H: मूलनिवासी/बौद्ध महापुरुष

 हमारे लिए महापुरुष होने की कसौटी है ऐसा व्यक्तित्व जिसने मूलनिवासियों के पक्ष में संगर्ष किया हो और उसका मूलनिवासियों पर अनुकूल असर पड़ा
“जिस समाज का इतिहास नहीं होता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने इतिहास से भी सबक नहीं सिखाता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने बहुजन महापुरुषों के आंदोलन से भी सबक नहीं सिखाता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने बहुजन महापुरुषों के उद्देश्य  स्वतंत्रता, समानता,नैतिकता, भाईचारा और न्याय को प्रस्थापित करने की कोशिश नहीं करता हैं, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने बहुजन महापुरुषों कि विचारधारा “बहुजन हीताय बहुजन सुखाय ” पर नहीं चलता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . क्योंकि अपने बहुजन महापुरुषों के आंदोलन के उद्देश्य और
विचारधारा से प्रेरणा मिलती है, प्रेरणा से जागृति आती है, जागृति से सोच बनती है, सोच से ताकत बनती है, ताकत से शक्ति बनती है और शक्ति से शासक बनता है -“

गौतम बुद्ध:

भगवान् बुद्ध  के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसाहै,उनके व्यक्तित्व और सिद्धांत के आगे कोई नहीं टिक सकताजो एक बार बौध धम्म कोठीक से समझ लेता है वो फिर कहीं नहीं जा सकता| बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।  भगवान् बुद्ध  को गौतम बुद्ध ‘, ‘ महात्मा बुद्ध आदि नामों से भी जाना जाता है। वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक हैं। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है। इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। इस धर्म के संस्थापक भगवान् बुद्ध  राजा शुद्धोदन के पुत्र थे और इनका जन्म स्थान लुम्बिनी नामक ग्राम था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया।
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यदि आप देश  की किसी भी धर्म कौम या झंडे से ज्यादा प्रेम करते हैं,
यदि आप समानता के पक्षधर हैं
यदि आप भारत की सभी समस्याओं की जड़ में पहुचना चाहते हो
यदि आप अपने जीवन में दुखों से मुक्ति चाहते हो
यधि आपको धार्मिक सत्ये जानना है
तो बस बौध धम्म के सिधान्तों और साहित्य को एक बार कुछ समय दे दो मानना  न मानना बाद की बात है

आज बौध धर्म का सबसे बड़ा नुक्सान ये बात कर रही है की ये दलितों का धर्म है जिसके वजह से इसे लोग समझने के लिए भी तयार नहीं जबकि ये वो मत है की इसे जो भी एक बार ठीक से समझ ले उसे फिर दुनिया में किसी भी धर्म के सिद्धांत खोकले लगते हैं।

भगवान् बुद्धा ने कहा है :
“मोह में हम किसी की बुराइयाँ नहीं देख सकते और घृणा में हम किसी की अच्छाईयाँ नहीं देख सकते”  ।
धम्म विरोधी अवसरवादियों द्वारा फैलाई गई घृणा के कारन आज आम जनता दुखी है पर दुःख दूर करने के स्रोत तक नहीं जाना चाहती।आपसे आग्रह है की एक बार इसे जानकार तो देखो मानना न मानना तो बाद की बात है|
कहा जाता है जी बौध और ब्राह्मण एक दुसरे के परस्पर विरोधी रहे हैं पर असल में ये बात केवल राजनेतिक कारणों से ही सही है। धार्मिक कारणों से तो क्या ब्राह्मण क्या मुसलमान क्या इसाई क्या अन्य कोई बौध मत के आगे कोई ज्यादा देर तक इसे अपनाने से खुद को नहीं रोक सकता। ऐसा इसलिए नहीं की ये सबसे अच्छा धर्म है बल्कि इसलिए की केवल यहाँ सत्य और तर्क  ज्यादा  है बाकि जगह कल्पना,गुटबाजी और पुरोहितवाद ज्यादा है । इसी कड़ी में प्रस्तुत है बौध धम्म  के कुछ जाने माने महान अनुयायी
1. समराट अशोक महान :
Mauryan-Dynasty_18892संसार के इतिहास में केवल 3 राजाओं को ही उनके नाम के साथ  ‘महान’ कहकर सम्भोदित किया जाता है एक अलेक्जेंडर दुसरे अकबर और हमारे अपने महान समराट अशोका
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भारत का सम्पूर्ण इतिहास विदेशिओं द्वारा हारने का इतिहास है केवल बौध मत के रहा अशोक ही एक्मात्र ऐसे मूल भारतीय राजा हुए जिन्होंने सरे हुन्दुस्तान समेत आज का नेपाल बांग्लादेश पाकिस्तान और अफगानिस्तान अदि को एक देश और एक झंडे के नीचे जीत लिए थे। केवल जीता ही नहीं बल्कि अपनी प्रजा को अपने बच्चों के समान प्रेम किया और बेहतरीन सुशाशन दिया जिसकी याद में आज भी हमारा रास्ट्र चिन्ह अशोक स्थंभ और झंडे पर अशोक चक्र है ।
संसार के इतिहास में केवल 3 राजाओं को ही उनके नाम के साथ  ‘महान’ कहकर सम्भोदित किया जाता है एक अलेक्जेंडर दुसरे अकबर और हमारे अपने महान समराट  अशोक

सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध के भक्त हो गए और उन्हीं (महात्मा बुद्ध) की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल-लुम्बिनी में मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्‍तम्‍भ के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। अशोक के अभिलेखों में प्रजा के प्रति कल्याणकारी द्रष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है।

2. बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर

भीमराव आम्बेडकर एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी भी थे। उन्हें बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। आम्बेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिन्दू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। आम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। अपनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों तथा देश की अमूल्य सेवा के फलस्वरूप डॉक्टर अम्बेडकर को ‘आधुनिक युग का मनु’ कहकर सम्मानित किया गया200px-Dr_Bhimrao-Ambedkar

डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में हुआ था। 1956 में उनका देहान्त हुआ। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की 14वीं व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले में है, से संबंधित था। अनेक समकालीन राजनीतिज्ञों को देखते हुए उनकी जीवन-अवधि कुछ कम थी। वे महार जाति के थे जो अछूत कहे जाते थे। किन्तु इस अवधी में भी उन्होंने अध्ययन, लेखन, भाषण और संगठन के बहुत से काम किए जिनका प्रभाव उस समय की और बाद की राजनीति पर है। भीमराव आम्बेडकर का जन्म निम्न वर्ण की महार जाति में हुआ था। उस समय अंग्रेज़ निम्न वर्ण की जातियों से नौजवानों को फ़ौज में भर्ती कर रहे थे। आम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और भीमराव के पिता रामजी आम्बेडकर ब्रिटिश फ़ौज में सूबेदार थे और कुछ समय तक एक फ़ौजी स्कूल में अध्यापक भी रहे। उनके पिता ने मराठी और अंग्रेज़ी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। वह शिक्षा का महत्त्व समझते थे और भीमराव की पढ़ाई लिखाई पर उन्होंने बहुत ध्यान दिया।

3 ह्वेन त्सांग

भारत में ह्वेन त्सांग ने बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का भ्रमण किया और उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाक़ो की भी यात्रा की। उन्होंने अपना अधिकांश समय नालंदा मठ में बिताया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहाँ उन्होंने संस्कृत, बौद्ध दर्शन एवं भारतीय चिंतन में दक्षता हासिल की। इसके बाद ह्वेन त्सांग ने अपना जीवन बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुवाद में लगा दिया जो 657 ग्रंथ थे और 520 पेटियों में भारत से लाए गए थे। इस विशाल खंड के केवल छोटे से हिस्से (1330 अध्यायों में क़रीब 73 ग्रंथ) के ही अनुवाद में महायान के कुछ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।

4. मिलिंद (मिनांडर)

मुख्य लेख : मिलिंद (मिनांडर)

उत्तर-पश्चिम भारत का ‘हिन्दी-यूनानी’ राजा ‘मनेन्दर’ 165-130 ई. पू. लगभग (भारतीय उल्लेखों के अनुसार ‘मिलिन्द‘) था। प्रथम पश्चिमी राजा जिसने बौद्ध धर्म अपनाया और मथुरा पर शासन किया। भारत में राज्य करते हुए वह बौद्ध श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य नागसेनसे उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।

 बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम ‘मिलिन्द’ आया है। ‘मिलिन्द पञ्हो’ नाम के पालि ग्रंथ में उसके बौद्ध धर्म को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। मिनान्डर के अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के ‘धर्मचक्र’ प्रवर्तन का चिह्न ‘धर्मचक्र‘ बना हुआ है, और उसने अपने नाम के साथ ‘ध्रमिक’ (धार्मिक) विशेषण दिया है।

5 सम्राट  कनिष्क

कुषाण राजा कनिष्क के विशाल साम्राज्य में विविध धर्मों के अनुयायी विभिन्न लोगों का निवास था, और उसने अपनी प्रजा को संतुष्ट करने के लिए सब धर्मों के देवताओं को अपने सिक्कों पर अंकित कराया था। 250px-Kanishka-Coinपर इस बात में कोई सन्देह नहीं कि कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था, और बौद्ध इतिहास में उसका नाम अशोक के समान ही महत्त्व रखता है। आचार्य अश्वघोष ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। इस आचार्य को वह पाटलिपुत्र से अपने साथ लाया था, और इसी से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी।

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फ़ाह्यान का जन्म चीन के ‘वु-वंग’ नामक स्थान पर हुआ था। यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने लगभग 399 ई. में अपने कुछ मित्रों ‘हुई-चिंग’, ‘ताओंचेंग’, ‘हुई-मिंग’, ‘हुईवेई’ के साथ भारत यात्रा प्रारम्भ की। फ़ाह्यान की भारत यात्रा का उदेश्य बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजना था। इसीलिए फ़ाह्यान ने उन्ही स्थानों के भ्रमण को महत्त्व दिया, जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थे।

8. डॉ भदन्त आनन्द कौशल्यायन Dr Bhadant Anand Kausalyayan

डॉ भदन्त आनन्द कौशल्यायन (05 जनवरी, 1905 – 22 जून, 1988) बौद्ध भिक्षु, पालि भाषा के मूर्धन्य विद्वान तथा लेखक थे। इसके साथ ही वे पूरे जीवन घूम-घूमकर राष्ट्रभाषा हिंदी का भी प्रचार प्रसार करते रहे। वे 10 साल राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के प्रधानमंत्री रहे। वे बीसवीं शती में बौद्ध धर्म के सर्वश्रेष्ठ क्रियाशील व्यक्तियों में गिने जाते हैं।

 जीवन परिचय :  उनका जन्म ०५ जनवरी, १९०५ को अविभाजित पंजाब प्रान्त के मोहाली के निकट सोहना नामक गाँव में एक खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता लाला रामशरण दास अम्बाला में अध्यापक थे। उनके बचपन का नाम हरिनाम था। १९२० में भदन्त जी ने १०वी की परीक्षा पास की, १९२४ में १९ साल की आयु में भदन्त जी ने स्नातक की परीक्षा पास की। जब वे लाहौर में थे तब वे उर्दू में भी लिखते थे।

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में भी भदन्त जी ने सक्रिय रूप से भाग लिया। महात्मा गाँधी, पुरुषोत्तम दास टंडन, पंडित जवाहरलाल नेहरु, बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर, महापंडित राहुल संकृत्यायन, भिक्षु जगदीश कश्यप, भिक्षु धर्मरक्षित आदि लोगो के साथ मिलकर वे भारत की आज़ादी की जंग में सक्रिय रहे। वे श्रीलंका में जाकर बौद्ध भिक्षु हुए। वे श्रीलंका की विद्यालंकर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष भी रहे।

भदन्त जी ने जातक की अत्थाकथाओ का ६ खंडो में पालि भाषा से हिंदी में अनुवाद किया। धम्मपद का हिंदी अनुवाद के आलावा अनेक पालि भाषा की किताबों का हिंदी भाषा में अनुवाद किया। साथ ही अनेक मौलिक ग्रन्थ भी रचे जैसे – ‘अगर बाबा न होते’, जातक कहानियाँ, भिक्षु के पत्र, दर्शन : वेद से मार्क्स तक, ‘राम की कहानी, राम की जुबानी’, ‘मनुस्मृति क्यों जलाई’, बौद्ध धर्म एक बुद्धिवादी अध्ययन, बौद्ध जीवन पद्धति, जो भुला न सका, ३१ दिन में पालि, पालि शव्दकोष, सारिपुत्र मौद्गाल्ययान् की साँची, अनागरिक धरमपाल आदि । 22 जून 1988 को भदन्त जी का नागपुर में महापरिनिर्वाण हो गया।

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9. साहब कांशी राम

बहुजन समाज को एक धागे में पिरोने का काम करने वाले कांशीराम जी के योगदान को जितना याद किया जाए, वो कम होगा. बहुजन
कांशी राम
समाज के हित के लिए प्रण लेने वाले कांशीराम जी ने समाज के हित के लिए घर-बार, मां-बाप, सबका मोह छोड़ दिया. दलित जिस उत्तर प्रदेश की सरकार को आज गौरव से निहारते हैं, उसको स्थापित करने का काम कांशीराम ने ही किया. उनकी जिंदगी पर एक नजर……

जन्म- 15 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में दलित (सिख समुदाय के रैदसिया) परिवार में हुआ.

माता-पिता – बिशन कौर और हरी सिंह

शिक्षा- स्नातक (रोपड़ राजकीय कालेज, पंजाब विश्वविद्यालय)

नौकरी- डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ)

नौकरी के दौरान जातिगत भेदभाव से आहत होकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर,भगवान् बुद्धा, ज्योतिबा फुले और पेरियार के दर्शन को गहनता से पढ़कर दलितों को एकजुट करने में जुटे.

पंजाब के एक चर्चित विधायक की बेटी का रिश्ता आया लेकिन दलित आंदोलन के हित में उसे ठुकरा दिया.

सबसे पहले बाबा साहेब द्वारा स्थापित पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के सक्रिए सदस्य बनें.

1971 में पूना में आरपीआई और कांग्रेस के बीच गैरबराबरी के समझौते और नेताओं के आपसी कलह से आहत होकर पार्टी से इस्तीफा.

बामसेफ -1964 में 6 दिसंबर 1978 को ‘बामसेफ’ का विधिवत गठन किया. कांशीराम का मानना था कि आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी में पहुंचा वर्ग ही शोषितों का थिंक, इंटलैक्चुअल और कैपिटल बैंक यही कर्मचारी तबका है. दलितों की राजनीतिक ताकत तैयार करने में बामसेफ काफी मददगार साबित हुआ.

दलितों को एकजुट करने और राजनीतिक ताकत बनाने का अभियान 1970 के दशक में शुरू किया.

दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) – दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय को जोड़ने के लिए उन्होंने डीएस-4 का गठन किया. इसकी स्थापना 6 दिसंबर 1981 को की गई. डीएस-4 के जरिए सामाजिक, आर्थिक बराबरी का आंदोलन आम झुग्गी-झोपड़ी तक पहुंचाने में काफी मदद मिली. इसको सुचारु रूप से चलाने के लिए महिला और छात्र विंग में भी बांटा गया. जाति के आधार पर उत्पीड़न, गैर-बराबरी जैसे समाजिक मुद्दों पर लोगों के बीच जागरूकता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन करना डीएस-4 के एजेंडे में रहे. डीएस-4 के जरिए ही देश भर में साइकिल रैली निकाली गई.

बहुजन समाज पार्टी (बसपा)- 14 अप्रैल, 1984 को बसपा का गठन. सत्ता हासिल करने के लिए बनाया गया राजनीतिक संगठन.

पे बैक टू सोसाइटी के सिद्धांत के तहत दलित कर्मचारियों को अपने वेतन का 10वां हिस्सा समाज को लौटाने का आह्वान किया.

– बुद्धिस्ट रिसर्च सेंटर की स्थापना की.

– कांशीराम जी की पहली ऐतिहासिक किताब ‘द चमचा ऐज’ (अंग्रेजी) 24 सितंबर 1982 को प्रकाशित हुआ.

– 1991 में पहली बार यूपी के इटावा से 11 लोकसभा का चुनाव जीते.

– 1996 में दूसरी बार लोकसभा का चुनाव पंजाब के होशियारपुर से जीते.

– 2001 में सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर कुमारी मायावती को उत्तराधिकारी बनाया.

-2003 में लकवाग्रस्त होने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर चले गए.

– 9 अक्टूबर, 2006 को हार्टअटैक, दिल्ली में अंतिम सांस ली.

कांशीराम ने निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाएं शुरू की—-

अनटचेबल इंडिया (अंग्रेजी)

बामसेफ बुलेटिन (अंग्रेजी)

आप्रेस्ड इंडियन (अंग्रेजी)

बहुजन संगठनक (हिन्दी)

बहुजन नायक (मराठी एवं बंग्ला)

श्रमिक साहित्य

शोषित साहित्य

दलित आर्थिक उत्थान

इकोनोमिक अपसर्ज (अंग्रेजी)

बहुजन टाइम्स दैनिक

बहुजन एकता

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ज्योतिबा फुले:
ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के माली जाति के परिवार में हुआ था. महाराष्ट्र के समाज सुधारकों
ज्योतिबा फुले
में सर्वाधिक आक्रामक, प्रतिभा संपन्न और विद्रोही व्यक्तित्व महात्मा ज्योतिबा फुले भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक कहलाते हैं. पिछड़ी जाति में जन्म लेने के कारण शिक्षा ग्रहण करते समय उन्हें भी कई बार अपमानित होना पड़ा था. उनका मानना था कि समाज व्यवस्था में दलितों, श्रमिकों और स्त्रियों को सबसे अधिक दबाया गया है. इस समाज रचना के विरोध में सक्रिय होकर उन्होनें तीन मार्गों को रखा.बौद्धिक स्तर पर विषय समाज रचना का विरोध, पिछड़ी जातियों और दलितों का संगठन और प्रत्यक्ष संघर्ष. उनका सबसे बड़ा कार्य ‘ब्राह्मणी संस्कृति’ का पर्दाफाश करना था. उनके अथक परिश्रम के कारण ही आगे के प्रगतिशील आंदोलनों को वैचारिक पृष्ठभूमि प्राप्त हुई. केवल ब्राह्मणी धर्म पर टूट पड़ना यही उनका लक्ष्य नहीं था. वे एक ऐसी व्यवस्था के लिए छटपटा रहे थे, जिसमें शोषण और अवहेलना न हो.

जाति और वर्ण के परे जाकर मनुष्य सत्यधर्म पर ही अपनाए ऐसी उनकी धारणा थी. इसी कारण मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ नामकjyotiba foole पुस्तक की उन्होंने रचना की. यह पुस्तक उनकी मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ नामक पुस्तक की उन्होंने रचना की. यह पुस्तक उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई. इस पुस्तक की रचना के बहुत पूर्व ही उन्होंने पुणे में 13 सितंबर 1863 ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की. महात्मा फुले ने सामाजिक कार्य करते हुए कई पुस्तकें लिखी. इनमें ‘तृतीय रत्न’, ‘ब्रह्मणंचे कसाब’, ‘इशारा’, ‘पोवाडा-छत्रपति शिवाजी भोंसले यांचा’ इत्यादि प्रमुख हैं. उन्होंने जीवन भार निम्म जाति, महिलाओं और दलितों के उद्धार के लिए कार्य किया. इस कार्य में उनकी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी पूरा योगदान दिया. महान कार्य करते हुए 1890 में महात्मा फूले जी की मृत्यु हो गई.
Jyotiba phule phule jyatiba born 11 April 1776 the Satara district of Maharashtra in Mali caste family. Jyotiba phule Maharashtra’s most aggressive in social reformers, talent-rich and rebellious personality of Mahatma jyotiba phule, Indian social revolution are called. Born in education due to the backward castes while they also had to be humiliated. He believed that social workers and the Dalits, women in the most depressed. The community composition of active and they put three tracks composed of intellectual level subject., organization of Dalits and backward castes and direct conflict. His biggest task was to expose the brahmani culture ‘. Their tireless due diligence as well as the ideological background to further progressive movements occurred. Fall break on religion that their goal only brahmani. They were a mechanism to override the abuse and it took.

Go beyond race and character of human beings was adopted on such satyadharm their perception. That is why satyadharm some years ‘ public ‘ death, a book he composed. This book is his death a few years ago called ‘ book ‘ public satyadharm he composed. This book was published after his death. The book of the East “, in September 1863 she satyashodhak Samaj ‘ Pune. Mahatma phule has written many books in social work. These “third gem ‘, ‘ brahmananche ‘, ‘ povada ‘, ‘ gesture kasab-chhatrapati Shivaji bhosle’s dedicated ‘ and so on. He loads the following race, life for the salvation of women and Dalits. Savitribai phule, this work contributed to complete their dharmapatni. Great work, 1890 died of Mahatma comparing g. (Translated by Bing)

चुनिन्दा सन्देश: भगवान् बुद्ध,सम्राट अशोक महान,रविदास और बाबासाहब आंबेडकर किसी मीडीया फेक्टरी से निकले  रेडीमेड लीडर नहीं है, ये तो जनता के सच्चे ह्रदय सम्राट है by Er. P

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पेरियार इ.वी. रामासामी

r eamaswamy
” जातिवाद क्या है ?? ” ::– पेरियार इ.वी. रामासामी
(कोइन्म्ब्तूर में सन 1958 को पेरियार दुयारा दिया गये भाषण के कुछ अंश )
” मैं क्या हूँ ?? ( What I am ??)
” पहला ::– मुझे ईशवर तथा दुसरे देवी-देवताओं में कोई आस्था नहीं है / ”
“दूसरा ::– दुनियां के सभी संगठित धर्मो से मुझे सख्त नफरत है /”
“तीसरा ::– शास्त्र, पुराण और उनमे दर्ज देवी-देव्त्ताओं में मेरी कोई आस्था नहीं है , क्योंकि बह सारे के सारे दोषी हैं और उनको जलाने तथा नष्ट करने के लिए मैं “जनता” से अप्पील करता हूँ /”मैंने सब कुछ किया और मैंने गणेश आदि सभी ब्रह्मणि देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डाली हैं और राम आदि के चित्र भी जला दिए हैं / मेरे इन कार्यों के बावजूद भी, मेरी सभायों में मेरे भाषण सुनने के लिए यदि हजारों की गिनती में लोग इकट्ठे होते हैं, तो यह बात सपष्ट है कि, ” स्वाभिमान तथा बुद्धि का अनुभव होना जनता में , जागृति का सन्देश है /”

‘द्रविड़ कड़गम आन्दोलन’ का क्या मतलब है ?? इसका केवल एक ही निशाना है कि, इस नक्क्मी आर्य ब्राह्मणवादी और वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना, जिस के कारन समाज उंच और नीच जातियों में बांटा गया है / इस तरह ‘द्रविड़ कड़गम आन्दोलन’ , ” उन सभी शास्त्रों, पुराणों और देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखता, जो वर्ण तथा जाति व्यवस्था को जैसे का तैसा बनाये रखे हुए हैं /”राजनितिक आज़ादी प्राप्ति के बाद सन 1958 ( लगभग 10 बर्षों के बाद भी ) तक्क भी वर्ण व्यवस्था और जातिगत भेद-भाव की निति ने जनता के जीवन के ऊपर अपना वर्चस्व बनाये रखने के कारन, देश में पिछड़ेपण को साबित कर दिया है / अर्थात , आर्य ब्रह्मण सरकार ने, इन 10 बर्षों तक्क भी वर्ण और जाति व्यवस्था को ख़त्म करने का कोई भी यत्न नहीं किया है / किसी और मुल्क में इस तरह के जाति के भेदभाव के कारण बहाँ की जनता हजारों की संख्या में बांटी हुयी नहीं है / हैरानी की बात यह है कि, समझदार लोग भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं / अपनी ही लालसावादी स्वारथ का दौर इस देश के नेताओं में है / कुछ लोग राष्ट्रीयता तथा राजनितिक पार्टी के आधार पर ( कांग्रेस की और इशारा करते हुए ) अपने आपको समाज-सेवी कहलाते हैं, वे भारत की असली समस्याओं के तरफ थोडा सा भी ध्यान नहीं देते / जिस करके देशवासी पछडे हालातों में से गुजर रहे हैं / राजनितिक आज़ादी प्राप्त करने से बाद दुसरे देशों के लोगों ने , राष्ट्रीय विकास और सामाजिक सुधारों में बड़े पैमाने पर तरक्की की है // …………………………………… /////आज से 2000 वर्ष पूर्व, तथागत बुद्ध ने हिन्दू धर्म के जहरीले अंगों से छुटकारा पाने के लिए जनता के दिलो-दिमाग को आज़ाद करने का यत्न किया था / बुद्ध ने जनता को , क्यों, कैसे तथा कौन से प्रशन किये और बस्तु / चीज के यथार्थ गुण तथा सवभाव के समीक्षा की / उन्होंने ने ब्राह्मणों के, वेदों को फिजूल बताया , उन्होंने किसी भी बस्तु से किसी भी ऋषि और महात्मा का अधिकार सवीकार नहीं किया / उन्होंने लोगों को अपनी भाषा में आत्म-चिंतन करने का और जीवन के साधारण सच्च को समझने का उपदेश दिया / इसका नतीजा क्या निकला ? ऐसे उपदेशकों को मौत के घाट उतारा गिया / उनके घर-बार जला दिए गए / उनकी औरतों का अपमान किया गया / बुद्ध धर्म के भारत में से अलोप हो जाने के बाद तर्कवाद समापित हो गया / बुद्ध की जन्म-भूमि से बुद्ध का प्रचार – प्रसार ना हो सका / बह चीन और जापान में चला गया / यहाँ उसने इन देशों को दुनियां के महान देशों की लाइन में खड़ा कर दिया / राष्रीय चरित्र, अनुशासन, शुद्धता, ईमानदारी और महिमानवाजी में कौनसा मुल्क जापान की बराबरी कर सकता है ?? ………………………………………………………………………………….///

इश्वर कैसे तथा क्यों जन्म-मरन करता है ? सभी देवी-देवताओं को देखो, राम का जन्म ‘नौवीं तिथि ‘ को हुआ, सुभ्रामानिया का जन्म ‘छेवीं तिथि’ को हुआ, कृष्ण का जन्म ‘अष्टमी तिथि’ को हुआ, और पुराणों के अनुसार इन सभी देवताओं की म्रत्यु भी हुई / क्या इस कथन के बाद भी हम उनकी पूजा देवते समझ कर करते रहें ?? ईशवर की पूजा क्यों करनी चाहिए ? ईशवर को भोग लगाने का क्या मतलव है ? रोजाना उसको नए कपडे पहना कर हार-शिंगार किया जाता है, क्यों ? यहाँ तक कि, मनुष्यों दुयारा ही, देवियों को नंगा करके स्नान करवाया जाता है ? इस अशलीलताके कारण ना तो उन देवियों को और ना ही उनके भक्तों को कभी क्रोध आता है, क्यों ? देवताओं को स्त्रियों कि क्या जरूरत है ? अक्सर वे एक औरत से सन्तुष नहीं होते / कभी कभी तो उनको एक एक रखैल यां वैश्य की जरूरत होती है / तिरुपति के देवता, मुस्लिम वैश्य के कोठे पर जाने की इच्छा करते हैं , और क्यों प्रतेक बर्ष यह देवता विवाह करवाते हैं ?? पिछले बर्ष के विवाह का क्या नतीजा है ? उसका कब तलाक हुआ ? किस अदालत ने उनके इस छोड़ने – छुड़ाने की मंजूरी दी है ? क्या इन सभी देवी-देवताओं के खिलवाड़ ने हमारी जनता को ज्यादा अकल्मन्द (समझदार), ज्यादा पवित्र और बड़ी सत्र पर एकता में नहीं बाँधा है ?
ईसाई, मुस्लिम और बुद्ध धर्म के संस्थापक दया भावना, करुणा, सज्जनता और भला करने वाले अवतार माने जाते हैं / ईसाई और बुद्ध धर्म के मूर्ति पूजा इन गुणों को दर्शाती है /

ब्राह्मण देवी-देवताओं को देखो, एक देवता तो हाथ में ‘भाला’ / त्रिशूल उठाकर खड़ा है , और दूसरा धनुष वाण , अन्य दुसरे देवी-देवते कोई गुर्ज , खंजर और ढाल के साथ सुशोभित हैं, यह सब क्यों है ? एक देवता तो हमेशा अपनी ऊँगली के ऊपर चारों तरफ चक्कर चलाता रहता है, यह किस को मारने के लिए है ?

यदि प्रेम तथा अनुग्रह आदमी के दिलो-दिमाग के ऊपर विजय प्राप्त कर लें तो, इन हिंसक अस्त्र -शास्त्र की क्या जरूरत है ? दुनियां के दुसरे धर्म उपदेशकों के पास कभी भी कोई हथियार नहीं मिलेगा / क्योंकि वो , शान्ति, अमन समानता तथा न्याय के पोषक हैं / जबकि आर्य-ब्राहमण धर्म सीधे तौर पर असमानता, अ-न्याय तथा हिंसा आदि का प्रवर्तक है / यही कारण है कि शान्ति, अमन तथा न्याय की बात करने वाले लोगों को डराने के लिए, आर्यों ब्राह्मणों ने अपने देवताओं के हाथों में हिंसक हथियार दिए हुए हैं / सपष्ट तौर पर हमारे ये देवी- देवता, बुराई करने वालों पर विजय प्राप्त करने के लिए इनको हिंसक शास्त्रों का इस्तेमाल करते हैं / क्या इसमें कोई कामयावी मिली है ?

हम आज कल के समय में रह रहे हैं / क्या यह वर्तमान समय इन देवी-देवताओं के लिए सही नहीं है ? क्या वे अपने आप को आधुनिक हथियारों से लैस करने और धनुषवान के स्थान पर , मशीन, यां बन्दूक धारण क्यों नहीं करते ? रथ को छोड़कर क्या श्री कृष्ण टैंक के ऊपर सवार नहीं हो सकते ? मैं पूछता हूँ कि, जनता इस परमाणु युग में इन देवी-देवताओं के ऊपर विश्वास करते हुए क्यों नहीं शर्माती ?? ………………… Periyar E.V. Ramasami ……………..

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7  राहुल सांकृत्यायन(पंडित दामोदर स्वामी)

बौद्ध  धम्म मत ने पंडित दामोदर स्वामी को बनाया राहुल सांकृत्यायन
आज बौध धर्म का सबसे बड़ा नुक्सान ये बात कर रही है की ये दलितों का धर्म है जिसके वजह से इसे लोग समझने के लिए भी तयार नहीं जबकि ये वो मत है की इसे जो भी एक बार ठीक से समझ ले उसे फिर दुनिया में किसी भी धर्म के सिद्धांत खोकले लगते हैं। कहा जाता है जी बौध और ब्राह्मण एक दुसरे के परस्पर विरोधी रहे हैं पर असल में ये बात केवल राजनेतिक कारणों से ही सही है। धार्मिक कारणों से तो क्या ब्राह्मण क्या मुसलमान क्या इसाई क्या अन्य कोई बौध मत के आगे कोई ज्यादा देर तक इसे अपनाने से खुद को नहीं रोक सकता। ऐसा इसलिए नहीं की ये सबसे अच्छा धर्म है बल्कि इसलिए की केवल यहाँ सत्य और तर्क  ज्यादा  है बाकि जगह कल्पना,गुटबाजी और पुरोहितवाद ज्यादा है । इसी कड़ी में प्रस्तुत है बौध धम्म महाज्ञाता श्री  राहुल सांकृत्यायन का छोटा सा परिचय :

बौध धम्म महाज्ञाता श्री  राहुल सांकृत्यायन (जन्म- 9 अप्रैल, 1893; मृत्यु- 14 अप्रैल, 1963) को हिन्दी यात्रा साहित्य का जनक माना जाता है। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद थे और 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था।

राहुल सांकृत्यायन जी का जन्म 9 अप्रैल, 1893 को पन्दहा ग्राम, ज़िला आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। राहुल सांकृत्यायन के पिता का नाम गोवर्धन पाण्डे और माता का नाम कुलवन्ती था। इनके चार भाई और एक बहिन थी,  भाइयों में ज्येष्ठ राहुल जी थे। पितृकुल से मिला हुआ उनका नाम ‘केदारनाथ पाण्डे’ था। बचपन से ही वे अन्धविश्वास और कर्मकांड को पसंद नहीं करते थे,धर्म की जिज्ञासा पूर्ती उन्हें  सन् 1930 ई. में  लंका में बौद्ध मत को समझने से मिली जिसके बाद उन्होंने बौध मत को हिंदी में उपलब्ध करने में अपना सारा जीवन लगा दिया । उन्होंने भगवान् बुद्धा और उनके धम्म मार्ग से पिता के सामान प्रेम किया और खुद को बेटा मानकर भगवान् बुद्धा के बेटे राहुल के नाम पर अपना नाम भी राहुल रख लिया ।बौद्ध होने के पूर्व राहुल जी ‘दामोदर स्वामी’ के नाम से भी पुकारे जाते थे। ‘राहुल’ नाम के आगे ‘सांस्कृत्यायन’ इसलिए लगा कि पितृकुल सांकृत्य गोत्रीय है।385px-Rahul_Sankrityayan

कट्टर सनातनी ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी सनातन या ब्राह्मण या हिन्दू धर्म की रूढ़ियों को राहुल जी ने अपने ऊपर से उतार फेंका और जो भी तर्कवादी धर्म या तर्कवादी समाजशास्त्र उनके सामने आते गये, उसे ग्रहण करते गये और शनै: शनै: उन धर्मों एवं शास्त्रों के भी मूल तत्वों को अपनाते हुए उनके बाह्य ढाँचे को छोड़ते गये।

सनातन धर्म से, आर्य समाज से और बौद्ध धर्म से साम्यवाद-राहुल जी के सामाजिक चिन्तन का क्रम है, राहुल जी किसी धर्म या विचारधारा के दायरे में बँध नहीं सके। ‘मज्झिम निकाय’ के सूत्र का हवाला देते हुए राहुल जी ने अपनी ‘जीवन यात्रा’ में इस बौध धर्म पर अपने हिंदी साहित्य का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है-
“बड़े की भाँति मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह पार उतरने के लिए है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं-तो मालूम हुआ कि जिस चीज़ को मैं इतने दिनों से ढूँढता रहा हूँ, वह मिल गयी”।

बौध धर्म पर उनके कुछ हिंदी लेखन निम्न प्रकार से हैं
*  बुद्धचर्या’ (1930 ई.)
*  धम्मपद’ (1933 ई.)
*  विनय पिटक’ (1934 ई.)
*  महामानव बुद्ध’ (1956 ई.)
*  मज्झिम निकाय – हिंदी अनुवाद (1933)
*  दिघ निकाय –  हिंदी अनुवाद  (1935 ई.)
*  संयुत्त निकाय –  हिंदी अनुवाद
*  ऋग्वैदिक आर्य
*  दर्शन दिग्दर्शन
*  तुम्हारी  क्षय – भारतीय जाती व्यवस्था, चल चलन पर व्यंग

घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो अप्रैल १९६३ में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और १४ अप्रैल, १९६३ को सत्तर वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।राहुल जी घुमक्कड़ी के बारे मे कहते हैं:

“मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दुख में हो चाहे सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़–फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया। जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव–वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहायी है, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हरगिज नहीं चाहेंगे कि वे खून के रास्ते को पकड़ें। किन्तु घुमक्कड़ों के काफले न आते जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।”

पुरस्कार
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को सन् 1958 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ और सन् 1963 भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।

मृत्यु
राहुल सांकृत्यायन को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को ले जाया गया। मार्च, 1963 में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और  अप्रैल, 1963 को सत्तर वर्ष की आयु में संन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया।

 

 


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BABA SAHAB Dr B R Ambedkar



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Dr S.L. Dhani (IAS-retd.)

drslldhani185@gmail.com

 

Published on 16 Jul 2013

Interviewed by Nikhil Sablania.

Dr SL Dhani is one of the prominent writer from India who has done an immense work on the analysis of Hindu mythological texts and Indian bureaucracy.

Dr. S L Dhani’s most important Contribution to modern knowledge is the synthesis of modern science and ancient Vedic religion through propounding of Manvantara Theory of Evolution of Solar Syatem and the Universe.
Manvantara Theory of Evolution of Universe was propounded by S L Dhani, and first presented by him before Theosophical Society, Chandigarh , in 1975. His paper on the subject had the distinction of being the only paper to be extensively covered in the National Dailies of India, and making him internationally acquainted.
Then, the theory was presented, on invitation in, inter alia, International Seminar on Theosophy and Science, organized by the World Theosophical Society in 1975 and later on in International Seminar on Aryabhata, organized by Indian National Science Academy in November, 1976.

Bio: Ex-Commissioner and Secy to Haryana Govt. Retired in 1989. Propounded Manvantara Theory of Evolution of Universe, in 1975, which was presented to Indian National Science Academy, on invitation in its first international seminar. in Nov, 1976. Got PhD at age of 56. Enrolled as Advocate at age 76. Recipient of Ambedkar National Award (1985); Featured by BBC in its Overseas Program in 1979 (Interview recorded in Lester (UK); Author of Politics of Gods (1984); Socio-Political Analysis of Manu-Smriti (1987); and that of “Dr. B R Ambedkar:Man of Millennium for Social Justice: (2007); Poet, Reviewer, Critic.

IAS (R), Advocate; MA PhD LL B MDPA; Certificat​e from Cranfield School of Management​, Cranfield (UK), 1979; Recipient of President of India’s Silver Medal (1971); and of Babasaheb Dr. B R Ambedkar National Award (1985) Manvantara Theory of Evolution of Univesrse, based on Vedas and Puranas (1975); Authored Politics of Gods: Churning of the Ocaen (1984);and Hindu Scheme of Things: Socio-Poli​tical Analysis of Manusmriti (1987), debated in The Tribune,, Chandigarh​;. Published Indian Freedom Struggle New Insigh551218_385305801510569_1531122496_n

========+++++++==Dr S.L. Dhani (IAS-r) with President of INDIA Shri Gyani ZAIL Singh=======================dr SL Dhani

Dr Dhani’s Seminar on History of Baujan/Buddhism struggle, A must listen

http://www.youtube.com/watch?v=5RJ8XsSdgew

THIS PAGE IS DEDICATED TO ARTICLES AND WRITINGS BY BAUJAN WRITER DR SUKH LAL DHANI

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Philosophy of Administration: Mythological Interpretation, by Dr Sukh Lal Dhani

interview by Nikhil Sablaniya

Dr Sukh LAL DHANI – BAHUJAN Philosopher and writer who interpreted BRAHMIN MYTHOLOGY as established that all that literature was to oppress BAHUJAN of BHARAT

Political BUDDHA of BAHUJANS- SAHAB KANSHIRAAM

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Udit Raj

5 thoughts on “H: मूलनिवासी/बौद्ध महापुरुष

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