यूपी के इलाहाबाद में सरेआम LLB कर रहे दलित छात्र दिलीप सरोज की हत्या की खबर से सारे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं कहीं रोष है कहीं मौन कहीं मार्च अदि निकाला जा रहे हैं सोशल मीडिया पर जबरदस्त विद्रोह हो रहा है,#JusticeForDilipSaroj ….Dilip C Mandal

 

 

 

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यूपी के इलाहाबाद में सरेआम LLB कर रहे दलित छात्र दिलीप सरोज की हत्या की गई,अख़बारों की कटिंग संलग्न है । सवाल उठता है कि उन जतिवादी हत्यारों को ऐसा करने का साहस कौन दे रहा है?… Dilip C Mandal FB post

देश की सबसे बुरी खबर।

पैर छू जाने पर 21वीं सदी में आदमी की हत्या कर दी गई!

यूपी के इलाहाबाद में जिस तरह सरेआम LLB कर रहे दलित छात्र दिलीप सरोज की हत्या की गई, उससे सवाल उठता है कि उन जतिवादी हत्यारों को ऐसा करने का साहस कौन दे रहा है?

************ से सवाल है कि – “कहीं वे आप तो नहीं? आपने ही तो कहीं इन हत्यारों का हौसला नहीं बढाया है?”

दलित और पिछड़ों का एक हिस्सा, धर्म के नाम पर मारता है और जाति के नाम पर मार दिया जाता है.

जो समाज अपने बच्चों और बच्चियों को, युवाओं को नहीं बचा सकता, बचाने की कोशिश नहीं करता, वह गुलाम रहने के लिए अभिशप्त है।इलाहाबाद दिलीप सरोज हत्याकांड।

सिर्फ संविधान के सहारे दलितों पर अत्याचार खत्म होना होता तो कब का खत्म हो चुका होता,जब तक दलित इनको इनकी भाषा में नहीं समझायेगा गुलाम ही रहेगा।

इलाहाबाद के दिलीप सरोज हत्याकांड के खिलाफ रोहित वेमुला और गुजरात के ऊना जैसे विशाल लोकतांत्रिक आंदोलन और बड़े जन उभार की जरूरत है। वरना वे हमारे युवाओं को मार डालेंगे। सबको मार डालेंगे। कोई नहीं बचेगा। सबका नंबर लगेगा।

राष्ट्रीय आंदोलन समय की मांग है। पूरे देश में विरोध होना चाहिए। हर शहर में, हर कस्बे में।

अगर हिंसा एक आम इंसानी बुराई है तो ऐसी खबरें भी आती कि

– दलितों ने एक ब्राह्मण युवक को पीटकर मार डाला।

– या उसकी आंख फोड़ दी।

– या कि पिछड़ों ने ठाकुर या भूमिहार युवक को मारकर उसे पेड़ पर टांग दिया।

– जीप से घसीटकर मार डाला।

भारत की कुछ जातियां ज्यादा ही हिंसक, बर्बर और असभ्य हैं।

भारत SC, ST, OBC, माइनॉरिटी और सभी समुदायों की महिलाओं के कारण लोकतांत्रिक है।

यहां जिस जंगल राज के अवशेष हैं, वह सवर्णों का कुकर्म है।

 

हो सकता है कि मजहब आपस में दुश्मनी करना नहीं सिखाता, लेकिन दुनिया का इतिहास यही रहा है कि हर धर्म का दूसरे धर्म से टकराव का रिश्ता है. एक की कीमत पर ही दूसरे को बढ़ना है. इसलिए दो धर्मों के लोगों के बीच नफरत की बात एक हद तक समझ में आती है.

लेकिन

हिंदू धर्म दुनिया का अकेला धर्म है, जो अपने ही धर्म के लोगों के बीच इतनी नफरत पैदा करता है कि पैर छू देने भर एक आदमी दूसरे आदमी की हत्या कर सकता है.

(या फिर दूसरी बात यह हो सकती है कि नीचे की जातियां हिंदू हैं ही नहीं.)

हिंदू धर्म की हर जाति दूसरी जाति से नफरत पालती है. खुद को बड़ा और दूसरे को नीच समझती है. एक दूसरे का हक मारती है और इसे धार्मिक आधार पर सही भी ठहराती ही.

हिंदू धर्म में नफरत को धार्मिक मान्यता है,

#JusticeForDilipSaroj

2 मिनट का मौन! इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अभी अभी हुई शोक सभा. यह एक सामूहिक दुख और क्रोध का क्षण है.

 

वे यादव के लिए आए,
मैं निश्चिंत रहा क्योंकि मैं यादव नहीं था,
फिर वे पटेलों के लिए आए,
लेकिन मैं तो पटेल नहीं था, बच गया.
फिर वे जाटवों के लिए आए,
मैं नसीब वाला निकला, मैं जाटव नहीं था,
फिर वे मौर्यों को लिए आए,
मैं फिर बच गया, मैं मौर्य नहीं था,
फिर वे मुसलमानों के लिए आए,
मैं मुसलमान नहीं था, बच गया.
वे महारों के लिए आए, मैं महार नही था.
फिर वे निषादों के लिए आए,
मैं फिर बच गया,
फिर वे पासियों के लिए आए,
मैं पासी नहीं था, बच गया,
फिर वे खटिकों के लिए आए,
मैं खटिक नहीं था, बच गया,
फिर वे ईसाइयों के लिए आए,
मैं ईसाई नहीं था,
वे आदिवासियों के लिए आए
मैं आदिवासी नहीं था.
फिर वे कुम्हारों के लिए आए,
मैं कुम्हार न होने के कारण बच गया.
वे जिनके लिए भी आए, मैं वह नहीं था.

फिर एक दिन वे मेरे लिए आए
अब मेरे साथ कोई नहीं था.

#JusticeForDilipSaroj

 

बोधिसत्व संत रैदास – राजेश (गुरु रविदास जयंती 31-jan-2018 पर विशेष )

संत रैदास बुद्ध धम्म की एक धारा हैं। प्रत्यक्ष रूप से वह बौद्ध नहीं दिखते हैं लेकिन गहन विवेचना उनको सीधे बुद्ध धम्म से जोड़ती है।
उनका जन्म उस समय हुआ, 15वीं शताब्दी में, जब बुद्ध का धम्म भारत से क्रमिक रूप से लुप्त हो हुआ दिखाई दे रहा था, लेकिन वास्तव में उससे नये सम्प्रदायों का जन्म हो रहा था , जो प्रत्यक्ष रूप से नये सम्प्रदाय दिख रहे थे लेकिन उनकी मौलिक जड़ें बुद्ध धम्म में थीं।
बौद्ध धर्म का एक सम्प्रदाय सहजयान बन चुका था। इसी सहजयान से भक्ति सम्प्रदाय का जन्म हुआ जिसके उल्लेखनीय प्रकट व्यक्तित्व मध्यकाल के संत हैं- संत रैदास, संत कबीर उनमें सर्वाधिक विख्यात हैं।
संत रैदास के पदों और दोहों का गहन अध्ययन किया जाए तो वे बुद्ध के वचनों के सिवा कुछ नहीं हैं।
चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु एवं अन्य कुछ लेखकों व शोधार्थियों ने संत रैदास पर लिखित अपनी पुस्तकों में उल्लेख किया है कि:
संत रैदास के पिता का नाम रघु अथवा रघ्घु था और मां का नाम घुरबिनिया अथवा करमा देवी था। इस दम्पति की सारनाथ में प्रवास कर रहे एक बौद्ध भिक्षु भंते रेवत पर बड़ी श्रद्धा थी। वह उनके दर्शन के लिए और उनसे उपदेश सुनने के लिए काशी से सारनाथ प्रायः जाया करते थे। वह निःसंतान दम्पति थे। एक दिन भंते जी ने दान और संतान का माहात्म्य बताया। दान कथा से प्रभावित होकर इस दम्पति ने एक दिन बड़ी श्रद्धापूर्वक अपने गुरु भंते रेवत को भोजनदान दिया और मिष्ठान्न के रूप में खीर खिलाई।
इस भोजनदान के उपरांत यथासमय माता करमा देवी ने एक संतान को जन्म दिया। दम्पति ने अपने गुरु भंते रेवत पर श्रद्धा के कारण बच्चे का नाम रेवतदास रखा जो कि कालान्तर में अपभ्रंशित हो कर रैदास हो गया। इस प्रकार संत रैदास का आध्यात्मिक सम्बन्ध सीधे बुद्ध धम्म से है क्योंकि उनके माता-पिता एक बौद्ध भिक्षु के प्रत्यक्ष शिष्य थे। यद्यपि कि जब तक रैदास युवा हुए तब तक भंते रेवत शांत हो चुके थे तथापि रैदास के पदों और दोहों में जो शिक्षाएं व्यक्त हुई हैं वह बुद्ध के वचनों के सिवा कुछ भी नहीं हैं:

• रैदास बाम्हन मति पूजिए, जो होवै गुनहीन।
पूजिहि चरन चण्डाल के, जऊ होवै गुन परवीन। ।
• रैदास उपजई सब एक बूँद ते, का बाम्हन का सूद ।
मूरिखजन न जानहिं, सभ मह राम मजूद। ।
• रैदास इक ही नूर तो, जिमि उपज्यो संसार।
ऊँच-नीच किहि बिधि भये, बाम्हन अरु चमार। ।
• रैदास जनम के कारने, होत न कोऊ नीच।
नर को नीच कर डारि है, ओछे करम की कीच।।

रैदास के यह वचन ठीक वही हैं जो सदियों पहले बुद्ध ने कहा है :

• न जच्चा होति वसलो, न जच्चा होति ब्राह्मणो।
कम्मा होति वसलो, कम्मा होति ब्राह्मणो ।।

– जन्म से कोई अछूत नहीं होता, न जन्म से कोई ब्राह्मण होता है। कर्म से कोई ब्राह्मण होता है , कर्म से कोई अछूत होता है।

• दया भाव हिरदै नहीं, भखहिं पराया मास।
ते नर नरक महं जाइहिं, सत भाषै रैदास। ।

यह भगवान बुद्ध के शिक्षा पद को संत रैदास ने अपने शब्दों में कहा है – पाणातिपाता वेरमणि सिक्खापदं समादयामि- मैं प्राणिमात्र की हिंसा से विरत रहने की शिक्षा गृहण करता हूँ।
भगवान बुद्ध का शिक्षा पद है- सुरामेरय मज्ज पमादट्ठाना वेरमणि सिक्खापदं समादयामि – मैं समस्त मादक पदार्थों से विरत रहने की शिक्षा गृहण करता हूँ।

भगवान बुद्ध के इन्हीं शिक्षा पदों को संत रैदास ने अपने युग में अपनी तरह से कहा है :

• रैदास मदुरा का पीजिये, जो चढ़े उतराए।
नांव महारस पीजिये, जो चढ़े नहिं उतराए। ।

संत रैदास, संत कबीर एवं मध्यकाल के अनेक संतों के पदों में इष्ट के रूप में, आराध्य के रूप में राम , श्याम, गोविन्द, गिरधर इत्यादि शब्दों का उल्लेख है जिसे पढ़कर बुद्धिवादी लोग रैदास को बौद्ध परम्परा की एक धारा मानने में थोड़ा झिझकते हैं। लेकिन इस झिझक को रैदास के समकालीन उनके धर्मबन्धु संत कबीर ने बड़ी निर्भीकता से तोड़ा है:

राम नाम सब कोई जपे, ठग ठाकुर अरु चोर।
जो नाम साधु जपे सोई नाम कुछ और ।।

इन संतों के इष्ट राम वह राम नहीं हैं जिस राम के नाम पर आज हाहाकार हो रहा है, दंगा-फसाद हो रहा है। इन संतों के राम उनका अंतर का बुद्धत्व है, निर्वाण है:

संत रैदास ने कहा भी है :

कहि रैदास समुझि रे संतों, इह पद है निरवान।
इहु रहस कोई खोजै बूझै, सोइ है संत सुजान। ।

संत रैदास के पदों और भजनों में बड़ी गहन बौद्ध शब्दावलियों का, टर्मिनोलाजी का, प्रयोग हुआ है :

कहि रैदास तजि सभ त्रस्ना…

संत रैदास समस्त तृष्णा को तज देने की बात कर रहे हैं।

भगवान बुद्ध के सम्बोधि के ठीक बाद प्रथम वचन हैं- तन्हानं खय मज्झगा- तृष्णा का क्षय हो गया है…

यह तृष्णा शब्द बौद्ध शब्दावली है। धम्मपद में पूरा एक अध्याय तृष्णा पर है – तन्हा वग्गो अर्थात तृष्णा वर्ग। वही संत रैदास कह रहे हैं- कहि रैदास तजि सभ त्रस्ना…

संत रैदास का साधना मार्ग विपस्सना है। विपस्सना का सहज सा अर्थ है समता में रहना- न सुखद वेदनाओं से राग, न दुःखद वेदनाओं से द्वेष, बल्कि समता में स्थित रहना।
संत रैदास वही अनुभूति अपने शब्दों में कहते हैं:

राग द्वेष कूं छाड़ि कर, निह करम करहु रे मीत।
सुख दुःख सभ महि थिर रहिं, रैदास सदा मनप्रीत।।

वे विपस्सना की एक बड़ी गहन अनुभूति को बड़े प्रेमल शब्दों में व्यक्त करते हैं:

गगन मण्डल पिय रूप सों , कोट भान उजियार।
रैदास मगन मनुआ भया, पिया निहार निहार ।।

भगवान बुद्ध ने सुख, दुःख, लाभ, हानि इत्यादि को लोक धर्म कहा है। जो इन लोक धर्मों से अविचल रहता है, उसका मंगल होता है:

फुट्टस्स लोक धम्मेहि चित्तं यस्स न कम्पति।
असोकं विरजं खेमं, एतं मंगलमुत्तमं। ।

– जिसका चित्त लोक धर्मों से विचलित नहीं होता, वह शोकरहित, निर्मल होता है, यह उत्तम मंगल है।

इसी को संत रैदास ने अपने शब्दों में कहा है:

सुख दुःख हानि लाभ कौ, जऊ समझहि इक समान।
रैदास तिनहि जानिए, जोगी संत सुजान। ।

भगवान बुद्ध का शब्द ‘ सति ‘ अथवा स्मृति ही मध्यकाल के संतों की भाषा में सुरति बन गया है। जिसे भगवान बुद्ध ने सम्यक् स्मृति कहा है उसे ही संत रैदास ने सुरति अथवा सुरत कहा है :

सुरत शब्द जऊ एक हो, तऊ पाइहिं परम अनन्द ।
रैदास अंतर दीपक जरई, घर उपजई ब्रम्ह अनन्द ।।

यह ब्रम्ह अनन्द क्या है? ब्रम्ह विहार ही ब्रम्ह आनन्द है । ब्रम्ह विहार अर्थात मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्खा।

भगवान बुद्ध सम्यक् समाधि को आर्य अष्टांग मार्ग के आठ अंगों में एक अंग बताते हैं। उसी समाधि को संत रैदास अपने शब्दों में व्यक्त करते हैं:

समाधि थिति संत जन, अपनहु अप्प मिटांहि।
जिमी गंगा समुद मिलि, रैदास समुदहि विलांहि ।।

भगवान बुद्ध धर्म के नाम पर चल रहे अंधविश्वासों के विध्वंसक हैं और संत रैदास उसे पुष्ट करते हैं:

जहं अंध विस्वास है, सत्त परख तहं नांहि ।
रैदास संत सोई जानिहै, जौ अनुभव होहि मन माहि।

भगवान बुद्ध के वचन हैं:

मनो पुब्बंगमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया…
– मन समस्त धर्मों का पूर्व नायक है, मन श्रेष्ठ है …

संत रैदास ने इसी बात को अपने समय की भाषा में कहा:

मन ही पूजा मन ही धूप,
मन ही सेऊ सहज सरूप।

और

मन चंगा तो कठौती में गंगा …

मन चंगा है तो कठौती में गंगा है । संत रैदास बुद्ध के प्रतिनिधि हैं।
संत रैदास का विस्तार सम्पूर्ण भारत है- उनके पद मराठी में अभंगों के रूप में मिलते हैं, राजस्थानी में मिलते हैं, पंजाब में गुरुग्रन्थ साहेब में गुरुमुखी में मिलते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि संत रैदास का विस्तार तिब्बत तक है। बुद्ध धम्म में चौरासी सिद्धों का उल्लेख है। चौरासी सिद्धों का क्रमवार विवरण तिब्बती परम्परा ने संरक्षित किया हुआ है। चौरासी सिद्धों के विवरण में संत रैदास क्रम संख्या चौदह पर हैं। वह विवरण एक और मिथक तोड़ता है कि संत रैदास के गुरु रामानन्द थे। तिब्बती परम्परा उल्लेख करती है कि संत कबीर और संत रैदास के गुरु एक बौद्ध भिक्षु थे जिनका नाम जालंधर नाथ था।
संत रैदास को बोधिसत्व रैदास के रूप में स्थापित करने का समय आ गया है।
– राजेश चन्द्रा

२६ जनवरी गणतंत्र दिवस की सभी भारतवासियों को बहुत बहुत बधाई, इस दिन भारत में बाबा साहब डॉ आंबेडकर द्वारा बनाया हुआ संविधान लागू हुआ था, पर इस देश का मीडिया और सरकार बाबा साहब को याद क्यों नहीं करते, अगर किसी सवर्ण ने बनाया होता तब भी यही उदासीनता होती ?

गणतंत्र दिवस की सभी भारतवासियों को बहुत बहुत बधाई एवं मंगलकामनाए।
२६ जनवरी गणतंत्र दिवस की सभी भारतवासियों को बहुत बहुत बधाई, इस दिन भारत में बाबा साहब डॉ आंबेडकर द्वारा बनाया हुआ संविधान लागू हुआ था, पर इस देश का मीडिया और सरकार बाबा साहब को याद क्यों नहीं करते, अगर किसी सवर्ण ने बनाया होता तब भी यही उदासीनता होती ?
कर्णाटक के मुख्य मंत्री श्री सिद्धराममया जी ने अख़बारों में बाबासाहब को याद करते हुए बड़े बड़े बैनर निकले हैं , सारा अम्बेडकरवादी समाज आपका आभारी है
26 जनवरी के महानायक भारतीय संविधान के रचयिता परम पूज्य बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ भीमरावअम्बेडकर जी को कोटि कोटि नमन व वंदन
यह कैसा गणतंत्र दिवस ?*
 कितने वर्षों से हम गणतंत्र दिवस मनाते रहे पर उस शख्स को ,उस महामानव को ,उस युगपुरुष को, क्यों याद नहीं किया जाता
*किसी भी देश का आजाद होना अलग बात है पर उस आजादी को कायम रखना और भी अलग बात है हमारा देश कई बार गुलाम हुआ है कभी तुर्को, कभी मुगलों, कभी अंग्रेजों से ,*
आज हम इस आजादी को कायम रख पाए हैं इसमें संविधान का बहुत बड़ा योगदान है आजादी के बाद हमारी सबसे बड़ी समस्या थी कि *देश को आगे कैसे चलाया जाए  संविधान कौन लिखेगा !संविधान कैसा होगा?*  और आज हम  गणतंत्र दिवस मनाना  ही नहीं समझ पाए
 *गणतंत्र दिवस पर  कई विद्यालयों में ,कई शासकीय कार्यालयों में बाबा साहेब की तस्वीर आज भी नहीं है आप जिस पाठशाला में पढ़ते हैं क्या वहां पर उस वक्त बाबा साहब की तस्वीर थी ?*
कहीं ना कहीं हम बाबा साहब की तस्वीर पर माल्यार्पणया बाबा साहब अमर रहे यह भी नहीं कह सकते
 *जिस महान आदमी ने 2 साल 11 महीने और 18 दिन लगातार अपनी सेहत खराब होने के बावजूद भी दिन रात एक कर के बहुत ही कम समय में सविधान लिखा*
ऐसा सविधान जो दुनिया का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ संविधान है
इतने आर्टिकल अमेरिका के संविधान में भी नहीं है
हम गणतंत्र दिवस मनाते हुए बाबा साहब अमर रहे यह भी नहीं कहते तो हमें अपने आप पर  शर्म आनी चाहिए
*उस शख्स को ,उस महान आत्मा को, हमने कैसे भुला दिया?*
मित्रों आप से अनुरोध है कि आने वाले हर गणतंत्र दिवस पर हम बाबा साहब की तस्वीर को माल्यार्पण करें एवं स्कूली बच्चों और लोगों को बाबा साहब , व हमारे संविधान के बारे मे बताएं  *जो हमें   समता स्वतन्त्रता बन्धुता और न्याय सिखाता है*
  हम पूरी ईमानदारी व पूरी समझदारी से गणतंत्र दिवस का पर्व मनाए
*आप सभी को गणतंत्र दिवस की अग्रिम हार्दिक-हार्दिक शुभकामनाएं*
 बाबा साहब अमर रहे ,
बाबा साहब अमर रहे,
*जय भीम जय भारत जय संविधान गणतंत्र दिवस अमर रहे*

आज जब संविधान बदलने की अफवाहे या बातें चल रही है ऐसे में संविधान के बारे में जननां जरूरी है |भारतीय संविधान सभा से जुड़े महत्‍वपूर्ण तथ्‍य और जानकारी

आज जब संविधान बदलने की अफवाहे या बातें चल रही है ऐसे में संविधान के बारे में जननां जरूरी है |क्या संविधान लिखकर वाकई कोई कारनामा किया था बाबा साहेब ने? चलो इसबार सच्चाई जान लेते हैं।
1895 में पहली बार बाल गंगाधर तिलक ने विधान लिखा था अब इससे ज्यादा मैं इस संविधान पर न ही बोलूँ वह ज्यादा बेहतर है, फिर 1922 में गांधीजी ने संविधान की मांग उठाई,  मोती लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और पटेल-नेहरू तक न जाने किन किन ने और कितने संविधान पेश किये । ये आपस् में ही एक प्रारूप बनाता तो दूसरा फाड़ देता, दुसरा बनाता तो तीसरा फाड़ देता और  इस तरह 50 वर्षों में कोई भी व्यक्ति भारत का एक (संविधान) का प्रारूप ब्रिटिश सरकार के सम्पक्ष पेश नही कर सके। उससे भी मजे की बात कि संविधान न अंग्रेजों को बनाने दिया और न खुद बना सके। अंग्रेजों पर यह आरोप लगाते कि तुम संविधान बनाएंगे तो उसे हम आजादी के नजरिये से स्वीकार कैसे करें। बात भी सत्य थी लेकिन भारत के किसी भी व्यक्ति को यह मालूम नही था कि इतने बड़े देश का संविधान कैसे होगा और उसमे क्या क्या चीजें होंगी? लोकतंत्र कैसा होगा? कार्यपालिका कैसी होगी? न्यायपालिका कैसी होगी? समाज को क्या अधिकार, कर्तव्य और हक होंगे आदि आदि..
अंग्रेज भारत छोड़ने का एलान कर चुके थे लेकिन वो इस शर्त पर कि उससे पहले तुम भारत के लोग अपना संविधान बना लें जिससे तुम्हारे भविष्य के लिए जो सपने हैं उन पर तुम काम कर सको। इसके बावजूद भी कई बैठकों का दौर हुआ लेकिन कोई भी भारतीय संविधान की वास्तविक रूपरेखा तक तय नही कर सका। यह नौटँकीयों का दौर खत्म नही हो रहा था,साइमन कमीशन जब भारत आने की तैयारी में था उससे पहले ही भारत के सचिव लार्ड बर्कन हेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती भरे स्वर में भारत के सभी नेताओं, राजाओं और प्रतिनिधियों से कहा कि इतने बड़े देश में यदि कोई भी व्यक्ति संविधान का मसौदा पेश नही करता तो यह दुर्भाग्य कि बात है। यदि तुम्हे ब्रिटिश सरकार की या किसी भी सलाहकार अथवा जानकार की जरूरत है तो हम तुम्हारी मदद करने को तैयार है और संविधान तुम्हारी इच्छाओं और जनता की आशाओं के अनुरूप हो। फिर भी यदि तुम कोई भी भारतीय किसी भी तरह का संविधानिक मसौदा पेश करते हैं हम उस संविधान को बिना किसी बहस के स्वीकार कर लेंगे। मगर यदि  तुमने संविधान का मसौदा पेश नही किया तो संविधान हम बनाएंगे और उसे सभी को स्वीकार करना होगा।
यह मत समझना कि आजकल जैसे कई संगठन संविधान बदलने की बातें करते हैं और यदि अंग्रेज हमारे देश के संविधान को लिखते तो हम आजादी के बाद उसे संशोधित या बदल देते। पहले आपको यह समझना आवश्यक है कि जब भी किसी देश का संविधान लागू होता है तो वह संविधान उस देश का ही नही मानव अधिकार और सयुंक्त राष्ट्र तथा विश्व समुदाय के समक्ष एक दस्तावेज होता है जो देश का प्रतिनिधित्व और जन मानस के अधिकारों का संरक्षण करता है। दूसरी बात किसी भी संविधान के संशोधन में संसद का बहुमत और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की भूमिका के साथ समाज के सभी तबकों की सुनिश्चित एवं आनुपातिक भागीदारी भी अवश्य है। इसलिए फालतू के ख्याल दिमाग से हटा देने चाहिए। दुसरा उदाहरण।
जापान एक विकसित देश है। अमेरिका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु हमले से ख़ाक कर दिया था उसके बाद जापान का पुनरूत्थान करने के लिए अमेरिका के राजनेताओं, सैन्य अधिकारियों और शिक्षाविदों ने मिलकर जापान का संविधान लिखा था। फरवरी 1946 में कुल 24 अमेरिकी लोगों ने जापान की संसद डाइट के लिए कुल एक सप्ताह में वहां के संविधान को लिखा था जिसमे 16 अमेरिकी सैन्य अधिकारी थे। आज भी जापानी लोग यही कहते है कि काश हमे भी भारत की तरह अपना संविधान लिखने का अवसर मिला होता। बावजूद इसके जापानी एक धार्मिक राष्ट्र और अमेरिका एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होते हुए दोनों देश तरक्की और खुशहाली पर जोर देते हैं।
लार्ड बर्कन की चुनौती के बाद भी कोई भी व्यक्ति संवैधानिक मसौदा तक पेश नही कर सका और दुनिया के सामने भारत के सिर पर कलंक लगा। इस सभा में केवल कांग्रेस ही शामिल नही थी बल्कि मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा जिसकी विचारधारा आज बीजेपी और संघ में सम्मिलित लोग थे। राजाओं के प्रतिनिधि तथा अन्य भी थे। इसलिए नेहरू इंग्लैण्ड से संविधान विशेषज्ञों को बुलाने पर विचार कर रहे थे। ऐसी बेइज्जती के बाद गांधीजी को अचानक डॉ अम्बेडकर का ख्याल आया और उन्हें संविधान सभा में शामिल करने की बात की।
इस समय तक डॉ अम्बेडकर का कहीं कोई जिक्र तक नही था, सरदार पटेल ने यहाँ तक कहा था कि डॉ अम्बेडकर के लिए दरबाजे तो क्या हमने खिड़कियाँ भी बन्द की हुई है अब देखते हैं वो कैसे संविधान समिति में शामिल होते हैं। हालाँकि संविधान के प्रति समर्पण को देखते हुए पटेल ने बाबा साहेब को सबसे अच्छी फसल देने वाला बीज कहा था। कई सदस्य, कई समितियां, कई संशोधन, कई सुझाव और कई देशों के विचारों के बाद केवल बीएन राव के प्रयासों पर जिन्ना ने पानी फेर दिया जब जिन्ना ने दो दो संविधान लिखने पर अड़ गए। एक पाकिस्तान के लिए और एक भारत के लिए।
पृथक पाकिस्तान की घोषणा के बाद पहली बार 9 दिसम्बर 1946 से भारतीय संविधान पर जमकर कार्य हुए। इस तरह डॉ अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करके दुनिया को चौंकाया। आज वो लोग संविधान बदलने की बात करते हैं जिनके पूर्वजों ने जग हंसाई करवाई थी। मसौदा तैयार करने के पश्चात आगे इसे अमलीजामा पहनाने पर कार्य हुआ जिसमें भी खूब नौटँकियां हुई .. अकेले व्यक्ति बाबा साहेब थे जिन्होंने संविधान पर मन से कार्य किये। पूरी मेहनत और लगन से आज ही के दिन पुरे 2 साल 11 माह 18 दिन बाद बाबा साहेब ने देशवासियों के सामने देश का अपना संविधान रखा जिसके दम पर आज देश विकास और शिक्षा की ओर अग्रसर बढ़ रहा है और कहने वाले कहते रहें मगर बाबा साहेब के योगदान ये भारत कभी नही भुला सकता है। हम उनको संविधान निर्माता के रूप तक सीमित नही कर सकते, आर्किटेक्ट ऑफ़ मॉडर्न इंडिया यूँ ही नही कहा गया कुछ तो जानना पड़ेगा उनके योगदान, समर्पण, कर्तव्य और संघर्षों को।

बौद्ध धम्म पर समयबुद्धा मिशन काम कर रहा है ,कृपया हमारे यूट्यूब चैनल को ज्वाइन या सबसक्राइव करना न भूलें व अपने सभी साथियों को भी ज्वाइन करवाएं, लिंक इस प्रकार है …

हम सब अपने बौद्ध धम्म में वापस लौट रहे हैं पर इसका सही मतलब मकसद और लक्ष्य से अनजान हैं, किताबें पढ़के भी कुछ खास पल्ले नहीं पड़ता , ब्राह्मणवादी मीडिया या टीवी  में तो इसपर बात ही नहीं होती , ऐसे में हमारे मिशन के सबसे अहम् मोर्चे  और स्थाई झंडे पर समयबुद्धा मिशन काम कर रहा है ,कृपया हमारे चैनल को ज्वाइन या सबसक्राइव करना न भूलें व अपने सभी साथियों को भी ज्वाइन करवाएं

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बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936 कुल भाग -22-एक समीक्षा , हम सभी को ये किताब अपने जीवन में जरूर पढ़नी चाहिए

“हर आदमी जो मिल के इस सिद्धांत को दोहराता है की एक देश किसी दूसरे देश पर शासन करने के लिए उपयुक्त नहीं है, उसे यह भी मानना होगा की एक जाति भी दूसरी जाति पर शासन करने के लिए उपयुक्त नहीं है” बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर
स्त्रोत – आंबेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936

आंबेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936 कुल भाग -22

इस किताब की शुरवात 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल में बाबासाहेब को अध्यक्ष बनाने के वाले निमंत्रण से होती है जिस में बाबा साहेब को “जाति प्रथा का विनाश” इस विषय पे बोलना था ,जिस में पहले बाबासाहेब मना करते है फिर बाद में मान जाते है लेकीन आखिर में 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की सभा कैंसिल हो जाती है क्यों की वह बाबा साहेब के हिन्दू धर्म छोड़ने ,हिन्दू धर्म ग्रंथो की श्रेष्ठा नस्ट करना आदि विषय पर सहमति नहीं होती लाहौर के जात पात तोड़क मंडल सभा ख़त्म कर देता है , बाबा साहेब इस जात पात तोड़क मंडल से नाराज़ होते है उन को जो सम्बोधन जात पात तोड़क मंडल में करना था उस की किताब छप चुकी होती है , इस लिए बाबा साहेब इसे बेचने का फैसला लेते है ,”जाति प्रथा का विनाश” बाबा साहेब को जो सभा में बोलना था वही कुछ है

भाग 1

इस भाग में बाबा साहेब सभा का आभार जताते है कुछ ख़ास नहीं है इस भाग में

भाग 2
इस भाग में बाबासाहेब कांग्रेस की बात करते है , वह बताते है कांग्रेस का जन्म एक ऐसे समय हुआ जब समाज को लग रहा था की समाज में प्रगति जब तक नहीं की जा सकती जब तक की हम अपने समाज में व्यापत बुरी प्रथाओं को ख़तम न कर दे ,और इसी उदेश्य के साथ एक सामाजिक सम्मेलन में कांग्रेस की नीव पड़ते है , कांग्रेस के दो हिस्से थे पहला कांग्रेस जो एक देश के राजनीतिक संगठन में कमजोर बिंदुओं को परिभाषित करने के लिए चिंतित थी, और दूसरा हिस्सा था कांफ्रेंस वाला जो समाज में व्यापत बुरी प्रथाओं को खतम करने के लिए कोशिश कर रहा था , पहले कुछ साल दोनों ने मिल के काम किया ,दोनों एक ही पंडाल के नीचे सम्मलेन करते थे ,लेकीन जल्द दोनों में मदभेद नज़र आने लगे जिस का कारण था क्या समाजिक सुधारो के बाद राजनीतिक सुधार किये जाने चाहिए ? सालो से कांग्रेस के यह दोनों धड़े आपस में संतुलन बनाये हुए थे ,लेकिन जल्द ही समाजिक सुधारो वाला धड़ा ख़तम हो गया ,और राजनीतिक सुधारो की तरफ जाने वालो की सख्या बढ़ाने लगी ,ऐसे लोगो की कमी नहीं थी जो राजनीतिक पार्टी से सहानुभूति रखते थे ,समाजिक सुधारो की कोफेस्स को आने वाले कुछ लोग ही बचे ,जल्द ही स्वर्गीय तिलक के नेतृत्व में एक ही पंडाल के नीचे कांफ्रेंस करने की आज्ञा को तिलक ने वापस ले लिया ,और दोनों धड़ो में दुश्मनी बढ़ाने लगी , नौबत यहां तक आ गई की जब सामाजिक कांफ्रेंस वाले हिस्से ने जब अपने पंडाल में कांफ्रेंस करने की कोशिश की तो पंडाल को जलाने की धमकी मिलने लगी , समय के साथ कांग्रेस का राजनीतिक धड़ा जीत गया और सामाजिक सुधारो वाला धड़ा ख़तम हो गया जिसे कांग्रेस के आठवें सेशन जो इलहाबाद में हुआ था सन 1892 में उस में कांग्रेस अध्यक्ष उमेश चन्द्र बनर्जी के इस भाषण से समझा जा सकता है,जिस ने समाजिक कांफ्रेंस की ताबूत में कील का काम किया ,

मुझे उन लोगो के लिए कोई सहनशीलता नहीं है जो कहते है की हम सामाजिक सुधारो से पहले राजनीतिक सुधारो में फिट नहीं होंगे ,मैं दोनों के बीच कोई संबंध देखने में विफल हूं …..क्या हम (राजनीतिक सुधार के लिए) फिट नहीं हैं क्योंकि हमारी विधवाएं अविवाहित रहती हैं और हमारी लड़कियों की अन्य देशों की तुलना में जल्दी शादी कर दी जाती है ,हम क्योंकि हमारी पत्नी और बेटियां अपने दोस्तों के साथ हमारे साथ नहीं चलती हैं?क्योंकि हम हमारी बेटियों को ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज भेजते नहीं हैं?

इस जीत से कई लोग खुश को दुखी भी हुए , इस के बाद बाबासाहेब पेशवा काल आछूतो की स्थिति का वर्णन करते है की पेशवा काल में मराठा राज्य में आछूतो को सड़को पे नहीं चलने देते थे ,क्यों की उनकी परछाई से कोई अपवित्र न हो जाये ,उस समय आछूतो को हाथ या गले में काला धागा पहनना आवश्य था ,ताकि कोई गलती से उन्हें छू न ले और अपवित्र न हो जाये पेशवा की राजधानी पूना में आछूतो को गले में मटका बाँधना पड़ता था ताकि किसी का थूक ज़मीन पर न गिरे और कोई ब्राह्मण उस पर पैर रख अपवित्र न हो जाये ,आछूतो को अपने पीछे बाँधना पड़ता था ताकि उन के पैरो के निशान मिट जाये कोई ब्राह्मण उस पर पैर रख अपवित्र न हो जाये ,इस के बाद इंदौर में बलाई जाति सामाजिक बहिस्कार का जिक्र करते है , गुजरात में एक दलित समुदाय की महलओ पर हुए हमले का जिक्र करते है जिस में दलित महिलाओ को केवल इस लिए मारा जाता है क्यों की उन के पास धातु के बर्तन थे ,गुजरात में एक दलित समुदाय के बच्चो को किस प्रकार सरकरी स्कूल में फरमान जारी कर रोका गया , इलहाबाद में कैसे घी की दावत देने पर दलितों पर हमला किया गया क्यों की दलित घी कैसे खा सकता है

फिर वह बात करते है कांग्रेस की राजनीतिक सुधारो वाला धड़ा क्यों हरा ,वह कहते है की उन्हें हिन्दू समाज में सुधार से कोई मतलब नहीं था वह तो केवल घर में सुधार करना चाहते थे , उच्च समाज की बुरी प्रथाओं को ख़त्म करना चाहते थे इस लिए वह हारे उन्हें जाति प्रथा से कोई ज्यादा लेना देना न थावह केवल उच्च समाज की बुरी प्रथा जैसे बाल विवाह ,विधवा विवाह आदि को समाप्त करना चाहते थे जिस से वह स्वय पीड़ित थे ,उन्हें जाति प्रथा समापत करने से कोई मतलब न था

मुझे लगता है कि राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है ,मुझे लगता है राजनीतिक संविधान सामाजिक सुधार की अनदेखी कर नहीं बन सकता ,फिर इस के लिए वह फर्डीनांड लससले कहे शब्दों का इस्तमाल करते है ,फिर वह पूछते है देश में कम्युनल अवार्ड की क्या उपयोगिता है जो विभिन्न वर्गों और समुदायों के लिए निश्चित अनुपात में राजनीतिक सत्ता का आवंटन करता है ,मुझे लगता है की समाजिक सुधार ही देश के राजनीतिक सविधान की नीव रख रहे है और यह एक तरह से उन की हार है जो राजनीतिक सुधारो को सामजिक सुधारो से ज्यादा महत्त्व देते है ,कम्युनल अवार्ड को देख मुझे ऐसा ही लगता है ,कुछ लोग कह सकते है कम्युनल अवार्ड अल्पसंख्यकों और नौकरशाही के बीच गठबंधन का नतीजा है और अप्रकृतिक है ,तो इस बात को साबित करने के लिए की राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है मेरे पास और उदहारण है , आइए आयरलैंड की ओर चले आयरिश होम रूल का इतिहास हमे क्या बताता है ,जब उत्तरी आयरलैंड और दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि आयरिश होम रूल पर बात करने मिले और श्री रेडमंड, जो दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि थे वह उत्तरी आयरलैंड को हर हाल में आयरिश होम रूल में शामिल करना चाहते थे उत्तरी आयरलैंड के प्रतिनिधि से पूछते है “आप की तरह किसी भी राजनीतिक सुरक्षा उपायों चाहते है हम वह आप को देंगे ,उत्तरी आयरलैंड के प्रतिनधि कहते है भाड़ में जाये तुम्हारे राजनीतिक सुरक्षा उपाय हम बस चाहते है की तुम हम पर हुकूमत न करो किसी भी कीमत पर और आज आप देखे आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड नाम के दो देश आप को एक छोटे दीप पर दिखेंगे ,सवाल उठता है की उत्तरी आयरलैंड के इस रवैये का कारण क्या था उन दोनों का ईसाई धर्म के अलग समुदाय से होना कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट होना यह साबित करता है राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है कुछ लोग इस में भी कह सकते है उन दोनों के बीच साम्राज्यवादी ताकत थी इस लिए वार्ता विफल हुई , तो रोम चलते है वाह जब राजा को ख़तम कर दिया गया तब साम्राज्य कंसोल्स और पोंटिफेक्स मैक्सिमस के बीच विभाजित किया गया था।कॉन्सल में राजा की धर्मनिरपेक्ष प्राधिकारी निहित थी,जबकि उत्तरार्द्ध ने राजा के धार्मिक अधिकार को ग्रहण किया। इस गणतंत्रवादी संविधान ने दो कॉन्सल बनाई एक पेट्रीशियन और दूसरी प्लीबियन ,दूसरी और उसी संविधान ने पोंटिफेक्स मैक्सिमस के तहत पुजारिओं को भी दो भागो में बाटा प्लेबियां और पेट्रीसियन जो कम्युनल राइट के सामान ही था ऐसा क्यों की रोम के गणतंत्रवादी संविधान ने कम्युनल राइट दिए क्यों की प्लेबियां और पेट्रीसियन में जातीय मदभेद था इसलिए ,दोनों अलग अलग जातियों से थे जो दृष्टांत मैंने लिया है वह साबित करते है सामाजिक और धार्मिक समस्याओं का राजनीतिक संविधान पर असर पड़ता है लेकिन यह नहीं माना जाना चाहिए कि दूसरे पर एक का असर सीमित है।

ऐसे इतिहास में कई उदाहरण है की राजनीतिक क्रांतियों को हमेशा सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों से पहले किया गया है,लूथर की सामाजिक क्रांति ने यूरोपीय लोगों के राजनीतिक मुक्ति को जन्म दिया इंग्लैंड में धर्मनिरपेक्षतावाद ने राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना की,यह धर्मनिरपेक्षता थी जिस ने अमेरिकी स्वतंत्रता के युद्ध जीता और धर्मनिरपेक्षता धार्मिक आंदोलन थी।मुस्लिम साम्राज्य के बारे में भी यही सच है। इस से पहले अरब राजनीतिक शक्ति बने वह पैगंबर मोहम्मद द्वारा शुरू की गई से धार्मिक क्रांति से गुजरे थे।यहां तक कि भारतीय इतिहास भी इस निष्कर्ष का समर्थन करता है चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति से पहले बुद्ध की धार्मिक और सामाजिक क्रांति ने इस राजनीतिक क्रांति की नीव रखी, शिवाजी के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति से पहले महाराष्ट्र के संतों द्वारा धार्मिक और सामाजिक क्रांति की गई ,सिखों की राजनीतिक क्रांति से पहले गुरु नानक ने धार्मिक और सामाजिक क्रांति की यह उदहारण बताते है की मन और आत्मा की मुक्ति आवश्यक है लोगों के प्रारंभिक राजनीतिक विस्तार के लिए

भाग 3

अब हम खुद को समाजवादियों की तरफ ले चलेंगे,क्या समाजवादी सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न होने वाली समस्या को नजरअंदाज कर सकते हैं?भारत में समाजवादियों ने यूरोप में अपने साथियो का अनुसरण किया है और उन्होंने यूरोप के इतिहास के आर्थिक व्याख्या को भारत में लागू करने की कोशिश की है ? उनका मानना है की इंसान केवल एक आर्थिक प्राणी है , और उस की गतिविधियों और आकांक्षाएं आर्थिक तथ्यों से बंधी है ,वह मानते है की संपत्ति शक्ति का एकमात्र स्रोत है , इस लिए वह मानते है की सामाजिक और राजनीतिक सुधार एक बड़ा भ्रम है , इस के स्थान पर आर्थिक सुधार जिस में संपत्ति को सब में बराबर बाँट दिया जाये सबसे पहले लागु किया जाना चाहिए , कुछ लोग कह सकते है इन का कहना सही है ऐसा सुधार सबसे पहले लागु किया जाना चाहिए ,कुछ लोग यह भी कह सकते है की आर्थिक मकसद केवल एकमात्र उद्देश्य नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य क्रियाशील होता है।आर्थिक शक्ति ही एकमात्र शक्ति है मानव समाज शास्त्र का कोई भी छात्र स्वीकार नहीं कर सकता, अक्सर एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति शक्ति और अधिकार का एक स्रोत बन जाती है ,हम इस महात्माओं के आम आदमी पर प्रभाव को देख कर समझ सकते है , वरना भारत में करोड़पति साधुओ और फाकिरों की बातो का पालन क्यों करते हैं?क्यों लाखों दरिद्र अपनी थोड़ी सम्पति को बेच कर बनारस और मक्का चले जाते है ? क्युकी ,भारत के इतिहास में धर्म शक्ति का एक मात्र स्रोत है जहा पुजारी आम आदमी पर अपना प्रभाव रखता है जो किसी मैजिस्ट्रेट से अधिक है और हर चीज़ से आधिक है ? इसलिए हड़तालों और चुनावों जैसे चीज़े भी हमारे देश में धार्मिक मोड़ ले लेती है या उन्हें आसानी से धार्मिक मोड़ दिया जा सकता है ,मनुष्य के ऊपर धर्म की शक्ति का प्रभाव समझने के लिए हम उदाहरण के रूप में रोम के प्लेबियंस (आम लोग ) का मामला लें। यह इस बिंदु पर प्रकाश डालता है,प्लेबियंस (आम लोग ) ने अपने अधिकारों के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी और रोमन गणराज्य के तहत सर्वोच्च कार्यकारी में आपने आधिकारो को प्रपात किया और जिस में वे रोम की संसद में आम मतदाताओं द्वारा चुने जा सकते थे और प्लेबियंस कौंसिल में अपना स्थान पा सकते थे। उन लोगो ने कौंसिल में चुने जाने का अधिकार इस लिए प्राप्त किया क्यों की उन्हें लगता था पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) उन के खिलाफ प्रशासन में भेदभाव करते है। लेकिन क्या उन्होंने इस अधिकार को प्राप्त कर कुछ हासिल किया ? नहीं क्यों नहीं क्यों की वह अपना कोई मजबूत प्रतिनिधि रोम की संसद में नहीं भेज पाए , ऐसा क्यों की जब वह खुद वोट कर अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे जो मजबूत प्रतिनिधि रोम की संसद में नहीं भेज पाए ,इस प्रश्न का उत्तर है धर्म का प्रभुत्व मनुष्य के प्रभुत्व से ऊपर होना। क्यों की प्लेबियंस (आम लोग ) उसे ही अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे जो डेल्फी नाम की देवी को स्वीकार हो , और इस डेल्फी नाम की देवी के मंदिर के सभी पुजारी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) वर्ग के थे , और यह देवी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) के माध्यम से ही अपना सन्देश प्लेबियंस (आम लोग ) तक पहुँचती थी। इस लिए प्लेबियंस (आम लोग ) सामान प्रतिनिधित्व होते हुए कभी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) जितने ताकतवर न हो पाए। क्यों की जब कभी कोई ताकतवर प्लेबियंस (आम लोग ) चुन कर संसद पहुंच जाता तो पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) कह देता की यह आदमी डेल्फी देवी को स्वीकार नहीं है यह है धर्म की शक्ति का प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक शक्ति पर धर्म को छोड़ने के बजाय, प्लीबेन (आम लोग ) ने भौतिक लाभ को छोड़ दिया, जिसके लिए वे इतनी मेहनत से लड़े थे भारत के सन्दर्भ में भी यही बात है ? क्या यह यह नहीं दिखाता है कि धर्म शक्ति का एक स्रोत हो सकता है पैसा जितना बड़ा नहीं तो उस के बरारबर । समाजवादियों का भ्रम यह मानने में है कि जैसे यूरोपीय सोसाइटी के वर्तमान स्तर में संपत्ति प्रमुख सत्ता का स्त्रोत है , क्या भारत के संदर्भ में भी यही बात सही है ,क्या इस से पहले भी यूरोप में सम्पति सत्ता का स्रोत थी ?धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति यह शक्ति और अधिकार दोनों स्रोत हैं, जिस के द्वारा एक आदमी , दूसरे की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए समक्ष है। इन में से एक एक स्तर पर हावी हो सकती है और दूसरी , दूसरी स्तर पर यही यह एकमात्र अंतर है दोनों में. यदि स्वतंत्रता आदर्श है,अगर स्वतंत्रता का मतलब है एक आदमी के दूसरे पर प्रभाव का विनाश तो आर्थिक सुधार से इसे पाया जा सकता है लेकीन , अगर वह प्रभुत्व धर्म और समाज के आधार पर स्थापित किया गया हो तो उस के लिए सामाजिक और राजनीतिक सुधार जरूरी होंगे जैसे समाजवादी नहीं मानते। इस प्रकार भारत के समाजवादियों द्वारा अपनाई गई आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत पर हमला किया जा सकता है।लेकिन मैं समझता हूं कि समाजवादी विवाद की वैधता के लिए इतिहास की आर्थिक व्याख्या आवश्यक नहीं है जो कहती है संपत्ति का बराबर बटवारा करने से सब कुछ ठीक हो जायेगा ? मै अपने समजवादी दोस्तों से पूछना चाहुगा क्या आर्थिक सुधार सामजिक सुधर से पहले लागु किये जा सकते है ? लगता है समजवादी दोस्तों ने इस पर विचार ही नहीं किया मैं उनके साथ अन्याय नहीं करना चाहता?मै पत्र का उदहारण देना चाहूंगा जो एक प्रमुख समाजवादी ने मेरे एक मित्र को लिखा था जिसमें उसने कहा था,मुझे नहीं लगता है कि हम भारत जब तक एक स्वतंत्र समाज का निर्माण कर सकते हैं, जब तक कि एक वर्ग दूसरे का दुर्व्यवहार और दमन करता रहेगा एक समाजवादी होने के कारण में विभिन्न वर्गों और समूहों के सामान उपचार में विशवास करता हु ,जिसे सामजवाद के द्वारा ही पाया जा सकता है। मै समजवादी दोस्त से पूछना चाहूंगा क्या यह कहने मात्र से की ” एक समाजवादी होने के कारण में विभिन्न वर्गों और समूहों के सामान उपचार में विशवास करता हु ” क्या इतना कहना समाजवाद के पुरे सिद्धांत को समझाता है नहीं , अब मै अपने विचार समाजवाद पर रखना चाहूंगा , जिस आर्थिक सुधर की बात समाजवाद करता है है वह तभी लागु की जा सकती है जब सत्ता पर समाजवाद का पूरा कब्ज़ा हो ,और वह कब्ज़ा श्रमजीवी वर्ग का हो। मै सवाल पूछता हु की क्या भारत का श्रमजीवी वर्ग मिल के ऐसी कोई क्रांति करेगा। यह क्रांति तभी संभव है जब सभी को यह विशवास हो की दूसरा जो उस के साथ है वह सत्ता हासिल होने के बाद उस के साथ धर्म या जाति के नाम पर भेदभाव नहीं करेगा , ऐसी कोई क्रांति भारत में तो संभव नहीं है ,चलिए हम मान ले समाजवादीओ ने किसी तरह सत्ता हासिल कर भी ली तो तो वह सामाजिक भेदभाव को मिटाये बिना इसे चला पाएंगे नहीं समाजवाद कुछ नहीं मन को संतुष्ट करने वाला वाकय भर है

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