभी प्रश्न यह है कि जो स्वयं को बौद्ध कहते हैं, नवबौद्ध कहते हैं, वे स्वयं बुद्ध के द्वारा उपद्दिष्ट इन सात नियमों का कितना पालन करते हैं? बार-बार एकत्रित होकर सभाएं करते हैं? नवबौद्ध बाबा साहब की जयंती और अब कुछ लोग बुद्ध जयंती पर एकत्रित होते हैं। साल के 365 दिनों में 363 दिन स्वयं को बौद्ध कहने वाले यह लोग धम्मकार्य के लिए एकत्रित नहीं होते, तो फिर धम्म का उत्थान कैसे होगा?

कहते हैं संसार में बुराइयां बुरे लोगों के सक्रिय होने से नहीं, बल्कि अच्छे लोगों के निष्क्रिय रहने से है और अच्छे लोग निष्क्रिय क्यों रहते हैं, क्योंकि सक्रिय होने से परेशानी होती है।

धम्म के उत्थान के लिए सक्रिय बौद्ध होने की आवश्यकता है। निष्क्रिय बौद्धों ने बुद्ध धम्म को आलोचना का धम्म बना दिया है, बस आलोचना करना ही बुद्ध धम्म की परिभाषा हो गई है।

हमें स्वीकार होगा, स्वयं को नवबौद्ध कहने वाले लोग सक्रिय नहीं हैं, निष्क्रिय रहते हैं। बार-बार एकत्रित नहीं होते। नवबौद्धों का एक भी ऐसा बुद्ध विहार नहीं जहां प्रति सप्ताह लोग धम्मानुराग से एकत्रित होते हों। मुस्लिम समाज, जैन समाज, सिक्ख समाज अल्पसंख्या में होते हुए भी सशक्त हैं, क्योंकि जाने-अनजाने वे बुद्ध के एक नियम का नियमित पालन कर रहे हैं, बार-बार एकत्रित होना और बौद्ध समाज स्वयं को बौद्ध अनुयाई कहते हुए भी बुद्ध की देशनाओं का अनुपालन नहीं कर रहा है। पहली बात हमें स्वीकारनी होगी कि हम बार-बार एकत्रित नहीं होते और दूसरी बात कि एकत्रित होते हैं, तो विवाद करते हैं, बैठकें मैत्रीपूर्ण नहीं होती।

मैंने बुद्ध विहारों में लोगों को विवाद करते देखा है, फिर धम्म की स्थापना कैसे होगी? दोष उनका नहीं जिनकी हम आलोचना कर रहे हैं, दोष उनका है, जो स्वयं का अवलोकन नहीं कर रहे हैं। हमें अपने विहारों को त्रिरत्नों का पावन केन्द्र बनाना होगा। मुझे आज तक भारत के नवबौद्धों का एक भी विहार सुनिर्मित या पूर्णनिर्मित नहीं दिखा, सब आधे-अधूरे निर्मित, खंडहर अवस्था में हैं। हां, महाराष्ट्र में कुछ विहारों को बड़ी सुंदर अवस्था में देखा है।

यदि विहारों में नियमित धम्म की गतिविधियां हों, उपासक-उपासिकाएं नियमित आएं, धम्म ग्रंथों का सामूहिक पाठ हो, साप्ताहिक धम्म देशना हो, तो विहार अपने आप बनते चले जाएंगे। ‘विहार’ शब्द का अर्थ ही होता है- आहार और उपरांत विहार अर्थात गति या चारिका। तात्पर्य यह के विहार धम्म की गतिविधियों के केंद्र होने चाहिए। गति नहीं, तो ईटों की दीवारों से घिरे परिसर को विहार कहना सार्थक नहीं।

हमें साप्ताहिक-मासिक धम्म वर्ग शुरू करने होंगे। एकत्रित होकर सामूहिक रूप से धम्म का अभ्यास, धम्म ग्रंथों का पाठ-वाचन करना होगा, कम से कम आनापानसति और मैत्री भावना ध्यानों का अभ्यास करना होगा, क्योंकि मन को परिवर्तित करने का सशक्ततम साधन ध्यान है।

धम्म प्रचार सिर्फ ज्ञान के प्रताप से संभव नहीं है। धम्म की स्थापना के लिए चाहिए ध्यान का प्रताप, शील का प्रताप। इसके साथ ज्ञान का प्रताप भी है, तो सोने पर सुहागा। ध्यान व शील का प्रताप अभ्यास से आएगा, सिर्फ अध्ययन से नहीं।

(पालि पाठ संस्था मुंबई के तत्वधान में तक्षशिला महाविद्यालय, उल्हासनगर, महाराष्ट्र में सितंबर, 2011 में दिया गया व्याख्यान। यह व्याख्यान “मैत्री सम्पूर्ण धम्म है”, ग्रन्थ में संकलित है।)

गौतम बुद्ध ने कहा है “जैसे पूरी धरती को समतल नहीं किया जा सकता वैसे ही सबको एकमत नहीं किया जा सकता”,अलग अलग तरीके के लोगों में मैत्री ही सम्पूर्ण धम्म है…Rajesh Chandra

।।लोकगुरू बुद्ध की पहली सद्घोषणा।।
-राजेश चन्द्रा-

सिद्धार्थ गौतम जब अपनी साधना के अंतिम चरण में थे तो निरंजना नदी के तट पर पीपल के पेड़ के नीचे पेड़ से अपनी पीठ लगाए अधलेटी-अधबैठी मुद्रा में चिंतन कर रहे थे- मैं जिस लक्ष्य की खोज में हूँ कहीं ऐसा तो नहीं कि वह लक्ष्य अस्तित्व में ही नहीं है या ऐसा तो नहीं कि मेरा मार्ग गलत है, मेरी तलाश व्यर्थ की तो नहीं?…

क्यों कि साधना-तपस्या करते हुए उन्हें छः साल बीत चुके थे और अभी तक उन्हें कुछ भी अर्थपूर्ण उपलब्ध नहीं हुआ था।

कुछ ऐसी ही चिंतन धारा और चिन्ताधारा एक साथ चल रही थी कि इसी बीच उस पेड़ के नीचे से एक संगीतज्ञ और उसका शिष्य आपस में बातें करते हुए जा रहे थे। संगीतज्ञ अपने शिष्य को समझा रहा था कि वीणा की तारों को इतना कसना नहीं चाहिए कि वो टूट जाएँ और उन्हें इतना ढीला भी नहीं रहने देना चाहिए कि वह बेसुरी हो जाए। सुमधुर संगीत के लिए वीणा के तारों का मध्यम कसाव पर होना जरूरी है…

बस इतना-सा संवाद सिद्धार्थ गौतम के कानों में पड़ा और मन में जैसे रोशनी-सी कौंध पड़ी- जीवन वीणा की तारों को इतना कसना नहीं चाहिए कि वो टूट जाएँ और उन्हें इतना ढीला भी न छोड़ना चाहिए कि वह बेसुरी हो जाए। जीवन के सुमधुर संगीत के लिए मध्यम मार्ग चाहिए।

उस दिन से भावी बुद्ध ने शरीरपीड़न तप त्याग कर थोड़ा भोजन स्वीकार किया, ऐतिहासिक रूप से कहें तो, सुजाता की खीर, और उनचासवें दिन वे बुद्धत्व को उपलब्ध हो गये। फिर जब उन्होंने अपनी उपलब्धि की पहली घोषणा की, सारनाथ में, जिसे बौद्ध इतिहास में धम्म चक्र प्रवर्तन कहते हैं, तो उन्होंने कहा:

मज्झिमा पटिपदा तथागतेन अभिसम्बुद्धा

– तथागत ने मध्यम मार्ग खोज निकाला है।

यह सद्घोषणा भगवान बुद्ध ने जिस दिन की उस दिन आषाढ़ पूर्णिमा थी जिसे आज गुरू पूर्णिमा कहते हैं। दरअसल उस दिन ज्ञात इतिहास में पहली गरू-शिष्य की परम्परा की स्थापना हुई। भगवान बुद्ध ने पांच परिव्राजकों- कौण्डिण्य, वप्प, भद्दिय, अस्सजि व महानाम- को दीक्षा दी दी, उन्हें ही बौद्ध इतिहास में पंचवर्गीय भिक्खु कहते हैं।

यह धर्म की पहली सद्घोषणा है- मध्यम मार्ग- वीणा के संगीत की तरह।

धर्म संगीत की तरह होता है जो सबके लिए है, सबको आनन्दित करता है, सबके लिए सुखद होता है। अब तो विज्ञान सिद्ध कर रहा है कि पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं पर भी संगीत का सकारात्मक प्रभाव होता है। धर्म संगीत की तरह होता है जिसके सम्पर्क में आकर अपने आप पैर थिरकने लगते हैं, गर्दन झूमने लगती है, लेकिन अगर धर्म हिंसा और उन्माद की भाषा बोलने लगे तो समझ लीजिए कि धर्म की वीणा के तार या तो ढीले हो गए हैं या फिर तार टूट गये हैं। यदि धर्म के नाम पर आतंकवाद फैलने लगे तो सुनिश्चित समझिये कि वीणा के तार टूट गये हैं या तार ढीले पड़ गये हैं। यदि छुआ-छूत, ऊँच-नीच, वर्णवाद-नस्लवाद को धर्म बताया जाने लगे तो मान लीजिये कि धर्म के तार टूट चुके हैं या ढीले हो गए हैं। धर्म संगीत की तरह होता है, सबके लिए सुखद होता है, आनन्दकारी होता है।

संसार के ज्यादातर धार्मिक विवादों का मुख्य कारण जानते हैं क्या है? ईसाइयों के लिए जीसस से बड़ा धर्मपुरुष नहीं है, लेकिन जीसस ने सारी धरती के लोगों को ईसाई नहीं बनाया, लेकिन सारे ईसाई इसी कोशिश में हैं कि पूरी दुनिया ईसाई हो जाए। मुस्लिमों के लिए हज़रत मुहम्मद से बड़ी रूहानी शख्सियत दूसरी नहीं है, उन्होंने भी सारी धरती के लोगों को मुस्लिम नहीं बनाया लेकिन सारे मुस्लिम इसी कोशिश में हैं कि पूरी दुनिया मुस्लिम हो जाए, भगवान बुद्ध ने सबको बौद्ध नहीं बना दिया लेकिन बौद्ध निरन्तर इस प्रयास में हैं कि सबके सब बौद्ध हो जाएं, भगवान महावीर ने सबको जैन नहीं बना दिया लेकिन जैनी भरसक प्रयासरत हैं कि अधिकाधिक जैन धर्मानुयायी हो जाएं, नानक ने सबको सिक्ख नहीं बना दिया लेकिन सिक्खों का पूरा प्रयास है कि सबके सब सिक्ख हो जाएं…

भगवान के ही वचन हैं- जैसे पूरी धरती को समतल नहीं किया जा सकता वैसे ही सबको एकमत नहीं किया जा सकता…

लगभग सभी धर्मानुयायी असम्भव को सम्भव करने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं लेकिन सहज सम्भव से मुख मोड़ रहे हैं। सबको एकमत करना असम्भव है लेकिन सबको प्रेम करना, सबका आदर करना, सबसे मैत्री करना सहज सम्भव है…

भगवान और उनके निकटतम शिष्य आनन्द के बीच एक बड़ा प्यारा संवाद है।

एकबार भगवान बुद्ध के सबसे निकटतम शिष्य आनन्द ने कहा- भगवान, आप बार-बार मैत्री की बात करते हैं, मुझे तो ऐसा लगता है कि सम्पूर्ण धम्म में आधा धम्म तो मैत्री ही है…

भगवान ने कहा- आनन्द, ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो…आनन्द, मैत्री आधा धम्म नहीं है, मैत्री सम्पूर्ण धम्म है…

समय की ज़रूरत यह है कि हम सारे उपसर्ग, प्रिफिक्स, हटा दें- हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, ईसाई धर्म, सिक्ख धर्म, बौद्ध धर्म… सब उपसर्ग हटा दीजिए, क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम, सिक्ख या ईसाई, जैन या बौद्ध…सिर्फ धर्म रहने दीजिए। धर्म क्या है?

मैत्री सम्पूर्ण धम्म है…

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है,आज के दिन ही तथागत बुद्ध ने सारनाथ (इसि पत्तन मृगदाव), वाराणसी में बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय का प्रथम उपदेश पञ्चवर्गीय भिक्खुओं को दिया और इस प्रकार आज के दिन ही भिक्खु संघ की स्थापना हुई…D***T Dastak

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है. बोधिसत्व राजकुमार सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में इसी दिन अपना गृह त्याग किया था और सत्य की खोज में निकल पड़े थे. 6 साल की कठिन तपस्या के बाद उनको वैसाख पूर्णिमा के दिन ज्ञान प्राप्त हुआ. 49 दिनों तक निर्वाण सुख में डूबे रहने के बाद सिद्धार्थ गौतम ने यह तय किया कि उन्होंने जो ज्ञान हासिल किया है, उसे लोगों तक पहुंचाना है. लोगों को धम्म सिखाना है.

भगवान बुद्ध महाकारुणिक थे और करुणा से ओत प्रोत होकर उन्होंने निर्णय लिया कि सबसे पहले मुझे अपने पुराने साथियों को उपदेश देना है. इसके बाद वह बोधगया से निकल कर सारनाथ के ऋषिपत्तन मृगदाय वन में पहुंचे जहां उनके पांच पुराने साथी थे, जिन्होंने लगभग छह वर्षों तक उनके साथ कठोर तप किया था और उस दौरान बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम की सेवा करते थे.

हालांकि तथागत बुद्ध उन पांचों को नहीं भूले थे. वैसाख पूर्णिमा को ज्ञान प्राप्ति के बाद और निर्वाण सुख पूरा करने के बाद 11 दिनों में लगातार पैदल चल कर वह वाराणसी के ऋषिपत्तन मृगदाय वन में पहुंचे. और अपने पुराने पांचों साथियों को धम्म उपदेश दिया. तथागत बुद्ध का उपदेश प्राप्त करने के बाद वो पांचों शिष्य अर्हत हो गए. वहीं ऋषिपत्तन मृगदाय वन में वह बुद्ध की सेवा करने लगे. इसी वन में तथागत बुद्ध ने अपने पांचों शिष्यों के साथ अपना पहला वर्षावास किया.

यहीं पर वाराणसी के बहुत बड़े व्यापारी का पुत्र यशकुलपुत्त भी बुद्ध से प्रभावित होकर उनका शिष्य बन गया. यशकुलपुत्त के चार अन्य धनाढ्यों ने जब यह सुना कि हमारा मित्र बुद्ध के शरणागत हो गया है तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि वहां कोई बड़े व्यवसायिक गतिविधि को अंजाम दे रहा है? यदि हम वहां नहीं गए तो हम पीछे रह जाएंगे. तब वो चारो मित्र भी वहां पहुंचें, और बुद्ध का उपदेश सुनने के बाद वे भी प्रव्रजित हो गए यानि बुद्ध के शिष्य बन गए. यहीं पर इनके पचास अन्य मित्र भी आएं और बुद्ध का उपदेश सुनने के बाद भिक्षु बन गए.

इस वर्षावास के समाप्ति पर जब बुद्ध के ये साठों शिष्य अर्हत हो गए तब बुद्ध ने उन्हें बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उपदेश दिया. जिस दिन तथागत बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे धम्म चक्क पवत्तन सुत्त कहते हैं. चूंकि भगवान बुद्ध गुरुओं के भी गुरु थे, इसलिए हमारे देश में इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. पूर्णिमा का दिन भगवान बुद्ध के जीवन में विशेष महत्व रखता है.

http://www.dalitdastak.com/dhammchakra-pravaratn-divas-tathagat-bauddh/

भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे और उसमे अशोक चक्र मतलब और डॉ आंबेडकर कनेक्शन….Ramvir Singh

” अशोक चक्र ” के लिए बाबासाहब ने बहुत Struggle किया है। .. ” अशोक चक्र ” का जब issue उठा तब पूरी Parliament में हंगामा शुरू था। .. पूरी Parliament दनदना गयी थी।..

पहले राष्ट्रध्वज का कलर बनाने के लिए बाबासाहब ने ” पेंगाली वेंकैय्या ” को चुना था। …पेंगाली वेंकैय्या को कलर के बारे में जनाकारी थी। … उनका संवैधानिक चयन बाबासाहब ने किया था। ,.. पेंगाली वेंकैय्या ने ध्वज का कलर तो बनाया लेकिन वो कलर ऊपर निचे थे … मतलब सफ़ेद रंग सबके ऊपर , फिर ऑरेंज और फिर हरा। …

बाबासाहब ने सोचा , अगर अशोक चक्र हम रखे तो वो नीले रंग में होना चाहिए , और झंडे के बिच में होना चाहिए … ऑरेंज रंग पे ” अशोक चक्र ” इतना खुल के नहीं दिखेगा। … बाबासाहब ने सोचा , अगर सफ़ेद रंग को बिच में रखा जाए जो की शांति का प्रतिक है , उसपर अशोक चक्र खुल के भी दिखेगा। .. और शांति के प्रतिक सफ़ेद रंग पे बुद्ध के शांति सन्देश का अशोक चक्र उसका मतलब बहुत गहरा होगा। … इसलिए बाबासाहब ने वो कलर ठीक से सेट किये। .. और सफ़ेद रंग बिच में रखा ताकि उसके ऊपर ” अशोक चक्र रखा जाए। ,…

दूसरी तरह से वो रंग गाँधी के कांग्रेस पार्टी के झंडे के कलर हो जाते है। … बाबासाहब ने जब अशोक चक्र का issue पार्लियामेंट में उठाया तब सबने विरोध किया था। .. गाँधी नेहरू का कहना था के झंडे पर गाँधी का चरखा रखा जाए जो की कांग्रेस पार्टी का सिम्बोल था। …. बाबासाहब अकेले दीवार की तरह खड़े थे। … बाबासाहब बोले थे, जब तक अशोक चक्र झंडे पर नहीं रखा जाएगा तब तक उस झंडे को ” संवैधानिक राष्ट्रध्वज” मैं संविधान में नहीं लिखूंगा ….

बाबासाहब जिद पे अड़े थे …. बाबासाहब ने बहुत भयंकर – भयंकर explanation दिए। … किसीको विरोध करने के लिए मुँह नहीं बचा … आखिर बाबासाहब की वजह से Parliament में ” अशोक चक्र ” का issue बहुमतों से पारित हुआ.. और ” अशोक चक्र ” को कबुल किया गया ।

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’, इसमें सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफ़ेद व सबसे नीचे हरा रंग है। सभी रंग बराबर अनुपात में हैं। सफ़ेद रंग की पट्टी पर झंडे के मध्य में नीले रंग का चक्र है

केसरिया रंग देश की ताकत एवं साहस का परिचायक है। बीच में सफ़ेद रंग की पट्टी शांति एवं सत्यता को दर्शाती है। हरे रंग की पट्टी धरती की उर्वरता, विकास एवं पवित्रता की परिचायक है। चक्र इस बात को दर्शित करता है कि जीवन गतिमान है जबकि मृत्यु निश्चलता का नाम है। झंडे की लंबाई व चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। चक्र का व्यास सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के लगभग बराबर होता है।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को भारत की संविधानकारी सभा द्वारा 22 जुलाई 1947 को अंगीकृत किया गया था।

अशोक चक्र को कर्तव्य का पहिया भी कहा जाता है । ये 24 तीलियाँ मनुष्य के 24 गुणों को दर्शाती हैं । दूसरे शब्दों में इन्हें मनुष्य के लिए बनाए गए 24 धर्म मार्ग भी कहा जा सकता है, जो किसी भी देश को उन्नति के पथ पर पहुंचा सकते हैं। इसी कारण हमारे राष्ट्र ध्वज के निर्माताओं ने जब इसका अंतिम रूप फाइनल किया तो उन्होंने झंडे के बीच से चरखे को हटाकर इस अशोक चक्र को रखा ।यह चक्र “धम्म चक्र” का प्रतीक है।

अशोक चक्र में दी गयी सभी 24 तीलियों का मतलब (चक्र के क्रमानुसार) जानते हैं –

1. पहली तीली :- संयम (संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देती है)
2. दूसरी तीली :- आरोग्य (निरोगी जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है)
3. तीसरी तीली :- शांति (देश में शांति व्यवस्था कायम रखने की सलाह)
4. चौथी तीली :- त्याग (देश एवं समाज के लिए त्याग की भावना का विकास)
5. पांचवीं तीली :- शील (व्यक्तिगत स्वभाव में शीलता की शिक्षा)
6. छठवीं तीली :- सेवा (देश एवं समाज की सेवा की शिक्षा)
7. सातवीं तीली :- क्षमा (मनुष्य एवं प्राणियों के प्रति क्षमा की भावना)
8. आठवीं तीली :- प्रेम (देश एवं समाज के प्रति प्रेम की भावना)
9. नौवीं तीली :- मैत्री (समाज में मैत्री की भावना)
10. दसवीं तीली :- बन्धुत्व (देश प्रेम एवं बंधुत्व को बढ़ावा देना)
11. ग्यारहवीं तीली :- संगठन (राष्ट्र की एकता और अखंडता को मजबूत रखना)
12. बारहवीं तीली :- कल्याण (देश व समाज के लिये कल्याणकारी कार्यों में भाग लेना)
13. तेरहवीं तीली :- समृद्धि (देश एवं समाज की समृद्धि में योगदान देना)
14. चौदहवीं तीली :- उद्योग (देश की औद्योगिक प्रगति में सहायता करना)
15. पंद्रहवीं तीली :- सुरक्षा (देश की सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहना)
16. सौलहवीं तीली :- नियम (निजी जिंदगी में नियम संयम से बर्ताव करना)
17. सत्रहवीं तीली :- समता (समता मूलक समाज की स्थापना करना)
18. अठारहवी तीली :- अर्थ (धन का सदुपयोग करना)
19. उन्नीसवीं तीली :- नीति (देश की नीति के प्रति निष्ठा रखना)
20. बीसवीं तीली :- न्याय (सभी के लिए न्याय की बात करना)
21. इक्कीसवीं तीली :- सहयोग (आपस में मिलजुल कार्य करना)
22. बाईसवीं तीली :- कर्तव्य (अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना)
23. तेईसवी तीली :- अधिकार (अधिकारों का दुरूपयोग न करना)
24. चौबीसवीं तीली :- बुद्धिमत्ता (देश की समृधि के लिए स्वयं का बौद्धिक विकास करना)

सभी तीलियाँ सम्मिलित रूप से देश और समाज के चहुमुखी विकास की बात करती हैं। ये तीलियाँ सभी देशवासियों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में स्पष्ट सन्देश देने के साथ साथ यह भी बतातीं हैं कि हमें रंग, रूप, जाति और धर्म के अंतरों को भुलाकर पूरे देश को एकता के धागे में पिरोकर समृद्धि के शिखर तक ले जाने के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए ।

 

संवेधानिक आरक्षण तो पिछले कुछ सालों से है इतनी सदियों ये धार्मिक आरक्षण वाले करते क्या रहे,जिन लोगों ने बुद्धि का ठेका ले रखा था उन्होंने अपनी बुद्धि ‘वाशिंग मशीन’ बनाने की बजाये ‘धोबी’ बनाने में चलाई | दिलीप की मंडल की फेसबुक पोस्ट

मोबाइल ऐप छोड़िए. यूरोप में साइंटिफिक रिवोल्यूशन शुरू होता है 1550 के आसपास. तब से लेकर संविधान लागू होने तक यानी 1950 तक भारत में कोई आरक्षण नहीं था,तब तक दुनिया में बड़े-बड़े आविष्कार हुए, भारत में कितने हुए?

भारत में एक जाति के पास पढ़ने-लिखने-ज्ञान पाने का एकाधिकार था. सिर्फ उन्हीं के लिए गुरुकुल वगैरह थे. हालांकि अंग्रेजों के आने के बाद शिक्षा के कुछ द्वार अन्य जातियों के लिए भी खुले. फिर भी वर्चस्व तो ब्राह्मणों का कायम रहा.

इस दौरान उनके द्वारा किए गए एक आविष्कार का नाम बताइए.

अपने इस्तेमाल में आने वाली एक मशीन का नाम बताइए, जिसका आविष्कार इन विश्वगुरुओं ने किया हो. किचन देखिए. अपने कमरे में देखिए.

कोई एक मशीन. कोई एक उपकरण, एक खोज, जिससे जिंदगी आसान हुई हो, उम्र लंबी हुई हो.

बताइए.

क्या आपके रसोई घर में कोई भी उपकरण है, जिसका आविष्कार भारत में हुआ है? – गैस, लाइटर, एक्जॉस्ट फैन, कुकर, माइक्रोवेव, ओटीजी, मिक्सर-ग्राइंडर, वाटर प्यूरीफायर, बल्व, इलेक्ट्रिक चिमनी? औरतों को गुरुकूल से दूर रखने से यही होगा. जिसकी समस्याएं थीं, उनकी ज्ञान तक पहुंच ही नहीं थी. आविष्कार निठल्ले तो करेंगे नहीं. उनको कोई समस्या ही नहीं थी.

अपने इस्तेमाल में आने वाली एक मशीन का नाम बताइए, जिसका आविष्कार इन विश्वगुरुओं ने किया हो. किचन देखिए. अपने कमरे में देखिए. कोई एक मशीन. कोई एक उपकरण, एक खोज, जिससे जिंदगी आसान हुई हो, उम्र लंबी हुई हो.

बताइए. क्या बनाया इन लोगों ने?

दुनिया बदलने वाले आविष्कार किन लोगों ने किए.

ताला बनाने वाले पीटर हैनलीन ने घड़ी बनाई.
वर्कशॉप में काम करने वाले जेम्स वाट ने भाप का इंजन बनाया.
सुनार रुंटजेन ने प्रिंटिंग प्रेस बनाया.

ज्ञान और श्रम के मिलन से आविष्कार हुए.

भारत में जन्मजात ज्ञान वाले सबके सिर पर बैठ गए और श्रम करने वाले नीच मान लिए गए. दोनों का मेल कभी हुआ ही नहीं. ज्ञानी निठल्ला था और श्रमिक को ज्ञानी माना नहीं गया.

तो आविष्कार होता कैसे?

आविष्कार श्रम को आसान बनाने के लिए होते हैं. श्रम न करने वाले आविष्कार नहीं कर सकते.

जहां कहार नाम की जाति हो वहां कार का आविष्कार नहीं हो सकता. धोबी नाम की जाति हो वहां, वाशिंग मशीन का आविष्कार नहीं हो सकता.

जाति व्यवस्था में सस्ता श्रम उपलब्ध था.

मशीन बनाने की जरूरत किसे थी? जिसे श्रम को आसान बनाने की जरूरत थी, उसे ज्ञान से वंचित रखना धार्मिक कर्तव्य था.

धार्मिक ठेकेदार ‘सूर्ये ग्रहण’ जैसे प्राकृतिक घटना को भी धार्मिक कर्मकांडी और अंधविश्वासी माध्यम बनाकर लोगों को ठगते हैं ,जबकि हमें वैज्ञानकि नजरिये से इसे देखने और अपना भविष्ये सुधार की सोचना चाहिए —शकील प्रेम

संविधान के मूल कर्तव्य “वैज्ञानिक सोच विकसित करना” के खिलाफ जाकर मीडिया के सहारे धार्मिक लोग सूर्ये ग्रहण जैसे प्राकृतिक घटना को भी धार्मिक कर्मकांडी और अंधविश्वासी माध्यम बनाकर लोगों को ठगते हैं। ये लोग हर प्राकृतिक घटना को भी धर्म के रूप में देखते हैं जबकि वास्तविकता ये है कि इनका किसी भी धर्म से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, ये विशुद्ध प्रकिर्तिक घटना है जिसका हमारे जीवन पर जो भी असर हो पर वैसा बिलकुल नहीं होता जिसका मीडिया में बैठे धर्म के ठेकेदार बताते है।

आइये इसी विषय पर पढ़ते हैं शकील प्रेम जी के विचार

 

पिछले 5 अरब वर्षों से लगातार जल रहे सूरज पर कभी कोई ग्रहण नही लगता जिसे हम सूर्यग्रहण कहते हैं वो हमारे चंदू मामा की शरारत होती है.

जब हम गर्मियों में धूप से बचने के लिए छाते का उपयोग करते हैं तब हमारे और सूर्य अंकल के बीच छाता होता है जो हम तक सूर्य अंकल के फोटोन को पहुंचने से रोक देता है यह भी एक तरह का ग्रहण ही होता है.

चंदू मामा के आंगन से भी सूर्य ग्रहण दिखाई देता है उसमें शरारत हमारी धरती माँ की होती है कभी कभी चाँद मामा और सूरज अंकल के बीच पृथ्वी माँ आ जाती है जिसे हम चंद्रग्रहण कहते हैं.

ग्रहों उपग्रहों और सितारों का यह सब खेल ग्रेविटी अंटी के चक्कर मे होता है जो दिखाई तो नही देती लेकिन यूनिवर्स के आंगन में फैले तमाम तत्वों को अपने इशारों पर नचाती है ग्रेविटी अंटी दिखती नही लेकिन जहां “तत्व” ताऊ होते हैं वहां ग्रेविटी अंटी भी होती हैं.

सूरज अंकल के द्वारा हमे निरंतर मुफ्त में फोटोन मिलता हैं जिससे हमें ऊर्जा मिलती है धूप और धूप से चलने वाले सौर ऊर्जा संयंत्रों से प्राप्त ऊर्जा के अलावा आज हम और जितने भी ऊर्जा स्रोत का इस्तेमाल करते हैं वो सब सूर्य अंकल की ही देन है जहां सूर्य अंकल के टॉर्च की रोशनी नही पहुंच पाती वहां तापमान माईनस में होता है और इक्वेटर पर उनके टॉर्च की रोशनी एकदम सीधी पड़ती है तो वहां तापमान कभी कभी 50 डिग्री के पार तक चला जाता है धरती पर कई ऐसे इलाके हैं जिनसे सूर्य अंकल हमेशा नाराज रहते हैं इसलिए वहां के लोगों की सबसे बड़ी प्राथमिकता सूर्य अंकल के प्रकोप से जूझने की होती है.

दुनिया के कई देश सीधे मध्यांतर रेखा पर पड़ते हैं जहां प्रचंड गर्मी पड़ती है करोड़ों लोग सूखे का शिकार होते हैं लाखों भूख से जूझते हैं और हजारों लू लगने से मरते हैं इसी तरह दुनिया के कई देश ऐसे भी हैं जहां लोग भयंकर ठंड का सामना करते हैं रूस ग्रीस आइसलैंड साइबेरिया ग्रीन लैंड जहां तापमान माईनस 50 डिग्री तक पहुंच जाता है दिन रात भयंकर ठंड से या भयंकर गर्मी से जूझने वाले लोगों को धर्म के नाम पर लड़ने की फुर्सत नही मिलती.

सूर्यग्रहण के अवसर पर हमें सूर्य के इसी महत्व को समझने की जरूरत है हमारे यहां भी भयंकर सूखा पड़ता है हर साल करोड़ों लोग सूखे से लड़ते हैं देश के कई इलाके पीने के पानी को तरसते हैं लू लगने से लोग मरते हैं हर साल बाढ़ से लोग मरते हैं विस्थापित होते हैं सर्दी में लोग ठंड से मरते हैं लेकिन हम कभी भी इन बुनियादी समस्यायों पर ध्यान नही देते क्योंकि हम धार्मिक लोग हैं इसलिए प्रकृति की निष्ठुरता से जूझने के साथ हम धर्म के नाम पर भी दिन रात लड़ते हैं.

130 करोड़ की आबादी वाले देश की पहली प्राथमिकता मंदिर मस्जिद धर्म ईश्वर है प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल कैसे हो ? इस पर कोई बात नही करता.

सौर ऊर्जा के क्षेत्र में हम कैसे आत्मनिर्भर हो ?

बाढ़ और सूखा इन दोनों समस्यायों का समाधान दोनों के सही प्रबंधन से क्यों नही किया जा सकता ? दुनिया मे जहां भयंकर सूखा पड़ता है वहां बाढ़ नही आती और जहां बढ़ आती है वहां सूखा नही पड़ता लेकिन हमारे यहां भयंकर सूखा पड़ता है तो भयंकर बाढ़ भी आती है अगर दोनों का आपस मे सामंजस्य बिठा दिया जाए तो दोनों समस्याएं एक दूसरे को खत्म कर सकती हैं.

याद रखिये की सूर्य अंकल की कृपा हमेशा के लिए नही है ग्लोबल वार्मिंग से नाराज सूर्य अंकल लगातार धरती का तापमान बढ़ा रहे हैं जिसकी वजह से प्रचंड गर्मी का दौर आने वाला है ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे नदियां सूखेंगी भूजल खत्म होगा फसलों की पैदावार में भारी गिरावट होगी जिससे भुखमरी के भयंकर हालात पैदा हो जाएंगे.

ऐसे में अमीर लोग अपने बड़े बैंक बैलेंस और छोटे से परिवार को साथ लेकर यहां से खिसक लेंगे और सूर्य अंकल की नाराजगी का सारा गुस्सा गरीबों को भुगतना पड़ेगा तब कोई अल्लाह ईश्वर गॉड या धर्म काम नही आएगा इसलिए आज हमें समझना होगा कि हमारी प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए ? ईश्वर अल्लाह गॉड या कुछ और…..

सूर्य ग्रहण के नाम पर ही सही भविष्य के बारे में थोड़ा सा तो सोच लीजिये….

-शकील प्रेम

खबर: यु पि एस सी की परीक्षा दिए बिना ही सयुक्त सचिव के पद भरे जायेंगे लेटरल एंट्री द्वारा| दूसरी खबर है की नाकाम कर्मचारियों की हर महीने लिस्ट बनाकर छटनी होगी

https://indianexpress.com/article/explained/lateral-entry-upsc-ias-bureaucracy-governance-industry-experts-5673305/

 

Click to access Environment-and-Forests_0.pdf

 

Modi govt ready for second round of lateral entry recruitment for 40 posts

 

गौतम बुद्ध और उनके धम्म को समझने का सबसे जरूरी लेख , इसको पढ़े बिना आप बुद्ध धम्म का मर्म नहीं समझ सकते चाहे कितनी ही किताबे पढ़ लो , बुद्ध धम्म की रेडीमेड मैगी है ये “बुद्ध मेरी दृस्टि में ओशो “

 

#hindibuddhism

ओशो ने सभी धर्मों पर बहुत अध्ययन किया गहन और विस्तार से व्याख्यान दिए हैं, धर्मों को खंगालते खंगालते वो बौद्ध धम्म तक पहुंचे और फिर बौद्ध धम्म पर ठहर गए|बौद्ध धम्म किताबों में बंद है आम जनता को उसको समझने के लिए किसी जीवित टीचर या गुरु की जरूरत है जो जनता को उनके स्तर तक आकर समझा सके|इस जरूरत को ओशो के धम्म पर रिकॉर्डिंग बहुत कमाल की है, उसी में से एक रिकॉर्डिंग पर आधारित है ये लेख|

हमने यूट्यूब पर वो वीडियो भी डाले थे पर भारत में धम्म को न पनपने देने के लिए बहुत बड़ा षडियंत्र चलता है| आपको जानकार हैरानी होगी की बाकि के धर्मों के व्याख्यान यूट्यूब पर हो तो कोई आपत्ति नहीं पर अगर बौद्ध धम्म पर उनका कोई व्याख्यान यूट्यूब पर डाल दे तो तुरंत कॉपीराइट का हवाला देकर उसे हटवा देते हैं|और सबसे बही बात अगर कॉपी राइट है तो खुद अपने नाम से ही डालो वो भी नहीं डालते| बौद्ध धम्म पर उनके भाषणों का लेख और ऑडियो वीडियो अगर कहीं मिले तो उसे तुरंत डाउनलोड कर के रख ले, पता नहीं षडियंत्र करी कब उसे ऑफ लाइन करवा दे|

dhyan do buddh parबुद्ध कहते हैं,

“तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो मानना या न मानना बाद की बात है। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यह तुम्हारी ही अंतर्मन का भवन है।”

 

पहली, गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं, द्रष्टा हैं।:   

दार्शनिक वह, जो सोचे। द्रष्टा वह, जो देखे। सोचने से दृष्टि नहीं मिलती। सोचना अज्ञात का हो भी नहीं सकता। जो ज्ञात नहीं है, उसे हम सोचेंगे भी कैसे? सोचना तो ज्ञात के भीतर ही परिभ्रमण है। सोचना तो ज्ञात की ही धूल में ही लोटना है। सत्य अज्ञात है। ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात है। अंधा लाख सोचे, लाख सिर मारे, तो भी प्रकाश के संबंध में सोचकर क्या जान पाएगा! आंख की चिकित्सा होनी चाहिए। आंख खुली होनी चाहिए। अंधा जब तक द्रष्टा न बनें, तब तक सार हाथ नहीं लगेगा।

तो पहली बात बुद्ध के संबंध में स्मरण रखना, उनका जोर द्रष्टा बनने पर है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। और वे नहीं चाहते कि लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें।
दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकाश की मुफ्त धारणाएं मिल जाएं, तो आंख का महंगा इलाज कौन करे! सस्ते में सिद्धान्त मिल जाएं, तो सत्य को कौन खोजे! मुफ्त, उधार सब उपलब्ध हो, तो आंख की चिकित्सा की पीड़ा से कौन गुजरे! और चिकित्सा कठिन है। और चिकित्सा में पीड़ा भी है।बुद्ध ने बार-बार कहा है कि मैं चिकित्सक हूं। उनके सूत्रों को समझने में इसे याद रखना। बुद्ध किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं।

वे किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं कर रहे हैं। वे केवल उन लोगों को बुला रहे हैं जो अंधे हैं और जिनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। और जब लोग बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने उन्हें कुछ शब्द पकड़ाए, बुद्ध ने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित और इशारा किया। क्योंकि ध्यान से है खुलती आंख, ध्यान से खुलती है भीतर की आंख।विचारों से तो पर्त की पर्त तुम इकट्ठी कर लो, आंख खुली भी हो तो बंद हो जाएगी। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। जितने विचार के पक्षपात गहन हो जाते हैं, उतना ही देखना असंभव हो जाता है। फिर तुम वही देखने लगते हो जो तुम्हारी दृष्टियां होती है। फिर तुम वह नहीं देखते, जो है। जो है, उसे देखना हो तो सब दृष्टियों से मुक्त हो जाना जरूरी है।इस विरोधाभास को खयाल में लेना, दृष्टि पाने के लिए सब दृष्टियांे से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसकी कोई भी दृष्टि नहीं, जिसका कोई दर्शनशास्त्र नहीं, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

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=> दूसरी बात, गौतम बुद्ध पारंपरिक नही, मौलिक हैं।: 

गौतम बुद्ध किसी परंपरा, किसी लीक को नहीं पीटते हैं। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि अतीत के ऋषियों ने ऐसा कहा था, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि वेद में ऐसा लिखा है, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। वे कहते हैं, जब तक तुम न जान लो, मानना मत। उधार श्रद्धा दो कौड़ी की है। विश्वास मत करना, खोजना। अपने जीवन को खोज में लगाना, मानने में जरा भी शक्ति व्यय मत करना। अन्यथा मानने में ही फांसी लग जाएगी। मान-मानकार ही लोग भटक गए हैं।

तो बुद्ध न तो परंपरा की दुहाई देते, न वेद की। न वे कहते हैं कि हम जो कहते हैं, वह ठीक होना ही चाहिए। वे इतना ही कहते हैं, ऐसा मैंने देखा। इसे मानने की जरूरत नहीं है। इसको अगर परिकल्पना की तरह ही स्वीकार कर लो, तो काफी है।परिकल्पना का अर्थ होता है, हाइपोथीसिस। जैसे कि मैंने कहा कि भीतर आओ, भवन में दीया जल रहा है। तो मैं तुमसे कहता हूं कि यह मानने की जरूरत नहीं है कि भवन में दीया जल रहा है। इसको विश्वास करने की जरूरत नहीं। इस पर किसी तरह की श्रद्धा लाने की जरूरत नहीं है। तुम मेरे साथ आओ और दीए को जलता देख लो। दीया जल रहा है तो तुम मानो या न मानो, दीया जल रहा है। और दीया जल रहा है तो तुम मानते हुए आओ कि न मानते हुए आओ, दीया जलता ही रहेगा। तुम्हारे न मानने से दीया बुझेगा नहीं, तुम्हारे मानने से जलेगा नहीं।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यही तुम्हारी ही अंतरात्मा का भवन है। तुम भीतर आओ और दीए को जलता देख लो। देख लो, फिर मानना।
और खयाल रहे जब देख ही लिया तो मानने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। हम जो देख लेते हैं, उसे थोड़े ही मानते हैं। हम तो जो नहीं देखते, उसी को मानते हैं। तुम पत्थर-पहाड़ को तो नहीं मानते, परमात्मा को मानते हो। तुम सूरज-चांद-तारों को तो नहीं मानते, वे तो हैं। तुम स्वर्गलोक, मोक्ष, नर्क को मानते हो। जो नहीं दिखाई पड़ता, उसको हम मानते हैं। जो दिखायी पड़ता है, उसको तो मानने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, उसका यथार्थ तो प्रगट है।
तो बुद्ध कहते हैं, मेरी बात पर भरोसा लाने की जरूरत नहीं, इतना ही काफी है कि तुम मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लो। इतना पर्याप्त है। इसको वैज्ञानिक कहते हैं, हाइपोथीसिस, परिकल्पना। एक वैज्ञानिक कहता है, सौ डिग्री तक पानी गर्म करने से पानी भाप बन जाता है। मानने की कोई जरूरत नहीं, चूल्हा तुम्हारे घर में है, जल उपलब्ध है, आग उपलब्ध है, चढ़ा दो चूल्हे पर जल को, परीक्षण कर लो। परीक्षण करने के लिए जो बात मानी गयी है, वह परिकल्पना। अभी स्वीकार नहीं कर ली है कि यह सत्य है, लेकिन एक आदमी कहता है, शायद सत्य हो, शायद असत्य हो, प्रयोग करके देख लें, प्रयोग ही सिद्ध करेगा-सत्य है या नहीं?
तो बुद्ध पारंपरिक नहीं हैं, मौलिक हैं। विचार की परंपरा होती है, दृष्टि की मौलिकता होती है। विचार अतीत के होते हैं, दृष्टि वर्तमान में होती है। विचार दूसरों के होते हैं, दृष्टि अपनी होती है।

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=> तीसरी बात, गौतम बुद्ध शास्त्रीय नहीं हैं। पंडित नहीं हैं, वैज्ञानिक हैं। :

बुद्ध ने धर्म को पहली दफे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दी। बुद्ध ने धर्म को पहली दफे विज्ञान के सिंहासन पर विराजमान किया। इसके पहले तक धर्म अंधविश्वास था। बुद्ध ने उसे बड़ी गरिमा दी। बुद्ध ने कहा, अंधविश्वास की जरूरत ही नहीं है। धर्म तो जीवन का परम सत्य है। एस धम्मो सनंतनो। यह धर्म तो शाश्वत और सनातन है। तुम जब आंख खोलोगे तब इसे देख लोगे।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा कि नरक के भय के कारण मानो, और यह भी नहीं कहा कि स्वर्ग के लोभ के कारण मानो। और इसलिए यह भी नहीं कहा कि परमात्मा सताएगा अगर न माना, और परमात्मा पुरस्कार देगा अगर माना। नही, ये सब व्यर्थ की बातें बुद्ध ने नहीं कहीं।
बुद्ध ने तो सारसूत्र कहा। बुद्ध ने तो कहा, यह धर्म तुम्हारा स्वभाव है। यह तुम्हारे भीतर बह रहा है, अहर्निश बह रहा है। इसे खोजने के लिए आकाश में आंखें उठाने की जरूरत नहीं है, इसे खोजने के लिए भीतर जरा सी तलाश करने की जरूरत है। यह तुम हो, तुम्हारी नियति है, यह तुम्हारा स्वभाव है। एक क्षण को भी तुमने इसे खोया नहीं, सिर्फ विस्मरण हुआ है।

तो बुद्ध ने चैतन्य की सीढ़ियां कैसे पार की जाएं, मूर्छा से कैसे आदमी अमूर्छा में जाए, बेहोशी कैसे टूटे और होश कैसे जगे, इसका विज्ञान थिर किया। और जो उनके साथ भीतर गए, उन्हें निरपवाद रूप से मान लेना पड़ा कि बुद्ध जो कहते हैं, ठीक कहते हैं।
यह अपूर्व क्रांति थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बुद्ध मील के पत्थर हैं मनुष्य-जाति के इतिहास में। संत तो बहुत हुए, मील के पत्थर बहुत थोड़े लोग होते हैं। महावीर भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि महावीर ने जो कहा, वह तेईस तीर्थंकर पहले कह चुके थे। कृष्ण भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि कृष्ण ने जो कहा, वह उपनिषद और वेद सदा से कहते रहे थे। बुद्ध मील के पत्थर हैं, जैसे लाओत्सू मील का पत्थर है। कभी-कभार, करोड़ों लोगों में एकाध संत होता है, करोड़ों संतों में एकाध मील का पत्थर होता है। मील के पत्थर का अर्थ होता है, उसके बाद फिर मनुष्य-जाति वही नहीं रह जाती। सब बदल जाता है, सब रूपांतरित हो जाता है। एक नयी दृष्टि और एक नया आयाम और एक नया आकाश बुद्ध ने खोल दिया।

इस प्रवचन में ओशो भगवान बुद्ध की विशेषताओं पर प्रकाश डालते है,इस प्रवचन को सुनने के बाद यही प्रतीत होता है की , बुद्ध को अगर कोई ठीक से समझ पाया है तो वोह एक मात्र ओशो है|बुद्ध के साथ धर्म अंधविश्वास न रहा, अंतर्खोज बना। बुद्ध के साथ धर्म ने बड़ी छलांग लगा ली। आस्तिक को ही धर्म में जाने की सुविधा न रही, नास्तिक को भी सुविधा हो गयी। ईश्वर को नहीं मानते, कोई हर्ज नहीं, बुद्ध कहते ही नहीं कि मानना जरूरी है। कुछ भी नहीं मानते, बुद्ध कहते हैं, तो भी कोई चिंता की बात नहीं। कुछ मानने की जरूरत ही नहीं है। बिना कुछ माने अपने भीतर तो जा सकते हो। भीतर जाने के लिए मानने की आवश्यकता क्या है! न तो ईश्वर को मानना है, न आत्मा को मानना है, न स्वर्ग-नर्क को मानना है। इसे तो नास्तिक भी इनकार न कर सकेगा कि मेरा भीतर है। इसे तो नास्तिकों ने भी नहीं कहा है कि भीतर नहीं है। भीतर तो है ही। नास्तिक कहते हैं, यह भीतर शाश्वत नहीं है। बुद्ध कहते हैं, फिकर छोड़ो, पहले यह जितना है उसे जान लो, उसी जानने से अगर शाश्वत का दर्शन हो जाए तो फिर मानने की जरूरत न होगी; तुम मान ही लोगे।
बुद्ध ने नास्तिकों को धार्मिक बनाने का महत कार्य पूरा किया। इसलिए बुद्ध के पास जो लोग आकर्षित हुए, बड़े बुद्धिमान लोग थे। आमतौर से धार्मिक साधु-संतों के पास बुद्धिहीन लोग इकट्ठे होते हैं। जड़, मूर्छित, मुर्दा। बुद्ध ने मनुष्य-जाति की जो श्रेष्ठतम संभावनाएं हैं, उनको आकर्षित किया। बुद्ध के पास नवनीत इकट्ठा हुआ चैतन्य का। ऐसे लोग इकट्ठे हुए जो और किसी तरह तो धर्म को मान ही नहीं सकते थे, उनके पास प्रज्वलित तर्क था। इसलिए बुद्ध दार्शनिक हैं, लेकिन बुद्ध के पास इस देश के सबसे बड़े से बड़े दार्शनिक इकट्ठे हो गए। बुद्ध अकेले एक व्यक्ति के पीछे इतना दर्शनशास्त्र पैदा हुआ, जितना मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी दूसरे व्यक्ति के पीछे नहीं हुआ। और बुद्ध के पीछे इतने महत्वपूर्ण विचारक हुए कि जिनकी तुलना सारी पृथ्वी पर कहीं भी खोजनी मुश्किल है।
कैसे यह घटित हुआ? बुद्ध ने महानास्तिकों को आकर्षित किया। आस्तिक को बुला लेना मंदिर में तो कोई खास बात नहीं, नास्तिक को बुला लेने में कुछ खास बात है। बुद्ध वैज्ञानिक हैं, इसलिए नास्तिक भी उत्सुक हुआ। विज्ञान को तो नास्तिक ठुकरा न सकेगा। बुद्ध ने कहा, संदेह है, चलो, संदेह की ही सीढ़ी बनाएंगे। संदेह से और शुभ क्या हो सकता है! संदेह के पत्थर को लेंगेी बना लेंगेे। संदेह से ही तो खोज होती है। इसलिए संदेह को फेंको मत।
इस बात को समझना। जिसके पास जितनी विराट दृष्टि होती है, उतना ही वह हर चीज का उपयोग कर लेना चाहता है। सिर्फ क्षुद्र दृष्टि के लोग काटते हैं। क्षुद्र दृष्टि का आदमी कहेगा, संदेह नहीं चाहिए, श्रद्धा चाहिए। काटो संदेह को। लेकिन संदेह तुम्हारा जीवंत अंग है, काटोगे तो तुम अपंग हो जाओगे। संदेह का रूपांतरण होना चाहिए, खंडन नहीं। संदेह ही श्रद्धा बन जाए, ऐसी कोई प्रक्रिया होनी चाहिए।
कोई कहता है, काटो कामवासना को। लेकिन काटने से तो तुम अपंग हो जाओगे। कुछ ऐसा होना चाहिए कि कामवासना राम की वासना बन जाए। ऊर्जा का अधोगमन ऊर्ध्वगमन बन जाए। तुम ऊर्ध्वरेतस बन जाओ। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे कंकड़-पत्थर भी हीरों में रूपांतरित हो जाएं। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे जीवन की कीचड़ कमल बन सके।बुद्ध ने वह कीमिया दी।

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= > चौथी बात, गौतम बुद्ध वायवी, एब्सट्रेक्ट नहीं, अत्यंत व्यावहारिक हैं।

ऊंचे से ऊंची छलांग ली है उन्होंने, लेकिन पृथ्वी को कभी नहीं छोड़ा। जड़ें जमीन में जमाए रखीं। वह सिर्फ हवा में ही पंख नहीं मारते रहे।
एक बहुत प्राचीन कथा है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि बनायी और सब चीजें बनायीं, तभी उसने यथार्थ और स्वप्न भी बनाया। बनते ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ और स्वप्न का झगड़ा तो प्राचीन है। पहले दिन ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं; स्वप्न ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं, तुझमे रखा क्या है! झगड़ा यहां तक बढ़ गया कि कौन महत्वपूर्ण है दोनों में कि दोनों झगड़ते हुए ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा हंसे और उन्होंने कहा, ऐसा करो, सिद्ध हो जाएगा प्रयोग से। तुममें से जो भी जमीन पर पैर गड़ाए रहे और आकाश को छूने में समर्थ हो जाए, वही श्रेष्ठ है।
दोनों लग गये। स्वप्न ने तो तत्क्षण आकाश छू लिया, देर न लगी, लेकिन पैर उसके जमीन तक न पहुंच सके। टंग गया आकाश में। हाथ तो लग गए आकाश से, लेकिन पैर जमीन से न लगे-स्वप्न के पैर होते ही नहीं। यथार्थ जमीन में पैर गड़ाकर खड़ा हो गया, जैसे कि कोई वृक्ष हो, लेकिन ठूंठ की तरह, आकाश तक उसके हाथ न पहुंचे।
ब्रह्मा ने कहा, समझे कुछ? स्वप्न अकेला आकाश में अटक जाता है, यथार्थ अकेला जमीन पर भटक जाता है। कुछ ऐसा चाहिए कि स्वप्न और यथार्थ का मेल हो जाए।
तो बुद्ध वायवी नहीं हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंनें आकाश नहीं छुआ। उन्होंने आकाश छुआ, लेकिन यथार्थ के आधार पर छुआ।
इस फर्क को समझना।
बुद्ध ने अपने पैर तो जमीन पर रोके, बुद्ध ने यथार्थ को तो जरा भी नहीं भुलाया, यथार्थ में बुनियाद रखी; भवन उठा, मंदिर ऊंचा उठा, मंदिर पर स्वर्णकलश चढ़े। लेकिन मंदिर के स्वर्णकलश टिकते तो जमीन में छिपे हुए पत्थरों पर हैं, भूमि के भीतर छिपे हुए बुनियाद के पत्थरों पर टिकते हैं। बुद्ध ने एक मंदिर बनाया, जिसमें बुनियाद भी है और शिखर भी।
बहुत लोग हैं, जिनको हम नास्तिक कहते हैं, वे जमीन पर अटके रह जाते हैं। वे ठूंठ की तरह हैं। यथार्थ का ठूंठ। मार्क्सवादी हैं या चार्वाकवादी हैं, वे यथार्थ का ठूंठ। वे जमीन में तो पैर गड़ा लेते हैं, लेकिन उनके भीतर आकाश तक उठने की कोई अभीप्सा नहीं है, आकाश तक उठने की कोई क्षमता नहीं है। और चूंकि वे सपने को काट डालते हैं बिलकुल और कह देते हैं, आदर्श है ही नहीं जगत में। बस यही सब कुछ है, मिट्टी ही सब कुछ है। उनके जीवन में कमल नहीं फूलता, कमल नहीं उठता। कमल का उपाय ही नहीं रह जाता। जिसको इनकार कर दिया आग्रहपूर्वक, उसका जन्म नहीं होता।
और फिर दूसरी तरफ सिद्धांतवादी हैं: एब्सट्रेक्ट, वायवी विचारक है; वे आकाश में ही पर मारते रहते हैं, वे कभी जमीन पर पैर नहीं रोकते हैं। वे आदर्श में जीते हैं, यथार्थ से उनका कभी कोई मिलन ही नहीं होता। उनकी आंखों में आकाश-कुसुम खिलते हैं, असली कुसुम नहीं।
बुद्ध स्वप्नवादी नहीं हैं, परम व्यावहारिक हैं। लेकिन चार्वाक जैसे व्यवहारवादी भी नहीं हैं। उनका व्यवहारवाद अपने भीतर आदर्श की संभावना छिपाए हुए है। लेकिन वे कहते हैं, शुरू तो करना होगा जमीन पर पैर टेकने से। जिसके पैर जमीन में जितनी मजबूती से टिके हैं, वह उतनी ही आसानी से आकाश को छूने में समर्थ हो पाएगा। मगर यात्रा तो शुरू करनी पड़ेगी जमीन में पैर टेकने से।
इसलिए जब कोई बुद्ध के पास आता है और ईश्वर की बात पूछता है, वे कहते हैं, व्यर्थ की बातें मत पूछो। अनेकों को तो लगा कि बुद्ध अनीश्वरवादी हैं, इसलिए ईश्वर के बाबत जवाब नहीं देते। यह बात सच नहीं है। बुद्ध कहते हैं, पहले जमीन में तो पैर गड़ा लो, पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अंतस चेतना में तो जड़ें फैला लो, पहले तुम जो हो उसको तो पहचान लो, फिर यह पीछे हो लेगा। यह अपने से हो लेगा। यह एक दिन अचानक हो जाता है। जब जमीन में वृक्ष की जड़े खूब मजबूती से रुक जाती हैं, तो वृक्ष अपने आप आकाश की तरफ उठने लगता है। एक दिन आकाश में उठे वृक्ष में फूल भी खिलते हैं, वसंत भी आता है। मगर वह अपने से होता है। असली बात जड़ की है।
तो बुद्ध बहुत गहरे में यथार्थवादी हैं, लेकिन उनका यथार्थ आदर्श को समाहित किए हुए है। वह आदर्श समन्वित है यथार्थ में।

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=>पांचवी बात, गौतम बुद्ध विधिवादी नहीं, मानवीय हैं।:

एक तो विधिवादी होता है, जैसे मनु। सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, मनुष्य महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसा लगता है मनु में, जैसे मनुष्य सिद्धांत के लिए बना है। मनुष्य की आहुति चढ़ायी जा सकती है सिद्धांत के लिए, लेकिन सिद्धांत में फेर-बदल नहीं की जा सकती।
बुद्ध अति मानवीय हैं, ह्ययूमनिस्ट। मानववादी हैं। वे कहते हैं, सिद्धांत का उपयोग है मनुष्य की सेवा में तत्पर हो जाना। सिद्धांत मनुष्य के लिए है, मनुष्य सिद्धांत के लिए नहीं। इसलिए बुद्ध के वक्तव्यों में बड़े विरोधाभास हैं। क्योंकि बुद्ध एक-एक व्यक्ति की मनुष्यता को इतना मूल्य देते, इतना चरम मूल्य देते हैं कि अगर उन्हें लगता है इस आदमी को इस सिद्धांत से ठीक नहीं पड़ेगा, तो वे सिद्धांत बदल देते हैं। अगर उन्हें लगता है कि थोड़े से सिद्धांत में फर्क करने से इस आदमी को लाभ होगा, तो उन्हें फर्क करने में जरा भी झिझक नहीं होती। लेकिन मौलिक रूप से ध्यान उनका व्यक्ति पर है, मनुष्य पर है। मनुष्य परम है। मनुष्य मापदंड है। सब चीजें मनुष्य पर कसी जानीं चाहिए।

इसलिए बुद्ध वर्ण-व्यवस्था को न मान सके। इसलिए बुद्ध आश्रम-व्यवस्था को भी न मान सके। क्योंकि ये जड़ सिद्धांत हैं। बुद्ध ने कहा, ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जाने। ब्राह्मण-घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता। और शूद्र वही जो ब्रह्म न जाने। शूद्र-घर में पैदा होने से कोई शूद्र नहीं होता। तो अनेक ब्राह्मण शूद्र हो गए, बुद्ध के हिसाब से, और अनेक शूद्र बाह्मण हो गए। सब अस्तव्यस्त हो गया। मनु के पूरे शास्त्र को बुद्ध ने उखाड़ फेंका।
हिंदू अब तक भी बुद्ध से नाराजगी भूले नहीं हैं। वर्ण-व्यवस्था को इस बुरी तरह बुद्ध ने तोड़ा। यह कुछ आकस्मिक बात नहीं थी कि डाक्टर अंबेडकर ने ढाई हजार साल बाद फिर शूद्रों को बौद्ध होने को निमंत्रण दिया। इसके पीछे कारण है। अंबेडकर ने बहुत बातें सोची थीं। पहले उसने सोचा कि ईसाई हो जाएं, क्योंकि हिंदुओ ने तो सता डाला है, तो ईसाई हो जाएं। फिर सोचा कि मुसलमान हो जाएं। लेकिन यह कोई बात जमीं नही, क्योंकि मुसलमानों में भी वही उपद्रव है। वर्ण के नाम से न होगा तो शिया-सुन्नी का है।
अंततः अंबेडकर की दृष्टि बुद्ध पर पड़ी और तब बात जंच गयी अंबेडकर को कि शूद्र को सिवाय बुद्ध के साथ और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि शूद्र के लिए भी अपने सिद्धांत बदलने को अगर कोई आदमी राजी हो सकता है तो वह गौतम बुद्ध हैं-और कोई राजी नहीं हो सकता-जिसके जीवन में सिद्धांत का मूल्य ही नहीं, मनुष्य का चरम मूल्य है।
यह आकस्मिक नहीं है कि अंबेडकर बौद्ध हुए। पच्चीस सौ साल के बाद शूद्रों का फिर बौद्धत्व की तरफ जाना, या बौद्धत्व के मार्ग की तरफ जाना, बौद्ध होने की आकांक्षा, बड़ी सूचक है। इससे बुद्ध के संबंध में खबर मिलती है।
बुद्ध ने वर्ण की व्यवस्था तोड़ दी और आश्रम की व्यवस्था भी तोड़ दी। जवान, युवकों को संन्यास दे दिया। हिंदू नाराज हुए। संन्यस्त तो आदमी होता है आखिरी अवस्था में, मरने के करीब। अगर बचा रहा, पचहत्तर साल के बाद उसे संन्यस्त होना चाहिए। तो पहले तो पचहत्तर साल तक लोग बचते नहीं। अगर बच गए, तो पचहत्तर साल के बाद ऊर्जा नहीं बचती जीवन में। तो हिंदुओं का संन्यास एक तरह का मुर्दा संन्यास है, जो आखिरी घड़ी में कर लेना है। मगर इसका जीवन से कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है।
बुद्ध ने युवकों को संन्यास दे दिया, बच्चों को संन्यास दे दिया और कहा कि यह बात मूल्यवान नहीं है, लकीर के फकीर होकर चलने से कुछ भी न चलेगा। अगर किसी व्यक्ति को युवावस्था में भी परमात्मा को खोजने की, सत्य को खोजने की, जीवन के यथार्थ को खोजने की प्रबल आकांक्षा जगी है, तो मनु महाराज का नियम मानकर रुकने की कोई जरूरत नहीं है। वह अपनी आकांक्षा को सुने, वह अपनी आकांक्षा से जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंकाक्षा को सुने। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आकांक्षा से जीए। उन्होंनें सब सिद्धांत एक अर्थ में गौण कर दिए, मनुष्य प्रमुख हो गया।
तो वे सैद्धांतिक नहीं हैं, विधिवादी नहीं हैं। लीगल नहीं है उनकी पकड़, उनकी पकड़ मानवीय है। कानून इतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य मूल्यवान है। और हम कानून बनाते ही इसीलिए हैं कि मनुष्य के काम आए। मनुष्य कानून के काम आने के लिए नहीं है। इसलिए जब जरूरत हो, कानून बदला जा सकता है। जब मनुष्य के हित में हो, ठीक है, जब अहित में हो जाए तोड़ा जा सकता है। जो-जो मनुष्य के अहित में हो जाए, तोड़ देना है। कोई कानून शाश्वत नहीं है, सब कानून उपयोग के लिए हैं।

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=> और छठवीं बात, गौतम बुद्ध नियमवादी नहीं है, बोधवादी हैं।

अगर बुद्ध से पूछो, क्या अच्छा है, क्या बुरा है, तो बुद्ध उत्तर नहीं देते। बुद्ध यह नहीं कहते कि यह काम बुरा है और यह काम अच्छा है। बुद्ध कहते हैं, जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा; जो बोधहीनता से किया जाए, बुरा।
इस फर्क को खयाल में लेना। बुद्ध यह नहीं कहते कि हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है। या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है। कभी कोई बात पुण्य हो सकती है, और कभी कोई बात पाप हो सकती है-वही बात पाप हो सकती है, भिन्न परिस्थति में वही बात पाप हो सकती है। इसलिए पाप और पुण्य कर्मो के ऊपर लगे हुए लेबिल नहीं हैं। अभी जो तुमने किया, पुण्य है; और सांझ को दोहराओ तो शायद पाप हो जाए। भिन्न परिस्थिति।
तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का? बुद्ध ने एक नया आधार दिया। बुद्ध ने आधार दिया-बोध, जागरूकता। इसे खयाल में लेना। जो मनुष्य जागरूकतापूर्वक कर पाए, जो भी जागरूकता में ही किया जा सके, वही पुण्य है। और जो बात केवल मूर्छा में ही की जा सके, वही पाप है। जैसे, तुम पूछो, क्रोध पाप है या पुण्य? तो बुद्ध कहते हैं, अगर तुम क्रोध जागरूकतापूर्वक कर सको, तो पुण्य है। अगर क्रोध तुम मूर्छित होकर ही कर सको, तो पाप है।
अब फर्क समझना। इसका मतलब यह हुआ कि हर क्रोध पाप नहीं होता और हर क्रोध पुण्य नहीं होता। कभी मां जब अपने बेटे पर क्रोध करती है, तो जरूरी नहीं है कि पाप हो। शायद पुण्य भी हो, पुण्य हो सकता है। शायद बिना क्रोध के बेटा भटक जाता। लेकिन इतना ही बुद्ध का कहना है, होशपूर्वक किया जाए।
मैंने एक झेन कहानी सुनी है। एक समुराई, एक क्षत्रिय के गुरु को किसी ने मार दिया। और जापान में ऐसी व्यवस्था है, अगर किसी का गुरु मार डाला जाए, तो शिष्य का कर्तव्य है कि बदला ले। और जब तक वह मारने वाले को न मार दे, तब तक चैन न ले। ये समुराई तो बड़े भयानक योद्धा होते हैं। गुरु को किसी ने मार डाला, तो उसका जो शिष्य था, वह तो सब कुछ छोड़कर बस इसी में लग गया।

दो साल बाद उसका पीछा करते-करते एक जंगल में, एक गुफा में उसको पकड़ लिया। बस उसकी छाती में छुरा भोंकने को था ही कि उस आदमी ने उस समुराई के ऊपर थूक दिया। जैसे ही उसने थूका, उसने छुरा वापस रख लिया अपनी म्यान में और वापस गुफा के बाहर निकल आया।
उस आदमी ने कहा, क्यों भाई, क्या हो गया? दो साल से मेरे पीछे पड़े हो, बमुश्किल तुम मुझे खोज पाए, मैं जंगल-जंगल भागता रहा, आज तुम्हें मिल गया, आज क्या बात हो गयी कि छुरा निकाला हुआ वापस रख लिया?

उसने कहा कि मुझे क्रोध आ गया। तुमने थूक दिया, मुझे क्रोध आ गया। मेरे गुरु का उपदेश था, मारो भी अगर किसी को, तो मूर्छा में मत मारना। तो मारने में भी कोई पाप नहीं है। लेकिन तुमने जो थूक दिया, दो साल तक मैंने होश रखा-यह तो सिर्फ एक व्यवस्था की बात थी कि गुरु को मेरे तुमने मारा तो मैं तुम्हें मार रहा था, मेरा इसमें कुछ वैयक्तिक लेना-देना नहीं था-लेकिन तुमने थूक क्या दिया मुझ पर, मैं भूल ही गया गुरु को और मेरे मन में भाव उठा कि मार डालूं इस आदमी को, इसने मेरे ऊपर थूका! मैं बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। अहंकार बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। इसलिए अब जाता हूं। अब फिर जब यह मूर्छा हट जाएगी तब सोचूंगा। लेकिन मूर्छा में कुछ किया नहीं जा सकता।
बुद्ध ने कहा है, जो तुम मूर्छा में करो, वही पाप; जो जागरूकता में करों, वही पुण्य है। यह पाप और पुण्य की बड़ी नयी व्यवस्था थी। और इसमें व्यक्ति को परम स्वतंत्रता है। कोई दूसरा तय नहीं कर सकता कि क्या पाप है, क्या पुण्य है। तुमको ही तय करना है। बुद्ध ने व्यक्ति को परम गरिमा दी।

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और सातवीं बात, गौतम बुद्ध असहज के पक्षपाती नहीं, सहज के उपदेष्टा हैं।

गौतम बुद्ध कहते हैं, कठिन के ही कारण आकर्षित मत होओ। क्योंकि कठिन में अहंकार का लगाव है।

इसे तुमने देखा कभी? जितनी कठिन बात हो, लोग करने को उसमें उतने ही उत्सुक होते हैं। क्योंकि कठिन बात में अहंकार को रस आता है, मजा आता है-करके दिखा दूं। अब जैसे पूना की पहाड़ी पर कोई चढ़ जाए, तो इसमें कुछ मजा नहीं है, एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं तो कुछ बात है। पूना की पहाड़ी पर चढ़कर कौन तुम्हारी फिकर करेगा, तुम वहां लगाए रहो झंडा, खड़े रहो चढ़कर! न अखबार खबर छापेंगे, न कोई वहां तुम्हारा चित्र लेने आएगा। तुम बड़े हैरान होओगे कि फिर यह हिलेरी पर और तेनसिंग पर इतना शोरगुल क्यों मचाया गया! आखिर इन ने भी कौन सी बड़ी बात की थी, जाकर हिमालय पर झंडा गाड़ दिया था, मैंने भी झंडा गाड़ दिया! लेकिन तुम्हारी पहाड़ी छोटी है। इस पर कोई भी चढ़ सकता है। जिस पहाड़ी पर कोई भी चढ़ सकता है, उसमें अहंकार को तृप्ति का उपाय नहीं है।
तो बुद्ध ने कहा कि अहंकार अक्सर ही कठिन में और दुर्गम में उत्सुक होता है। इसलिए कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जो सहज और सुगम है, जो हाथ के पास है, वह चूक जाता है और दूर के तारों पर हम चलते जाते हैं।
देखते हैं, आदमी चांद पर पहुंच गया। अभी अपने पर नहीं पहुंचा! तुमने कभी देखा, सोचा इस पर? चांद पर पहुंचना तकनीक की अदभुत विजय है। गणित की अदभुत विजय है। विज्ञान की अदभुत विजय है। जो आदमी चांद पर पहुँच गया, यह अभी छोटी-छोटी चीजें करने में सफल नहीं हो पाया है। अभी एक ऐसा फाउंटेनपेन भी नहीं बना पाया जो लीकता न हो। और चांद पर पहुँच गए! छोटी-सी बात भी, अभी सर्दी-जुखाम का इलाज नहीं खोज पाए, चांद पर पहुंच गए! अब ऐसे फाउंटेनपेन को बनाने में उत्सुक भी कौन है जो लीके न! छोटी-मोटी बात है, इसमें रखा क्या है!
फाउंटेनपेन सदा लीकेंगे। कोई आशा नहीं दिखती कि कभी ऐसे फाउंटेनपेन बनेंगे जो लीकें न। और सर्दी-जुखाम सदा रहेगी, इससे छुटकारे का उपाय नहीं है। क्योंकि चिकित्सक कैंसर में उत्सुक हैं, सर्दी-जुखाम में नहीं। बड़ी चीज अहंकार की चुनौती बनती है। आदमी अपने भीतर नहीं पहुंचा जो निकटतम है और चांद पर पहुंच गया। मंगल पर भी पहुंचेगा, किसी दिन और तारों पर भी पहुंचेगा, बस, अपने को छोड़कर और सब जगह पहुंचेगा।
तो बुद्ध असहजवादी नहीं हैं। बुद्ध कहते है, सहज पर ध्यान दो। जो सरल है, सुगम है, उसको जीओ। जो सुगम है, वही साधना है। इसको खयाल में लेना। तो बुद्ध ने जीवनचर्या को अत्यंत सुगम बनाने के लिए उपदेश दिया है। छोटे बच्चे की भांति सरल जीओ। साधु होने का अर्थ बहुत कठिन और जटिल हो जाना नहीं, कि सिर के बल खड़े हैं, कि खड़े हैं तो खड़े ही हैं, बैठते नहीं, कि भूखों मर रहे हैं, कि लंबे उपवास कर रहे हैं, कि कांटों की शय्या बिछाकर उस पर लेट गए हैं, कि धूप में खड़े हैं, कि शीत में खड़े हैं, कि नग्न खड़े हैं। बुद्ध ने इन सारी बातों पर कहा कि ये सब अहंकार की ही दौड़ हैं। जीवन तो सुगम है, सरल है। सत्य सुगम और सरल ही होगा। तुम नैसर्गिक बनो और अहंकार के आकर्षणों में मत उलझो।

-ओशो

रहस्यदर्शियों पर ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग 9
(प्रवचन नं. 82 से संकलित)

वाकई बाबा साहब आंबेडकर को छोड़कर अब तक के सभी भारतीय विद्वानों में बुद्धा को ओशो ने ही सही से समझा पाया है|

एक्टर सुशांत राजपूत और रोहित वेमुला की डिप्रेशन में आत्महत्या पर भारतीय समाज का दुःख अलग अलग होता है, भारत देश का दुर्भाग्य है की जाती मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती- एक समीक्षा? ….विकास कुमार जाटव

ये भारत वो देश है जहाँ शमशान घाट भी जाती के हिसाब से होते हैं ,भारत देश का दुर्भाग्य है की जाती मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती-

एक्टर सुशांत राजपूत और रोहित वेमुला की डिप्रेशन में आत्महत्या पर भारतीय समाज का दुःख अलग अलग होता है-एक समीक्षा?  ….विकास कुमार जाटव

 

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के कुछ घंटे बाद ही तथाकथित “प्रधानसेवक” से लेकर तमाम उन व्यक्तिओ का दुःख भरा संदेश आ गया है जो की;

“रोहित वेमुला की आत्महत्या पर इसे कायरता, मुर्खता, कह रहे थे, वेमुला को कायर कह रहे थे”

जबकि दोनों ही स्तिथि में सबसे कॉमन बात यह है की दोनों ही व्यक्ति;

“डिप्रेशन से ग्रस्त हो गये थे”

डिप्रेशन भी अलग अलग स्तिथि में अपना प्रभाव दिखाता है.

1.सुशांत सिंह का डिप्रेशन एकाएक मिली सफलता के बाद असफलताओ का सामना भी हो सकता है. जांच के बाद पता लगेगा की किस प्रकार का डिप्रेशन था. ऐसा डिप्रेशन भारत की अमूमन 135 करोड़ जनसँख्या को है, किसी को कम है और किसी को ज्यादा हो सकता है।

2.रोहित वेमुला को जो डिप्रेशन था, वो डिप्रेशन उसका एससी/एसटी 25% समाज सैकड़ो वर्षो से धर्म के आधार पर झेल रहा है. बस उसका समाज धर्म के आधार पर इसे अपनी नियति समझकर झेलता रहा, लेकिन वर्ण व्यवस्था, जातिवादी माहोल से लडकर आत्मसम्मान व मनोबल प्राप्त कर चूका रोहित वेमुला जातिवादी मानसिकता के लोगो के दमन को झेल नही पाया. रोहित वेमुला की आत्महत्या में स्मृति इरानी के पत्र पर काफी हंगामा हुआ था, और आज देखिए;

“स्मृति इरानी ने सुशांत सिंह राजपुर की आत्महत्या पर बड़ा ही दुःख प्रकट किया है”

3.लेकिन इतना तय है की सुशांत सिंह को जो डिप्रेशन था वो उस स्तर का नही था जिस उच्च स्तर का रोहित वेमुला को रहा है. बकायदा रोहित वेमुला का सुसाइड पत्र अगर एक बार पढ़ लिया जाए तो जो बायस सामाजिक व्यवहार नही रखता है वो कहेगा की कितना दर्द था, कितना तनाव था.

4.फिर भी आत्महत्या का समर्थन नही किया जा सकता है. बाबा साहब को जब पारसी गेस्ट हाउस से सामान यह जानकर फैंक दिया गया की यह अछूत है, और उसके बाद बाबा साहब पार्क में “डिप्रेशन” में ही बैठे थे, लेकिन उन्होंने डिप्रेशन में अपने को मजबूत किया और ऐसा इतिहास लिख दिया जो हमेशा याद रखा जायेगा. फिर भी सुशांत की आत्महत्या पर व्यक्तिगत तौर पर दुःख हुआ. लेकिन क्या;

“रोहित वेमुला की डिप्रेशन में आत्महत्या पर भारतीय समाज को इतना ही दुःख हुआ?”

विकास कुमार जाटव

 

 

(आत्महत्या का किसी भी कारन से का समर्थन नही किया जा सकता है, मरना है तो मार के मारो).

 

रोहित वेमुला की आत्महत्या कायरता और सुशांत की आत्महत्या दुःखद घटना हो गयी