उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में चमार/जाटव समाज पर हुए जातीय दंगों,आगजनी और कत्लेआम के विरोध में और एडवोकेट चंद्रशेखर रावण व भीम_आर्मी के समर्थन में दिल्ली स्तिथ जंतर_मंतर में जबरदस्त प्रदर्शन हुआ,विदेशी मीडिया ने प्रदर्श को कवर किया, ज्यादातर सक्षम लोगों के पढ़ने वाला अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया अखबार में खबर छपी,क्या टीवी पर आपने ये खबर देखी…Samaybuddha Mishan

आज का प्रदर्शन दिल्ली में इस साल का सबसे बड़ा जनसमुद्र था।

सुबह से लोग लाठियों में नीला झंडा लगाए संसद के बिल्कुल पास जंतर मंतर पर जुटने लगे। सुबह वहाँ क़रीब तीन सौ पुलिसवाले, गिरफ्तार करने के लिए क़रीब 30 बसें, आँसू गैस छोड़ने वाला वज्र वाहन और पानी की तेज़ धार छोड़नी वाली दमकल तैनात थी।

फिर विदेशी मीडिया कर्मी आने लगे। ज़्यादातर को आपने मंच के आसपास नोटिस किया होगा। अमेरिकी, यूरोपीय, जापानी, ऑस्ट्रेलियाई। और भी कई।

एक बात उन्होंने आयोजकों से पूछ ही ली।

Where is Indian Media?
भारतीय मीडिया कहाँ है?

ज़ाहिर है आयोजक कार्यक्रम में व्यस्त थे। कारण बता नहीं पाए। लेकिन वह सवाल अब भी हवा में टँगा है- Where is Indian Media?
भारतीय मीडिया कहाँ है?

जंतर मंतर पर आज दलितों का मध्यवर्ग और इलीट भी था। हर हाथ में स्मार्ट फ़ोन। अच्छे कपड़े। पाँव में बूट। आँखों में सनग्लास।

सैकड़ों लोग अपनी कारों से आए। इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर, रिसर्च स्कॉलर्स, दुकानदार, नौकरीपेशा लोग, प्रोफ़ेशनल।

यह तबक़ा इतनी बड़ी संख्या में जब सड़क पर आ जाए, तो समझ लेना चाहिए कि सतह के नीचे कहीं कुछ बहुत गंभीर हो रहा है।

यह तबक़ा पहली बार इतना नाराज़ है।

अब सब कुछ पहले की तरह नहीं रह जाएगा।

==================दिलीप सी मंडल के फेसबुक वाल से साभार ===================================

आज युवाओं का प्रदर्शन लगा पूरी तरह। वह भी ऐसे स्मार्ट स्टाइलिश, खाते पीते तबके का, जिनके ऊपर अक्सर यह आरोप लगता है कि नौकरी पाकर पेट भरने लगा तो वे अपने पूर्वजों और दो तीन पीढ़ी पहले अपने परिवार के संघर्षों को भूल गए हैं।
आज का जमावड़ा मैंने इसी नजरिये से देखा।

 

दिल्ली जंतर-मंतर पर 21- मई 2017 को सुबह 9 बजे से दलितों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर देश की राजधानी में शांतिपूर्ण तरीके से होगा धरना प्रदर्शन, इस विषय में सुनिए मान्यवर एडवोकेट श्री चंद्रशेखर आजाद रावण का ऑडियो सन्देश इसी पोस्ट में

*विशेष सूचना*
*देश भर के दलित संगठनों ने किया एलान*
*दलितों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर देश की राजधानी में शांतिपूर्ण तरीके से होगा धरना प्रदर्शन*
*सहारनपुर कांड के पीडितों को दिलाएंगे इंसाफ*
*अभी नहीं तो कभी नहीं*
*जरूर पहुंचें*
*स्थान – दिल्ली जंतर-मंतर*
*तारीख- 21- मई 2017*
*समय – सुबह 9 बजे से*
*एक एक व्यक्ति को घर से निकालो और जंतर-मंतर पहुंचों*

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भीम आर्मी के लीडर मान्यवर श्री चंद्रशेखर आज़ाद रावण का कार्टून आया है जिसमे दिखाया गया है की चंद्रशेखर जनता के लीडर के रूप में उभर रहे हैं और मायावती व् पासवान जैसे तथाकथित दलित लीडर अपने किले से ये सब देख रहे हैं| क्या आपने नोट किया है की टीवी और हिंदी अखबार में तो बहुत सी ख़बरें नहीं आती जो की अंग्रेजी अखबार में आती हैं |जनता ज्यादातर ख़बरों के लिए टीवी और हिंदी अखबार पर निर्भर रहती है, जबकी अलाइड क्लास यानि अमीर लोग या सवर्ण के यहाँ अंग्रेजी अखबार जैसे टाइम्स ऑफ़ इंडिया आता है|

सहारनपुर के घटना के बाद दलितों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा क्योंकि प्रशासन बजाय प्रभावित लोगो को मदद करने के भीम सेना को एक अपराधिक समूह घोषित करने पर आमादा है|बहुजन नेतृत्व अम्बेडकरवादी युवाओ की राजनैतिक आकांक्षाओं को समझें…विद्या भूषण रावत https://hindi.sabrangindia.in



सहारनपुर के घटना के बाद दलितों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा क्योंकि प्रशासन बजाय प्रभावित लोगो को मदद करने के भीम सेना को एक अपराधिक समूह घोषित करने पर आमादा है . भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद को पुलिस तलाश कर रही है और ये सूचनाएं है के उनके ऊपर रास्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने के तैय्यारी चल रही है . घायल दलित परिवार अस्पताल में हैं और प्रदेश से लेकर केंद्र तक का एक भी मंत्री, सांसद  या विधायक लोगो की खोज खबर लेने नहीं गया. जिन लोगो का सब कुछ लुट गया उनके सुरक्षित घर वापसी और उनके जीवन को वापस पटरी पर लाने के लिए कोई योजना अथवा समाचार अभी तक तो नहीं सुनाई दिया है . इस सरकार और उसकी रणनीति को लेकर अगर अभी भी लोगो को गलतफहमिया हैं तो वो निकाल ले . मंचो से जय भीम के नारे और प्रधान सेवक के इमोशनल भाषण चाहे बाबा साहेब को लेकर हो या बुद्ध को लेकर हो उससे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगो को चाहिए के दलितों और पिछडो के प्रति सरकार के पिछले कुछ सालो के कार्यकाल बता सकते हैं के आखिर सरकार ने क्या क्या किया है . रोह्ति वेमुला से लेकर जे एन यू में छात्रवर्ती का प्रश्न हो या दलितों के लिए स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान की बात हो सभी न्यूनतम हो चुके हैं . अगर वेलफेयर योजनाओं को देखे तो सरकार की उनमे कोई दिलचस्पी नहीं है. बीफ बैन हो या अन्य कोई मामला, सभी किसानो और दलित पिछडो के विरुद्ध जाते हैं .

हालाँकि प्रधान्सेवक बाबा साहेब आंबेडकर और बुद्ध का बहुत नाम ले रहे हैं पर उत्तर प्रदेश के प्रधान सेवक को अम्बेडकरवाद में बहुत दिलचस्पी हो ऐसा नज़र नहीं आता और ये उनकी कार्यशैली से पता चल जाता है . अभी मेरठ के एक दिवसीय दौरे पर एक दलित बस्ती में जाते समय वो बाबा साहेब आंबेडकर के प्रतिमा को माल्यार्पण नहीं किये जबकि लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे.  ऐसी बाते भूल से नहीं होती अपितु उनके पीछे अपने वोट बैंक को एक सन्देश भी देना होता है के हम सबकी तरह नहीं है .

योगी आदित्यनाथ के आने के बाद से उत्तर प्रदेश के राजपूत अति उत्साहित है . हो सकता है के बहुत सारे उन्हें महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान के बाद का सबसे मजबूत राजा मान रहे हो क्योंकि आज तक खुले तौर पर योगी आदित्यनाथ इस व्यस्था के पोषक दिखाई दे रहे हैं जो वर्णवादी है . उनके प्रसाशन पर राजपूतो के पकड़ दिखाई देती है और ये अनायास ही नहीं के वे लखनऊ में समाजवादी नेता चंद्रशेखर के जन्म दिवस अप्रेल १९ को एक कार्यक्रम में अतिथि बन कर गए और उनकी स्मृति में एक पुस्तक का विमोचन किया . मंच पर मुख्या अतिथियों में राजा भैया भी दिखाई दिए और ये कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि चंर्दाशेखर जी हालांकी खांटी समाजवादी थे लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवो में उनकी ताकत उनकी जाति ही थी लोगो को उनके समाजवाद से कम और ठाकुर होने से ज्यादा मतलब था और क्षेत्र के तमाम स्वनामधन्य नेताओं से उनके संपर्क थे और उन्होंने उसे कभी छुपाया भी नहीं . मंडल कमीशन के लागु होने पर उसके विरोध में सबसे ज्यादा चंद्रशेखर ही थे और अंत तक उनका विरोध था . उनके क्षेत्र के दलित पिछडो को चंद्रशेखर जी की राजनीती में कोई भरोषा नहीं था लेकिन वह नेताओं के नेता थे और माननीय मुलायम सिंह जी ने भी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर जी की स्मृति में एक दिन की छुट्टी की घोषणा की थी . अब सभी चंद्रशेखर जी के समाजवाद से कम और ठाकुरवाद से ज्यादा प्रभावित थे .

उत्तर प्रदेश के राजनीती में बर्चस्व की राजनीती हावी है और नेताओं को दूसरीजाति पर भरोषा नहीं होता और वे अपनी अपनी जातियों के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पे पहुंचाते हैं . ये हकीकत सबको पता है और इसिलए हिंदुत्व भी ब्राह्मणवादी राजनीती है लेकिन अब योगी जी को भी बिरादरी की आवशयकता महसूस हो रही है . कल उत्तर प्रदेश के एक साथी कह रहे थे के योगी जी अच्चा काम कर रहे हैं लेकिन भाजपा के महत्वकांक्षी नेता उन्हें कुछ करने नहीं देंगे . हकीकत यह है के  छोटी छोटे निर्णयों के लेकर मीडिया ने लालू, अखिलेश और मायावती को तो घोर जातिवादी करार दे दिया जबकि दोनों की किचन कैबिनेट में भी ब्राह्मणों की अच्छी खासी भूमिका थी . इस वक़्त योगी और मोदी को मीडियाकर्मी उनके नेतृत्व के तौर पर नहीं अपितु  प्रशंशक के तौर पर देख रहा है अतः उनकी न तो आलोचना हो सकती है और न ही कोई सवाल उनसे किया जा सकता है . उनके भक्तो की जमात उनसे सवाल करने वाले लोगो से बदला लेने को तैयार है . मेरा सवाल यह है के इतने दिनों से उत्तर प्रदेश में गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों का उत्पीडन हो रहा है लेकिन न तो प्रधान सेवक और न ही मुख्यमंत्री ने एक भी शब्द उनके बारे में कहा, तो क्या यह अच्छी बात है ? उन्होंने अपने लोगो से खुले तौर पर यह नहीं कहा के कानून हाथ में न लो . हम ये मानते हैं के संघ के जिन कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग शुरू से ही जाति और धर्म के संकीर्ण दायरे में हुई हो तो वो अचानक से नहीं बदलेंगे. उन्हें अभी भी नहीं लग रहा के सरकार में आने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी को ज्यादा जिम्मेवार और समझदारी से बोलना होता है . लोग आपसे सवाल करेंगे और आपकी सरकार की उपलब्धिया मांगगे लेकिन उसके उत्तर में उन्हें गौसेवक, राष्ट्रवाद और अब सहारनपुर के दंगे ही दिखाई देंगे .

सहारनपुर के दंगो के पीछे साफ़ तौर पर जिले की राजनीती में सवर्ण बर्चस्व कायम करना है . सहारनपुर में दलितों के आर्थिक सामाजिक राजनैतिक हालत उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाको से बेहतर हैं और इसलिए ये बसपा का गढ़ भी रहा है . उत्तर प्रदेश में भाजपा के लम्बी रणनीति के तहत हिन्दू मुसलमान की राजनीती में पिछडो और दलितों के नेतृत्व को पूर्णतया समाप्त करने की है. जातियों के बर्चस्व को कायम करने के लिए ही महाराणाप्रताप के जन्मदिन को मनाने की बात हुयी. लेकिन दिल में रहने वाली घृणा को देखिये के ठाकुर लोग बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति की स्थापना चमार बस्ती में भी नहीं करने देना चाहते हैं . ये साफ़ नज़र आता है के वर्णवादी सवर्णों को अम्बेडकरवादी अस्मिता से बहुत परेशानी है क्योंकि वो व्यस्था को चुनौती दे रहे हैं .

सहारनपुर घटनाक्रम से भीम आर्मी का बहुत जिक्र हो रहा है . बहुत से ऑनलाइन पोर्टल्स में आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेकर आजाद और उसके अध्यक्ष के साक्षात्कार सुनाये गए हैं . चंद्रशेखर राजनैतिक तौर पर जागरूक व्यक्ति नज़र आते हैं और उन्होंने कोई ऐसी बात नहीं की है जो समाज विरोधी या संविधान विरोधी हो . हकीकत बात यह है भीम आर्मी ने लोगो को न केवल जागरुक किया है अपितु उन्हें स्वरोजगार और व्यवसाय की तरफ भी आकर्षित किया है . भीम आर्मी अभी तक दलितवर्ग में आत्मसम्मान जगाने हेतु और उनमे एकता लाने का कार्य कर रही है  लेकिन भीम आर्मी को समझना पड़ेगा के उनका इस्तेमाल बसपा की ताकत को समाप्त करने के लिये  भी किया जा सकता है इसलिए आवश्यकता इस बात की है के आन्दोलन अभी सामाजिक ही रहे और राजनीतिक प्रयोग करने का प्रयास न करे क्योंकि उत्तर प्रदेश में २०१९ तक बहुजन समाज को अपनी स्थापित पार्टियों में ही परिवर्तन लाकर मज़बूत करना होगा नहीं तो मनुवादी शक्तियों के ही हाथ मज़बूत होंगे .

अभी तक बसपा की ओर से सहारनपुर हिंसा पर बहुत कुछ वक्तव्य नहीं आया है . भीम आर्मी से पार्टी ने पूर्णतया किनारा कर लिया है लेकिन वो ठीक नहीं है. बसपा मान्यवर कांशीराम द्वारा खड़ा किया गया आत्मसम्मान का आन्दोलन है और ये सब आसानी से नहीं होता. इसलिए जो लोग भीमसेना या कोई और लोगो को बसपा के विकल्प के तौर पर खड़ा करने की कोशिश करेंगे तो वो केवल वोट काटू की भूमिका में रहेंगे और कुछ नहीं कर पाएंगे . राजनीती के धरातल की हकीकत कुछ और होती है . बसपा प्रमुख सुश्री मायावती को चाहिए के वो भीम सेना या देश भर में हुए छात्रा आन्दोलन के नेताओं को एक मंच प्रदान करें . पिछले तीन वर्षो में हैदराबाद से लेकर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और अखलाक से लेकर पहलु खान तक की मौत ने, रोहित वेमुला से लेकर नजीब तक के लिए न्याय मांगते छात्र सडको पे हैं . विश्विद्यालयो की पढाई अब मुश्किल होती जा रही है और शिक्षा में हिंदुत्व का अजेंडा अब लागु हो चूका है जहा एक तरफ शिक्षा निजीकरण की और बढ़ रही है वही पाठ्यक्रम में मनुवादी विचारधारा घुसाई जा रही है . क्या बसपा या सपा जैसी पार्टिया युवाओं और छात्रो के ज्वलंत सवालो से मुंह चुरा सकती है . क्या ये अवसर नहीं के ये दोनों दल अपने अन्दर पूर्णतया पारदर्शिता लाये, युवा नेतृत्व विकसित करें और देश के युवा नेतृत्व चाहे भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद हो जिग्नेश मेवानी या कोई और, सबको कार्यक्रमों के जरिये एक मंच पर लाये ताकि जो युवा बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे है उन्हें एक राजनैतिक मंच मिल सके .

बसपा राजनितिक मजबूरियों के तहत चाहे ब्राह्मणों के साथ ‘अन्याय’ की बात कहे लेकिन वो दलितों, अकलियतो पर हो रहे अत्याचारों पर अगर खुल कर सामने नहीं आती है और यदि ऐसे आन्दोलनों का समर्थन नहीं करती जो दलितों की अस्मिताओ की रक्षा और उनकी सामाजिक आन मान के लिए बनायी गयी हैं तो उसका अस्तित्व नहीं रहेगा. बसपा को अभी भी समाज का समर्थन प्राप्त है लेकिन एक बात बसपा नेतृत्व को समझनी पड़ेगी के लोगो की सहनशीलता जवाब दे रही है . बसपा की मजबूती दलित अस्मिता के लिए जरुरी है लेकिन इसके साथ ही बसपा के अन्दर नए युवा नेतृत्व को विकसित करना पड़ेगा . आज से २० साल बाद बसपा का नेतृत्व क्या होगा और कौन करेगा इसके लिए एक नहीं कई युवा खड़े करने पड़ेंगे .

सहारनपुर का घटनाक्रम योगी आदित्यनाथ की राजनीती और उनके आड़ में ठाकुरशाही चलाने वालो के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है . संघ दलित और पिछडो के बीच के अंतर्द्वंद का लाभ लेता आया है . मुसलमानों को जबरन बीच में डालकर उसने सवर्ण नेत्रत्व को सबके उपर लाद दिया है . लेकिन जहाँ दलित पिछडो के अंतर्द्वंद हैं वही ब्राह्मण ठाकुरों के भी गंभीर अंतर्द्वंद हैं और उनकी एकता का एक ही बिंदु है वो दलित पिछड़ा विरोध की राजनीती लेकिन जब सत्ता के मलाई की बात आती है तो दोनों के अंतर्द्वंद आपस में टकरायेंगे और सुश्री मायावती ने ब्राह्मणों के साथ हो रहे ‘अन्याय’ को लेकर उस मुद्दे को खड़ा करने की कोशिश की है लेकिन वो अभी नहीं कामयाब होगी क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर या अन्य सवर्ण जातिया अभी हिंदुत्व को छोड़कर कही और जाने से रही क्योंकि मोदी और योगी युग स्वर्ण प्रभुत्वाद की एक नयी शुरुआत है और इसको वो आसानी से हाथ से जाने नहीं देंगे .

फिलहाल सहारनपुर में दलितों को न्याय देने की बात अभी तक एक भी मंत्री ने नहीं की है . सारा प्रशाश्निक फोकस ऐसा लगता है, भीम सेना पर है  और घायल लोगो और उनके उजड़े घर बार कैसे बसेंगे इसके लिए कोई प्रयास नहीं किये जा रहे . दुखद बाद यह है कोई भी राजनैतिक दल अभी संघ की चालो को समझ नहीं पा रहे या उसकी काट नहीं ढूंढ पा रहे और ये उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है . जरुरत है दलितों के साथ अन्याय को ख़त्म करने की और सरकार को दलित परिवारों पर हमला करने वाले लोगो को गिरफ्तार करने की और लोगो को समय पर मुवावजा दिलवाने की . सहारनपुर के दलितों को सुरक्षा और सम्मान चाहिए और जिन भी लोगो ने दलित बस्ती को जलाया या उनकी महिलाओं और पुरुषो पर अत्याचार किया उनके खिलाफ तुरंत कार्यवाही करे क्योंकि उसके अभाव में युवा इस क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम करना बहुत मुश्किल होगा .

वैसे भी संघ का अजेंडा दलित बहुत समाज और अन्य विपक्ष  को नेतृत्वविहीन कर देने का है . बसपा में विघटन का प्रयास किया गया है और अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी मीडिया को रोज ‘ब्रेक न्यूज़’ देंगे जैसे कपिल मिश्र दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के लिए और कांग्रेस के कई नेता अब सोनिया और राहुल के खिलाफ बोल रहे हैं वैसे ही मुलायम सिंह को लगातार खबरों में रखा जायेगा ताकि अखिलेश यादव भी लाइन पे रहे . लालू यादव को पहले ही फंसाने की पूरी तैय्यारी है . मतलब यह के विपक्ष में खुले तौर पर फूट डालने का अजेंडा है और इसे समझने की जरुरत है .

इस बात को भी समझना पड़ेगा के मुख्य धारा की राजनीती ने अभी तक जनता के ज्वलंत प्रश्नों पर गहरी चुप्पी साधे हुई है . चाहे वो बस्तर में आदिवासियों के जंगल में अधिकार का मामला हो या कश्मीर में राजनैतिक पहल , झारखण्ड के आदिवासियों का संघर्ष हो या विश्विद्यालयो में छात्रो के संघर्ष सभी जगह स्वयंस्फूर्त आन्दोलन खड़े हैं और राजनैतिक दल कुछ कह नहीं पा रहे हैं . या तो पार्टियों में इन सवालो पे ज्यादा चर्चा नहीं है अथवा नेतृत्व इन प्रश्नों को सही नहीं मानते हैं . हकीकत यह के अम्बेडकरवादी युवा अब अन्याय सहने को तैयार नहीं है चाहे वो रोहित वेमुला हो या भीम सेना का प्रश्न, लोग नेताओं का इंतज़ार नहीं करेंगे और आन्दोलन होंगे . बहुजन राजनीती को चाहिए के वे इन युवाओं के सपनो और आकांक्षाओं को मज़बूत करे और उन्हें रजिनैतिक रूप दे अन्यथा आन्दोलन किसी प्रश्न से शुरू होते हैं और राजनैतिक भटकाव का शिकार हो जाते हैं जो अंततः उस आन्दोलन को नुक्सान करते हैं जिसकी मजबूती के लिए वे शुरुआत करते हैं . हमारे सामने बहुत उदाहरण हैं जब नेकनीयती से किये आन्दोलन भटकाव का शिकार हो जाते हैं क्योंकि वो राजनैतिक तिकड़मे नहीं जानते . आवश्यक है के बहुजन राजनीती इन आन्दोलनों से बात करे और भविष्य की और देखे ताकि बिखराव की स्थिति पैदा न हो . उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामो से लोगो में बहुत निराशा भी है लेकिन भीम सेना ने उनमे पुनः उर्जा का संचार किया है . जब बहुजन राजनीती इन प्रश्नों पर खामोश रहेगी तो लोग अपना रास्ता खुद तय कर लेंगे लेकिन वो स्थिति बहुत अच्छी नहीं होगी क्योंकि उस परिस्थिति का लाभ वो लोग लेंगे जिन्होंने योज्नाबद्ध तरीके से सहारनपुर के घटनाक्रम को अंजाम दिया . देश में युवाओं की बहुत बड़ी आबादी जिसके मन में मौजूदा नेतृत्व और उसके तौर तरीको के प्रति घहरी निराशा है क्योंकि वो उनकी भावनाओं और महत्वाकांक्षाओ को समझने में या तो नाकाम रहा है या जानबूझकर उनकी अनदेखी कर रहा है  जो लम्बे समय में राजनैतिक तौर पर नुक्सान्वर्धक हो सकता है. राजनैतिक तौर पर पार्टियों को समझना पड़ेगा के यदि प्रशाशन उत्पीडित समूहों को न्याय देने में अक्षम रहा और यदि हिंदुत्व की सेनाए लोगो को जहा तहां पीटती रही और प्रशाशन कोई कार्यवाही नहीं करेगा तो जवाब में लोग भी अन्याय का मुकाबला करने के लिए जातीय राजनीती और उसकी अक्षमता के फलस्वरूप जातीय सेनाओं पर भरोषा करना शुरू करते हैं जो अंततः लोकतंत्र के लिए खतरनाक है लेकिन अगर बिहार में रणवीर सेना दलितों का उत्पीडन नहीं करती तो जवाबी सेनाये नहीं बनती  इसलिए जरुरी है के प्रशाशन कानून का शाशन स्थापित करे और लोगो को न्याय मिले .

 

https://hindi.sabrangindia.in/articles/understand-political-aspirations-bahujan-ambedkarite-youth-hindi

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