भक्ति और धर्म का नशा कर के अगर भेड़ बनोगे तो ऊन तो उतरी ही जायेगी , खाल तो खींची जाएगी और मार के खाया ही जाएगा । हे शाशकों तुम्हारी मुक्ति खुद को पहचानने में है कब तक भेड़ बने रहोगे ?

एक शेर का बच्चा भटक के भेड़ों के झुण्ड में चला गया। वो उन्हीं के साथ पलने बढ़ने लगा और खुद को भेड़ समझने लगा। वो भूल ही गया कि वो शेर है भेड़ नहीं।

फिर एक दिन एक शेर ने उसे भेड़ों के बीच देखा तो आश्चर्य किया ये शेर भेड़ों के बीच घास चर रहा है?? वो उससे बात करने को उसकी ओर बढ़ा तो वो शेर को देख भागने लगा।

आखिर उस शेर ने उसे भाग के पकड़ लिया और उससे बोला, “अबे गधे तू इन भेड़ों के बीच क्या कर रहा है। तो वो खुद को भेड़ समझकर अपनी जान की भीख मांगने लगा।

उसको बहुत समझाया की तू भेड़ नहीं शेर है लेकिन वो न समझा। फिर आखिर शेर ने उसको उसका बिम्ब पानी में दिखाया तब जाकर उसकी आँखे खुलीं।

धार्मिक परिवार में पैदा होने वाला हर बच्चा उस शेर की तरह ही है जिसे प्रकृति ने पूर्ण स्वतंत्रता दी है पर वो भेड़ बन जाता है क्योंकि वो उन लोगों के बीच पैदा हुआ है जो खुद को भेड़ समझकर बैठे हैं। धर्मगुरुओं ने इनको धर्म नामक बाड़े में बंद किया हुआ है और लोक परलोक सुधारने के नाम पर इन मूर्खों से तरह तरह की मूर्खतापूर्ण कसरतें करवा रहे हैं, इनको अपने इशारों पर हांक रहे हैं, आपस में लड़वा रहे हैं और इनकी ऊन उतार कर अपना घर भर रहे हैं।

बाबासाहब डॉ आंबेडकर ने कहा था ” हमारा संघर्ष सत्ता संपत्ती के लिए नही बल्की संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए है ” संपूर्ण व्यवस्था के पांच अंग हैं राजनैतिक,सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक, हमें इन में से हर अंग पे काम करना होगा

” हमारा संघर्ष सत्ता संपत्ती के लिए नही बल्की संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए है ” ऐसा बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकरजी ने क्यू कहा ? पढिये और समझीये.

भारत के बहुजनो मे आजकल राजनीतिक आस्था जादा बढ गई हैं। राजनीतिक परिवर्तन के माध्यम से वे अपनी सभी समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। लेकिन पिछले पचास सालों से राजनीति करने के बावजूद भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है, बल्कि उनकी समस्याएं दिन ब दिन बढती ही जा रही हैं। ऐसा क्यों??

क्योंकि, राजनीति और व्यवस्था में मूलभूत फर्क है। व्यवस्था के जो पांच अंग होते हैं, उनमें से एक अंग राजनीती है। अगर आप अपना संपूर्ण समय, बुद्धि और संपत्ति केवल राजनीति के लिए ही इस्तेमाल करोगे, तो व्यवस्था के बाकी चार अंग (सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक) आपके खिलाफ हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में बहुजनो को जब सत्ता मिल गई थी, तब प्रतिक्रिया में जातिय अत्याचारों मे भी वृद्धि हो गई थी। अर्थात, व्यवस्था का राजनीतिक अंग हमारे समर्थन में होने के बाद सामाजिक अंग हमारे खिलाफ हो गया था। इसलिए, केवल राजनीति करने से समस्याओं का समाधान होनेवाला नहीं है।

समस्याओं के समाधान के लिए संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का उद्देश्य महत्वपूर्ण है। बाबासाहेब आंबेडकर जी ने इसीलिए कहा था कि, हमारा संघर्ष सत्ता या संपत्ति के लिए नहीं है बल्कि संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए है।

वर्तमान भारत में व्यवस्था ब्राह्मणों के कब्जे में है, इसलिए उनकी कोई भी समस्या नहीं है। क्योंकि वे King makers हैँ। यही कारण है कि, भारत में सत्ता तो बदलती रहती है लेकिन व्यवस्था कायम रहती है। जिनका व्यवस्था पर नियंत्रण होता है, उन्हीं लोगों का राजनिती पर भी नियंत्रण रहता है। वर्तमान भारत की व्यवस्था पर ब्राम्हणों का नियंत्रण होने के कारण उन्होंने उनकी व्यवस्था को संभालने वाले राजनेताओं को नियुक्त किया है। अगर एक नेता इस काम में असफल होता है, तो उस काम पर दुसरा नियुक्त कर दिया जाता है। बौद्ध धर्म के पतन के बाद से भारत में यही खेल चल रहा है। राजाओं को ब्राह्मणवादी ढांचे में बनाया जाता था और अगर किसी राजाने उस ढांचे को बदलने की कोशिश की, तो उसकी जगह पर दुसरे कट्टरपंथी राजा को नियुक्त किया जाता था और उस राजा के माध्यम से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को और जादा मजबूत किया जाता था। यही कारण है कि, बुद्ध के बाद भारत में सफल क्रांति नहीं हुई।

*बहुजनो ने इस ऐतिहासिक तथ्य को समझना जरूरी है। केवल राजनीति में ही पीढियां बरबाद करना मुर्खता है। अधिकांश लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन के महानतम कार्य में हिस्सा लेना चाहिए और King बनने की बजाए King makers बनने की कोशिश करनी चाहिए, तभी व्यवस्था पर हमारा कब्जा होगा। अगर आप व्यवस्था परिवर्तन का महत्तम कार्य सफल करोगे, तो सत्ता, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा, नोकरी, आरक्षण यह सब बातें आपको व्यवस्था के साथ बोनस के रूप में मिलेगी और हमारी सभी समस्याओं का समाधान भी होगा। क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन ही सभी समस्याओं का मुख्य उपाय है।,,

“बाबा साहेब ने कहा था”

इंसान जीता है , पैसे कमाता है, खाना खाता है और अंत में मर जाता है. जीता इसलिए है ताकि कमा सके. कमाता इसलिए है ताकि खा सके और खाता इसलिए है ताकि जिंदा रह सके लेकिन फिर भी मर जाता है अगर सिर्फ मरने के डर से खाते हो तो अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जाएगी. मरना तो सबको एक दिन है ही
समाज के लिए जीयो, जिंदगी का एक उद्देश्य बनाओ. गुलामी की जंजीर मे जकड़े समाज को आजाद कराओ. अपना और अपने बच्चो का भरण पोषण तो एक जानवर भी कर लेता है मेरी नजर में इंसान वही है जो समाज की भी चिंता करे और समाज के लिए कार्य करे.

…डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर

 

फ्रांसिस बेकन ने जब मिथकों के खिलाफ झंडा बुलंद किया तो घोषणा की थी कि साइंस इंसानियत को भविष्य में ले जाएगा। इस बात को कोपरनिकस, गेलिलियो और खास तौर से न्यूटन ने गंभीरता से लिया। इसके बाद पश्चिम ने विज्ञान पैदा किया।

बाद में समाजशास्त्र और एंथ्रोपोलॉजी ने मिथकों को नए ढंग से पढ़ना समझना शुरू किया और “मिथकों का विज्ञान” खोज निकाला।

इधर भारत मे न बेकन जन्मे न न्यूटन जन्मे। नतीजा ये कि हम साइंस पैदा नहीं कर सके। अब पश्चिमी साइंस हमने उधार तो ले लिया लेकिन उस साइंस को साइंटिफिक ढंग से इस्तेमाल करने की बुद्धि विकसित नहीं कर पाए।

पश्चिम ने जिस तरह “साइंस” और “साइंस ऑफ मिथ” पैदा किया भारत ने साइंस की नसबंदी करते हुए “मिथ ऑफ साइंस” पैदा किया। आज हम इसी दौर में जी रहे हैं।

केन विलबर्स ने ठीक ही लिखा है, जिन समाजों ने विज्ञान और लोकतन्त्र के जन्म की प्रसव पीड़ा खुद नहीं झेली उन्हें उधार में मिले विज्ञान और लोकतन्त्र की न तो समझ है न तमीज है। वे विज्ञान और लोकतंत्र को भी झाड़ फूंक की तरह ही इस्तेमाल करते हैं।

– संजय श्रमण

आपका मिशन ,सारी बातें,सारा अम्बेडकरवाद बुद्धिज़्म और सारा ज्ञान आदि जीरो हो जाएगा अगर आपमें सही जगह वोट डालने का काम नहीं किया, जागो और 2019 में सही चुनो , अबकी बार आपके शाशक और गुलाम बनने की लड़ाई है, चुन लो आपको जो भी बनना है . “संविधान बचाओ अपनी आज़ादी बचाओ “

संविधान बचाओ अपनी आज़ादी बचाओ

सभी भारतवासियों को 1 जनवरी बहुजन शौर्ये दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएं ,भीमा कोरेगाव का विजय स्तम्भ ही महार रेजिमेंट की रेजिमेंट बैच और टोपी पर अंकित होता है , जो महारों या बहुजनों को उनकी वीरता की याद दिलाता रहता है

 

प्रश्न :बुद्ध धम्म (धर्म ) मे अगर आत्मा नही है तो पुनर्जन्म जन्म किसका होता है❓*…Anil Gautam

प्रश्न 1 :बुद्ध धम्म (धर्म ) मे अगर आत्मा नही है तो पुनर्जन्म जन्म किसका होता है❓*

*उत्तर:*
*विषय गंभीर और कठिन है उत्तर घ्यान से पढ़िये*
पुनर्जन्म शरीर का नही चेतना के प्रवाह का होता है। शरीर का केवल पुनर्गठन होता है। उसी शरीर को जला दिए जाने पर पुनः उन्ही सेल,हड्डियों से निर्मित होना संभव ही नही है।
भगवान बुद्ध ने किसी सनातन (सदा रहने वाली) स्थाई आत्मा को स्वीकार नही किया उन्होंने केवल चेतना के प्रवाह (धारा) को स्वीकार किया है। भगवान बुद्ध इसे कोई नाम नही देते । बुध्द ने इसे अनतत्ता अर्थात आत्मा का न होना कहा।
जन्म या पुनर्जन्म चेतना(उर्जा) का होता है। यह जन्म आभासी( महसूस होने वाला,अस्थायी, temporary) होता है। जिसमे स्व अर्थात मैं (आत्म) का भाव उत्पन्न होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कपास को रुई का आभास होने लगे रुई से जब सूत काता जाए तो उसी कपास को धागे का आभास होने लगे। फिर उसी धागे से जब कपड़ा बनाया जाए तो उसे कपडे का आभास होने लगे और जब कपड़े की कमीज बनाई जाए तो कमीज का आभास होने लगे बाद में पुरानी कमीज से झाड़न और फिर पोछे का आभास और इस तरह अंत मे जलने के बाद राख का आभास होने लगे। इनमे से कुछ भी स्थाई नही है। भगवान बुध्द ने इसी को पुनर्जन्म कहा है। इस चेतना के प्रवाह को हम जीवन चक्र के कई आभासों में देखते हैं जैसे कभी मानव होने का आभास तो कभी पक्षी ,कभी किट,कभी,वनस्पति, कभी पशु आदि होने का आभास। परंतु इसमे कुछ भी स्थाई नही है। परंतु इस आभासी स्व (मैं, आत्म) के चक्र से मुक्ति सम्भव है ।
परंतु आज विज्ञान का युग है यहां थ्योरी नही चलती हमें साक्षात प्रमाण चाहिए।
पुनर्जन्म और चेतना के प्रवाह के साक्षात दर्शन को बुद्ध ने क्षणिकवाद में बहुत अच्छी तरह समझाया है। मानव शरीर को बुध्द चेतना का प्रवाह कहते हैं। इस प्रवाह के समय व्यक्ति शिशु से लड़कपन ,किशोरावस्था से युवावस्था, युवावस्था से प्रौढ़ावस्था, प्रौढ़ावस्था से वर्द्धवस्था में पुनर्जीवित होता है। व्यक्ति वही होते हुए भी वही नही होता। क्योंकि उसके शरीर का हर पल पुनर्गठन हो रहा है। परंतु चेतना की स्मृति(यादें) वही होती है। 60 साल का बुजुर्ग कभी भी खुद को बच्चा नही कह सकता क्योंकि अब वह बुढ़ापे में पुनर्जीवित हो चुका है। यह तर्क वैज्ञानिक रूप से भी सत्य है क्योंकि हमारे शरीर के सेल और हड्डियां हर क्षण नष्ट और बनते रहते हैं। जिस कारण हम वही व्यक्ति होते हुए भी वही नही होते। और यह पुनर्जन्म हम स्वयं महसूस भी करते है और जीते भी हैं। यह चेतना के पुनर्जन्म का एक अंश मात्र है।

इसे भगवान बुद्ध नदी के उदाहरण से भी समझाते हैं। अगर आप नदी के एक किनारे बैठे है। कुछ क्षण पहले जो नदी आपने देखी थी अगले ही क्षण नदी वही होते हुए भी वही नही होती। यह नदी का प्रवाह है जो हर पल बदल रहा है। परंतु फिर भी नदी वही है।यह क्षणिकवाद है। ठीक इसी प्रकार टिमटिमाती दीपक की लो हर क्षण जलती और बुझती है ।यह सब बहुत तेजी से होता है।परंतु यह लो वही होते हुए भी वही नही होती। हर क्षण दीपक की लौ का पुनर्जन्म हो रहा है लेकिन वह हमें दिखाई नही देता । बस एक लौ दिखाई देती है।

*🙏🏻नमो बुद्धाय🙏🏻*

 

anil123gautam@gmail.com

राजस्थान राज्य के नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव डांगावास दलित हत्याओं की प्रयोगशाला बन गया है ,यहाँ अक्सर हत्या और प्रतारणा होती रहती है ,यहाँ 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है….–    भंवर मेघवंशी (लेखक राजस्थान में दलित ,आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर संघर्षरत है )

डांगावास : दलित हत्याओं की प्रयोगशाला-
नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास ,जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है ,तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास ,..जी हाँ ,यह वही डांगावास गाँव है ,जहाँ पिछले एक साल में  चार दलित हत्याकांड हो चुके है ,जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी ,मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया ,उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए ,4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया ,इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफा कर दिया गया .पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की .
स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है .यहाँ पर थानेदार भी उनके है ,तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है ,फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये ? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है ,कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है ,अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है .
जमीन के बदले जान लेने का प्रचलन
एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी ) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है.यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों,झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है ,जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है ,तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है.ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था ,हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा ,बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा .बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें ,तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया,जमीन कीमती हो गयी ,उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया .पहले दलितों ने याचना की ,फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा ,मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना ,मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी .करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा ,बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया ,बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया .वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया .इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया ,लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये.रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी .मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की.मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा .
निर्मम नरसंहार ,अमानवीयता ,पशुता ,दरिंदगी !
12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया ,मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी ,बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी ,इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था ,अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ  कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है  ,चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े ,दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे ,अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां ,लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे ,उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया .
दलितों ने गोली चलायी ही नहीं
लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था ,इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर  फ़ायर कर दिया ,लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया ,जिससे मुन्नाराम  गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी ,जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था .गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये ,उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.
ट्रेक्टरों से कुचला ,लिंग नोचा ,ऑंखें फोड़ दी ,गुप्तांगों में लकड़ियाँ डाल दी
ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है ,वे निरीह ,निहत्थे दलितों पर चलने लगे ,पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी ,तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया .इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था ,जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था .जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया ,उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी .महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी .तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए ,एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जला कर राख कर दी गयी ,एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया .जो भी समान वहां था ,जालिम उसे लूट ले गए .इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा ,लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई  ,जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की ,इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी .
यह अचानक नहीं हुआ ,सब कुछ पूर्वनियोजित था
ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित नरसंहार ही था ,इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक  वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है .पुलिस ने दलितों की और से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है ,जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था ,भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ,ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके . कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे ,उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला . बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे ,दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही ,इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ,यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा ,अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे .क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा ? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है .
इस शर्मनाक कृत्य पर शर्मिंदा नहीं है जालिम
कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है ,मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है .सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है ,कोई  भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया .अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है ,फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम आज तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा .नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है .दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता ,कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी ,वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें .इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफ आई आर भी दर्ज करवाई गयी है ,जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.
सीबीआई जाँच ही सच सामने ला सकती है .
अगर डांगावास नरसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सी बी आई को सौपना होगा ,क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है ,आखिर जिन  अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही ,जिसने दलितों की कमजोर एफ आई आर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया  ,उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है .
ख़ामोशी भयानक है .
इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है ,यह आश्चर्यजनक बात है .कहीं कोई भी हलचल नहीं है ,मेघसेनाएं ,दलित पैंथर्स ,दलित सेनाएं ,मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है ? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा ,हर घर आग के हवाले होगा ,हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी ,हर गाँव बथानी टोला होगा ,कुम्हेर होगा ,लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा .इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है ? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे .अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये ,उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है ,कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है ,ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से ,सम्मान और स्वाभिमान से जी सके .
–    भंवर मेघवंशी
(लेखक राजस्थान में दलित ,आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर संघर्षरत है )