उड़ीसा पुरी में भगवान बुद्ध का दांत की आज भी पूजा किया जाता है,भगवान बुद्ध का दांत को स्थापित करना को नवकलेवर कहते है ।…R R Bag Bauddh

मैं उड़ीसा का हूं याने आदि बौद्ध भूमि कलिंगा का हूं । मेरा जो सरनेम है वह बाग है और बाग जो है वो नाग शब्द की अपभ्रंश हो सकता है । क्योंकि उड़ीसा में नाग राजाओं ने बुद्धिज्म को उनका राज्य के धम्म के रूप में स्वीकार किया था । पुरी जगन्नाथ मंदिर में भगवान बुद्ध का दांत की आज भी पूजा किया जाता है । अगर हम देखेंगे जो नबकलेबर जगन्नाथ जी का होता है वह और कुछ नहीं एक मूर्ति से दूसरे मूर्ति में भगवान बुद्ध का दांत को स्थापित करना उसी को नवकलेवर कहते है ।

इसी विषय में विश्व विख्यात साहित्यकार प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद जी विशेष रूप इस चीज का उल्लेख किया है।ओड़िसा के खुर्दा जिले के गोविंदपुर गाँव से बुद्ध की जो प्रतिमा मिली है और जिस प्रतिमा की रक्षा सातमुखी नाग कर रहे हैं, वह सातमुखी नाग वस्तुतः नव नाग वंश के सात राजाओं के प्रतीक हैं।

नव नाग वंश की स्थापना दूसरी सदी के मध्य में नव नाग ने की थी, जिस वंश के सर्वाधिक प्रतापी राजा वीरसेन नाग थे और अंतिम तथा सातवें राजा भव नाग थे। कोई दो सौ साल बाद चौथी सदी के मध्य में नव नाग वंश का पतन हो गया।

नव नाग वंश के पतन के बाद सात नाग राजाओं द्वारा की गई बौद्ध सभ्यता की सुरक्षा के स्मृतिस्वरूप कलाकारों द्वारा सातमुखी नाग के सुरक्षा घेरे में बुद्ध की यह प्रतिमा बनाई गई है।

यहीं कारण है कि चौथी सदी के पहले इस प्रकार की बुद्ध-प्रतिमा कहीं से नहीं मिलती है और जिस इतिहासकार ने इस प्रतिमा की उम्र 1400 साल बताई है, वह सही बताई है।

इसी बात से यह सिद्ध होता है की उड़ीसा में बुद्धिज्म और नाग राजाओं का पतन के बाद या ब्राह्मणवाद ने छल कपट से यहां पर हिन्दुवाद को स्थापित किया लिया

 

जीवक कौमारभच्च बौद्ध भारत के प्रसिद्ध चिकित्सक थे, आइये बौद्ध धम्म के और मानवता के इतिहास के ऐसे चमकते सितारे की कथा जानते हैं

जीवक, एक कूड़े के ढेर पर मिला था | कूड़े के ढेर पर निजात शिशु को देख कर वहॉ भीड़ एकत्र हो गई, उसी समय पर वहॉ से राजा बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय कि सवारी गुजर रही थी | राजकुमार अभय ने भीड़ को देख कर एकत्र लोगों से प्रकरण कि जानकारी ली, तो पता चला कि नवजात शिशु जीवित है, अभय ने नवजात शिशु को इस कारण ‘जीवक’ नाम उसको देकर उसे गोद लेकर उसका अपने पुत्र कि तरह लालन पालन किया |

जीवक कि आयु बढने पर, उसे पता चला कि वह कूड़े के ढेर पर मिला था व अभय ने करूणावस उसका लालन पालन किया है | जीवक को लगा सभी बच्चे बडे होकर कोई न कोई सिप्प सीखकर कोई व्यवसाय करते हैं, अत: जीवक ने अभय से चिकित्सक (वैद्य) बनने कि इच्छा प्रकट की | अभय का आशीर्वाद प्राप्त करके जीवक तक्षसिला चिकित्सक बनने के लिए चला गया |

शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने गुरू से पूछा, “अभी कितने दिनों तक और शिक्षा प्राप्त करनी होगी|” ! गुरू ने कहा, “जीवक!  तक्षसिला कि गलियों में जाओ व जंगलो में भी जाओं और वहा पर जो भी ऐसा पौधा या वृक्ष मिले जिसकी औषधी न बनाई जा सकती हो, उसे तोडकर मेरे पास ले आओ|” जीवक ने सारा क्षेत्र ढूंढ मारा ऐसा कोई पौधा या वृक्ष नहीं मिला जिससे औषधि न बनाई जा सके और यही बात उसने अपने गुरू को बता दी | गुरू ने कहा, “तेरी शिक्षा पूर्ण हुई|” तब जीवक राजगृह अपने पिता अभय के पास पहुंचने के लिए निकल पडा|

लेकिन रास्ते में उसका यात्रा-व्यय समाप्त हो गया, इस स्थिति में जीवक ने पता किया कि यहा कोई यदि किसी असाध्य रोग से ग्रस्त है तो उसकी जानकारी उसे दे, एक सरेनी कि पत्नी माइग्रेन से पीडित थी, उस सरेनी कि पत्नी से जीवक बोला, “क्या मै आपका उपचार कर सकता हूँ?” सरेनी-पत्नी बोली बडे-बडे दीर्घायु को प्राप्त वैद्य तो मेरा उपचार कर न सके, तू तो नवयुवक है, तू क्या कर पायेगा? जीवक बोला कि एक अवसर प्रदान करे जिसका मुझे कोई शुल्क भी नहीं चाहिए, यदि आप स्वस्थ होने पर कुछ देना चाहे तो दे देना अन्यथा कोई बात नही | यह सुनकर सरेनी-पत्नी ने उपचार करने की अनुमति दे दी | वह कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गई, प्रसन्न होकर उसने उसे सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दीं |

यह सुचना प्राप्त होने पर सरेनी-पूत्री ने अपनी मॉ से दुगनी सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दी, सरेनी ने सुना कि उसकी पत्नी स्वस्थ हो गई है, रोगग्रस्त रहते हमेसा घिर-घिर करती रहती थी तो उसने अपनी पुत्री से भी दुगुना सुवर्ण मुद्रायें जीवक को दे दी | अब जीवक के पास हजारों सुवर्ण मुद्रायें हो गई, इन्हें लेकर राजगृह के लिए प्रस्थान किया | राजगृह पहुच कर सारी सुवर्ण मुद्रायें जीवक ने अपने पिता अभय को दे दी, पिता अभय ने जीवक को समस्त मुद्रायें लोटाते हुये कहा कि अब इस क्षेत्र में अपना मकान बना कर रह | तब राजा बिम्बिसार बवासीर से ग्रस्त था व सभी उपचार व्यर्थ हो रहे थे, अभय के कहने पर बिम्बिसार ने अपने उपचार हेतु जीवक को बुलवा भेजा | जीवक के उपचार से राजा बिम्बिसार स्वस्थ हो गया तो राजा ने जीवक को क्षेत्रपति बना दिया व उस क्षेत्र में जीवक का बनाया ओषधालय आज भी पुरातत्व विभाग को प्राप्त है |

राजा बिम्बिसार ने दूसरे राजाओं के उपचार हेतु भी जीवक को भेजा व तथागत गोतम बुद्ध के उपचार करने का उत्तरदायित्व जीवक को प्रदान किया | जीवक ने तथागत गोतम बुद्ध के लिए जीवकाराम बनवाया | जीवक के कारण तथागत गोतम बुद्ध ने कई विनय पिटक में संशोधन भी किया था | आयुर्वेद में एक ओषधि का नाम आज भी “जीवक” है | जीवक को राजा बिम्बिसार के पुत्र राजकुमार अभय ने पाला पोसा इस कारण उसे “जीवक कौमारभृत्य” के नाम से समस्त जम्बूद्विप में जाना गया |

भारत में चार प्रकार के बौद्ध: एक विश्लेषण -राजेश चन्द्रा-

।।चार प्रकार के बौद्ध: एक विश्लेषण।।   -राजेश चन्द्रा-

भारत में चार प्रकार के बौद्ध हैं।

एक, पारम्परिक बौद्ध हैं जो कि अधिकांशतः लद्दाख, अरुणाचल, सिक्किम, असम, नागालैण्ड, पश्चिम बंगाल आदि प्रांतों में रहते हैं- चकमा, बरुआ, ताई इत्यादि। ये वह बौद्ध हैं जो भारत के बुद्ध धम्म के विपत्तिकाल में अपने आप को बचा सके और बुद्ध धम्म की धरोहर को मुसीबतों में संरक्षित रख सके। इन बौद्धों के पास बुद्ध धम्म की बड़ी अनमोल धरोहरें संरक्षित हैं- परम्पराओं के रूप में, दुर्लभ ग्रंथों के रूप में। जैसे इसाईयों ने जीसस क्राइस्ट के सूली पर चढ़ाए जाने के समय का रक्तरंजित वस्त्र, जिसे श्राउड ऑफ ट्यूरिन कहते हैं, संरक्षित किया हुआ है, ऐसे इन पारम्परिक बौद्धों के पास भगवान बुद्ध के वास्तविक चीवर तक संरक्षित हैं, पूरे के पूरे भी और टुकड़ों में भी, भगवान के द्वारा प्रयुक्त वस्तुएं जैसे पात्र, आसन, नख इत्यादि भी। ऐसे पारम्परिक बौद्धों के बहुत निकट रह कर मैंने बड़ी सामग्रियां इकट्ठा की है। भारत के संविधान के अंतर्गत उनमें से अधिकांश पारम्परिक बौद्ध अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में सूचीबद्ध हैं। वे पैदायशी बौद्ध होते हैं। उनके सारे रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, पूजा-संस्कार, आस्था-विश्वास सब के केन्द्र में भगवान बुद्ध और बुद्ध धम्म होता है। उनकी नैतिक कथाओं, कहानियों और कहावतों में भी सिर्फ बुद्ध होते हैं। उनके सपनों में भी बुद्ध और उनका धम्म होता है। तात्पर्य यह कि उनकी कल्पना और भावजगत का ताना बाना भी बुद्धमय होता है। इन बौद्धों की संख्या सिन्धी, सिक्ख, जैन, पारसी, ईसाइयों की तरह अल्पसंख्या है लेकिन फिर भी इन समुदायों का राजनैतिक मूल्य न के बराबर है क्योंकि इनमें राजनैतिक जागरूकता बहुत कम है। यद्यपि कि पूर्वोत्तर राज्यों में इनके मत निर्णायक होते हैं।

दूसरे, वे बौद्ध हैं जो ओशो के अनुयायी अथवा अध्येता हैं। वे घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन बौद्धिक तल पर भगवान बुद्ध के प्रति उनकी गहरी स्वीकार्यता है। उनके मन में भगवान बुद्ध के प्रति गर्व की भावना है। वे भगवान बुद्ध को और बौद्ध धर्म को भारत का गौरव मानते हैं।

तीसरे, वे बौद्ध हैं जो गुरु सत्य नारायण गोयनका जी के साधना शिविरों में विपस्सना साधक हैं। विपस्सना के निष्ठावान ये साधकगण भी घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन भगवान बुद्ध के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा है। मानें तो मानस तल पर वे परिपूर्ण बौद्ध हैं लेकिन अभिलेखों में वे सवर्ण-अवर्ण, हिन्दू-मुस्लिम इत्यादि सब लोग हैं।

चौथे प्रकार के बौद्ध हैं जो बोधिसत्व बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के कारण स्वयं को बौद्ध मानते हैं। उनमें से भी अधिसंख्य अभिलेखों में अनुसूचित जाति के हैं, धार्मिक कोष्ठक में हिन्दू हैं, लेकिन मौखिक घोषणा में वे सर्वाधिक निष्ठावान बौद्ध हैं।

इस प्रकार अघोषित रूप भारत की एक बहुत बड़ी जनसंख्या बौद्ध है अथवा बुद्धानुयायी है।

चारों प्रकार के बौद्धों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं।

पारम्परिक बौद्ध भाषा-बोली-क्षेत्रीयता-रीति-रिवाजों के नाते शेष बुद्धानुरागियों से असम्पृक्त रहते हैं तथा शेष बुद्धानुरागियों के लिए भी ये पारम्परिक बौद्ध कौतुहल और विस्मय का विषय भर हैं। उनके साथ शेष बौद्धों की न सघन मैत्री है और न घुलने-मिलने वाला सम्पर्क।

ओशो से प्रभावित बुद्धानुरागियों के लिए बुद्ध व धम्म एक दार्शनिक चर्चा-परिचर्चा का विषय भर है। संस्कारिक तल पर वे अपनी-अपनी मान्यताओं व आस्थाओं में उतने ही कट्टर हैं जितना कि कथित कट्टर कट्टर होते हैं। भारत की सामाजिक-साम्प्रदायिकता-धार्मिक विषमताओं इत्यादि से उनका सरोकार न के बराबर है। बुद्ध प्रेमी-ओशो प्रेमी नामक एक समुदाय-सा है जिनके बीच उनकी गहरी मैत्री है। शेष बुद्धानुरागियों से उनकी मैत्री लगभग शून्य है।

विपस्सना करने वाले ध्यानी बौद्धों के जीवन केन्द्र में केवल विपस्सना है। दस दिवसीय-बीस दिवसीय-सतिपट्ठान इत्यादि शिविर करना उनके सरोकार की पराकाष्ठा है। विपस्सना के प्रति उनकी लगन कमाल की है। एक तरह से वे धम्म को व्यवहारिक तल पर जीने का चरम प्रयास कर रहे हैं। वे मन के गहनतम तल पर रूपान्तरण की कीमिया में लगे हैं। ये विपस्सी साधक स्वयं को बौद्ध घोषित नहीं करते लेकिन घोषित बौद्धों से अधिक निष्ठावान बौद्ध हैं। लेकिन सामाजिक सरोकारों से इनका भी कोई वास्ता नहीं है या है भी तो नगण्य है।

अब चौथे प्रकार के बौद्ध हैं जो बोधिसत्व बाबा साहेब के प्रभाव में स्वयं को बौद्ध मानते हैं। उनके लिए सामाजिक सरोकार प्राथमिक है, प्रिऑरटी है। यह समुदाय 14 अक्टूबर’1956 के बाद अस्तित्व में आया है। कुछ लोग इस नवजन्मित समुदाय को भीमयानी अथवा नवयानी भी कहने लगे हैं। भारत की सामाजिक-राजनैतिक-धार्मिक विसंगतियों के निराकरण के लिए यह नवयान सर्वाधिक उत्साही और सक्रिय है। जनगणना सन् 2011 के अनुसार भारत के बौद्धों की कुल जनसंख्या में 13 प्रतिशत पारम्परिक बौद्ध हैं और शेष 87% में नवयानी बौद्ध हैं। भारत को बुद्धमय बनाने का सबसे प्रबल सपना इन्हीं नवयानियों का है। जाति विहीन समाज बनाना उनकी प्राथमिकता है। लेकिन इन नवयानियों में भी चार प्रकार के बौद्ध हैं:

1. पड़े हुए बौद्ध
2. खड़े हुए बौद्ध
3. बढ़े हुए बौद्ध
4. चढ़े हुए बौद्ध

पड़े हुए बौद्ध

पड़े हुए बौद्ध वे हैं जो वास्तव में बिल्कुल भी बौद्ध नहीं हैं। बस बाबा साहेब की जयंती और बुद्ध जयंती के अवसर पर उत्सव-समारोह में वे ‘नमो बुद्धाय जय भीम’ का सम्बोधन प्रयोग करते हैं। साल के शेष दिनों में वे सब उन्हीं संस्कारों में लिप्त रहते हैं जिन संस्कारों से बाबा साहेब ने मुक्त करने का आह्वान किया था।

खड़े हुए बौद्ध

खड़े हुए बौद्ध सबसे ज्यादा मुखर हैं। हिन्दुत्व, ब्राह्मणवाद, मनुवाद, अंधविश्वास, पाखण्ड इत्यादि की मुखर निन्दा-आलोचना करना, कर्मकाण्ड की शल्यक्रिया करना, उपहास करना उनकी प्राथमिकता में है लेकिन बुद्ध धम्म के बारे में उनकी जानकारी लगभग शून्य है। उनकी दिनचर्या, संस्कार, आचार में बुद्ध धम्म की छाया भी नहीं है। बस निन्दा-आलोचना-शल्यक्रिया-विश्लेषण इत्यादि को ही वे बुद्ध धम्म समझते हैं। उन्हें मालूम है कि रामचरितमानस में कौन-कौन सी चौपाइयाँ निन्दनीय हैं लेकिन यह नहीं मालूम की धम्मपद की कौन-सी गाथाएँ प्रशंसनीय हैं। उन्हें तिरतन वन्दना तक नहीं आती है। उन्हें विपस्सना आरएसएस का एजेण्डा दिखता है, त्रिपिटक की अट्ठकथाओं में भी ब्राह्मणवाद दिखता है, ध्यान-साधना-सुत्तपाठ इत्यादि सब कुछ मनुवाद लगता है, उनका सारा सरोकार 22 प्रतिज्ञाओं से है, उनमें भी सिर्फ पहली तीन प्रतिज्ञाओं पर सारा जोर रहता है, शेष प्रतिज्ञाओं का वे स्वयं भी पालन नहीं करते हैं। उन्हें यह तो अच्छे से मालूम है कि गलत क्या है, लेकिन सही क्या इस बात की जानकारी लगभग नहीं ही है या है तो पालन नहीं करते।

ऐसा मुस्लिम ढूढ़ना मुश्किल है जिसे नमाज़ न आती हो, ऐसा सिक्ख ढूँढ़ना मुश्किल है जिसे गुरूग्रंथ साहेब के शबद न याद हों, ऐसा इसाई ढूंढ़ना लगभग नामुमकिन है जिसे बाइबिल के कुछ सानेट न याद हों, ऐसा हिन्दू तो ढूँढ़ना असम्भव है जिसे कोई आरती-चालीसा-स्तुति-भजन न आता हो लेकिन ऐसे कथित बौद्ध लाखों की संख्या में मिल जाएंगे जिन्हें त्रिशरण-पंचशील-बुद्धपूजा-तिरतन वन्दना कुछ नहीं आता लेकिन ताल ठोक कर अपने को बौद्ध कहते हैं। इन खड़े हुए बौद्धों की सोच क्रान्तिकारी है, तार्किक है। ये ही बौद्ध बाबा साहेब की और भगवान बुद्ध की जयंती मनाने के प्रति सर्वाधिक सक्रिय हैं।

बढ़े हुए बौद्ध

बढ़े हुए बौद्ध वे हैं जो निन्दा-आलोचना-शल्यक्रिया-विश्लेषण से थोड़ा आगे बढ़ कर सच्चे अर्थों में धम्म का व्यवहारिक रूप से पालन कर रहे हैं। उन्हें त्रिशरण-पंचशील-बुद्धपूजा-त्रिरत्न वन्दना-सुत्तपाठ आता है। जन्मदिन, विवाह, गृहप्रवेश इत्यादि अवसरों पर पूज्य भन्ते या बोधाचार्यों से संस्कार सम्पन्न कराते हैं। पुराने संस्कारों को छोड़ कर उन्होंने बौद्ध संस्कारों को जीवन में आत्मसात करना शुरू कर दिया है। वे सच्चे अर्थों में बुद्धमय भारत बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि सिर्फ निन्दा-आलोचना करते रहने भर से बुद्धमय भारत नहीं बनेगा। सकारात्मक विकल्प पर व्यावहारिक काम करने से भारत बुद्धमय होगा। नवयानी बौद्धों में यह बढ़े हुए बौद्ध ही उम्मीद की मशाल हैं।

चढ़े हुए बौद्ध

चढ़े हुए बौद्ध, इन्हें धम्म के वास्तविक नायक कहिये, जो धम्म के मूल तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। ध्यान-साधना-विपस्सना करते हैं, बुद्ध वचनों को मूल रूप में अध्ययन करते हैं, त्रिपिटक में धम्म खंगालते हैं, शून्यागारों में ध्यान करते हैं। उपोसथ धारण करते हैं। धम्म के आध्यात्मिक पक्ष को सर्वोपरि प्राथमिकता देते हैं और सामाजिक सरोकारों में भी सकारात्मक व रचनात्मक योगदान देते हैं। उन्हें धम्म का मर्मज्ञ कहा जा सकता है। सातवीं संगीति भारत में आयोजित करना इन बौद्धों का सपना और महत्वाकांक्षा है। वे इसके लिए प्रयासरत भी हैं। शेष बौद्धों के मन में यह बात अभी कल्पना में भी नहीं है। भारत को सच्चे अर्थों में बुद्धमय यही बौद्ध बनाएंगे, चढ़े हुए बौद्ध।

और विशिष्ट रूप से कहें तो ये चार अलग-अलग समूह अथवा व्यक्ति नहीं हैं। चारों एक ही हैं। पड़ा हुआ बौद्ध ही एक दिन खड़ा हुआ बौद्ध बनता है। खड़ा हुआ बौद्ध ही कभी बढ़ा हुआ बौद्ध बनता है और यह बढ़ा हुआ बौद्ध ही एक दिन चढ़ा हुआ बौद्ध बनता है। यह भी सम्भव है कि अभी कोई पड़ा बौद्ध और खड़ा बौद्ध के बीच संक्रमण अवधि, ट्रांजीसनल पीरियेड, से गुजर रहा हो। यह परस्पर उत्तरोत्तर विकास की प्रक्रिया, प्राॅसेस आफ वोल्यूशन, है। यह विकास स्वयं के प्रयास से भी होता है तथा प्रशिक्षण से भी होता है। जबरन कुछ नहीं होता। स्वैच्छिक विकास बहुत क्रांतिकारी परिणाम देता है।

जो खड़े हुए हैं उन्हें पड़े हुए लोगों पर कटाक्ष नहीं करना है बल्कि याद यह रखना है कि कभी वे स्वयं भी वहीं थे। बढ़े हुए लोगों को खड़े हुए लोगों को बढ़ने के लिए प्रेरित करना है, उपाय कौशल करना है। चढ़े हुए बौद्धों को शेष तीन के प्रति भी मैत्री भाव से बर्ताव करना है। बढ़े और चढ़े हुए बौद्धों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी, भारत बुद्धमय होता जाएगा।

भारत तीव्र गति से बुद्धमय होगा जैसे-जैसे भारत के सभी प्रकार के बौद्धों में सघन मैत्री व आपसी समझ, म्युचुअल अण्डरस्टैण्डिंग, बढ़ती जाएगी, क्योंकि बुद्ध वचन हैं- मैत्री सम्पूर्ण धम्म है!

बाबा साहब डॉ आंबेडकर के मशहूर कथन जो हम सब का रोजमर्राह की जिंदगी में मार्गदर्शन करती है

स्वाभिमानी लोग ही संघर्ष की परिभाषा समझते हैं,जिनका स्वाभिमान मरा होता है वह गुलाम होते हैं I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
मेरी जय जय कार करने से अच्छा है, मेरे बताए हुए मार्ग पर चलें I
-बाबा साहब डॉ आंबेडकर
राजनीति में हिस्सा ना लेने का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करने लगते हैं I
-बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
जो कौम अपना इतिहास भूल जाती है,वह कौम कभी अपने इतिहास का निर्माण नहीं कर सकती I
-बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पिएगा वह दहाड़ेगा I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर

हमारा यह आंदोलन तब तक सफलता की चोटी पर नहीं पहुंच सकता जब तक हमारी महिलाएं भी इसमें सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेंगी
– बाबा साहब डॉ आंबेडकर

जिस समाज में हमारा जन्म हुआ है,उस समाज का उद्धार करना हमारा मुख्य कर्तव्य है I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर

मैं उसे ही शिक्षित मानता हूं,जो अपने दुश्मन को पहचानता है I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
राजनीतिक सत्ता के बिना हमारे लोगों को उद्धार संभव नहीं
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है I
– बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर

 

जिस घर में महिला शिक्षित हो जाती है उस घर में सारा परिवार शिक्षित हो जाता है I
– राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले

भारत के भाग्य विधाता बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की जयंती की हार्दिक शुभकामनायें , डॉ अम्बेडकर जयंती मानाने में आज महिलाएं भी पीछे नहीं क्योंकि वो समझ गयीं हैं की उनकी दशा कानून द्वारा बाबा साहब ने सुधारी किसी देवता ने नहीं ,देखिये महिलाओं का उत्साह

बौद्ध बनने के लिए मुझे क्या करना होगा …SamayBuddha

बौद्ध बनने के लिए पहले कुछ बुनियादी ज्ञान प्राप्त करो, निम्न काम करो :

1.बौद्ध धम्म को आसान हिंदी में समझने के लिए youtube चैनल HINDIBUDDHISM सब्स्क्राइब/ज्वाइन करे व अपने सभी सामाजिक भाइयों को भी ज्वाइन करवाएं , लिंक इस प्रकार है : https://www.youtube.com/c/HINDIBUDDHISM कृपया सब्स्क्राइब/ज्वाइन करना न भूलें

https://clyp.it/sb2tekuk is audio ko poora suno aor samjho

2. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने उल्लेख किया है कि उनकी बौद्ध धर्म की सोच जानने के लिए उनकी तीन किताबें पढनी आवश्यक है। प्रमुख पुस्तक
(१) भगवान बुद्ध और उनका धम्म, और अन्य दो पुस्तकें हैं:
(२) बुद्ध और कार्ल मार्क्स; और
(३) भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति।

3. किताबें खरीदने का लिंक https://samaybuddha.wordpress.com/baud-dhamm-aur-ambedkarvaadi-kitabe-khareedo-nikhil-sablaniya/

बौद्ध धम्म साहित्य में एक तरफ तो लिखा है फलां बात ऐसे है वहीँ कहीं दूसरी तरफ लिखा है फलां बात ऐसे नहीं ऐसे है|आज बौद्ध धम्म की तरफ अग्रसर लोगों की सबसे बड़ी परेशानी ये है की वो किसको सही माने किसको गलत,किसको अपनाएं किसको छोड़ें|बौद्ध धम्म के पतन के लिए न केवल दमन से बल्कि विरोधियों ने भिक्षु बन कर बौद्ध साहित्य में बहुत ज्यादा मिलावट कर दी थी| वही मिलावट का साहित्य आज मार्किट में उपलब्ध है जिसका सार यही बनता है जी जीवन नीरस है कुछ मत करो या ये बनता है की भगवान् बुद्धा एक इश्वरिये शक्ति थे उनकी पूजा करो और कृपा लाभ मिलेगा |असल में बौद्ध धम्म मनुवादी षडियन्त्र और अन्याय द्वारा व्याप्त दुःख को मिटने वाली क्रांति है ये इश्वरिये सिद्धांत को नकारता है|इस सबसे बचने का यही इलाज है की आप अन्यत्र किसी धम्म साहित्य ज्यादा ध्यान मत दो| युगपुरुष महाज्ञानी बहुजन मसीहा एव आधुनिक भारत के उत्क्रिस्ट शिल्पकार बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की निम्न तीन पुस्तकों को शुरुआती ज्ञान से लेकर अंतिम रेफरेंस तक मनो :
१. भगवन बुद्धा और उनका धम्म
२. भगवन बुद्धा और कार्ल मार्क्स
३. प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति
ये बात स्वेव बाबा साहब की है वे खुद बौध धम्म को सही मायेने में समझाना चाहते थे न की आम धर्म की तरह| इन तीनो पुस्तकों से आगे जाना असल में अपने को धम्म विरोधी मिलावट में फ़साना होगा|इन तीन पुस्तकों की रचना डॉ आंबेडकर ने इसी भटकाव को रोकने के लिए किया है और ये बात उन्होंने खुद कही है|हमें आखिर कहीं किसी बिन्दु पर तो एक मत होना ही होगा वरना विरोधी अपनी चाल चल जायेंगे और हम सही गलत की बहस ही करते रह जायेंगे,अब फैसला आपके हाथ में है|”

4.जब भी जनसंख्या की गिनती हो तब आप सरकार की उस जनसंख्या लिस्ट में खुद को बौद्ध के रूप में दर्ज कराएं

5. डॉक्टर अंबेडकर द्वारा दिलाई गई 22 प्रतिज्ञाएं के हिसाब से अपना जीवन चलाएं

बस इतना करने से आप बौद्ध हो जाएंगे

 

बहुजन मसीहा मान्यवर कांशीराम जी के जन्म दिवस 15 मार्च बहुजन संकल्प दिवस पर हम सब की तरफ़ से उन्हें कोटि कोटि नमन। आज हम शाशक कौम बनने का संकल्प दोहराते हैं । पढ़िए दिलीप मंडल का लेख “कांशीराम: राजनीति का बेमिसाल रसायनशास्त्री”

कांशीराम: राजनीति का बेमिसाल रसायनशास्त्री

भारतीय राजनीति में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. और दूसरी बार ऐसा कब होगा, यह सवाल भविष्य के गर्भ में है. लगभग 50 साल की उम्र में एक व्यक्ति, वर्ष 1984 में एक पार्टी का गठन करता है. और देखते ही देखते देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, जहां से लोकसभा की 85 सीटें थीं, में इस पार्टी की मुख्यमंत्री शपथ लेती है. यह पार्टी पहले राष्ट्रीय पार्टी और फिर वोट प्रतिशत के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है.

जिस व्यक्ति ने इस पार्टी का गठन किया, वह बेहद साधारण परिवार से संबंधित था. उस समुदाय से, जिसे पढ़ने-लिखने का हक नहीं था और जिन्हें छूने की शास्त्रों में मनाही है. यह चमत्कार कितना बड़ा है, इसे समझने के लिए बीजेपी (जनसंघ) और कांग्रेस जैसी मुकाबले की दूसरी पार्टियों को देखें, जिनकी लंबी-चौड़ी विरासत है और जिन्हें समाज के समृद्ध और समर्थ लोगों का साथ मिला.

सरकारी कर्मचारी पद से इस्तीफा दे चुके इस व्यक्ति के पास संसाधन के नाम पर कुछ भी नहीं था. न कोई कॉर्पोरेट समर्थन, न कोई और ताकत, न मीडिया, न कोई मजबूत विरासत. सिर्फ विचारों की ताकत, संगठन क्षमता और विचारों को वास्तविकता में बदलने की जिद के दम पर इस व्यक्ति ने दो दशक से भी ज्यादा समय तक भारतीय राजनीति को कई बार निर्णायक रूप से प्रभावित किया. दुनिया उन्हें कांशीराम के नाम से जानती है. समर्थक उन्हें मान्यवर नाम से पुकारते थे.

कांशीराम ने जब अपनी सामाजिक-राजनीतिक यात्रा शुरू की, तो उनके पास पूंजी के तौर पर सिर्फ एक विचार था. यह विचार भारत को सही मायने में सामाजिक लोकतंत्र बनाने का विचार था, जिसमें अधिकतम लोगों की राजकाज में अधिकतम भागीदारी का सपना सन्निहित था. कांशीराम अपने भाषणों में लगातार बताते थे कि वे मुख्य रूप से संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और उनके साथ क्रांतिकारी विचारक ज्योतिराव फुले के विचारों से प्रभावित रहे. 1980 में लखनऊ में एक सभा में उन्होंने कहा था कि “अगर इस देश में फुले पैदा न होते, तो बाबा साहब को अपना कार्य आरंभ करने में बहुत कठिनाई होती.” कांशीराम ने बहुजन का विचार भी फुले की ‘शुद्रादिअतिशूद्र’ (ओबीसी और एससी) की अवधारणा का विस्तार करके ही हासिल किया. कांशीराम के बहुजन का अर्थ देश की तमाम वंचित जातियां और अल्पसंख्यक हैं, जिनका आबादी में 85% का हिस्सा है. कांशीराम मानते थे देश की इस विशाल आबादी को राजकाज अपने हाथ में लेना चाहिए. इसे वे सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना और देश के विकास के लिए अनिवार्य मानते थे. इसके लिए वे सामाजिक वंचितों के आर्थिक सबलीकरण के भी प्रबल पक्षधर रहे.

इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए कांशीराम ने अपना ध्यान सबसे पहले इन जातियों के सरकारी कर्मचारियों पर केंद्रित किया. वे मानते थे कि ये लोग राजनीतिक गतिविधियों में बेशक हिस्सा नहीं ले सकते. लेकिन बुद्धिजीवी होने के कारण, समाज को बौद्धिक नेतृत्व और आर्थिक संबल देने में यह तबका सक्षम है. आजादी के बाद से आरक्षण लागू होने के कारण उस समय तक मोटे अनुमान के मुताबिक इन जातियों के 20 लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारी थी. कांशीराम ने 1978 में सरकारी कर्मचारियों का संगठन बामसेफ यानी बैकवर्ड (एससी/एसटी/ओबीसी) एंड मायनॉरिटी कम्युनिटीज इंप्लाइज फेडरेशन का गठन किया और देखते ही देखते लाखों लोग इससे जुड़ गए. कांशीराम ने कर्मचारियों को ‘पे बैक टू सोसायटी’ की अवधारणा से अवगत कराया. इसकी वजह से उन्हें हजारों समर्पित कार्यकर्ता मिले और संगठन चलाने के लिए धन भी.

बामसेफ ने 1980 में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के तहत 9 राज्यों के 34 स्थानों पर चलता-फिरता आंबेडकर मेला सफलतापूर्व आयोजित कर स्थापित कर दिया कि कांशीराम जो सपना देख रहे हैं, उसे आगे बढ़ाने का रास्ता खुल चुका है. इसके बाद पहले राजनीतिक संगठन के रूप में कांशीराम 1981 में डीएस-4 यानी दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन करते हैं और 1984 में बीएसपी यानी बहुजन समाज पार्टी की स्थापना होती है. कांशीराम के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियानों में उनकी 3000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा उल्लेखनीय है, जिस दौरान वे हजारों लोगों से सीधे मिले और लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाई. इसके बाद कांशीराम के 2004 में सेहत खराब होने तक तक बीएसपी जो राजनीतिक सफर तय करती है, वह समकालीन इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है.

बाबासाहब की तरह कांशीराम भी बौद्ध धर्म स्वीकार करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने 2006 में अक्टूबर महीने की तारीख भी तय कर ली थी. लेकिन इससे पहले उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया और 9 अक्टूबर, 2006 को उनका निधन हो गया. उनका शवदाह बौद्ध विधि से दिल्ली में हुआ.

कांशीराम की राजनीतिक विरासत पर विचार करते हुए इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे भारतीय राजनीति के पहले शख्स हैं, जिन्होंने दलितों को शासक बनने का न सिर्फ सपना दिखाय़ा, बल्कि उसे साकार करने का रास्ता भी बताया. राजनीतिक उद्देश्यों के लिए साधन की पवित्रता के हिमायती वे कभी नहीं रहे. राजनीतिक समझौतों की सवारी करते हुए अपनी विचारधारा की राजनीति को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जाते रहे. उन्होंने पवित्रतावाद की जगह, अवसर को सिद्धांत में तब्दील कर दिया. बीएसपी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक समय में देश का हर सोलहवां वोटर इस पार्टी के हाथी निशान पर बटन दबा रहा था. अपनी राजनीति को कामयाबी तक पहुंचाने की दिशा में कांशीराम को मिली सफलताओ ने उनके व्यक्तित्व को वह चमक दी, जिसकी कोई भी राजनेता सिर्फ कामना ही कर सकता है.

– दिलीप मंडल