नई दिल्ली में तुगलकाबाद में जो में 510 वर्ष पुराना गुरु रविदास जी का मंदिर तोड़ दिया गया था उसपर बहुजन समाज के जबरदस्त संगर्ष के बाद कोर्ट का फैसला आ गया है, अब मंदिर वही दोबारा बनाया जायेगा , हालाँकि कितना बड़ा और कितनी जगह में बनेगा इसकी गाइडलाइन कोर्ट ने तय कर दी है …source TIMES OF INDIA news

नई दिल्ली में तुगलकाबाद में जो में 510 वर्ष पुराना गुरु रविदास जी का मंदिर तोड़ दिया गया था उसपर बहुजन समाज के जबरदस्त संगर्ष के बाद कोर्ट का फैसला आ गया है, अब मंदिर वही दोबारा बनाया जायेगा , हालाँकि कितना बड़ा और कितनी जगह में बनेगा इसकी गाइडलाइन कोर्ट ने तय कर दी है …source TIMES OF INDIA news

 

राजस्थान में बहुजन समाज के एक जोड़े अजय जाटव और बबिता ने पंडित के बिना डॉ अम्बेडकर और गौतम बुद्ध के समक्ष संविधान की शपथ लेकर शादी की,घोड़ी बग्गी पर शोभा यात्रा निकली, मेहमानों को संविधान की कॉपी और पौधा गिफ्ट किया, उस गांव में ३०००० रूपए की लाइब्रेरी की किताबें दान की, प्लास्टिक फ्री इंतज़ाम ……टाइम्स ऑफ़ इंडिया 17/10/2019

राजस्थान में बहुजन समाज के एक जोड़े अजय जाटव और बबिता ने पंडित के बिना डॉ अम्बेडकर और गौतम बुद्ध के समक्ष संविधान की शपथ लेकर शादी की,घोड़ी बग्गी पर शोभा यात्रा निकली, मेहमानों को संविधान की कॉपी और पौधा गिफ्ट किया, उस गांव में ३०००० रूपए की लाइब्रेरी की किताबें दान की, प्लास्टिक फ्री इंतज़ाम टाइम्स ऑफ़ इंडिया

कहानी – बौद्ध शब्द ‘अविद्या’ का क्या मतलब होता है ?

🤔अविद्या🤔

एक बार राजा ने अपने मंत्री से पूछा की यह बौद्ध शब्द ‘अविद्या’ का क्या मतलब होता है ?

मंत्री ने बोला कि आप मुझे 4 दिनकी छुट्टी दे दो फिर मैं आपको बताऊंगा !

राजा राजी हो गया और उसने चार दिनों की छुट्टी दे दी !

मंत्री मोची के पास गया और बोला कि भाई जूती बना दो,मोची ने नाप पूछी तो मंत्री ने बोला भैया ये नाप वाप कुछ नहीं। डेढ़ फुट लंबी और एक बित्ता चौड़ी बना दो,और इसमें हीरे जवाहरात जड देना । सोने और चांदी के तारों से सिलाई कर देना और हाँ पैसे वैसे चिंता मत करना जितना मांगोगे उतना मिलेगा।

तो मोची ने भी कहा ठीक है भैया तीसरे दिन ले लेना !

तीसरे दिन जूती मिली तब पेमेंट देने के पहले मंत्री ने उस मोची से एक ठोस आश्वासन ले लिया कि वह किसी भी हालात में इस जूती का किसी से भी कभी भी जिक्र नहीं करेगा यानि हर हालात में अनजान बना रहेगा ।

अब मंत्री ने एक जूती अपने पास रख लिया और दूसरी पूजास्थल में फेंक दिया। जब सुबह पुजारी पूजा के आया तो उसको वो जूती वहाँ पर मिली ।

पुजारी ने सोचा यह जूती किसी इंसान की तो हो ही नहीं सकती जरूर ईश्वर यहाँ आया होगा और उसकी छूट गई होगी।

तो उसने वह जूती अपने सर पर रखी, मत्थे में लगाई पूजा की और खूब जूती को चूमा ।

क्यों ?

क्योंकि वह जूती ईश्वर का था ना ।

वहां मौजूद सभी लोगों को दिखाया सब लोग बोलने लगे कि हां भाई यह जूती तो ईश्वर की रह गई उन्होंने भी उसको सर पर रखा और खूब चूमा।

यह बात राजा तक गई।

राजा ने बोला, मुझे भी दिखाओ ।

राजा ने देखा और बोला यह तो ईश्वर की ही जूती है।

उसने भी उसे खूब चूमा, सर पर रखा और बोला इसे पूजास्थल में ही अच्छी तरह अच्छे स्थान पर रख दो !

मंत्री की छुट्टी समाप्त हुई, वह आया बादशाह को सलाम ठोका और उतरा हुआ मुंह लेकर खड़ा हो गया।

अब राजा ने मंत्री से पूछा कि क्या हो गया मुँह क्यों बना रखा है।

तो मंत्री ने कहा राजासाहब हमारे यहां चोरी हो गई ।

राजा बोला – क्या चोरी हो गया ?

मंत्री ने उत्तर दिया – हमारे परदादा की जूती थी चोर एक जूती उठा ले गया । एक बची हैः

राजा ने पूछा कि क्या एक जूती तुम्हारे पास ही है ?

मंत्री ने कहा – जी मेरे पास ही है ।उसने वह जूती राजा को दिखाई । राजा का माथा ठनका और उसने पूजास्थल से दूसरी जूती मंगाई और बोला या ईश्वर मैंने तो सोचा कि यह जूती ईश्वर की है मैंने तो इसे चाट चूम के चिकनी बना डाली

मंत्री ने कहा राजा साहब यही है ‘अविद्या’ ।

यह कहानी कई मतों, संप्रदाय धर्मों पर बिल्कुल सही बैठती है ।

पता कुछ भी नहीं और भेड़ चाल में चले जा रहे है।

अविधा का मतलब है अपना दिमाग लगाए बिना सोचे समझे बिना मान लेना, न जानने न सोचने न समझने की अवस्था ही अविद्या है

गौतम बुद्ध की तस्वीर और मूर्तियां कैसी होनी चाहिए,बंद या खुली आंख में क्या फर्क है- Hindi Buddhism

 

गौतम बुद्ध की मूर्ती में निम्न कमिया नहीं होनी चाहिए

– शरीर के बिना केवल सर की फोटो या मूर्ती गलत है, कई बौद्ध देशों में ये बैन है
– तस्वीर या फोटो में सर झुका नहीं होना चाहिए

इसके आलावा नवबौद्धों की मान्यता अनुसार:

– हाथ में भीख का कटोरा नहीं बल्कि धम्मपद या त्रिपिटक की किताब होनी चाहिए, भीक का कटोरा कमजोरी का प्रतीक है , और कमजोरी से बड़ा और कोई दुःख नहीं
– तस्वीर या फोटो की आंके बंद नहीं होने चाहिए, बाबा सहन ने खुली आँख वाली तस्वीर बनाकर इस चलन को शुरू किया था

 

कहानी – हम सब मुरखलाल तो नही ? ….एक राजा को देवताओं के कपड़े पहनने का शौक चढ़ा, फिर पुरोहितों ने राजा के साथ क्या कांड किया जानने के लिए पढ़े ये कहानी, और सोचो समझो जब राजा के साथ पुरोहित ये कर सकते हैं तो आम जनता के साथ क्या करते होंगे।।

हम सब मुराखलाल तो नही ? (कहानी)

एक राजा था एक बार उसे देवताओं के कपड़े पहनने का शौक चढ़ा तो उसने अपने पुरोहितों को दिल की बात बताई पुरोहित जानते थे कि राजा की इच्छा पूर्ति करना उनके लिए कितना जरूरी है ? उन्हें लोगों को उल्लू बनाने में महारथ भी हासिल थी इसलिए उन्होंने राजा से कहा की आप पूजा का इंतजाम शुरू कीजिए 10 दिन के बाद हमारी पूजा से खुश होकर देवता अपने वस्त्र प्रदान कर देंगे.

भव्य आयोजन शुरू हुआ पूरे शहर में ढिंढोरा पिटवा दिया गया राज्य की जनता पूजा खत्म होने का इंतजार करने लगी आखिरकार वह घड़ी आ गई जब हवन कुंड में आखिरी आहुति दी गई अब राजा के सब्र का बांध टूट चुका था तभी पुजारी ने हवन कुंड के आगे अपना हाथ उठाया और राजा से कहा कि महाराज मुबारक हो वस्त्र मिल गए हैं लेकिन राजा ने देखा कि पुजारी के हाथ मे तो कुछ नही था.

अब पुजारी बोला कि देवताओं के वस्त्र वही देख सकता है जो अपने पिता की असली संतान हो इतना कहने भर से सभा मे उपस्थित ज्यादातर लोगों को देवताओं के वस्त्र दिखाई देने लगे वे उन कपड़ों की तारीफ में कसीदे पढ़ने लगे राजा को अपने डीएनए पर शक उतपन्न होने लगा अगर वो कहता कि वस्त्र नही दिख रहे तो बाकी लोगों को भी उसके डीएनए का राज मालूम हो जाता इसलिए वह भी वस्त्रों की तारीफ में कसीदे पढ़ने लगा अब जब राजा को वस्त्र दिखने लगे तो बाकी दरबारी लोगों ने भी राजा के सुर में सुर मिला दिया.

समस्या तब शुरू हुई जब पुजारी ने कहा कि इन पवित्र वस्त्रों को आपको पहनना ही पड़ेगा चाहे एक बार ही सही लेकिन पहनना तो पड़ेगा वर्ना देवता नाराज हो जाएंगे.

अब राजा ने मजबूरन स्नान किया और उन अदृश्य कपड़ों को पहन लिया जब वह देवताओं के वस्त्रों को पहनकर दरबार मे पहुंचा तो राजा की जय जयकार शुरू हो गई सबको अपने डीएनए पर शक हो गया सब इसी निष्कर्ष पर पहुंचे की बाकी लोगों को राजा देवताओं के वस्त्र में दिख रहा है केवल मुझे ही राजा नँगा दिख रहा है इसका अर्थ यह है कि मैं अपने पिता की संतान नही हूँ.

अब पुजारी ने राजा से कहा कि इतने खूबसूर वस्त्रों में आपको नगर भृमण करना चाहिए ताकि जनता भी देवताओं के पवित्र वस्त्रों का दर्शन कर सके.

शहर में ढिंढोरा पिटवा दिया गया राजा देवताओं के वस्त्र में नगर पधार रहे हैं लेकिन उनके वस्त्र केवल उसी को दिखाई देंगे जो अपने असली बाप की संतान होगा.

रथ पर बैठा नँगा राजा जनता की भीड़ के बीच से गुजरता हुआ पूरी तरह आश्वस्त था कि उसने तो देवताओं के वस्त्र पहने हैं और पूरी जनता इन बेशकीमती वस्त्रों को देखकर जय जयकार कर रही है यानी कि वस्त्र तो असली हैं लेकिन मैं नही.

जनता की इसी भीड़ में मुराखलाल अपने बच्चे को कंधे पर उठाए हुए राजा के वहां से गुजरने की प्रतीक्षा में खड़ा था राजा को देखते ही पिता के कंधे पर सवार बालक चिल्लाने लगा कि राजा तो नँगा है राजा तो नंगा है.

भीड़ की निगाहें उस बालक की ओर गईं और सबने जोर से कहा कि ये बालक तेरा नही है मुराखलाल, इसकी माँ से पूछ इसका असली बाप कौन है ?

असली मूर्ख कौन ? पुरोहित राजा दरबारी जनता या मूरखलाल ?

26 सितंबर 2019 दो दलित बच्चों को खुले में शौच के कारन पीट पीट के मार डालने वाली घटना ने ये साबित किया है की जातिवादिओं के मन में किस कदर आज भी घृणा भरी हुई है,आखिर ये लोग इतनी घृणा लाते कहाँ से हैं , जबकि आये दिन प्रताड़ित होने वाले दलित आज तक इनके लिए अपने मन में घृणा नहीं ला पाए

जातिवाद है सबसे बड़ा आतंकवाद, इस बात को धीरे धीरे भारत का एक बड़ा तबका समझने लगा है, नीचे दिए हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के कार्टून में ये बताने की कोशिश की गयी है की आतंकवाद को जरूरत से ज्यादा ही बढ़ा खतरा प्रचारित किया जाता है जबकि जातिवाद इससे कहीं बड़ा खतरा है

दो दलित बच्चों को खुले में शौच के कारन पीट पीट के मार डालने वाली घटना ने ये साबित किया है की जातिवादिओं के मन में किस कदर आज भी घृणा भरी हुई है,आखिर ये लोग इतनी घृणा लाते कहाँ से हैं , जबकि आये दिन प्रताड़ित होने वाले दलित आज तक इनके लिए अपने मन में घृणा नहीं ला पाए

मध्यप्रदेश के शिवपुरी में दो दलित बच्चों को कुछ लोगों ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया।पूछताछ में एक आरोपी ने बोलै है की भगवन का आदेश हुआ है की राक्षशों का सर्वनाश कर दो|

मध्यप्रदेश के शिवपुरी ज़िले में खुले में शौच कर रहे दो दलित बच्चों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई है.

मामला ज़िले के सिरसौद थाना क्षेत्र के भावखेड़ी गांव का है. जहां पर बुधवार की सुबह वाल्मीकि समाज के दो बच्चे, रोशनी जिसकी उम्र 12 साल और अविनाश जिसकी उम्र 10 साल बताई जा रही है, पंचायत भवन के सामने सड़क पर शौच कर रहे थे.

पुलिस के मुताबिक़ हाकिम ने दोनों बच्चों को सड़क पर शौच करने से मना किया और कहा कि सड़क को गंदा कर रहे हो. उसके बाद उसने रामेश्वर के साथ मिलकर हमला कर दिया.

पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है. जानकारी के मुताबिक़ दोनों नाबालिग रिश्ते में बुआ और भतीजे थे.

घटना के बाद तनाव की वजह से क्षेत्र में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है. अविनाश के पिता मनोज वाल्मीकि ने दावा किया, “दोनों सुबह 6 बजे शौच के लिये निकले थे. हाकिम और रामेश्वर यादव ने उनकी लाठियों से पिटाई की. उन्होंने दोनों को तब तक मारा जब तक उनकी मौत नहीं हो गई. जब मैं वहा पहुंचा तो दोनों वहा से भाग गये थे.”

https://www.bbc.com/hindi/india-49832690

 

दलित बच्चों की पीट-पीटकर हत्या पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्य सरकारों पर हमला बोला है। मायावती ने इसको लेकर एक ट्वीट किया और सरकार पर हमला बोला। मायावती ने ट्वीट में लिखा, ‘देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों व धार्मिक अल्पसंख्यकों को सरकारी सुविधाओं से काफी वंचित रखने के साथ-साथ उन्हें हर प्रकार की द्वेषपूर्ण जुल्म-ज्यादतियों का शिकार भी बनाया जाता रहा है और ऐसे में मध्य प्रदेश के शिवपूरी में 2 दलित युवकों की नृशंस हत्या अति-दुःखद व अति-निन्दनीय।’

मानव जीवन में दुखों की मुक्ति का रास्ता है सिर्फ बौद्ध दर्शन का मध्यम मार्ग – अरविन्द आलोक

जब हम बुद्ध द्वारा कही गई बातों का मनन करते हैं , तो जो बात सबसे पहले हमारे मन को छूती है , वह है उनके द्वारा मानव मन को दी गई स्वतंत्रता। मन की प्रधानता पर जितना जोर बुद्ध ने दिया , उतना शायद ही किसी और ने दिया हो। उन्होंने कहा कि जैसे गाड़ी का पहिया बैल के पैरों के पीछे-पीछे घूमता है , उसी तरह हमारे जीवन का कार्य व्यापार हमारे मन के पीछे-पीछे चलता है। ‘ इसका आशय यह है कि मन के मुताबिक ही हर कार्य संपन्न होता है।

कर्म पर आप कितना भी बल दें , उससे क्या लाभ , जब मन ही स्वस्थ और स्वच्छ न हो। सुमार्ग पर जाना बहुत ही कठिन है , यदि मन गुस्सा या मैला हो। मन के द्वारा ही मानवीय गुणों को सीखा और सींचा जा सकता है। जीवन के आदर्शों को अपनाने में मन का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि मन की बुराइयों को दूर कर मन लायक संस्कार गढ़ें।

बौद्ध दर्शन में ऐसे मूल्यों को प्राप्त करना और उन्हें अपनी दिनचर्या में लागू करने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता होती है- वह है अष्टांगिक मार्ग। अष्टांगिक मार्ग का अर्थ है आठ अंगों वाला मार्ग , आठ तत्वों वाला मार्ग। ऐसी राह जिस पर चलने के लिए आठ बातों का ध्यान रखना है। वे आठ बातें कौन कौन सी हैं ? वे हैं सम्यक दृष्टि , सम्यक वचन , सम्यक काम , सम्यक आजीव , सम्यक व्यायाम , सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इन्हीं को मिला देने से अष्टांगिक मार्ग बन जाता है। अष्टांगिक मार्ग पर चलने से सभी मानवीय मूल्यों का स्वयं ही मन में विकास हो जाता है।

व्यक्ति मानव के सबसे अच्छे संस्कारों से ओतप्रोत हो कर सम्यक जीवन जीना सीखता है। इस अष्टांगिक मार्ग को ही बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा , जिस पर चलना बहुत कठिन नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस मार्ग पर चल सकता है और चलकर सुखी जीवन जी सकता है।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग का रास्ता दिखा कर मानव का बहुत बड़ा हित किया। जब सभी लोग और सभी देश अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और कोई भी किसी से कम नहीं होने की बात कर रहा है- ऐसे में ‘ मध्यम मार्ग ‘ एक बहुत बड़ा समाधान हो सकता है मानव और विश्व की सारी परेशानियों को दूर करने का। बीच का रास्ता अपनाओ और सभी बाधाओं को पार कर जाओ-यही मूल मंत्र है सम्यक जीवन जीकर परम लक्ष्य को प्राप्त करने का। मध्यम मार्ग अपनाने से व्यक्ति के मन को कोई ठेस नहीं पहुंचती। उसका सम्मान रह जाता है और टकराव तथा संताप की स्थिति भी पैदा नहीं होती। इसके विपरीत हमें मैत्री और सद्भाव का लाभ मिलता है।

इसी भाव से तो विश्व में शान्तिपूर्ण मानव समाज के विचार को साकार करने में सफलता मिलेगी। नई पीढ़ी के लिए तो बुद्ध का यह दर्शन सबसे ज्यादा उपयोगी है। उसे मन की स्वतंत्रता देकर भविष्य के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। कुंठाओं में डूबे युवा न तो अपने आप का विकास कर सकते हैं और न देश का। स्वतंत्र मन के माध्यम से ही स्वतंत्र समाज और संपन्न राष्ट्र की बात की जा सकती है।

बंधा हुआ और विचलित मन कभी पर्याप्त परिणाम और परिमाण नहीं दे सकता। इसलिए जरूरी है कि नई पीढ़ी को हम आजादी दें , बंधन मुक्त करें। लेकिन कितनी स्वतंत्रता दें ? क्या पूरी तरह से छोड़ दें ? नहीं , मध्य मार्ग पर रहें- वीणा के तार को थोड़ा कसें , थोड़ा ढील दें। लेकिन आजाद हो कर युवा पीढ़ी भी क्या करे ? इस स्वतंत्रता के उपभोग में भी मध्यम मार्ग का अनुसरण उपयोगी है। क्योंकि मध्यम मार्ग जहां हमारे मन के मान की रक्षा करता है , वहीं अनेकानेक कुविचारों से भी बचाता है। अच्छे कर्मों का संचय और बुरे कार्यों का त्याग-मध्यम मार्ग के माध्यम से ही सम्भव है।

इसके लिए ‘ मिलाजुला कर ‘ कह सकते हैं कि ‘ मध्यम मार्ग ही मानव की मुक्ति का मार्ग है! ‘ वही मानव को जीवन सागर पार कराने वाला यान भी है , चाहे आप संसारी की तरह जीवन का सुख पाना चाहें या निर्वाण ही प्राप्त करना चाहें।

Source

https://hindi.speakingtree.in/article/content-246850