प्रश्न: भगवान बुद्ध ने कहा है: अपने दीए आप बनो। तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं है? गुरु तो बुद्ध जैसे व्यक्ति ही होते हैं, जो कहते हैं, अप्प दीपो भव! – ओशो

“अप्प दीपो भव:” – ओशो

प्रश्न: भगवान बुद्ध ने कहा है: अपने दीए आप बनो। तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं है?

यह जानने को भी तुम्हें बुद्ध के पास जाना पड़ेगा न!-अपने दीए आप बनो। इतनी ही जरूरत है गुरु की। गुरु तुम्हारी बैसाखी नहीं बनने वाला है। जो बैसाखी बन जाए तुम्हारी, वह तुम्हारा दुश्मन है, गुरु नहीं है। क्योंकि जो बैसाखी बन जाए तुम्हारी, वह तुम्हें सदा के लिए लंगड़ा कर देगा। और अगर बैसाखी पर तुम निर्भर रहने लगे, तो तुम अपने पैरों को कब खोजोगे? अपनी गति कब खोजोगे? अपनी ऊर्जा कब खोजोगे?

जो तुम्हें हाथ पकड़कर चलाने लगे, वह गुरु तुम्हें अंधा रखेगा। जो कहे: मेरा तो दीया जला है; तुम्हें दीया जलाने की जरूरत क्या? देख लो मेरी रोशनी में। चले आओ मेरे साथ। उस पर भरोसा मत करना। क्योंकि आज नहीं कल रास्ते अलग हो जाएंगे। कब रास्ते अलग हो जाएंगे, कोई भी नहीं जानता। कब मौत आकर बीच में दीवाल बन जाएगी। कोई भी नहीं जानता। तब तुम एकदम घुप्प अंधेरे में छूट जाओगे। गुरु की रोशनी को अपनी रोशनी मत समझ लेना। ऐसी भूल अक्सर हो जाती है।

सूफियों की कहानी है कि दो आदमी एक रास्ते पर चल रहे हैं। एक आदमी के हाथ में लालटेन है। और एक आदमी के हाथ में लालटेन नहीं है। कुछ घंटों तक वे दोनों साथ-साथ चलते रहे हैं। आधी रात हो गयी। मगर जिसके हाथ में लालटेन नहीं है, उसे इस बात का खयाल भी पैदा नहीं होता कि मेरे हाथ में लालटेन नहीं है। जरूरत क्या है? दूसरे आदमी के हाथ में लालटेन है। और रोशनी पड़ रही है। और जितना जिसके हाथ में लालटेन है उसको रोशनी मिल रही है, उतनी उसको भी मिल रही है जिसके हाथ में लालटेन नहीं है। दोनों मजे से गपशप करते चले जाते हैं। फिर वह जगह आ गयी, जहां लालटेन वाले ने कहा: अब मेरा रास्ता तुमसे अलग होता है। अलविदा। फिर घुप्प अंधेरा हो गया।

आज नहीं कल गुरु से विदा हो जाना पड़ेगा। या गुरु विदा हो जाएगा। सदगुरु वही है, जो विदा होने के पहले तुम्हारा दीया जलाने के लिए तुम्हें सचेत करे। इसलिए बुद्ध ने कहा है: अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनो। यह भी जिदंगीभर कहा, लेकिन नहीं सुना लोगों ने। जिन्होंने सुन लिया, उन्होंने तो अपने दीए जला लिए। लेकिन कुछ इसी मस्ती में रहे कि करना क्या है! बुद्ध तो हैं। आनंद से कही यह बात उन्होंने। आनंद भी उन्हीं नासमझों में एक था, जो बुद्ध की रोशनी में चालीस साल तक चलता रहा। स्वभावतः, चालीस साल तक रोशनी मिलती रहे, तो लोग भूल ही जाएंगे कि अपने पास रोशनी नहीं है; कि हम अंधे हैं। चालीस साल तक किसी जागे का साथ मिलता रहे, तो स्वभावतः भूल हो जाएगी। लोग यह भरोसा ही कर लेंगे कि हम भी पहुंच ही गए। रोशनी तो सदा रहती है। भूल-चूक होती नहीं। भटकते नहीं। गड्ढों में गिरते नहीं। और आनंद बुद्ध के सर्वाधिक निकट रहा। चालीस साल छाया की तरह साथ रहा। सुबह-सांझ, रात-दिन। चालीस साल में एक दिन भी बुद्ध को छोड़कर नहीं गया। बुद्ध भिक्षा मांगने जाएं, तो आनंद साथ जाएगा। बुद्ध सोएं, तो आनंद साथ सोएगा। बुद्ध उठें, तो आनंद साथ उठेगा। आनंद बिलकुल छाया था। भूल ही गया होगा। उसको हम क्षमा कर सकते हैं। चालीस साल रोशनी ही रोशनी! उठते-बैठते रोशनी। जागते-सोते रोशनी। भूल ही गया होगा। फिर बुद्ध का अंतिम दिन आ गया। रास्ते अलग हुए। और बुद्ध ने कहा कि अब मेरी आखिरी घड़ी आ गयी। अब मैं विदा लूंगा। भिक्षुओ! किसी को कुछ पूछना हो, तो पूछ लो। बस, आज मैं आखिरी सांस लूंगा।

जिन्होंने अपने दीए जला लिए थे, वे तो शांत अपने दीए जलाए बैठे रहे परम अनुग्रह से भरे हुए-कि न मिलता बुद्ध का साथ, तो शायद हमें याद भी न आती कि हमारे भीतर दीए के जलने की संभावना है, तो भी हमने न जलाया होता। हमें यह भी पता होता कि संभावना है, जल भी सकता है, तो विधि मालूम नहीं थी।
आखिर दीया बनाना हो, तो विधि भी तो होनी चाहिए! बाती बनानी आनी चाहिए। तेल भरना आना चाहिए। फिर दीया ऐसा होना चाहिए कि तेल बह न जाए। फिर दीए की सम्हाल भी करनी होती है। नहीं तो कभी बाती तेल में ही गिर जाएगी और दीया बुझ जाएगा। वह साज-सम्हाल भी आनी चाहिए; विधि भी आनी चाहिए। फिर चकमक पत्थर भी खोजने चाहिए। फिर आग पैदा करने की कला भी होनी चाहिए।

तो अनुग्रह से भरे थे। जिन्होने पा लिया था, वे तो शांत, चुपचाप बैठे रहे। गहन आनंद में, गहन अहोभाव में। आनंद दहाड़ मारकर रोने लगा। उसने कहा: यह आप क्या कह रहे हैं। यह कहो ही मत। मेरा क्या होगा? आ गया रास्ता अलग होने का क्षण। आज उसे पता चला कि ये चालीस साल मैं तो अंधा ही था। यह रोशनी उधार थी। यह रोशनी किसी और की थी। और यह विदाई का क्षण आ गया। और विदाई का क्षण आज नहीं कल, देर-अबेर आएगा ही। तब बुद्ध ने कहा था: आनंद! कितनी बार मैंने तुझसे कहा है, अप्प दीपो भव! अपना दीया बन। तू सुनता नहीं। अब तू समझ। चालीस साल निरंतर कहने पर तूने नहीं सुना, इसलिए रोना पड़ रहा है। देख उनको, जिन्होंने सुना। वे दीया बने शांत अपनी जगह बैठे हैं। बुद्ध के जाने से एक तरह का संवेग है। इस अपूर्व मनुष्य के साथ इतने दिन रहने का मौका मिला। आज अलग होने का क्षण आया। तो एक तरह की उदासी है। मगर दहाड़ मारकर नहीं रो रहे हैं। क्योंकि यह डर नहीं है कि अंधेरा हो जाएगा। अपना-अपना दीया उन्होंने जला लिया है।

तुम पूछते हो: ‘भगवान बुद्ध ने कहा, अपने दीए आप बनो, तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं हैं?’

यह जरा नाजुक सवाल है। नाजुक इसलिए कि एक अर्थ में जरूरत है और एक अर्थ में जरूरत नहीं है। इस अर्थ में जरूरत है कि तुम अपने से तो शायद जाग ही न सकोगे; तुम्हारी नींद बड़ी गहरी है। कोई तुम्हें जगाए। लेकिन इस अर्थ में जरूरत नहीं है कि किसी दूसरे के जगाने से ही तुम जाग जाओगे। जब तक तुम ही न जागना चाहो, कोई तुम्हें जगा न सकेगा। और अगर तुम जागना चाहो, तो बिना किसी के जगाए भी जाग सकते हो, यह संभावना है। बिना गुरु के भी लोग पहुंचे हैं। मगर इसको जड़ सिद्धांत मत बना लेना कि बिना गुरु के कोई पहुँच गया, तो तुम भी पहुंच जाओगे।

मेरे पास लोग आ जाते हैं। वे कहते हैं: आपसे एक सलाह लेनी है। अगर गुरु न बनाएं, तो हम पहुंच सकेंगे कि नहीं? मैंने कहा कि तुम इतनी ही बात खुद नहीं सोच सकते; इसके लिए भी तुम मेरे पास आए! तुमने गुरु तो बना ही लिया! गुरु का मतलब क्या होता है? किसी और से पूछने गए; यह भी तुम खुद न खोज पाए!

मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि आपका गुरु कौन था? हमने तो सुना कि आपका गुरु नहीं था! जब आपने बिना गुरु के पा लिया, तो हम क्यों न पा लेंगे? मैं उनसे कहता हूं: मैं कभी किसी से यह भी पूछने नहीं गया कि बिना गुरु के मिलेगा कि नही! तुम जब इतनी छोटी सी बात भी खुद निर्णय नहीं कर पाते हो, तो उस विराट सत्य के निर्णय में तुम कैसे सफल हो पाओगे?

तो एक अर्थ में गुरु की जरूरत है। और एक अर्थ में नहीं है। अगर तुम्हारी अभीप्सा प्रगाढ़ हो, तो कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जरूरत या गैर-जरूरत, इसकी समस्या क्यों बनाते हो? जितना मिल सके किसी से ले लो। मगर इतना ध्यान रखो कि दूसरे से लिए हुए पर थोड़े दिन काम चल जाएगा। अंततः तो अपनी समृद्धि खुद ही खोजनी चाहिए। किसी के कंधे पर सवार होकर थोड़ी देर चल लो, अंततः तो अपने पैरों का बल निर्मित करना ही चाहिए। रास्ता सीधा-साफ है। प्रबल प्यास हो, तो अकेले भी पहुंच जाओगे। रास्ता इतना सीधा-साफ है कि इस पर किसी के भी साथ की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन अगर अकेले पहुंचने की हिम्मत न बनती हो, तो थोड़े दिन किसी का साथ बना लेना। लेकिन साथ को बंधन मत बना लेना। फिर ऐसा मत कहना कि बिना साथ के हम जाएंगे ही नहीं। नहीं तो तुम कभी न पहुंचोगे। क्योंकि सत्य तक तो अंततः अकेले ही पहुंचना होगा। एकांत में ही घटेगी घटना। उस एकांत में तुम्हारा गुरु भी तुम्हारे साथ मौजूद नहीं होगा।

गुरु तुम्हें संसार में मुक्त होने में सहयोगी हो सकता है। लेकिन परमात्मा से मिलने में सहयोगी नहीं हो सकता। संसार से छुड़ाने में सहयोगी हो जाएगा। संसार छूट जाए, तो फिर तुम्हें एकांत में परमात्मा से मिलना होगा। वह मिलन भीड़-भाड़ में नहीं होता।

किस कदर सीधा सहल साफ है यह रास्ता देखो
न किसी शाख का साया है, न दीवार की टेक
न किसी आंख की आहट, न किसी चेहरे का शोर 
न कोई दाग जहां बैठ के सुस्ताए कोई 
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं
चंद कदमों के निशां, हां, कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फकत चंद कदम 
और फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिए आप चलो, तन्हा, अकेले 
साथ आए जो यहां कोई नहीं, कोई नहीं
किस कदर सीधा सहल साफ है यह रस्ता देखो

थोड़ी दूर किसी के कदम के साथ चल लो, ताकि चलना आ जाए। मंजिल नहीं आती इससे, सिर्फ चलने की कला आती है। थोड़ी दूर किसी के पग-चिन्हों पर चल लो, ताकि पैरों को चलने का अभ्यास हो जाए। इससे मंजिल नहीं आती; मंजिल तो तुम्हारे ही चलने से आएगी; किसी और के चलने से नहीं। मेरी आंख से तुम कैसे देखोगे? हां, थोड़ी देर को तुम मेरी आंख में झांक सकते हो। तुम मेरे हृदय से कैसे अनुभव करोगे? हां, थोड़ी देर किसी गहन भाव की दशा में तुम मेरे हृदय के साथ धड़क सकते हो। निश्चित ही किसी प्रेम की घटना में थोड़ी देर को तुम्हारा हृदय और मेरा हृदय एक ही लय में बद्ध हो सकते हैं। उस समय क्षणभर को तुम्हें रोशनी दिखेगी। उस समय क्षणभर को आकाश खुला दिखायी पड़ेगा; सब बादल हट जाएंगे। लेकिन यह थोड़ी ही देर को होगा। अंततः तुम्हें अपने हृदय का सरगम खोजना ही है।

अच्छा है कि तुम्हें परमात्मा तक अकेले ही पहुंचने की संभावना है। नहीं तो किसी पर निर्भर होना पड़ता। और निर्भरता से कभी कोई मुक्ति नहीं आती। निर्भरता तो गुलामी का ही एक अच्छा नाम है। निर्भरता तो दासता ही है। वह दासता की ही दास्तान है-नए ढंग से लिखी गयी; नए लफ़्ज़ों में, नए शब्दों में, नए रूप-रंग से; लेकिन बात वही है।

इसलिए कोई सदगुरु तुम्हें गुलाम नहीं बनाता। और जो गुलाम बना ले, वहां से भाग जाना। वहां क्षणभर मत रुकना। वहां रुकना खतरनाक है। जो तुम्हें कहे कि मेरे बिना तुम्हारा कुछ भी नहीं होगा; जो कहे कि मेरे बिना तुम कभी भी नहीं पहुंच सकोगे; जो कहे: मेरे पीछे ही चलते रहना, तो ही परमात्मा मिलेगा, नहीं तो चूक जाओगे-ऐसा जो कोई कहता हो, उससे बचना। उसे स्वयं भी अभी नहीं मिला है। क्योंकि यदि उसे स्वयं मिला होता, तो एक बात उसे साफ हो गयी होती कि परमात्मा जब मिलता है, एकांत में मिलता है; वहां कोई नहीं होता; कोई दूसरा नहीं होता। उसे परमात्मा तो मिला ही नहीं है; उसने लोगों के शोषण करने का नया ढंग, नयी तरकीब ईजाद कर ली है। उसने एक जाल ईजाद कर लिया है, जिसमें दूसरों की गरदनें फंस जाएंगी। ऐसा आदमी भीड़-भाड़ को अपने पीछे खड़ा करके अहंकार का रस लेना चाहता है। इस आदमी से सावधान रहना। इस आदमी से दूर-दूर रहना। इस आदमी के पास मत आना।

जो तुमसे कहे कि मेरे बिना परमात्मा नहीं मिलेगा, वह महान से महान असत्य बोल रहा है। क्योंकि परमात्मा उतना ही तुम्हारा है, जितना उसका। हां, यह हो सकता है कि तुम जरा लड़खड़ाते हो। वह कम लड़खड़ाता है। या उसकी लड़खड़ाहट मिट गयी है और वह तुम्हें चलने का ढंग, शैली सिखा सकता है। हां, यह हो सकता है कि उसे तैरना आ गया और तुम उसे देखकर तैरना सीख ले सकते हो। लेकिन उसके कंधों का सहारा मत लेना, अन्यथा दूसरा किनारा कभी न आएगा। उसके कंधों पर निर्भर मत हो जाना, नहीं तो वही तुम्हारी बर्बादी का कारण होगा।

इसी तरह तो यह देश बरबाद हुआ। यहां मिथ्या गुरुओं ने लोगों को गुलाम बना लिया। इस मुल्क को गुलामी की आदत पड़ गयी।इस मुल्क को निर्भर रहने की आदत पड़ गयी। यह जो हजार साल इस देश में गुलामी आयी, इसके पीछे और कोई कारण नहीं है। इसके पीछे न तो मुसलमान हैं, न मुगल हैं, न तुर्क हैं, न हूण हैं, न अंग्रेज हैं। इसके पीछे तुम्हारे मिथ्या गुरुओं का जाल है। मिथ्या गुरुओं ने तुम्हें सदियों से यह सिखाया है: निर्भर होना। उन्होंने इतना निर्भर होना सिखा दिया कि जब कोई राजनैतिक रूप से भी तुम्हारी छाती पर सवार हो गया, तुम उसी पर निर्भर हो गए। तुम जी-हुजूर उसी को कहने लगे। तुम उसी के सामने सिर झुकाकर खड़े हो गए। तुम्हें आजादी का रस ही नहीं लगा; स्वाद ही नहीं लगा।

अगर कोई मुझसे पूछे, तो तुम्हारी गुलामी की कहानी के पीछे तुम्हारे गुरुओं का हाथ है। उन्होंने तुम्हें मुक्ति नहीं सिखायी, स्वतंत्रता नहीं सिखाई। काश! बुद्ध जैसे गुरुओं की तुमने सुनी होती, तो इस देश की गुलामी का कोई कारण नहीं था। काश! तुमने व्यक्तित्व सीखा होता, निजता सीखी होती; काश! तुमने यह सीखा होता कि मुझे मुझी होना है; मुझे किसी दूसरे की प्रतिलिपी नहीं होना है; और मुझे अपना दीया खुद बनना है, तो तुम बाहर के जगत में भी पैर जमाकर खड़े होते। यह अपमानजनक बात न घटती कि चालीस करोड़ का मुल्क मुट्ठीभर लोगों का गुलाम हो जाए! कोई भी आ जाए और यह मुल्क गुलाम हो जाए! जरूर इस मुल्क की आत्मा में गुलामी की गहरी छाप पड़ गयी। किसने डाली यह छाप? किसने यह जहर तुम्हारे खून में घोला? किसने विषाक्त की तुम्हारी आत्मा? किसने तुम्हें अंधेरे में रहने के लिए विधियां सिखायीं? तुम्हारे तथाकथित गुरुओं ने। वे गुरु नहीं थे।

गुरु तो बुद्ध जैसे व्यक्ति ही होते हैं, जो कहते हैं, अप्प दीपो भव!

– ओशो

http://www.oshodhara.org.in/blog/2015/08/%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AA-%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A4%B5-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B/

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गौतम बुद्ध और उनके धम्म पर बेहतरीन यूट्यूब हिंदी चैनल पर नया वीडियो : Short Documentary on Buddhist Shrine SANKISSA in HINDI संकिसा- उत्तर प्रदेश-फरुखाबाद में बौद्ध तीर्थ

 

संकिशा अथवा संकिसा भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य के फ़र्रूख़ाबाद जिले के पखना रेलवे स्टेशन से सात मील और मैनपुरी के भोगाओं स्टेशन से १४ किलोमीटर है दूर काली नदी के तट पर, बौद्ध-धर्म स्थान है, इसका प्राचीन नाम संकाश्य है, कहते हैं बुद्ध भगवान स्वर्ग से उतर कर यहीं पर आये थे,हालाँकि स्वर्ग से उतरने वाली बात कहीं भी त्रिपिटक में नहीं लिखी है और जैसा की हम जानते हैं की बुद्ध ने स्वर्ग नर्ग की कल्पना को अस्वीकार कर दिया था तो ऐसे भी उनके स्वर्ग से उतरने वाली बात विरोधी मिलावट के अलावा और कुछ नहीं|

वर्तमान संकिशा एक टीले पर बसा छोटा सा गाँव है, टीला बहुत दूर तक फ़ैला हुआ है, और किला कहलाता है, किले के भीतर ईंटों के ढेर पर बिसहरी देवी का मन्दिर है, बिसहरी देवी गौतम बुद्ध की माँ का नाम था |पास ही अशोक स्तम्भ का शीर्ष है, जिस पर हाथी की मूर्ति निर्मित है, धम्म विरोधियों आताताइयों ने राजनैतिक प्रतिक्रांति में  ने हाथी की सूंड को तोड डाला है।

संकिसा उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद के निकट स्थित आधुनिक संकिस ग्राम से समीकृत किया जाता है हांलंकि भौगोलिक रूप से यह जनपद मैनपुरी  में आता है। कनिंघम ने अपनी कृति ‘द एनशॅंट जिऑग्राफी ऑफ़ इण्डिया’ में संकिसा का विस्तार से वर्णन किया है। संकिसा का उल्लेख महाभारत में किया गया है

उस समय यह नगर पांचाल की राजधानी कांपिल्य से अधिक दूर नहीं था। महाजनपद युग में संकिसा पांचाल जनपद का प्रसिद्ध नगर था। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार यह वही स्थान है, जहाँ बुद्ध, इन्द्र एवं ब्रह्मा सहित स्वर्ण अथवा रत्न की सीढ़ियों से त्रयस्तृन्सा स्वर्ग से पृथ्वी पर आये थे। इस प्रकार गौतम बुद्ध के समय में भी यह एक ख्याति प्राप्त नगर था।

महात्मा बुद्ध का आगमन इसी नगर में महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर यहाँ आये व संघ में स्त्रियों की प्रवृज्या पर लगायी गयी रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर बौद्ध संघ का द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिया गया था। बौद्ध ग्रंथों में इस नगर की गणना उस समय के बीस प्रमुख नगरों में की गयी है। प्राचीनकाल में यह नगर निश्चय ही काफ़ी बड़ा रहा होगा, क्योंकि इसकी नगर भित्ति के अवशेष, जो आज भी हैं, लगभग चार मील (लगभग 6.4 कि.मी.) की परिधि में हैं। चीनी यात्री फ़ाह्यान पाँचवीं शताब्दी के पहले दशक में यहाँ मथुरा से चलकर आया था और यहाँ से कान्यकुब्ज, श्रावस्ती आदि स्थानों पर गया था। उसने संकिसा का उल्लेख सेंग-क्यि-शी नाम से किया है। उसने यहाँ हीनयान और महायान सम्प्रदायों के एक हज़ार भिक्षुओं को देखा था। कनिंघम को यहाँ से स्कन्दगुप्त का एक चाँदी का सिक्का मिला था।

हिंदुत्ववादियों के मेन टारगेट मुस्लिम नहीं, खुद वंचित/गरीब हिन्दू समुदाय है Written by एच.एल.दुसाध (स्कूल और अस्पताल व्यस्था सबके लिए ख़तम हुई है, केवल सेडुल कास्ट और मुसलमान के लिए नहीं, शिक्षा और इलाज तो तरसते ये लोग हिन्दू वोट बैंक है )

Activists of Bajrang Dal, a hardline Hindu group, hold their weapons at a temple on the occasion of Dussehra festival in the northern Indian city of Agra October 9, 2008. The Dussehra festival commemorates the triumph of Lord Rama over the Ravana, marking the victory of good over evil. REUTERS/Brijesh Singh (INDIA)

इसमें कोई शक नहीं कि भा*पा के उत्थान में कमसे कम 75 % योगदान मुस्लिम विद्वेष के प्रसार रहा है.ऐतिहासिक कारणों से कुछ ऐसे हालात बने हैं कि शुद्ध हिन्दू अर्थात सवर्णों के पक्ष में चित्त और पट दोनों जा रहा है. इन राष्ट्र विरोधियों के कारण ही देश हजारों साल तक गुलाम रहा और वे गुलामी के हर दौर में विदेशियों के सहायक बनकर सत्ता का जूठन चाटते रहे. बाद में विदेशियों के वही सहायक आजाद भारत में गुलामी के दौर की हीन मानसिकता को भुनाने की जुगत शुरू किये.इस काम में चैम्पियन बने हेडगेवार .आज उन्ही हेडगेवार के अनुसरणकारी हिन्दुओं के रग-रग में व्याप्त हीन मानसिकता को भुनाने में पिक पर पहुँच गए हैं. वे सत्ता का लाभ उठाकर ऐसा कुछ करने लगे हैं जो दुनिया की सबसे हीन कौम को अपार संतुष्टि दे रही है .

कल शाम मैं एक मारवाड़ी प्रकाशक के यहाँ बैठा हुआ था. प्रसंगवश जब भाजपा की चर्चा चली उसने कहा,’ मैं आप लोगो की इस बात से सहमत हूँ कि मोदी एक व्यर्थ शासक हैं, बावजूद इसके मोदी की भाजपा का समर्थन सिर्फ इसलिए करता हूँ और करता रहूँगा क्योंकि वह दूसरे दलों की तरह मुसलमानों की बात नहीं करते.’ मतलब समझ गए न कि यदि कोई दल मुसलमानों के पक्ष में कुछ कहा, हिन्दू उसकी प्रतिक्रिया में भाजपा के पक्ष में चले जायेंगे.

इसलिए गुजरात विधानसभा चुनाव में अगर विपक्ष मुसलमानों के पक्ष में कुछ नहीं कह रहा है तो उस उपेक्षा को रणनीति का एक हिस्सा मानते हुए, मुस्लिम समुदाय को नजरअंदाज कर देना चाहिए. स्मरण रहे जो लोग निरीह हिन्दुओं की हीनमानसिकता को भुनाने की तरह-तरह की जुगत भिड़ा रहे हैं, उनका मेन टारगेट मुस्लिम नहीं, दलित-पिछड़ा हिन्दू समुदाय है, जिसके खिलाफ ये हजारों साल से षड्यंत्र रचते रहे हैं.इस षड्यंत्र के तहत ही उन्होंने विदेशियों के लिए लाल कारपेट बिछाया, अपनी बहु-बेटियां देकर उन्हें खुश किया. लेकिन जब -ज़ब यह वंचित हिन्दू समुदाय उठ खड़ा होने की कोशिश करता है: जब-जब उसमे अधिकार चेतना करवट लेती है , उनके जन्मजात शत्रु इसी किस्म का चक्रांत रचते हैं. इस षड्यंत्र की तहत गुजरात में मुस्लिम समुदाय को रिएक्ट करने लिए बहुत कुछ कर सकते.हैं. ऐसे में जज्बाती मुस्लिम समुदाय अगर अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए, रिएक्ट करने से खुद को बचा ले तो वह बहुजन भारत और खुद उसके अपने हित में बहुत बड़ा काम होगा.

 

https://hindi.sabrangindia.in/article/hindutvadiyo-ka-main-target-muslim-nahi-khud-vanchit-hindu-samudai-hai

“अहंकार त्याग:: गौतम बुद्ध और यशोधरा” – ओशो

“अहंकार त्याग:: गौतम बुद्ध और यशोधरा” – ओशो

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्चा, उनका बैटा एक ही दिन का था। राहुल एक ही दिन का था। जब आए, तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्नी- यशोधरा, बहुत नाराज थी। स्वभावत:। और उसने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा।

उसने पूछा कि मैं इतना ही  जानना चाहती हूं;  क्या तुम्हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं| क्या तुम सोचते हो कि मैं तुम्हें रोकती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्हें भेज सकते है, तो सत्य की खोज पर नहीं भेज सकेते ? तुमने मेरा अपमान किया है। बुरा अपमान किया है। जाकर किया अपमान ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्लाती हूं, रूकावट डालती हूं।

कहते है बुद्ध से बहुत लोगों ने बहुत तरह के प्रश्न पूछे होंगे। मगर जिंदगी में एक मौका था जब वे चुप रह गए; जवाब न दे पाये। और यशोधरा ने एक के बाद एक तीर चलाए। और यशोधरा ने कहा कि मैं तुमसे दूसरी यह बात पूछती हूं कि जो तुमने जंगल में जाकर पाया, क्या तुम छाती पर हाथ रख कर कह सकते हो कि वह यहीं नहीं मिल सकता था? यह भी भगवान बुद्ध कैसे कहें – कि यहीं नहीं मिल सकता था। क्योंकि सत्य तो सभी जगह है। और भ्रम वश कोई अंजान कह दे तो भी कोई बात मानी जाये, अब तो उन्होंने खुद सत्य को जान लिया है, कि वह जंगल में मिल सकता है, तो क्या बाजार में नहीं मिल सकता? पहले बाजार में थे, तब तो लगता था, सत्य तो यहां नहीं है। वह तो जंगल में ही है। वह संसार में कहां, वह तो संसार के छोड़ देने पर ही मिल सकता है। पर सत्य के मिल जाने के बात तो फिर उसी संसार और बाजार में आना पडा; तब जाना यहां भी जाना जा सकता था सत्य को; नाहक भागे। पर यहां थोड़ा कठिन जरूर है, पर ऐसा कैसे कह दे की यहां नहीं है। वह तो सब जगह है।

भगवान बुद्ध ने आंखे झुका ली। और तीसर प्रश्न जो यशोदा ने चोट की, शायद यशोदा समझ न सकी की बुद्ध पुरूष का यूं चुप रह जाना अति खतरनाक है। उस पर बार-बार चोट कर अपने आप को झंझट में डालने जैसा है| सो इस आखरी चोट में यशोदा उलझ गई। तीसरी बात उसने कहीं, राहुल को सामने किया और कहा कि ये तेरे पिता है। ये देख, ये जो भिखारी की तरह खड़ा है, हाथ में भिक्षा पात्र लिए। यहीं है तेरे पिता। ये तुझे पैदा होने के दिन छोड़ कर भाग गये थे। जब तू मात्र के एक दिन का था। अभी पैदा हुआ नवजात। अब ये लौटे है, तेरे पिता, देख ले इन्हीं जी भर कर। शायद फिर आये या न आये।

तुझे मिले या न मिले। इनसे तू अपनी वसीयत मांग ले। तेरे लिए क्या है इनके पास देने के लिए। वह मांग ले। यह बड़ी गहरी चोट थी। बुद्ध के पास देने को था क्या। यशोधरा प्रतिशोध ले रही थी बारह वर्षों का। उसके ह्रदय के घाव जो नासूर बन गये थे। लेकिन उसने कभी सोचा भी नहीं था कि, ये घटना कोई नया मोड़ ले लेगी।

भगवान ने तत्क्षण अपना भिक्षा पात्र सामने खड़े राहुल के हाथ में दे दिया। यशोधरा कुछ कहें या कुछ बोले। यह इतनी जल्दी हो गया। कि उसकी कुछ समझ में नहीं आया। इस के विषय में तो उसने सोचा भी नहीं था। भगवान ने कहा,बेटा मेरे पास देने को कुछ और है भी नहीं, लेकिन जो मैंने पाया है वह तुझे दूँगा। जिस सब के लिए मैने घर बार छोड़ा तुझे, तेरी मां, और इस राज पाट को छोड़, और आज मुझे वो मिल गया है। मैं खुद चाहूंगा वही मेरे प्रिय पुत्र को भी मिल जाये। बाकी जो दिया जा सकता है। क्षणिक है। देने से पहले ही हाथ से फिसल जाता हे। बाकी रंग भी कोई रंग है? संध्या के आसमान की तरह,जो पल-पल बदलते रहते है। में तो तुझे ऐसे रंग में रंग देना चाहता हूं जो कभी नहीं छुट सकता।

तू संन्यस्त हो जा। बारह वर्ष के बेटे को संन्यस्त कर दिया। यशोधरा की आंखों से झर- झर आंसू गिरने लगे। उसने कहां ये आप क्या कर रहे है। पर बुद्ध ने कहा, जो मरी संपदा है वही तो दे सकता हूं। समाधि मेरी संपदा है, और बांटने का ढंग संन्यास है। और यशोधरा, जो बीत गई बात उसे बिसार दे। आया ही इसलिए हूं कि तुझे भी ले जाऊँ। अब राहुल तो गया। तू भी चल। जिस संपदा का मैं मालिक हुआ हूं। उसकी तूँ भी मालिक हो जा। और सच में ही यशोधरा ने सिद्ध कर दिया कि वह क्षत्राणी थी।

तत्क्षण पैरों में झुक गई और उसने कहा- मुझे भी दीक्षा दें। और दीक्षा लेकर भिक्षुओं में, संन्यासियों में यूं खो गई कि फिर उसका कोई उल्लेख नहीं है। पूरे धम्म पद में कोई उल्लेख नहीं आता। हजारों संन्यासियों कि भीड़ में अपने को यूँ मिटा दिया। जैसे वो है ही नहीं। लोग उसके त्याग को नहीं समझ सकते। अपने मान , सम्मान, अहंकार को यूं मिटा दिया की संन्यासी भूल ही गये की ये वहीं यशोधरा है। भगवान बुद्ध की पत्नी। बहुत कठिन तपस्या थी यशोधरा की। पर वो उसपर खरी उतरी। उसकी अस्मिता यूं खो गई जैस कपूर। बौद्ध शास्त्रों में इस घटना के बाद उसका फिर कोई उल्लेख नहीं आता। कैसे जीयी, कैसे मरी,कब तक जीयी, कब मरी, किसी को कुछ पता नहीं। और जब आप अति विशेष हो तो आपको अपनी अति विशेषता को छोड़ना अति कठिन है। यशोधरा ने छोड़ा, उन संन्यासियों की भिड़ में ऐसे गुम हो गये। यूं लीन हो गये, यूं डूब गये, इसको कहते है आना । कि आने के पद चाप भी आप न देख सके कोई ध्वनि भी न हुई, कोई छाया तक नहीं बनी ।

–ओशो

[आपुई गई हिराय, प्रवचन—10]

ब्राह्मण धर्म और शास्त्रानुसार भारत देश को विदेशी हमलों से बचने की जिम्मेदारी क्षत्रिओं पर थी, फिर क्यों ज्यादातर विदेशी आक्रमणकारी सफल हुए, इस बात पर दिलीप सी0 मंडल जी के निम्न fb पोस्ट रौशनी डालते हैं, जरूर पढ़ें