बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मस्थान मध्यप्रदेश के महू रेलवे स्टेशन का नया नाम अब है:- ‘डॉ. अम्बेडकर नगर’, सभी भारतवासियों को मुबारकबाद|….National Dastak

रतलाम। मध्यप्रदेश के महू रेलवे स्टेशन का नाम भारतीय रेल द्वारा डॉ. आंबेडकर नगर घोषित किया गया और आधिकारिक पत्र भी पश्चिम रेल द्वारा जारी किया जा चुका है। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म स्थान रहे महू के रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर कर ‘डॉ. अम्बेडकर नगर’ किया जाएगा। रेल प्रबंधक कार्यालय ने इस सम्बन्ध में एक आदेश पारित किया है।

आपको बता दें कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म महू में ही हुआ था। इसलिए उनकी याद में रेलवे ने महू रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर ‘डॉ. अम्बेडकर नगर’ करने का फैसला लिया है। रतलाम के रेल प्रबंधक कार्यालय ने इस सम्बन्ध में एक नॉटिफिकेशन जारी किया है।

बहुजन लोगों को अपने महापुरुष या मसीह को पहचानने समझने में सदियों लग जाते हैं,तब तक देर भी हो जाती है, वो हमें छोड़ कर जा चुके होते हैं| जबकि ब्राह्मणवादी अपने भला करने वाले को उसके जीवन काल में ही पहचान लेते हैं, बल्कि सही बात तो ये है की उसके गद्दी पर बैठे रहते ही या उससे पहले ही पहचानकर उससे लाभ ले लेते हैं| कशी बहुजन दे अम्बेडकर के सक्रिय दिनों में उनको पहचान कर साथ दे देते तो अब तक तो आजाद हो गए होते |

http://www.nationaldastak.com/story/view/change-name-of-mahu-railway-station-in-dr-ambedkar-nagar

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बुद्ध की तुलना में सभी महान धार्मिक गुरु बहुत छोटे पड़ जाते हैं।वे तुम्हें अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं,जबकि गौतम बुद्ध आपको स्वतंत्र कर देते हैं …OSHO

buddha-the-greatबुद्ध की तुलना में सभी महान धार्मिक गुरु बहुत छोटे पड़ जाते हैं। वे तुम्हें अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि तुम एक निश्चित अनुशासन का पालन करो, वे चाहते हैं कि तुम्हारे तौर-तरीके, तुम्हारी नैतिकता, तुम्हारी जीवन शैली एक व्यवस्थित तरीके से हो। वे तुम्हें ढालकर कर एक सुन्दर जेल की कोठरी दे देते हैं।
बुद्ध पूरी तरह से स्वतंत्रता के लिए अकेले खड़े हैं। बिना स्वतंत्रता के व्यक्ति अपने परम रहस्य को नहीं जान सकता; जंजीरों में बंधा हुआ वह आकाश में अपने पंख फैला कर उस पार की यात्रा पर नहीं जा सकता। सभी धर्म व्यक्ति को जंजीरों से बांध कर, किसी तरह लगाम लगाए हुए उन्हें अपने वास्तविक स्वरुप में रहने की इजाजत नहीं देते अपितु वे उसे एक व्यक्तित्व और मुखोटे दे देते हैं- और इसे वे धार्मिक शिक्षा का नाम दे देते हैं।
बुद्ध कोई धार्मिक शिक्षा नहीं देते। वे केवल चाहते हैं कि जो भी हो, तुम सहज रहो। यही है तुम्हारा धर्म–अपनी सहजता में जीना। किसी मनुष्य ने आज तक स्वतंत्रता से इतना प्रेम नहीं किया। किसी मनुष्य ने आज तक मानवता से इतना प्रेम नहीं किया। वो केवल इसी कारण से अनुयायियों को स्वीकार नहीं करते क्योंकि किसी को अपना अनुयायी स्वीकार करने का अर्थ है उसकी गरिमा को नष्ट करना। उन्होंने केवल सह यात्रियों को स्वीकार किया। शरीर त्यागने से पहले उनका जो अंतिम वक्तव्य था, “मैं यदि कभी दोबारा लौटा तो तुम्हारा मैत्रेय बन कर लौटूंगा।” मैत्रेय का मतलब होता है मित्र।
भारत इस सरल से कारण के लिए गौतम बुद्ध को समझ नहीं पाया : वह समझता है कि मौन बैठना, बस होना मात्र कोई मूल्य नहीं रखता। तुम्हें कुछ करना होगा, तुम्हें प्रार्थना करनी होगी, तुम्हें मन्त्रजाप करने होंगे। तुम्हें किसी मंदिर में जा कर इंसान के ही बनाये हुए भगवान की पूजा करनी होगी। “तुम शांत बैठे-बैठे क्या कर रहे हो?”
और गौतम बुद्ध का सबसे बड़ा योगदान यह है कि : तुम अपनी शाश्वतता, अपनी लौकिक सत्ता को प्राप्त कर सकते हो अगर तुम बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी इच्छा के, और बिना किसी लालसा के शांत बैठ सको, बस अपने होने का आनंद लेते हुए–उस खाली अंतराल में जहां सहस्त्र कमल खिल उठते हैं।
गौतम बुद्ध अपने आप में एक श्रेणी है। सिर्फ कुछ ही लोगों ने उनको समझा है। यहां तक कि उन देशों में जहां बौद्ध धर्म एक राष्ट्रीय धर्म है–थाईलैंड, जापान, ताइवान–में यह एक बौद्धिक दर्शन बन गया है। झाजेन, मनुष्य का मौलिक योगदान–मिट गया है।
शायद तुम लोग ही केवल हो जो गौतम बुद्ध के निकटतम समकालीन हो। इस मौन में, इस शून्य में, इस मन से अ-मन की छलांग में, तुम एक अलग ही शून्य में प्रवेश कर जाते हो जो कि ना बाहर का है ना ही भीतर का। बल्कि दोनों के पार है।
मेरा सन्देश है: गौतम बुद्ध को समझने की कोशिश करो। वे सबसे सुन्दर लोगों में से हैं जिन्होंने इस धरती पर कदम रखा।
ऐच.जी वेल्स, ने अपने विश्व इतिहास में एक वाक्य लिखा है जो कि स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने योग्य है। गौतम बुद्ध के बारे में लिखते हुए वह कहता है, “शायद गौतम बुद्ध ही सिर्फ ऐसे नास्तिक व्यक्ति है जो फिर भी बहुत ईश्वर स्वरूप है।”
उस प्रकाश में, उस संबोधि, और निर्वाण के क्षण में, उन्हें किसी भगवान के दर्शन नहीं हुए। सम्पूर्ण आस्तित्व दिव्य है; वहां अलग से कोई निर्माता नहीं है। पूरा आस्तित्व ही प्रकाश से ओत-प्रोत है, चेतना से ओत-प्रोत; इसलिए कोई भगवान नहीं है वरन वहां भगवत्ता है।
यह धार्मिक जगत में एक क्रान्ति है। बुद्ध ने भगवान-रहित धर्म का निर्माण किया। पहली बार भगवान धर्म का केंद्र नहीं है। मनुष्य, धर्म का केंद्र बन गया है, और मनुष्य का अंतरतम भगवत्ता हो गया है, जिसके लिए तुम्हे कहीं नहीं जाना है–तुमने केवल बाहर जाना बंद कर दिया। कुछ क्षणों के लिए अपने भीतर रहो। धीरे-धीरे अपने केंद्र में स्थिर होते हुए। जिस दिन तुम अपने केंद्र पर स्थिर हुए कि विस्फोट हो जाता है।
तो मेरा सन्देश है: गौतम बुद्ध को समझो, ना कि बौद्ध बन जाओ। उनका अनुसरण मत करो। उस समझ को अपनी प्रज्ञा द्वारा आत्मसात करो, बल्कि उसे अपना बन जाने दो। जिस क्षण भी वो तुम्हारी अपनी हो जाती है, वह तुम्हे रूपांतरित करने लगती है। तब तक वह गौतम बुद्ध की रही है, और उसमे पच्चीस सदियों का अंतर है। तुम बुद्ध के शब्दों को दोहराये चले जा सकते हो–वे सूंदर हैं परंतु वे तुम्हें उसको पाने में मदद ना कर सकेंगे जिसकी खोज में तुम हो।
जहां तक पुराने संतों का सवाल है करुणा पर गौतम बुद्ध का जोर एक बहुत ही नई घटना थी। गौतम बुद्ध ने ध्यान को अतीत से एक ऐतिहासिक विभाजन दिया है; उनसे पहले ध्यान अपने आप में पर्याप्त था, किसी ने भी ध्यान के साथ करुणा पर जोर नहीं दिया। और उसका कारण था की ध्यान संबुद्ध बनाता है, तुम्हें खिलावट देता है, ध्यान तुम्हारे होने की चरम अभिव्यक्ति है। इससे ज़्यादा तुम्हे और क्या चाहिए? जहां तक व्यक्ति का सम्बन्ध है, ध्यान पर्याप्त है। गौतम बुद्ध की महानता इस बात में समाहित है कि तुम ध्यान करने से पहले करुणा से परिचित हो जाओ। तुम अधिक प्रेमपूर्ण, अधिक दयावान, अधिक करुणावान हो जाओ।
इसके पीछे एक छिपा हुआ विज्ञान है। इससे पहले कि व्यक्ति संबुद्ध हो यदि उसके पास एक करुणा से भरा ह्रदय हो तो संभावना बनती है कि ध्यान के उपरान्त वह दूसरों को वही सौंदर्य, वही ऊंचाई, वही उत्सव जो उसने खुद हासिल किया है, पाने में मदद कर सके। गौतम बुद्ध ने संबोद्धि को संक्रामक बना दिया है। पर यदि कोई व्यक्ति महसूस करे कि वह घर लौट आया है, तो फिर किसी और की क्या चिंता लेनी?
बुद्ध ने पहली बार आत्मज्ञान को निस्वार्थ बनाया है; उन्होंने इसे सामाजिक जिम्मेदारी बनाया है। यह एक महान परिवर्तन है। लेकिन आत्मज्ञान से पहले करुणा सीख लेनी चाहिए। यदि इसे पहले सीखा ना गया तो आत्मज्ञान के उपरान्त कुछ भी सीखने को नहीं बचता। जब कोई अपने आप में उन्माद से भर जाता है तो करुणा तक उसकी खुद की प्रसन्नता में बाधा बन जाती है -उसके उन्माद में एक प्रकार का विघ्न पड़ जाता है… इसलिए सैकड़ों आत्मज्ञान को उपलब्ध हुए हैं परंतु सद्गुरु बहुत कम।
संबुद्ध हो जाने का मतलब जरूरी नहीं कि तुम सद्गुरु भी हो जाओ। सद्गुरु हो जाने का अर्थ यह के तुम मे अनंत करुणा है, और तुम अपने भीतर की उस परमशांति के सौंदर्य में अकेले जाने से शर्मिंदगी महसूस करते हो जो तुमने आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त की है। तुम उन लोगो की मदद करना चाहते हो जो अंधे हैं, अन्धकार में हैं और अपने लिए मार्ग टटोल रहें हैं। उनकी मदद करना आनंददायी है, ना कि कोई बाधा।
असलियत में तो, जब तुम अपने आस-पास बहुत सारे लोगों को खिलते देखोगे; तो यह एक और ज्यादा समृद्ध आनंद बन जाता है; तुम एक बंजर जंगल में अकेले वृक्ष नहीं हो जो उग गया है, जहां कोई और वृक्ष नहीं उग रहा। जब तुम्हारे साथ सारा जंगल खिलता है तो आनंद हजारों गुना बढ़ जाता है; तुमने अपने आत्मज्ञान को दुनिया में क्रान्ति लाने के लिए उपयोग किया। गौतम बुद्ध केवल आत्मज्ञानी नहीं हैं, लेकिन एक आत्मज्ञानी क्रांतिकारी।
उनकी चिंता इस दुनिया के, लोगो के प्रति गहरी है। वे अपने शिष्यों को सिखाते थे की जब तुम ध्यान करो और उससे तुम्हे मौन और शान्ति मिले, तुम्हारे भीतर गहरे आनंद के बुलबुले उठने लगे तो; उसे रोको मत, उसे पुरे संसार में बांटो। और कोई चिंता ना लो, क्योंकि जितना तुम दोगे उतना ही तुम और देने के लिए सक्षम हो जाओगे। देने का भाव बहुत महत्व रखता है क्योंकि एक बार तुम्हे इस बात का पता चल जाए कि देने से तुम कुछ खोते नहीं बल्कि इसके विपरीत, यह तुम्हारे अनुभवों को कई गुना बढ़ा देता है। परंतु जिस व्यक्ति ने कभी करुणा नहीं जानी उसे देने के रहस्य का पता नहीं, उसे बांटने के रहस्य का पता नहीं।
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जोरबा टू बुद्ध : ओशो कहते हैं कि ‘जोरबा’ का अर्थ होता है- एक भोग-विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति और ‘बुद्धा’ का अर्थ निर्वाण पाया हुआ।…OSHO

zorba-to-buddhaजोरबा टू बुद्ध : ओशो कहते हैं कि ‘जोरबा’ का अर्थ होता है- एक भोग-विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति और ‘बुद्धा’ का अर्थ निर्वाण पाया हुआ।

जोरबा केवल शुरुआत है। यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो, तो तुम्हें कुछ बेहतर, कुछ उच्चतर, कुछ महत्तर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता, वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा, क्योंकि वे छोटे-छोटे, क्षुद्र अनुभव उकताने वाले हो जाएंगे। गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए, क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे।

पूरब ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि 29 वर्षों तक बुद्ध इस तरह जीए, जैसा कोई जोरबा कभी न जीया होगा। ओशो कहते हैं कि दरिद्र को ‘नारायण’ कहने से ही इस देश में दरिद्रता फैल गई है। यदि आप दरिद्रता और गरीबी को सम्मान देंगे तो आप कभी भी उससे मुक्त नहीं हो सकते। मेरा संन्यासी ऐसा होना चाहिए कि वह पहले धन पर ध्यान दे फिर ध्यान की चिंता करे। ओशो पर आरोप हैं कि वे सिर्फ अमीरों के गुरु हैं। उन्होंने पूंजीवाद को बढ़ावा दिया। उनके पास लगभग 100 रॉल्स रॉयस कारें थीं। वे कभी गरीबों और गरीबी का पक्ष नहीं लेते थे। ओशो कहते हैं कि दुखवादी नहीं, सुखवादी बनो।

सुखी रहने के सूत्र ढूंढो तो समृद्धि स्वत: ही आने लगेगी। ओशो कहते हैं कि किसी गांव में दस हजार गरीब हो और दो आदमी उनमें से मेहनत करके अमीर हो जाएं तो बाकी नौ हजार नौ सौ निन्यानवे लोग कहेंगे कि इन दो आदमियों ने अमीर होकर हमको गरीब कर दिया। और कोई यह नहीं पूछता कि जब ये दो आदमी अमीर नहीं थे तब तुम अमीर थे? तुम्हारे पास कोई संपत्ति थी, जो इन्होंने चूस ली। नहीं तो शोषण का मतलब क्या होता है? अगर हमारे पास था ही नहीं तो शोषण कैसे हो सकता है? शोषण उसका हो सकता है जिसके पास हो। अमीर के न होने पर हिन्दुस्तान में गरीब नहीं था? हां, गरीबी का पता नहीं चलता था। क्योंकि पता चलने के लिए कुछ लोगों का अमीर हो जाना आवश्यक है। तब गरीबी का बोध होना शुरू होता है। बड़े आश्चर्य की बात है, जो लोग मेहनत करें, बुद्धि लगाएं, श्रम करें और अगर थोड़ी-बहुत संपत्ति इकट्ठा कर लें तो ऐसा लगता है कि इन लोगों ने बड़ा अन्याय किया होगा। पूंजीवाद शोषण की व्यवस्था नहीं है। पूंजीवाद एक व्यवस्था है श्रम को पूंजी में कन्वर्ट करने की।

श्रम को पूंजी में रूपांतरित करने की व्यवस्था है। लेकिन जब आपका श्रम रूपांतरित होता है, जब आपको या मुझे दो रुपए मेरे श्रम के मिल जाते हैं तो मैं देखता हूं जिसने मुझे दो रुपए दिए उसके पास कार भी है, बंगला भी खड़ा होता जाता है। स्वभावत: तब मुझे खयाल आता है कि मेरा कुछ शोषण हो रहा है। और मेरे पास कुछ भी नहीं था उसका शोषण हुआ।

उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में विवादित जगह पर लगे एक पेड़ से एक दलित युवक का दातून तोड़ने के ‘जुर्म’ में कुछ कथित दबंगों ने कर दी दलित की हत्या, दो गिरफ़्तार…बीबीसी British Broadcasting Corporation (BBC)

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उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में विवादित जगह पर लगे एक पेड़ से एक दलित युवक का दातून तोड़ना इलाक़े के ही कुछ कथित दबंगों को नागवार गुज़रा.

पुलिस के मुताबिक महुई गांव की इस घटना में दलित युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई और गोली लगने के कारण दो और लोग घायल हो गए.

बांदा के पुलिस अधीक्षक डॉक्टर श्रीपति मिश्र ने बीबीसी को बताया कि ये घटना रविवार सुबह की है और असल मामला ग्राम समाज की ज़मीन का है जिसे दोनों पक्ष अपना-अपना दावा करते हैं.

लिस अधीक्षक के मुताबिक, “लल्लू नाम का व्यक्ति विवादित ज़मीन पर लगे पेड़ से दातून तोड़ रहा था. अभियुक्तों ने उसे ऐसा करने से मना किया, और फिर उसके न मानने पर उस पर फ़ायरिंग शुरू कर दी.”

डॉक्टर श्रीपति मिश्र ने बताया कि मामले में पांच लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है जिनमें से मुख्य अभियुक्त विश्राम सिंह समेत एक अन्य को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

उन्होंने बताया कि हत्या में इस्तेमाल हुई बंदूक को भी ज़ब्त कर लिया गया है.

पुलिस अधीक्षक के मुताबिक अभियुक्तों का आपराधिक रिकॉर्ड है.

पहले से ही इनके ख़िलाफ़ कई मुक़दमे दर्ज हैं. अन्य अभियुक्तों की तलाश में पुलिस कई जगह छापेमारी कर रही है लेकिन इलाक़े में तनाव बना हुआ है.

http://www.bbc.com/hindi/india-38435098?ocid=socialflow_facebook

 

 

(जो लोग अपने इतिहास,अपने महापुरुष को नहीं जानते न जानना चाहते हैं, न ही शिक्षा और  संगठन पर  संगर्ष करना चाहते हैं, ऐसे निकम्मे लोग ही आज दलित कहलाते हैं|इन्हीं लोगों को बुद्ध सोया हुआ बता कर जगाने की बात करते हैं| यही लोग जिन्दा तो है पर मरे सामान हैं शायद इसीलिए  इन्हीं लोगों के लिए मनुस्मृति में लिखा है की  गोह , उल्लू , कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है । )

25 दिसंबर मनुस्मृति दहन दिवस पर विशेष:- मनुस्मृति पर “ओशो” के विचार… OSHO

मनुस्मृति पर “ओशो” के विचार…
manusmriti dahan
मनु की स्मृति पढ़ने जैसी है। मनु की स्मृति से ज्यादा अन्यायपूर्ण शास्त्र खोजना कठिन है, क्योंकि कोई न्याय जैसी चीज ही नहीं है। मनुस्मृति हिंदुओं का आधार है- उनके सारे कानून, समाज-व्यवस्था का। अगर एक ब्राह्मण एक शूद्र की लड़की को भगाकर ले जाये तो कुछ भी पाप नहीं है। यह तो सौभाग्य है शूद्र की लड़की का। लेकिन अगर एक शूद्र, ब्राह्मण की लड़की को भगाकर ले जाये तो महापाप है। और हत्या से कम, इस शूद्र की हत्या से कम दंड नहीं। यह न्याय है!!! और इसको हजारों साल तक लोगों ने माना है। जरूर मनाने वाले ने बड़ी कुशलता की होगी।
कुशलता इतनी गहरी रही होगी, जितनी कि फिर दुनिया में पृथ्वी पर दुबारा कहीं नहीं हुई। ब्राह्मणों ने जैसी व्यवस्था निर्मित की भारत में, ऐसी व्यवस्था पृथ्वी पर कहीं कोई निर्मित नहीं कर पाया, क्योंकि ब्राह्मणों से ज्यादा बुद्धिमान आदमी खोजने कठिन हैं। बुद्धिमानी उनकी परंपरागत वसीयत थी। इसलिये ब्राह्मण शूद्रों को पढ़ने नहीं देते थे क्योंकि तुमने पढ़ा कि बगावत आई। स्त्रियों को पढ़ने की मनाही रखी क्योंकि स्त्रियों ने पढ़ा कि बगावत आई। स्त्रियों को ब्राह्मणों ने समझा रखा था, पति परमात्मा है। लेकिन पत्नी परमात्मा नहीं है!!! यह किस भांति का प्रेम का ढंग है ? कैसा ढांचा है ? इसलिये पति मर जाये तो पत्नी को सती होना चाहिये, तो ही वह पतिव्रता थी। लेकिन कोई शास्त्र नहीं कहता कि पत्नी मर जाये तो पति को उसके साथ मर जाना चाहिये, तो ही वह पत्नीव्रती था। ना, इसका कोई सवाल ही नहीं।
पुरुष के लिये शास्त्र कहता है कि जैसे ही पत्नी मर जाये, जल्दी से दूसरी व्यवस्था विवाह की करें। उसमें देर न करें। लेकिन स्त्री के लिये विवाह की व्यवस्था नहीं है। इसलिये करोड़ों स्त्रियां या तो जल गईं और या विधवा रहकर उन्होंने जीवन भर कष्ट पाया। और यह बड़े मजे की बात है, एक स्त्री विधवा रहे, पुरुष तो कोई विधुर रहे नहीं; क्योंकि कोई शास्त्र में नियम नहीं है उसके विधुर रहने का। तो भी विधवा स्त्री सम्मानित नहीं थी, अपमानित थी।
होना तो चाहिये सम्मान, क्योंकि अपने पति के मर जाने के बाद उसने अपने जीवन की सारी वासना पति के साथ समाप्त कर दी। और वह संन्यासी की तरह जी रही है। लेकिन वह सम्मानित नहीं थी। घर में अगर कोई उत्सव-पर्व हो तो विधवा को बैठने का हक नहीं था। विवाह हो तो विधवा आगे नहीं आ सकती। बड़े मजे की बात है; कि जैसे विधवा ने ही पति को मार डाला है!!! इसका पाप उसके ऊपर है। जब पत्नी मरे तो पाप पति पर नहीं है, लेकिन पति मरे तो पाप पत्नी पर है!!! अरबों स्त्रियों को यह बात समझा दी गई और उन्होंने मान लिया। लेकिन मानने में एक तरकीब रखनी जरूरी थी कि जिसका भी शोषण करना हो, उसे अनुभव से गुजरने देना खतरनाक है और शिक्षित नहीं होना चाहिये। इसलिये शूद्रों को, स्त्रियों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं।
तुलसी जैसे विचारशील आदमी ने कहा है कि ”शूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधकारी।” इनको अच्छी तरह दंड देना चाहिये। इनको जितना सताओ, उतना ही ठीक रहते हैं। ”शूद्र, ढोल, पशु, नारी…’ ढोल का भी उसी के साथ-जैसे ढोल को जितना पीटो, उतना ही अच्छा बजता है; ऐसे जितना ही उनको पीटो, जितना ही उनको सताओ उतने ही ये ठीक रहते हैं। यही धारा थी। इनको शिक्षित मत करो, इनके मन में बुद्धि न आये, विचार न उठे। अन्यथा विचार आया, बगावत आई। शिक्षा आई, विद्रोह आया।
विद्रोह का अर्थ क्या है ? विद्रोह का अर्थ है, कि अब तुम जिसका शोषण करते हो उसके पास भी उतनी ही बुद्धि है, जितनी तुम्हारे पास। इसलिये उसे वंचित रखो।
—बिन बाती बिन तेल-(झेन कथा)

बहुजनों के त्यौहार ‘मनुस्मृति दहन दिवस 25 दिसंबर पर सभी भारतवासियों को हार्दिक शुष्कामनाएं| आज ही के दिन हमारे मसीहा बोधिसत्व डॉ अम्बेडकर ने मनुस्मृति जैसे अमानवीय, अन्यायी और दमनकारी ब्राह्मणवादी संविधान को जलाकर भारतवासियों को आज़ाद किया था(मूल लेख “मनुस्मृति” दहन दिवस)….एस आर दारापुरी

मनुस्मृति दहन दिवस
manusmriti jalai kyon gayi
 25 दिसम्बर का दिन  दलितों के लिए ” मनुस्मृति दहन दिवस” के रूप में  अति महतवपूर्ण दिन  है।  इस दिन ही  सन 1927 को  ” महाड़ तालाब” के महा संघर्ष के अवसर पर  डॉ. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने खुले तौर पर मनुस्मृति जलाई थी। यह ब्राह्मणवाद के विरुद्ध दलितों के संघर्ष की  अति महतवपूर्ण  घटना है। अतः इसे गर्व से याद किया जाना चाहिए।
 डॉ. आंबेडकर के मनुस्मृति जलाने  के कार्यक्रम को विफल करने के लिए सवर्णों ने यह तै किया था कि उन्हें इस के लिए कोई भी जगाह न मिले परन्तु एक फत्ते खां नाम के मुसलमान ने उन्हें  इस कार्य हेतु अपनी निजी ज़मीन उपलब्ध करायी थी। उन्होंने यह भी रोक लगा दी थी कि आन्दोलनकारियों को स्थानीय स्तर पर खाने पीने तथा ज़रूरत की अन्य कोई भी चीज़ न मिल सके। अतः सभी वस्तुएं बाहर से ही लानी पड़ी थीं। आन्दोलन में भाग लेने वाले स्वयं सेवकों को इस  अवसर पर पांच बातों  की शपथ लेनी थी:-
1. मैं जन्म  आधारित चातुर्वर्ण में विशवास नहीं रखता  हूँ।
2. मैं जाति  भेद में विशवास नहीं रखता हूँ।
3. मेरा विश्वास है कि जातिभेद हिन्दू धर्म  पर कलंक है और मैं इसे ख़तम करने की कोशिश  करूँगा।
4. यह मान कर कि कोई भी उंचा – नीचा  नहीं है, मैं  कम से कम हिन्दुओं में आपस में खान पान में कोई प्रतिबन्ध नहीं मानूंगा।
5. मेरा विश्वास है कि दलितों का मंदिर, तालाब और दूसरी सुविधाओं में सामान अधिकार है।
डॉ. आंबेडकर दासगाओं बंदरगाह से पद्मावती बोट द्वारा आये थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं बस वाले उन्हें ले जाने से इन्कार न कर दें।
कुछ लोगों ने बाद में कहा कि डॉ आंबेडकर ने मनुस्मृति  का निर्णय बिलकुल अंतिम समय में लिया क्योंकि कोर्ट के आदेश और कलेक्टर के मनाने पर महाड़  तालाब से पानी पीने का प्रोग्राम रद्द करना पड़ा था। यह बात सही नहीं है क्योंकि मीटिंग के  पंडाल के सामने ही मनुस्मृति को जलाने के लिए पहले से ही वेदी बनायीं गयी थी। दो दिन से 6 आदमी इसे तैयार करने में लगे हुए थे। एक गड्डा जो 6 इंच गहरा और डेढ़ फुट वर्गाकार था  खोद गया था जिस में चन्दन की लकड़ी रखी गई थी। इस के चार किनारों पर  चार पोल गाड़े गए थे जिन पर तीन बैनर टाँगे गए थे जिन पर लिखा था:
1. मनुस्मृति  दहन स्थल
2. छुआ -छुत का नाश हो और
3. ब्राह्मणवाद को दफ़न करो।
25 दिसम्बर, 1927 को 9 बजे इस पर मनुस्मृति को एक एक पन्ना फाड़ कर डॉ आंबेडकर, सहस्त्रबुद्धे और अन्य 6 दलित साधुओं द्वारा जलाया गया।
पंडाल में केवल गाँधी जी की ही एकल फोटो थी। इस से ऐसा प्रतीत होता कि डॉ आंबेडकर और दलित लीडरोँ का तब तक गाँधी जी से मोहभंग नहीं हुआ था।
मीटिंग में बाबा  साहेब का ऐतहासिक भाषण हुआ था। उस भाषण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित लिखित थे:-
हमें यह समझाना चाहिए कि हमें इस तालाब से पानी पीने  से क्यों रोक गया है। उन्होंने चतुर्वर्ण की व्याख्या की और घोषणा की कि हमारा संघर्ष चातुर्वर्ण को नष्ट करने का है और यही हमारा समानता के लिए संघर्ष का पहला कदम है। उन्होंने इस मीटिंग की तुलना 24 जनवरी, 1789 से की जब लुइस 16वें ने फ्रांस के जन प्रतिनिधियों की मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में राजा  और रानी मारे गए थे, उच्च वर्ग के लोगों को परेशान  किया गया था और कुछ मारे भी गए थे। बाकी  भाग गए और अमिर लोगों की सम्पति ज़ब्त कर ली गयी थी तथा इस से 15 वर्ष का लम्बा गृह युद्ध शुरू हो गया था। लोगों ने इस क्रांति के महत्त्व को नहीं समझा है। उन्होंने फ्रांस की क्रांति के बारे में विस्तार से बताया।  यह क्रांति केवल फ्रांस के लोगों  की खुशहाली का प्रारंभ ही नहीं था,  इस से पूरे यूरोप और विशव में क्रांति आ गयी थी।
तत्पश्चात उन्होंने कहा कि  हमारा उद्देश्य न केवल छुआ -छुत को समाप्त करना है बल्कि इस की जड़ में  चातुर्वर्ण को भी समाप्त करना है। उन्होंने आगे कहा कि किस तरह पैट्रीशियनज़  ने धर्म के नाम पार प्लेबिअन्स को बेवकूफ बनाया था। उन्होंने ललकार कर कहा था कि  छुअछुत का मुख्य कारण अंतरजातीय विवाहों पर प्रतिबन्ध है जिसे हमें तोडना है। उन्होंने उच्च वर्णों से इस “सामाजिक क्रांति” को शांतिपूर्ण ढंग से होने देने, शास्त्रों  को नकारने और न्याय के सिद्धांत को स्वीकार करने की अपील की। उन्होंने उन्हें अपनी तरफ से पूरी तरह से शांत रहने का आश्वासन दिया। सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गए  और समानता की घोषणा की गयी। इस के बाद मनुस्मृति जलाई गयी जैसा  कि ऊपर अंकित किया गया है।
ब्राह्मणवादी मीडिया में इस पर बहुत तगड़ी प्रतिक्रिया हुयी। एक अखबार ने उन्हें “भीम असुर” कहा। डॉ आंबेडकर ने कई लेखों में मनुस्मृति के जलाने को जायज़ ठहराया। उन्होंने उन लोगों का उपहास किया और कहा कि उन्होंने मनुस्मृति को पढ़ा नहीं है और कहा कि हम इसे कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने उन लोगों का ध्यान दलितों पर होने वाले अत्याचार की ओर खींचते  हुए कहा कि वे लोग मनुस्मृति पर चल रहे हैं जो  यह कहते हैं कि यह तो चलन में नहीं है, इसे क्यों महत्व देते हो। उन्होंने आगे पूछा कि अगर यह पुराणी हो गयी है तो फिर आप को किसी द्वारा  इसे जलाने  पर आपात्ति क्यों होती है? जो लोग यह कह रहे थे कि मनुस्मृति जलाने  से दलितों को क्या मिलेगा इस पर उन्होंने उल्टा पूछा कि  गान्धी  जी को विदेशी वस्त्र जलाने से क्या मिला? “ज्ञान प्रकाश” जिसने खान  और मालिनी के विवाह के बारे में छापा  था को जला कर क्या मिला? न्युयार्क में मिस मेयो की ” मदर इंडिया ” पुस्तक जला कर क्या मिला? राजनैतिक सुधारों को लागू करने के बनाये गए “साइमन कमीशन” का बाईकाट करने से क्या मिला? यह सब विरोध दर्ज कराने के तरीके थे ऐसा ही हमारा भी मनुस्मृति के विरुद्ध था।
उन्होंने आगे घोषणा की अगर दुरभाग्य से मनुस्मृति जलाने  से ब्राह्मणवाद ख़त्म नहीं होता तो हमें या तो ब्राह्मणवाद से ग्रस्त लोगों को जलाना पड़ेगा या फिर हिन्दू धर्म छोड़ना पड़ेगा। आखिरकार बाबा साहेब को  हिन्दू को त्याग कर बौद्ध धम्म वाला रास्ता अपनाना पड़ा। मनुस्मृति का चलन आज भी उसी तरह से है। अतः दलितों को मनुस्मृति दहन दिवस मना कर तब तक जलाना पड़ेगा जब तक चातुर्वर्ण ख़त्म नहीं हो जाता
S R DARAPURI
एस आर दारापुरी
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25 दिसंबर मनुस्मृति दहन दिवस पर विशेष:- दलितों-पिछड़ों(मूलनिवासी) और स्त्रियों के शोषण को वैधता दिलाने का दर्शन है ब्राह्मणवाद का लिखित विधान/संविधान :- ‘मनुस्मृति’…डॉ.मुकेश कुमार

manusmritiदलितों-पिछड़ों(मूलनिवासी) और स्त्रियों के शोषण को वैधता दिलाने का दर्शन है ब्राह्मणवाद का लिखित विधान/संविधान :- ‘मनुस्मृति’
आज मनुस्मृति दहन दिवस है. आज ही के दिन 25 दिसंबर 1927 को अपने एक ब्राह्मण मित्र सहस्रबुद्धे के सुझाव पर बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने मनुस्मृति जलाकर ब्राह्मणवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का शंखनाद किया था. ब्राह्मणवाद जाति-वर्ण आधारित विषमतमूलक समाज व्यवस्था का दर्शन है. ब्राह्मणवाद दलितों-पिछड़ों-स्त्रियों के शोषण को वैधता दिलाने का दर्शन है और मनुस्मृति इसकी आचार संहिता है. इसे जलाते हुए बाबा साहब ने इस आचार संहिता की वैधता को ही चुनौती प्रदान कर दी थी. धर्म-समाज की जकड़बंदी को कायम रखने में धर्मशास्त्रों व आचार संहिताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के तमाम निर्णायक घड़ी में और लोक व्यवहार में भी इसकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस रूप में ब्राह्मणवाद आज भी जिन्दा है और राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित कर रहा है. आज भी वह दलित-बहुजनों-स्त्रियों का खून चूस रहा है. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या, अख़लाक़-मिन्हाज अंसारी के कत्ल से लेकर नजीब को गायब करने तक में इसकी भूमिका देखी जा सकती है. गुजरात के ऊना में दलितों की हत्या से लेकर देश के हर कोने में दलित उत्पीड़न का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जिससे यह साबित होता है कि ब्राह्मणवाद आज भी जिन्दा है. और इसके खिलाफ लड़ाई की जरूरत आज भी बनी हुई है. ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई का अर्थ यथास्थितिवादी समाज वयवस्था को बदलने की लड़ाई है. यह दलितों-शोषितों-वंचितों-स्त्रियों के हक़-अधिकार की लड़ाई है.

समता के मूल्यों के आधार पर समाज को रचने-गढ़ने की लड़ाई है. यह लड़ाई आज भी जारी है. ऊना से लेकर उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, मध्य प्रदेश और दिल्ली-हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान हर जगह जारी है. यह लड़ाई बीजेपी शासित राज्यों में भी जारी है और गैर बीजेपी शासित राज्यों में भी जारी है. यह लड़ाई साम्प्रदायिक फासीवाद के खिलाफ से होते हुए कॉर्पोरेट फासीवाद तक के विरुद्ध हर मोर्चे पर जारी है. खनिज लूट के खिलाफ आदिवासियों की हर लड़ाई, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों की देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही लड़ाइयों में भी पूंजीवाद से संश्रयबद्ध ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई के तत्व निहित है.

भूमि अधिकार के लिये, भूमि सुधार के लिये गुजरात से लेकर भागलपुर के दलितों-वंचितों द्वारा भूमि के सवाल पर नये सिरे से लड़ी जा रही लड़ाई भी ब्रह्मणवाद के खिलाफ ही तो है. विश्वविद्यालय कैंपसों में जातिगत आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ, आरक्षण में किये जा रहे घपले-घोटालों के खिलाफ दलित-बहुजन छात्रों द्वारा लड़ी जा रही लड़ाइयां भी उम्मीद पैदा कर रही हैं. सत्ता के बर्बर हमलों से हमारे लोग लहूलुहान हो रहे हैं, किंतु हौसले पस्त होने के बजाय बुलन्द ही होते जा रहे हैं.

आइये बाबा साहब द्वारा आज से 90 वर्ष पूर्व शुरू की गई इस लड़ाई के अधूरे कार्यभार को पूरा करते हुए समतामूलक समाज बनाने का आज फिर से संकल्प व्यक्त करें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डॉ.मुकेश कुमार न्याय मंच से जुड़े हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘नेशनल स्लोगन ‘ उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। )

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डॉ.मुकेश कुमार

http://nationalslogan.com/2016/12/25/dr-mukesh-kumar-opinion-on-manusmriti-combustion-day/
http://www.nationaldastak.com/story/view/opinion-about-manusmariti