VVPAT मतलब ऐसी कागज की पर्ची या रसीद जो ईवीएम मशीन के साथ लगे प्रिंटर से निकलती है,वोटर देख सकता है की जहाँ उसने वोट डाला वहीँ पड़ा है , और फिर उसे पेटी में डालता है|किसी विवाद होने की स्थिति में इसी ट्रेल पेपर से ऑडिट या सही साबिती होती है| भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ही फैसला दिया है की के बिना VPAT के EVM से नहीं हो सकता साफ सुथरा चुनाव…Team SBMT

उत्तर प्रदेश चुनाव के रिजल्ट के बाद  सारे भारत में EVM (electronic voting machine) मशीन पर लोगों की शक और चर्चा जारी है, आइये हम इससे जुड़े कुछ तथ्यों को जाने
पहले कागज़ पर मोहर लगाकर चुनाव होता था, अब इलेक्ट्रॉनिक मशीन द्वारा होता है

VVPAT मतलब ऐसी कागज की पर्ची या रसीद जो ईवीएम मशीन के साथ लगे प्रिंटर से निकलती है,वोटर देख सकता है की जहाँ उसने वोट डाला वहीँ पड़ा है , और फिर उसे पेटी में डाता है|किसी विवाद होने की स्थिति में इसी ट्रेल पेपर से ऑडिट या सही साबिती होती है| भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2013  में ही फैसला दिया है की के बिना VPAT के EVM से नहीं हो सकता साफ सुथरा चुनाव         http://www.nationaldastak.com/story/view/supreme-court-judgement-at-evm

 

 

अगर EVM गड़बड़ी को साबित करना है तो दुनिया के जिन जिन देशो ने EVM गड़बड़ी के कारण उनके देशो में EVM पर पाबन्दी लगाईं वहां के इंजिनियर को बुला उनसे गड़बड़ी की जांच कराई जाए ,तब पोल खुलेगा ।

  1. नीदरलैंड ने EVM  मशीनों का प्रयोग बंद कर दिया
    2. आयरलैंड ने ३ साल की 51 million पौंड की रिसर्च से बाद इविऍम मशीनों पे रोक लगाई
    3. जर्मनी से इविऍम मशीनों को असंवेधानिक बताकर रोक लगा दी
    4. इटली ने पाया की गड़बड़ की जा सकती अहि और इविऍम मशीनों पर रोक लगा दी
    5. अमेरिका केलिफोर्निया जैसे अनेकों देशों ने बिना पेपर ट्रेल की एवम मषीनों पर पूरी तरह रोक लगा दी
    6. वेनेजुएला मेसिडोनिया यूक्रेन ने सीआईए रिपोर्ट के आधार पर इविऍम मशीनों पर रोक लगा दी
    7. इंग्लैंड और फ्रांस ने कभी भी इविऍम मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया आज तक

जब ऐसे विकसित और तकनिकी रूप से उन्नत देश एवम मशीनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे तो भारत देश क्यों कर रहा है, और अगर करना ही है तो सुप्रीम कोर्ट  के आदेशानुसार विविपैट  ट्रेल पेपर क्यों नहीं लगा रहा| क्या आप इतनी सी बात नहीं समझ सकते

Dilip C Mandal  फेसबुक पर लिखते हैं  “घोटाला वग़ैरह मैं नहीं जानता। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को आदेश है कि चुनाव आयोग को पैसे दे ताकि वह सभी बूथ पर मशीन के साथ काग़ज़ से भी वोट कराए, तो सिर्फ मशीन से वोट क्यों हो रहे हैं। पैसे क्यों नहीं दिए? 2013 का फ़ैसला है।”

 

 

 

इसे माइक्रोकंट्रोलर कहते हैं, ज्यादातर डिवाइस जो गणना के लिए या रोबोटिक सिस्टम , या किसी भी रिमोट सेंसिंग डिवाइस हो वहां ज्यादातर समय इसकी ही वेराइटी USE होती है!उदाहरण के लिए ट्रैफिक लाइट कौन सी कितनी देर जलेगी ये इसी चिप में प्रोग्राम कर के भर दिया जाता है
जिसमे कंप्यूटर से लिखी एक खाश भाषा में प्रोग्राम यानि की हमें कैसे काम करवाना है उसका उपयोग किया जाता है ! दिशा निर्देश लिख कर डाला जाता है !
EVM को MANUFACTURE करते समय उसमे ऐसे प्रोग्राम यानि दिशा निर्देश डालना कोई बड़ी बात नही है !
कुछ काल्पनिक है पर पढ़े जरूर !
मान लीजिए तीन महीने बाद चुनाव है, और इसी तीन महीने के पहले सारी मशीन बना दी गयी और अगले तीन महीने तक सारी मशीनों का परिक्षण होना है की सही काम कर रही की नही !
हमने डिफ़ॉल्ट प्रोग्राम के तौर पर
1 No बटन पर हाथी
2 No पर कमल
3 No पर साइकिल
………………….
……………….
सेट कर दिया और हमने ऐसा प्रोग्राम सेट किया की तीन महीने तक ये डिफ़ॉल्ट रूप में काम करता रहे जैसे जिस बटन पर प्रेस किया जाए उसी को वोट जाए, इस दौरान मशीन पूरी सुरक्षा से राखी गयी होगी और परिक्षण एकदम सही सही आएगा !
तीन महीने या निर्धारित तिथि के बाद हमने ऐसा प्रोग्राम डाला हुआ है की ये उपरोक्त प्रोग्राम टूट जाएगा तथा
1 नम्बर बटन दबाने पर एक वोट पड़े हाथी को
2 नंबर बटन दबाने पर 2 या 3 या सुविधानुसार वोट पड़े कमल को
3 नंबर बटन दबाने के बाद 1 वोट साइकिल को पड़े !
तीसरा प्रोग्राम कुछ ऐसा सेट हो की फिर जब चुनाव खत्म हो जाए तो 2 नंबर प्रोग्राम टूट जाए और डिफ़ॉल्ट में बदल जाए जिससे अगर कभी आरोप लगाया जाए की EVM घोटाला हुआ है तो उसे न पकड़ा जाय जब तक बड़े लेवल के टेक्निकल हाथ न डाले माइक्रोकंट्रोलर की आंतरिक जांच न की जाए !
प्रोग्राम लिखने के और भी तरीके हो सकते है ये बस एक उदाहरण है !
आप सब ने जापान चीन अमेरिका में बड़े बड़े मानव रोबोट देखे है ये सारे मशीन प्रोग्राम पर ही काम करते हैं आप जितना जटिल और बेहतरीन प्रोग्राम लिख सकते है उतना बेहतर अपने उपयोग लायक रोबोट बना सकते !
कोई अतिशयोक्ति नही की EVM एक रोबोट है!
-बाबा सत्यार्थी

सब बातों का निचोड़ ये हैं की 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने EVM machine के खिलाफ सुनवाई करने के बाद ये आदेश दे चुका है की पहले तो बैलेट पेपर पर चुनाव कराओ, अमेरिका ब्रिटेन फ्रांस जैसे विकसित देशों में भी बैलेट पेपर पर ही चुनाव होता है| खर्च ज्यादा होने के कारन अगर नहीं हो सकता तो EVM मशीन में हर वोट का ट्रेल पेपर VVPAT निकलना चाहिए जो की बाद में विवाद होने की स्तिथि में गिना जा सकता हैं| EVM मशीन से निकला ये ट्रेल पेपर वोटर देख सकता है की जहाँ उसने वोट डाला वहीँ पड़ा है , और फिर उसे मतपेटी में डाल सकता है| आज उत्तर प्रदेश में EVM घोटाले की जाच होने का कोई तरीका ही नहीं है |

 

About VVPAT Voter-Verified Paper Audit Trail (VVPAT) is a method of providing feedback to voters. It’s completely an independent verification system. For those uninitiated, VVPAT is a printer-like machine attached to every EVM that allows voters to verify that their vote has been cast correctly. Once a voter presses button of his choice in the EVM, a printed paper appears containing the name of the candidate and poll symbol so that he can verify it. After the voter views the receipt it goes inside a container linked to the EVM, which can be accessed only by the polling officers. This latest system is one step further towards prevention of electoral fraud. –

https://en.wikipedia.org/wiki/Voter-verified_paper_audit_trail

भारतीय लोकतन्त्र के बहुजन (SC+ST+OBC) शासकों को एकता के साथ शासन करने के लिये “क्रान्ति का दर्शन” कराने वाले क्राँतिवीर मान्यवर साहब कांशीराम जी को उनके जन्मदिन 15 MARCH पर कोटि-कोटि श्रद्धासुमन अर्पित !!!…लाला बौद्ध

kanshiramबहुजन नायक मान्यवर कांशीराम :
जीवन परिचय :-
जन्म- 15 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में बहुजन (सिख समुदाय के रैदसिया) परिवार में हुआ.
माता-पिता – बिशन कौर और हरी सिंह
शिक्षा- स्नातक (रोपड़ राजकीय कालेज, पंजाब विश्वविद्यालय)
नौकरी- डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ)
सामाजिक प्रेरणा स्रोत:-
नौकरी के दौरान जातिगत भेदभाव से आहत होकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार के दर्शन को गहनता से पढ़कर दलितों को एकजुट करने में जुटे.
पंजाब के एक चर्चित विधायक की बेटी का रिश्ता आया लेकिन दलित आंदोलन के हित में उसे ठुकरा दिया.
– बुद्धिस्ट रिसर्च सेंटर की स्थापना की.
– कांशीराम जी की पहली ऐतिहासिक किताब ‘द चमचा ऐज’ (अंग्रेजी) 24 सितंबर 1982 को प्रकाशित हुआ.
-पे बैक टू सोसाइटी के सिद्धांत के तहत दलित कर्मचारियों को अपने वेतन का 10वां हिस्सा समाज को लौटाने का आह्वान किया.
राजनीतिक व सामाजिक यात्रा का प्रारम्भ :-
-सबसे पहले बाबासाहेब द्वारा स्थापित पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के सक्रिए सदस्य बनें.
-1971 में पूना में आरपीआई और कांग्रेस के बीच गैरबराबरी के समझौते और नेताओं के आपसी कलह से आहत होकर पार्टी से इस्तीफा.
-बामसेफ -1964 में 6 दिसंबर 1978 को ‘बामसेफ’ का विधिवत गठन किया. कांशीराम का मानना था कि आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी में पहुंचा वर्ग ही शोषितों का थिंक, इंटलैक्चुअल और कैपिटल बैंक यही कर्मचारी तबका है. बहुजनों की राजनीतिक ताकत तैयार करने में बामसेफ काफी मददगार साबित हुआ.
राजनितिक मुहिम का प्रारम्भ :-
बहुजनों को एकजुट करने और राजनीतिक ताकत बनाने का अभियान 1970 के दशक में शुरू किया.
दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) – दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय को जोड़ने के लिए उन्होंने डीएस-4 का गठन किया. इसकी स्थापना 6 दिसंबर 1981 को की गई. डीएस-4 के जरिए सामाजिक, आर्थिक बराबरी का आंदोलन आम झुग्गी-झोपड़ी तक पहुंचाने में काफी मदद मिली. इसको सुचारु रूप से चलाने के लिए महिला और छात्र विंग में भी बांटा गया. जाति के आधार पर उत्पीड़न, गैर-बराबरी जैसे समाजिक मुद्दों पर लोगों के बीच जागरूकता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन करना डीएस-4 के एजेंडे में रहे. डीएस-4 के जरिए ही देश भर में साइकिल रैली निकाली गई.
भारत की तीसरे नम्बर की पार्टी का सफरनामा:-
बहुजन समाज पार्टी (बसपा)- 14 अप्रैल, 1984 को बसपा का गठन. सत्ता हासिल करने के लिए बनाया गया राजनीतिक संगठन.
– 1991 में पहली बार यूपी के इटावा से 11 लोकसभा का चुनाव जीते.
– 1996 में दूसरी बार लोकसभा का चुनाव पंजाब के होशियारपुर से जीते.
– 2001 में सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर कुमारी मायावती को उत्तराधिकारी बनाया.
महापरिनिर्वाण:-
-2003 में लकवाग्रस्त होने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर चले गए.
– 9 अक्टूबर, 2006 को हार्टअटैक, दिल्ली में अंतिम सांस ली.
साहित्यक योगदान:-
कांशीराम ने निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाएं शुरू की—-
अनटचेबल इंडिया (अंग्रेजी)
बामसेफ बुलेटिन (अंग्रेजी)
आप्रेस्ड इंडियन (अंग्रेजी)
बहुजन संगठनक (हिन्दी)
बहुजन नायक (मराठी एवं बंग्ला)
श्रमिक साहित्य
शोषित साहित्य
दलित आर्थिक उत्थान
इकोनोमिक अपसर्ज (अंग्रेजी)
बहुजन टाइम्स दैनिक
बहुजन एकता
सम्पूर्ण योगदान एक नजर में:-
कांशीराम जी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिसने शोषित समाज की निष्क्रिय रही राजनितिक चेतना को जागृत किया था. बाबासाहब ने संविधान के माध्यम से शोषित समाज के लिए विकास के लिए बंद दरवाजे खोल दिए थे, लेकिन इस विकास रूपी दरवाजे के पार पहुचाने का कार्य मान्यवर ‘कांशीराम’ जी ने किया था. बाबासाहब ने शोषितों का मनोबल प्राप्त करने का आह्वान किया, कांशीराम जी ने समाज को ‘मनोबल’ प्राप्त करने के लिए मजबूर किया. कांशीराम जी उन महान पुरुषों में से है जिन्होंने व्यक्तिगत ‘स्वार्थ’ की जगह समाज के लिए कार्य किया, अपनी माँ को लिखी चिठ्ठी में ‘मान्यवर कांशीराम’ जी ने ‘शोषित समाज’ को ही अपना परिवार बताया. वर्तमान में समाज को ‘कांशीराम’ जी जैसे महापुरुषों की अत्यंत आवश्यकता है.
भारतीय लोकतन्त्र के बहुजन शासकों को एकता के साथ शासन करने के लिये “क्रान्ति का दर्शन” कराने वाले क्राँतिवीर को उनके जन्मदिन पर कोटि-कोटि श्रद्धासुमन अर्पित !!!

2013 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी के श्री सुब्रमनियम स्वामी द्वारा इलेक्शन कमीशन की शिकायत पर फैसला दिया की EVM से नहीं हो सकता साफ सुथरा चुनाव,VVPAT चाहिए| पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला source National Dastak


IN THE SUPREME COURT OF INDIA

CIVIL APPELLATE JURISDICTION
CIVIL APPEAL NO.9093 OF 2013

(Arising out of SLP (Civil) No. 13735 of 2012)
Dr. Subramanian Swamy …. Appellant(s)
Versus
Election Commission of India …. Respondent(s)
WITH
WRIT PETITION (C) NO. 406 OF 2012

J U D G M E N T
P. Sathasivam, CJI.
1) Leave granted.
Civil Appeal @ SLP (C) No. 13735 of 2012

2) This appeal is directed against the judgment and order dated 17.01.2012 passed by the vision Bench of the High Court of Delhi at New Delhi in W.P.(C) No. 11879 of 2009 whereby the High Court disposed of the petition by disallowing the prayer made by the appellant herein for issuance of a writ of mandamus directing the Election Commission of India (ECI)-Respondent herein to incorporate a system of “paper trail/paper receipt” in the Electronic Voting Machines (EVMs) as a convincing proof that the EVM has rightly registered the vote cast by a voter in favour of a particular candidate.

3) Being aggrieved of the above, the present appeal has been filed by way of special leave.
Writ Petition (Civil) No. 406 of 2012
4) One Rajendra Satyanarayan Gilda has filed this Writ Petition, under Article 32 of the Constitution of India, praying for issuance of a writ of mandamus/direction(s) directing the Union of India, the Chief Election Commissioner and the Technical Experts Committee-Respondent Nos. 1-3 herein respectively to effect the necessary modifications in the EVMs so as to allow the voters to verify their respective votes and to attach the printers to the EVMs with a facility to print the running record of the votes for the purpose of verification by the voters in the process of voting. He also prayed for a direction to frame guidelines and to effect necessary amendments in the Conduct of Election Rules, 1961.
5) In view of the pendency of the appeal filed by Dr. Subramanian Swamy, this Court issued notice in the writ petition and tagged with the said appeal.

6) Heard Dr. Subramanian Swamy, appellant-in-person in the appeal, Dr. R.R. Deshpande, learned counsel for the writ petitioner, Mr. Ashok Desai and Ms. Meenakshi Arora, learned senior counsel for the ECI.
Contentions:


7) Dr. Subramanian Swamy, the appellant herein contended before this Court that the present system of EVMs, as utilized in the last few general elections in India, does not meet all the requirements of the international standards and though the ECI maintains that the EVMs cannot be tampered with, but the fact is that EVMs, like all electronic equipments, are open to hacking.


8) The appellant has further highlighted that the instant matter arises out of the refusal of the ECI to incorporate a certain obvious safeguard in the EVMs called “paper backup”, “paper receipt” or “paper trail”, presently in use and mandated in some countries like USA, which would easily and cheaply meet the requirement of proof that the EVM has rightly registered the vote cast by a voter. The appellant has further highlighted that the “paper trail” system is to
supplement the procedure of voting as in this procedure, after recording a vote in the EVM, a print out will come out which will appraise the voter that his vote has been rightly registered and the same will be deposited in a box which can only be used by the ECI in case of election dispute.

 

9) It is the categorical stand of the appellant that the above said system will bring more accuracy in the present system and if a particular election is challenged on the ground that some particular identified voter’s voter or the votes of a group of voters have been suppressed/have not been correctly assigned by the EVMs, the accepted current procedure is for a re-run of the same EVMs for a re-count, however, under the new procedure, a re-count will be of the receipts in the ballot box containing the printouts the EVMs had issued to the voter thereby ensuring more transparency in the process.

 

10) The writ petitioner has also raised similar contentions as those of Dr. Swamy. According to the petitioner, in the present system of voting through EVMs, there is no such facility by which a voter can verify and confirm his own voting. At present, a voter presses a button only but cannot ascertain the actual voting. He is not sure whether his vote is recorded or not, if recorded, whether it is recorded in favour of the person to whom it was intended or not. Whether it is valid or invalid and whether it is counted or not. It is submitted by the petitioner that unless and until answers to these questions are personally seen by the voter, it cannot be said that voting is made by him because “pressing a button of choice and getting flashed the red-light” is not actual voting in real sense unless the voter knows well that
what has happened in consequence of pressing a button of his choice from the EVMs. Stand of the Election Commission of India:

 

11) Mr. Ashok Desai, learned senior counsel for the ECI submitted that the apprehension that EVMs could be tampered with is baseless. It was also informed to this Court that the ECI has been exploring the possibility of incorporating a viable Voter Verifiable Paper Audit Trail (VVPAT) system as a part of the presently used EVMs to make the election system more transparent. Further, it was brought to our notice that the ECI conducted field trials for VVPAT system earlier also but the same had not been successful and were discontinued. The ECI also filed a counter affidavit stating that the EVMs provided by the Commission are of such a high end technology that it cannot be hacked.


12) Referring to Section 61A of the Representation of the People Act, 1951, it is submitted that the Statute itself provides for recording of votes by EVMs and the ECI has been given the discretion to prescribe recording of votes by such EVMs as it may deem fit. This discretion has to be exercised in a manner to preserve the sanctity of the election process and ensure that the election is conducted in a free and fair manner. The ECI has exercised due diligence to ensure that EVMs so used are “tamper proof” and it is also in the process of exploring to incorporate VVPAT system which is compatible with the present EVMs used by it. It is asserted that there is no instance of tampering with EVMs so far by anyone.


13) It is further submitted that the EVMs used in India are unique and unlike the ones used in the elections in USA and other countries, which are personal computer based. EVMs deployed by the ECI have been lauded not only in India but also abroad. EVM’s Control Unit retains in the memory each vote recorded elector-wise. The information stored in the memory of the Control Unit can be retrieved by using a device called the “decoder” which, when attached to the Control Unit of EVM, can print out the statement of voting data showing the order in which each voter has voted and to whom he has voted.


14) Insofar as the transparency of the election process as well as the right of a voter to know whether his vote has actually been recorded for the candidate for whom it was cast is concerned, it is submitted that as soon as a vote is recorded by a voter by pressing the “candidate’s” button on the Ballot Unit, a light glows against the name and symbol of the candidate, which the voter can see for himself/ herself. This is a visual (electronic) assurance to the voter that the candidate for whom he has cast his vote has actually got that vote. Thereafter, the light goes off to protect the secrecy of voting.


15) It is further submitted that the feasibility of VVPAT system was sought to be explored to by various political parties and they were explained the technical and administrative safeguards. The ECI also constituted a Technical Experts Committee to examine the viability of the VVPAT system. On 27.05.2011, the Technical Experts Committee, after discussion with political parties and civil society members and also after seeing the demonstration of the prototype VVPAT system developed by M/s. Bharat Electronics Ltd. (BEL) and M/s. Electronics Corporation of India Ltd. (ECIL), recommended that a field test of the prototype VVPAT system should be carried out in a simulated election under different environmental conditions in Jaisalmer, Thiruvananthapuram, Delhi, Leh and Cherapunji. The ECI also held further meetings with the manufacturers of EVMs on various dates to fine tune the system and expedite the follow up action required. Several meetings were also held with the Expert Committee on VVPAT system.

 

16) In wider fulfillment of the objectives of the field trial, the ECI has requested the National and State parties to extend necessary cooperation by getting involved in the trial process actively and also witness the trial in order to have a first hand experience of the system. The ECI has also requested the individuals including the appellant – Dr. Subramanian Swamy and the groups, who have been engaged with the ECI on the issue of EVM-VVPAT, to witness the trial.

 

17) We have carefully perused the relevant materials and considered the rival contentions.
Discussion

 

18) When the matter was listed before this Court for hearing on 27.09.2012, Mr. Ashok Desai had brought to our notice that the ECI is contemplating foolproof method in EVMs for which they are taking various steps in consultation with the Technical Experts Committee and the views of all recognized political parties. Mr. Desai also promised to appraise this Court about the deliberations and the ultimate decision to be taken by them in this regard. Accordingly, this Court granted sufficient time to the ECI to file Status Report regarding introduction of VVPAT system in EVMs to be used in the elections.

 

19) Pursuant to the directions of this Court, the ECI filed a Status Report on the developments of VVPAT system. In the said report, the ECI, citing various technicalities, prayed for further time to make the system more robust for the field conditions.


20) On 15.12.2012, M/s BEL, Bangalore filed a report showing the status of development of VVPAT system which contains changes that have been carried out in VVPAT from September to December, 2012 and also furnished chronological changes made in VVPAT system after the field trial of the VVPAT system held in July and August, 2012.

 

21) Pursuant to the directions of this Court, the Secretary, ECI, filed an affidavit highlighting the following steps/ information:

 

“(i) That vide its Affidavit dated 14.01.2013, the Commission had filed the status report regarding introduction of the VVPAT system in the Electronic Voting Machines (EVMs).

 

(ii) That subsequently, in the Technical ExpertCommittee meeting held on 04.02.2013, the  Committee approved the design of the VVPAT and decided that software fine tuning will be done and completed by the end of February, 2013, and modified design specifications will be submitted to the Technical Expert Committee for approval. The Committee also recommended that the Commission may for using the VVPAT and that the VVPAT should be tried in a bye-election.

 

(iii) That in the Technical Expert Committee meeting held on 19.02.2013, the Committee finalized the VVPAT design. The manufacturers, namely, M/s. Bharat Electronics Limited and M/s. Electronics Corporation of India Limited have quoted Rs. 16,200/- (excluding duties, taxes and transport charges) per VVPAT system. The Commission has decided to purchase sufficient units of VVPAT for trials in a Bye-election, at an approximate cost of Rs.72,90,000/- (Rupees seventy
two lakh ninety thousand) approximately.


(iv) It is submitted that the Commission will require approximately 13 lakh VVPAT units to be manufactures for 13 lakh EVMs presently available and roughly about Rs. 1690 crores (One Thousand Six Hundred Ninety Crores)(i.e. 13 lakh units x Rs.13,000 per unit) are required for the purpose of implementation of the VVPAT system taking into account the possible reduction in the cost per unit when produced in bulk.

 

(v) It is further submitted that in order to implement the new system the Conduct of Election Rules, 1961 will require certain amendments. In this connection, vide letter No. 3/1/2013/Vol.II/SDR/86 dated 28.03.2013, the Commission has informed the Legislative Department of the Ministry of Law and Justice inter alia the various amendments required to the relevant parts of Rules 49A to 49X, 66A, 55C, 56C, 57C and Form 17C of the Conduct of Elections Rules, 1961, as well as introduction of Rules 49MA and 56D in the said Rules…

 

(vi) That the Commission has called for a meeting of all the recognized National and State Parties on 10th May, 2013 for the purpose of demonstration of VVPAT unit to them and for discussion with them for eliciting their views regarding use of VVPAT system in the elections. The petitioner herein and others interested in the matter would also be invited at the
meeting.”

 

22) It is seen from the records that after various deliberations with the experts and persons concerned with the technology, the Technical Experts Committee approved the final design of VVPAT units in its meeting held on 19.01.2013. In order to meet the directions of this Court and for proper execution of VVPAT system, as noticed above, the ECI in its letter dated 28.03.2013, addressed to the Secretary to the Government of India, Ministry of Law and Justice stated that necessary ground work for amendment to the Conduct of Election Rules, 1961 (in relevant parts in Rules 49A to 49X, 66A, 55C, 56C, 57C and Form 17C) may be made so that the amendment to the Rules can be notified immediately which will enable the ECI to use the VVPAT system in bye-elections in consultation with the political parties. By placing all those
materials, the ECI requested the Ministry of Law and Justice for drafting and notifying amendment Rules expeditiously.

 

23) From the materials placed by the ECI, it is noted that the purchase order has been placed with M/s BEL and M/s ECIL for supplying 150 and 300 VVPAT units respectively at Rs. 16,200/- per unit excluding excise duty, sales tax and transportation etc. costing Rs. 72,90,000/- (approx.). The ECI has also highlighted that if the VVPAT systems are ultimately to be used with all the 13 lakh EVMs available, the total cost in the purchase of VVPAT units may come to about Rs. 1,690 crores, taking into account the possible reduction in the cost per unit due to bulk production the cost may come to Rs. 13,000/- per unit approximately.

 

24) The affidavit dated 21.08.2013, filed on behalf of the ECI, shows that the Ministry of Law and Justice, on 24.07.2013, referred the draft notification to amend the Conduct of Election Rules, 1961 to provide for use of VVPAT system of elections to the ECI for its views and comments. The ECI suggested certain minor modifications in the draft notification and sent the same back to the Ministry of Law and Justice on 02.08.2013 with a request to notify the amendment Rules at the earliest. Accordingly, the Ministry of Law and Justice notified the amendments to the Conduct of Election Rules, 1961 in the Gazette of India vide notification No. S.O. 2470(E) dated 14.08.2013 to enable use of VVPAT with EVMs.

 

25) The aforesaid affidavit of the ECI also shows that the ECI had also convened a meeting of all the recognized National and State political parties on 10.05.2013 and demonstrated before their representatives the working of VVPAT system. Separately, on the same day, the ECI also held a meeting with individuals including the appellant herein who had been engaged with the ECI over the past several years regarding the functioning of EVMs. VVPAT system was demonstrated before them as well. Representatives of political parties and other individuals expressed their satisfaction over the VVPAT system. Thereafter, the ECI had decided to use the VVPAT system in the bye-election from 51-Noksen (ST) Assembly Constituency in the State of Nagaland. Instructions were issued to hold special meetings with the contesting candidates in that constituency to brief them about the use of VVPAT system. The ECI also organized special training sessions for poll officers for the use of VVPAT and steps were taken to educate the electors for the same.

 

26) After various hearings, when the matter was heard on 4.10.2013, an affidavit dated 01.10.2013 filed on behalf of the ECI was placed before this Court. The said affidavit was filed to place on record the performance/result of the introduction of the VVPAT system in the bye-election from 51-Noksen (ST) Assembly Constituency of Nagaland for which the poll was conducted on 04.09.2013 indicating the future course of action to be decided by the ECI on the basis of said performance. By this affidavit, it was brought to our notice that since VVPAT system was being used for the first time, the ECI has decided that intensive training shall be given to the polling officers. Members of the Technical Experts Committee of the ECI also went to supervise training and the actual use of VVPAT in the bye-election.
It is further stated that the ECI also wrote letters to all the recognized political parties and other persons, including the appellant herein, engaged with the ECI on this subject inviting them to witness the use of VVPAT. It is also brought to our notice that VVPAT was successfully used in all the 21 polling stations of 51- Noksen (ST) Assembly Constituency of Nagaland. It was also stated that as per the Rules, the paper slips of VVPAT shall not be counted normally except in case the Returning Officer decides to count them on an application submitted by any of the candidates. However, since VVPAT system was being used for the first time in any election, the ECI decided on its own to count paper slips of VVPAT in respect of all polling stations. According to the ECI, no discrepancy was found between the electronic and paper count.

 

27) In the said affidavit, it is finally stated that the ECI has decided to increase the use of VVPAT units in a phased manner and for this purpose the ECI has already written to the Government of India, Ministry of Law and Justice to issue administrative and financial sanction for procurement of 20,000 units of VVPAT (10,000 each from M/s BEL and M/s ECIL) costing about Rs. 38.01 crore.

 

28) Though initially the ECI was little reluctant in introducing “paper trail” by use of VVPAT, taking note of the advantage in the system as demonstrated by Dr. Subramanian Swamy, we issued several directions to the ECI . Pursuant to the same, the ECI contacted several expert bodies, technical advisers, etc. They also had various meetings with National and State level political parties, demonstrations were conducted at various places and finally after a thorough examination and full discussion, VVPAT was used successfully in all the 21 polling stations of 51-Noksen (ST) Assembly Constituency of Nagaland. The information furnished by the ECI, through the affidavit dated 01.10.2013, clearly shows that VVPAT system is a successful one. We have already highlighted that VVPAT is a system of printing paper trail when the voter casts his vote, in addition to the electronic record of the ballot, for the purpose of verification of his choice of candidate and also for manual counting of votes in case of dispute.

 

29) From the materials placed by both the sides, we are satisfied that the “paper trail” is an indispensable requirement of free and fair elections. The confidence of the voters in the EVMs can be achieved only with the introduction of the “paper trail”. EVMs with VVPAT system ensure the accuracy of the voting system. With an intent to have fullest transparency in the system and to restore the confidence of the voters, it is necessary to set up EVMs with VVPAT system because vote is nothing but an act of expression which has immense importance in democratic system.

 

30) In the light of the above discussion and taking notice of the pragmatic and reasonable approach of the ECI and considering the fact that in general elections all over India, the ECI has to handle one million (ten lakhs) polling booths, we permit the ECI to introduce the same in gradual stages or geographical-wise in the ensuing general elections. The area, State or actual booth(s) are to be decided by the ECI and the ECI is free to implement the same in a phased manner. We appreciate the efforts and good gesture made by the ECI in introducing the same.

 

31) For implementation of such a system (VVPAT) in a phased manner, the Government of India is directed to provide required financial assistance for procurement of units of VVPAT.

 

32) Before parting with the case, we record our appreciation for the efforts made by Dr. Subramanian Swamy as well as the ECI, in particular Mr. Ashok Desai and Ms. Meenakshi Arora, learned senior counsel for the ECI.
33) With the above directions, the appeal and the writ petition are disposed of. No separate order is required in the applications for intervention. Both sides are permitted to approach this Court for further direction(s), if need arises.

……………….…………………………CJI

 (P. SATHASIVAM)
 .…….…………………………………J.
(RANJAN GOGOI)

NEW DELHI;
OCTOBER 8, 2013.

 

http://supremecourtofindia.nic.in/outtoday/9093.pdf

 

http://www.nationaldastak.com/story/view/supreme-court-judgement-at-evm

महिला दिवस 8 मार्च विशेष: डॉ अम्बेडकर ने महिलाओं को वो सारे अधिकार महिलाओं को संविधान में दिलाये जो ब्राह्मणवादी धर्म ग्रंथों,देवी देवताओं और उनके विधान “मनुस्मृति” ने छीन लिए थे | डॉ. अम्बेडकर ने लिखी थी हिंदू महिलाओं की किस्मत में सबसे बड़ी क्रांति की कहानी…विष्णु शर्मा

भारत में जब भी महिलाओं की आजादी, हक या अधिकारों की बातें होती हैं तो ना जाने किस-किस का नाम लिया जाता है. तमाम बहादुर महिलाओं, वीरांगनाओं, लेखिकाओं और अपने अपने क्षेत्र में कामयाबी का परचम लहराने वाली महिलाओं को याद किया जाता है. नहीं याद किया जाता तो उस डा. भीमराव अम्बेडकर को जिसका योगदान आजाद भारत में इस दिशा में शायद सबसे ज्यादा है. किसी भी पीढ़ी के व्यक्ति से बात करिए या फिर किसी भी पार्टी के नेता से बात करिए तो वो संविधान बनाने में डा. अम्बेडकर का योगदान तो बताएगा लेकिन महिलाओं के हक की लड़ाई में उनकी चर्चा नहीं करेगा. जबकि आजाद भारत में पैदा हुई हर महिला को उनका आभारी होना चाहिए, कम से कम हिंदू महिलाओं को तो.

खासकर हिंदू महिलाओं का जिक्र और इस बात पर जोर इसलिए क्योंकि डॉ. अम्बेडकर ना होते तो हिंदू कोड बिल आता ही नहीं, शायद कोई सोचता भी नहीं जिसके जरिए भारतीय महिलाओं को इतने अधिकार मिले थे, जैसे—तलाक का अधिकार, दूसरी शादी करने का अधिकार, विधवा पुनर्विवाह का अधिकार, पिता या पति की सम्पत्ति में हिस्से का अधिकार, तलाक के बाद मेंटीनेंस पाने का अधिकार आदि. हिंदू महिलाओं की जिंदगी में क्रांति लाने वाला ये बिल डा. भीमराव अम्बेडकर ने तैयार किया था और अगर नेहरू दवाब में नहीं आए होते तो अम्बेडकर के सारे प्रावधान लागू होते और महिलाओं को और भी ज्यादा अधिकार मिले होते. इसी तरह अगर नेहरू की सरकार ने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी बात मानी होती तो उसी वक्त मुस्लिम महिलाओं को भी ये अधिकार मिल गए होते, जो आज तक ट्रिपल तलाक जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं.

आखिर कैसे हुआ ये सब? कैसे आया हिंदू कोड बिल? किस-किस ने किया विरोध और क्यों किया विरोध? किसने घेरी संसद? क्यों देना पड़ा कानून मंत्री पद से डा. अम्बेडकर को इस्तीफा? क्यों लड़े वो निर्दलीय चुनाव? क्यों नेहरू ने चुनाव जीतने के लिए किया बिल में संशोधन का वायदा? क्यों दी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को इस्तीफे की धमकी? इन्हीं सवालों के जवाब में छुपी है आजाद भारत में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई की पूरी कहानी. सोचिए, जब इन सवालों में छुपा हुआ ये घटनाक्रम ही इतना हैरतअंगेज लगता है तो वाकई में क्या ये सब इतना आसान होगा? पूरे आठ साल लग गए इस लड़ाई में, तब जाकर महिलाओं को मिल पाए थे ये अधिकार वो भी टुकड़ों-टुकड़ों में.

आसान भी नहीं था, सदियों से जो हिंदू समाज तमाम स्मृतियों के सहारे अपने कानून चलाता आया है, भले ही उन्हें कोई मानता नहीं था, हर जाति-समाज की अपनी परम्पराएं थी. वेदों तक मे जिक्र है कि महिलाएं श्रषि होती थीं, शास्त्रार्थ करती थीं, हल चलाती थीं या फिर वैद्य या शिक्षक जैसे व्यवसायों में थीं, ऐसे में विदशियों के आक्रमण और जाति व्यवस्था के मजबूत होने से महिलाओं की स्थिति में गिरावट आती चली गई. परदादारी, घूंघट, बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियां हिंदुओं में आ गईं. राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बड़े प्रयास किए, लेकिन आजादी तक उनकी स्थिति में भी कोई खास बदलाव नहीं था. ऐसे में नेहरू की पहल पर जब डा. अम्बेडकर ने हिंदू कोड बिल का ड्राफ्ट रखा, वो भी आजादी मिलने के चार साल बाद ही तो कुछ लोगों ने सवाल उठाए. हालांकि 1948 में भी संविधान सभा के सामने ये बिल रखा गया था, तब भी खासा विरोध हुआ था.

पहला सवाल ये कि ये चुनी हुई सरकार नहीं थी, इसको कोई बड़ा फैसला लेने का अधिकार नहीं था. दूसरे हिंदुओं के निजी मामले में सरकार नहीं बोल सकती थी. तीसरा और अहम सवाल जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ये उठाया कि जब आप अच्छी नीयत से महिलाओं को अधिकार देने के लिए इस बिल को ला रहे हैं तो केवल हिंदू धर्म की महिलाओं को ही क्यों? क्यों नहीं यही अधिकार बाकी धर्मों की महिलाओं को भी मिले. उनका मानना था कि सरकार की बाकी धर्मों के मामले में ये बड़ा फैसला खुद तय करने की हिम्मत ही नहीं है, यहीं से समान नागरिक संहिता या यूनीफॉर्म सिविल कोड की मांग उठी थी.

नेहरू ने भले ही इस मामले पर कभी सीधे बात नहीं की, लेकिन डा. अम्बेडकर ने उस वक्त कहा था कि हम शुरूआत भले ही हिंदू धर्म से कर रहे हैं, लेकिन बाद में अन्य धर्मों के निजी कानूनों में भी सुधार के लिए बिल लाए जा सकते हैं. कांग्रेस के भी तमाम सांसद इस मामले में नेहरू के विरोधी थे, यहां तक कि संविधान सभा के अध्यक्ष डां राजेन्द्र प्रसाद भी, जो तब तक राष्ट्रपति चुने जा चुके थे. उनका मानना था कि इससे बहुसंख्यक हिंदू नाराज हो जाएंगे, उन्होंने इतना तक कह दिया कि मैं इस बिल पर हस्ताक्षर करने से पहले इस्तीफा देना बेहतर समझूंगा. डॉ. अम्बेडकर भी नेहरू से खुश नहीं थे क्योंकि नेहरू अपनी ही पार्टी के लोगों को बिल के पक्ष में राजी नहीं कर पा रहे थे, जबकि डा, अम्बेडकर उस वक्त नेहरू की केबिनेट में ही कानून मंत्री थे. डा. अम्बेडकर के एक नेहरू विरोधी-कांग्रेस विरोधी बयान पर नेहरू ने अम्बेडकर को एक कड़ा खत भी उन दिनों लिखा था.

इधर उस दौर में बाबा रामदेव की तरह की सक्रिय एक बडे संत और शंकराचार्य के शिष्य हिंदू कोड बिल बनाने की बात पर सरकार से खासे नाराज हो गए। उन्होंने नेहरू को खुली चुनौती दी कि वो शास्त्रों के आधार पर ये साबित करेंगे कि जो अधिकार आप इस हिंदू कोड बिल के जरिए देने जा रहे हैं, वो शास्त्रों में हिंदू महिलाओं को पहले से ही दिए गए हैं और विवाह विच्छेद या तलाक का हिंदुओं में कोई प्रावधान ही नहीं है, बहुविवाह पर उनका मानना था कि शास्त्रों में बहुविवाह किसी विशेष परिस्थिति में ही मान्य है. उन्होंने पूरे देश में आंदोलन छेड़ दिया, इधर डॉ. अम्बेडकर ने मनु स्मृति, पाराशर स्मृति जैसे ही तमाम हिंदू ग्रंथों के हवाले से ही महिलाओं को अधिकार देने की बात कही. संसद में भी इसको लेकर हंगामा होता रहा. जब ये बहस अंदर चल रही थी तो करपात्री महाराज ने हजारों लोगों के साथ संसद को बाहर से घेर लिया था. डॉ. अम्बेडकर पर भारी दवाब था कि वो इसको संशोधित करें, कुछ नर्म नियम लाएं लेकिन डॉ. अम्बेडकर अपने बिल में कोई भी तब्दीली या संशोधन करने को तैयार नहीं थे.

अम्बेडकर ने इसलिए धर्मशास्त्रों के आधार पर ही तर्क रखे कि ये सुधार, ये बिल क्यों जरूरी है और वो कॉमन सिविल कोड के पक्ष में थे, लेकिन शुरूआत हिंदू धर्म से ही होनी चाहिए. जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बिल के विरोध में नेहरू को कड़ा खत लिखा तो नेहरू ने भी जवाब में लिखा, कि इसे वापस लेने से कांग्रेस की प्रतिष्ठा खराब होगी, विदेशों में भी हमारी बदनामी होगी. लोगों ने ये तक आरोप लगाए कि अम्बेडकर जानबूझकर हिंदुओं के खिलाफ ये बिल लाकर साजिश की है, वो अपने विरोधियों से बदला लेना चाहते हैं. इधर जब से नेहरू ने अम्बेडकर के एक भाषण पर खत लिखकर उनसे नाराजगी जताई थी, इस भाषण में अम्बेडकर ने सरकार, पीएम और कांग्रेस सभी पर सवाल उठाए थे, तभी से दोनों ही इस बिल पर एक साथ होने के वाबजूद उनमें मतभेद थे. ऐसे में लोगों को बिल पास होने पर काफी शंका थी.

ऐसे में डॉ. अम्बेडकर के एक भाषण ने आग में घी का काम किया, मई 1951 में दिल्ली में हुए राजदूतों के एक सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने खुलकर हिंदू धर्म की कुरीतियों की आलोचना कर दी और बौद्ध धर्म अपनाने पर जोर दिया. लोगों को लगा जो व्यक्ति खुद हिंदू रहने में शर्म महसूस करता है, वो क्या उस धर्म का भला करेगा? संसद के अगले सत्र सितम्बर में होने से ठीक एक महीने पहले यानी 10 अगस्त 1951 को डॉ. अम्बेडकर ने नेहरूजी को एक खत लिखा और अपनी खराब तबियत का हवाला देकर फिर से हिंदू कोड बिल लाने के लिए दवाब डाला. उनको खबर थी कि नेहरू दवाब में इस बिल को ठंडे बस्ते में डाल सकते हैं. इधर देश का पहला आम चुनाव सर पर था, नेहरू ने फिर चर्चा की, तो कांग्रेस के ज्यादातर सांसद इसके विरोध में थे, उन्होंने संसद में खुलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का साथ दिया. नेहरू ने वैसे भी कांग्रेस सांसदों के लिए व्हिप भी जारी नहीं किया था, इसलिए अम्बेडकर को शंका थी, करपात्री महाराज अलग संसद घेरे पड़े थे.

आखिरकार नेहरू थोड़े झुक गए, उस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया. डा. अम्बेडकर नाराज थे, लेकिन फिर भी वो मान गए, बीस सितम्बर को उनका भाषण हुआ, काफी विरोध उनको झेलना पड़ा, यहां तक अपने कानून मंत्री का कांग्रेस के सांसदों ने भी उनका खुलकर विरोध किया. अब नेहरू फिर पीछे हटते दिखे और 26 सितम्बर 1951 को संसद में ऐलान किया, और बिल को दो हिस्सों में बांटने का ऐलान किया. उन्होंने चुनाव तक रुकने की बात कही और उस सत्र में हिंदू कोड बिल पर चर्चा टाल दी. अम्बेडकर को सपना बिखरता सा लगा, दिलचस्प बात ये थी कि तब आज की तरह महिला संगठन नहीं थे वरना डॉ. अम्बेडकर के साथ वो तो खड़े होते. उनको बिल ना पास होने से अंदर तक धक्का लगा और गुस्से में डॉ. अम्बेडकर ने देश के पहले कानून मंत्री की पोस्ट से इस्तीफा दे दिया. महिला अधिकारों के लिए ये बड़ा बलिदान था. हालांकि करपात्री महाराज जैसे सनातनी हिंदुओं ने आंदोलन वापस ले लिया था, नेहरू की मुसीबतें टल गई थीं.

डॉ. अम्बेडकर को इस्तीफा देने के बाद संसद में भाषण तक नहीं करने दिया गया, राज्यसभा के डिप्टी चेयरमेन ने उनसे स्टेटमेंट लिखित में मांगा, अम्बेडकर गुस्सा हो गए और फौरन बाहर निकल गए. बाहर प्रेस के लोगों को अपने इस्तीफे का लैटर बांट दिया. उसमें लिखा था कि, ‘’पीएम के कहने पर मैं बिल से शादी और तलाक का हिस्सा इसलिए अलग करने पर राजी हो गया क्योंकि मुझे लगा कि कम से कम कुछ तो हो रहा है, लेकिन पीएम ने जिस तरह दो दिन की बहस के बाद उसे भी पास होने से रोक दिया गया, मैं बिलकुल हैरान रह गया, बिल की तो हत्या कर दी गई. पीएम में उस बिल को लागू करने का साहस नहीं दिखा. मैं ये मानने को तैयार नहीं हूं कि समय की कमी के चलते शादी और तलाक बिल पास नहीं हो पाया. सामाजिक असमानता और पुरुष-महिला की गैरबराबरी हिंदू समाज के जड़ में है, इसको हाथ ना लगाना और आर्थिक असमानता दूर करने के लिए कानून बनाते जाना गोबर के ढेर पर महल खड़ा करने जैसा है. मेरे लिए हिंदू कोड बिल इतना अहम था कि मैं मतभेदों के वाबजूद मंत्रिमंडल में बना रहा.‘’

इस पत्र के बाद नेहरू पर काफी दवाब बढ़ गया था, संविधान रचने वाले डॉ. अम्बेडकर कांग्रेस से किनारा कर गए थे. लेकिन वो चुनावों की तैयारी में लग गए, फूलपुर से उनके खिलाफ भी एक संन्यासी खड़ा हो गया- प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, मुद्दा केवल एक था हिंदू कोड बिल. जनसंघ और हिंदू महासभा ने भी प्रभुदत्त को ही समर्थन दे दिया. प्रभुदत्त का कैम्पेन का तरीका अनोखा था, ना कोई रैली, ना कोई भाषण, सिर्फ साधुओं का भजन-नृत्य और एक परचा, जिसमें लिखा होता था- नेहरू या तो साबित करें कि हिंदू कोड बिल हिंदुओं के पक्ष में हैं या फिर वापस लें. पूरे कैम्पेन में प्रभुदत्त ने एक शब्द नहीं बोला. नेहरू के विरोध में पहले ही चुनाव में जबरदस्त माहौल बनने लगा था, नेहरू के करीबियों ने उनको समझाया. हवा के रुख को भांपकर चुनाव से ठीक पहले नेहरू को भी नरम होना पड़ा, नेहरू ने ऐलान किया कि हिंदू कोड बिल में कुछ बदलाव होंगे तब वो पेश होगा, और उसके बाद वो जीत गए.

लेकिन अम्बेडकर ने बड़ी कीमत चुकाई, वो नेहरू की तरह झुकने को तैयार नहीं थे, कांग्रेस छोड़ चुके थे, इसलिए निर्दलीय चुनाव लड़े और हार गए. नेहरू सत्ता में चुनकर वापस लौट आए थे और इस बार पूरी ताकत उनके पास थी. पूरे देश से 23 महिला सांसद चुनकर आई थीं, नेहरू ने दिमाग लगाया और उन महिला सांसदों को महिलाओं के लिए इस बिल में क्या अधिकार हैं, ये समझाया तो नेहरू को अब संसद में उन महिला सांसदों का भी सपोर्ट मिल गया था. अम्बेडकर अब ना सरकार में थे और ना कांग्रेस में वो, वो नेपथ्य में चले गए थे. हालांकि राज्यसभा सदस्य थे. नए कानून मंत्री एच वी पाटस्कर ने हिंदू कोड बिल पेश किया, लेकिन नेहरू की सलाह पर कई टुकड़ों में उसे पेश किया. 1955 से 1956 तक कुल चार बिल पेश कर दिए गए, जो पहले अम्बेडकर के हिंदू कोड बिल में शामिल थे. हिंदू मैरिज एक्ट, जिसमें तलाक, अर्न्तजातीय विवाह की इजाजत मिली तो एक से ज्यादा शादी पर रोक लगा दी गई, को 1955 में पास किया गया. 1956 में तीन एक्ट और पास किए गए जिनमें हिंदू सक्शेसन एक्ट, हिंदू एडोप्शन एंट मेंटीनेंस एक्ट और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट भी लागू हो गए.

हिंदू महिलाओं की जिंदगी में इन चार कानूनों ने क्रांति ला दी, उन्हें सम्पत्ति का अधिकार मिला, तलाक और उसके बाद मेंटीनेंस का अधिकार मिला, लड़कियों को गोद लेने पर जोर दिया गया. उनकी जिंदगी मानो एकदम से बदल गई. ये सभी कानूनों का लाभ हिंदुओं के अलावा सिखों, जैनों और बौद्ध महिलाओं को भी मौका मिला. लेकिन मुस्लिम महिलाओं को नहीं मिल पाया, यहां तक कि आजादी के वक्त कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेबी कृपलानी तक ने सरकार को इस मुद्दे पर साम्प्रदायिक बना दिया. ऐसे में डॉ. अम्बेडकर का साफ कहना था कि ये केवल पहला चरण है, इसके बाद मुसलमानों के लिए भी बिल लाया जाएगा, लेकिन उसके बाद ना नेहरू ने सोचा और ना उनके बाद के कांग्रेस नेताओं ने हिम्मत दिखाई. लोगों का मानना है कि अम्बेडकर ज्यादा जीते और कानून मंत्री बने रहते तो शायद मुस्लिम महिलाओं को भी इस क्रांति का लाभ मिलता.
विष्णु शर्मा

 

source:

http://www.inkhabar.com/opinion/36743-dr-Ambedkar-wrote-story-of-the-biggest-revolution-in-the-fate-of-Hindu-women

 

इस चुनाव की असली और अकेली विजेता हैं मायावती….रवीश कुमार NDTV

 

इस चुनाव की असली और अकेली विजेता हैं मायावती…रवीश कुमार


यह धारणा पुरानी और रद्दी हो चुकी है कि भारत में चुनाव चुनाव आयोग कराता है। नई धारणा और तथ्य यह है कि भारत में चुनाव न्यूज़ चैनल कराते हैं। चैनल के लोग रिटर्निंग अफसर की भूमिका में हर कार्यक्रम में किसी एक दल की जीत का एलान करते रहते हैं। चुनाव के वक्त नए नए चैनल खुल जाते हैं। नई वेबसाइट बन जाती है। इन्हें लेकर आयोग की कोई रणनीति नज़र नहीं आती है। इसलिए पारंपरिक रूप से अति महिमामंडन की शिकार इस संस्था का तरीके से मूल्यांकन होना चाहिए। चुनाव आयोग समय से पीछे चलने वाली एक पुरातन संस्था है। आयोग के पास राजनीतिक निष्ठा और भय के कारण किसी एक दल की ओर झुके मीडिया को पकड़ने का कोई तरीका नहीं है। पेड न्यूज़ की उसकी समझ सीमित है। आयोग अभी तक एग्ज़िट पोल के खेल को ही समझ पाया है। उसके पास किसी सर्वे के सैंपल जांचने या देखने की कोई समझ नहीं है। अधिकार तो तब मांगेगा जब समझ होगी। न्यूज़ एंकर पार्टी महासचिव की भूमिका में पार्टी का काम कर रहे हैं। एक दल की दिन भर पांच पांच रैली दिखाई जाती है। एक दल की एक भी रैली नहीं दिखाई जाती है। सत्ताधारी दल ने बड़ी आसानी से प्रचार के ख़र्चे और तरीके को बदल कर मीडिया को मिला लिया है। एंकर और पत्रकार अब राजनीतिक दलों के महासचिव हैं और इसमें एक दल की प्रमुखता कायम हो गई है। आयोग के पास ऐसी कोई समझ नहीं है कि वो रैलियों के प्रसारण को लेकर संतुलन कायम करने का कोई नियम बनाए। अख़बार तो आयोग से बिल्कुल ही नहीं डरते हैं। एफ आई आर के बाद भी कुछ फर्क नहीं पड़ा है। राजनीतिक दलों ने अपने ख़र्चे और रणनीति मीडिया को आउटसोर्स कर दिया है। बार्टर(वस्तु विनिमय) सिस्टम आ गया है। विज्ञापन दीजिए और उसके बदले रैली का सीधा प्रसारण घंटों दिखाइये। वो नहीं तो मीडिया घराने के खनन व्यवसाय को लाइसेंस दे दीजिए या सड़क निर्माण में ठेके।

सात चरण में चुनाव कराने की उसकी समझ का कायल हो गया हूं। मुझे दुख हो रहा है कि चुनाव जल्दी ख़त्म हो गए। इन्हें कम से कम भादो तक चलने चाहिए थे। उससे भी आगे दुर्गा
पूजा तक चुनाव हो सकते थे। 403 चरणों में भी यूपी के चुनाव हो सकते थे। मैंने यह लेख चुनाव आयोग पर नहीं लिखा है। मैंने यह लेख मायावती के लिए लिखा है। इस चुनाव में वे अकेली मीडिया के बनाए एक पक्षीय माहौल के राजनीतिक दबाव से लड़ती रही हैं। पूरी दुनिया के चुनाव में मीडिया के अश्लील इस्तमाल के इस दौर में मायावती ने अपना एक और चुनाव मीडिया के बिना ही पूरा किया। यह बताता है कि उस नेता की बनावट अख़बारी पन्नों से नहीं बल्कि इस्पात के किसी प्रकार से होगी। ज़रूर बसपा ने इस बार सोशल मीडिया का इस्तमाल किया। व्हाट्स अप के लिए नए नए बैनर, वीडियो सामग्री बनाए हैं लेकिन मुख्य तौर पर बसपा ने मीडिया का बेहद संक्षिप्त और पारंपरिक इस्तमाल किया है। मायावती लखनऊ लौटकर एक प्रेस कांफ्रेंस करती थीं और बाकी समय मीडिया को दूर ही रखा। चुनाव से पहले कुछ अखबारों को इंटरव्यू तो दिया मगर टीवी को नहीं दिया। ट्वीटर को तो डूब मरना चाहिए कि वे भारत की अकेली ऐसी नेता हैं जो ट्वीट नहीं करती थीं। अपनी रैली का फोटो अपलोड नहीं कर रही थीं।

इस युग में किसी चुनावी रणनीति की कल्पना बग़ैर मीडिया के नहीं हो सकती है। मायावती ने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव को बग़ैर मीडिया के लड़ा है। उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं रहा होगा। कायदे से उन्हें मीडिया के लिए उपलब्ध होना चाहिए था मगर क्या यह सच नहीं है कि मीडिया बसपा को पार्टी ही नहीं मानता है। मायावती को घेरन वाले विरोधी दल टीवी के इस्तमाल से समानांतर माहौल रच रहे थे। कोई भी देखने वाला चकरा जाए कि शायद चुनाव का यही माहौल है। मायावती मीडिया की लगातार बनाई जा रही घारणाओं को नज़रअंदाज़ करती रहीं हैं। सीना फुलाने वाले अच्छे अच्छे नेता टीवी के बनाए इस माहौल में फंस जाते हैं। उनकी धुकधुकी बढ़ जाती है। कई बार माहौल बनवाकर भी वे अंत अंत तक डरे रहते हैं। अजीब अजीब हरकतें करते हैं। दो महीने के चुनाव में मायावती सामान्य बनी रही हैं। इस बात के लिए उनपर रिसर्च होनी चाहिए। इस बात के लिए भी रिसर्च होनी चाहिए कि बग़ैर घनघोर मीडिया के एक नेता आज भी अपने वोटर से और वोटर अपने नेता से कैसे संबंध बनाए रखता है। मायावती भले न दबाव में आती हों मगर वोटर तो उसी मीडिया समाज में रहता है। उस मतदाता के लिए अपने नेता के साथ खड़े रहना कम आसान नहीं रहा होगा। बसपा का कार्यकर्ता तो दस जगह उठता बैठता होगा,वो कैसे उस पार्टी के लिए काम करता होगा जो मीडिया में नज़र नहीं आती है मगर उसकी नेता चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं।

ऐसा हो नहीं सकता कि हार का डर मायावती को नहीं सताता होगा। बीच चुनाव में उन्हें नहीं लगा होगा कि सबकुछ हाथ से गया। हारने के बाद उन पर तीखे सवालों के हमले होंगे। चिंता तो होती ही होगी कि मीडिया के कारण उनकी पार्टी कमज़ोर पड़ सकती है। इस तरह की ज़रा सी ऐसी स्थिति में आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बर्ताव देखिये और मायावती का देखिये। हार का मामूली डर प्रधानमंत्री को किस तरह से भरभरा सकता है ये बनारस ने देखा होगा और ये भी बनारस की दिखा सकता है कि वो जिस नेता को हिन्दू ह्रदय सम्राट समझता है उसे सभासद की तरह देखने की ख़्वाहिश भी रखता है। अंतिम नतीजा जो भी निकले, तीन दिन तक प्रधानमंत्री बनारस में ऐसे अटके रहे जैसे सातवें चरण का चुनाव 40 सीटों पर नहीं, बल्कि 5 सीटों के लिए हुआ है। एक पक्ष यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री युद्ध को युद्ध की तरह लेते हैं। हार रहे हैं तो जीतने के लिए हाथी से उतर सकते हैं। जिस दादा का टिकट काटते हैं उसी का हाथ पकड़ कर पूजा करते हैं। बीच चुनाव में भाषा और रणनीति बदल सकते हैं। बनारस इतना डरा दिया कि वे अकेले नहीं आए, बल्कि बीसों मंत्रियों को बुलाया, सांसदों को बुलाया और संपादकों को भी। अगर आपको अब भी लगता है कि प्रधानमंत्री घबराते नहीं हैं तो आपको सही लगता होगा।

इसके ठीक उलट मायावती स्थितप्रज्ञ बनी रहीं। उन्होंने समभाव को नहीं छोड़ा। चीखी चिल्लाई नहीं कि वे डूब रही हैं। बचाओ बचाओ। बसपा के सारे नेता बनारस आओ। सारे कार्यकर्ता बनारस आओ। बनारस हार गए तो सरकार नहीं बनेगी। ऐसा नहीं किया। चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में भी वो घबराई नहीं। इसके ठीक उलट चुनाव प्रचार समाप्त होने से एक दिन प्रचार समाप्त कर लखनऊ पहुंच गईं। जो लोग नेतृत्व में साहस और धैर्य के तत्व खोजते रहते हैं उन्हें मायावती फिर भी नहीं दिखेंगी। मोदी ही दिखेंगे जो पांच सीटों की हार से घबराकर गली गली घूमने लगे। मोदी की मदद के लिए पूरा मीडिया था। घंटों सीधा प्रसारण होता रहा। कैमरों के लिए तरह तरह की छवियां बनाई गईं। पहली बार बाबा विश्वनाथ मंदिर की बनी पंरपराओं को तोड़कर पूजा के राजनीतिक स्वांग का सीधा प्रसारण किया गया। गढ़वा आश्रम जाकर गाय को फल खिलाने लगे ताकि ओबीसी मतदात झुक जाएं। ये तब हाल है जब काशी को क्योटो बनाया जा रहा है। वहां के लोग जापान का वीज़ा लेकर बनारस में टहल रहे हैं। लाल बहादुर शास्त्री मेमोरिलय तक चले गए जिसके बारे में इकोनोमिक टाइम्स के सीएल मनोज ने लिखा है कि कायस्थ मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गए। शास्त्री जी की जाति तक खोज ली गई।

बनारस में चैनलों ने जिस तरह से रतजगा किया है उसे देखकर एक सामान्य मतदाता की जान ही निकल जाए। ऐसे में क्या मायावती बिल्कुल नहीं घबराई होगीं? क्या उन्हें बनारस की पांच सीटें चाहिए ही नहीं? आप बनारस में किसी से बात कीजिए। हर सीट पर बसपा लड़ाई में है और कुछ सीटों पर जीतने की स्थिति में है। ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बसपा वहां बग़ैर मायावती के रोड शो और मीडिया के चुनाव लड़ रही है। हो सकता है कि मायावती चुनाव हार जायें। चुनाव हारने के बाद मायावती की निर्मम आलोचना में यही सब न करने के तत्व शामिल होंगे लेकिन सोचिये कि इस चुनाव में कोई ज़िद की तरह अपनी बुनावट को बचाए रखने के लिए अपने तरीके से जीता रहा है। मेरे हिसाब से मीडिया के बनाए चुनावी माहौल की अकेली विजेता मायावती हैं। उन्होंने मीडिया के अश्लील दबावों के सामने घुटने नहीं टेके। मीडिया को न महत्व दिया और न मीडिया ने उन्हें। क्या ऐसा भारत के सबसे लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर सकते हैं? क्या हारने की हद तक ख़ुक को किसी चुनाव में टीवी के पर्दे से दूर रहकर प्रचार कर सकते हैं, चुनाव लड़ सकते हैं। मैं इसका जवाब जानता हूं। आप भी जानते हैं। इसलिए इस सवाल पर ठहाके लगाइये। मायावती ने मीडिया को हरा दिया है। चुनाव हारने की कीमत पर वो इस लड़ाई को लड़ती रहीं और जीत गईं हैं।उन्हें जीतनी भी सीटें आएंगी, हर सीट मीडिया के ख़िलाफ़ आएगी।

 

SOURCE

भारत का संक्षित इतिहास…Bheem Sangh

भारत का संक्षित इतिहास  Posted on by

 भारत का इतिहास

▶ इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता(3200 BC से पहले)
आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व (3200 BC से पहले) भारत मे इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता का इतिहास मिलता है और यह सभ्यता दुनिया के अग्रणी सभ्यताओ मे मानी जाती थी। यह सभ्यता महान नागवंशियों और द्रविड़ों द्वारा स्थापित की गयी थी जिनको आज एससी, एसटी, ओबीसी और आदिवासी कहा जाता है, यह लोग भारत के मूलनिवासी है। इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता एक नगर सभ्यता थी जो कि आधुनिक नगरो की तरह पूर्णतः योजनाबद्ध एवं वैज्ञानिक ढंग से बसी हुयी थी।
▶ विदेशी आर्य आक्रमण (3100BC-1500)
विदेशी आर्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जोकि असभ्य, जंगली एवं ख़ानाबदोश थे और यूरेशिया से देश निकाले की सजा के द्वारा निकले गए लोग थे। इन युरेशियनों  के आगमन से पूर्व हमारे समाज के लोग प्रजातान्त्रिक एवं स्वतंत्र सोच के थे एवं उनमे कोई भी जाति व्यस्था नहीं थी। सब लोग मिलकर प्रेम एवं भाईचारे के साथ मिलजुल कर रहते थे। ऐसा इतिहास इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता का मिलता है। फिर विदेशी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लगभग 3100 ईसा पूर्व भारत आये और उनका यहाँ के मूलनिवासियो के साथ संघर्ष हुआ।
▶ वैदिक काल (1500-600BC)
यूरेशियन लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) साम, दाम, दंड एवं भेद की नीत से किसी तरह संघर्ष में जीत गए। परन्तु युरेशियनों की समस्या थी कि बहुसंख्यक मूलनिवासी लोगों को हमेशा के लिए नियंत्रित कैसे रखा जाए। इसलिए उन्होंने मूलनिवासियो को पहले वात्य-स्तोम (धर्म परिवर्तन) करवाके अपने धर्म में जोड़ा। फिर युरेशियनों ने मूलनिवासियों को नीच साबित करने के लिए वर्ण व्यवस्था स्थापित की, जिसमें मूलनिवासियों को चौथे वर्ण शूद्र मे रख दिया। समय के साथ यूरेशियन ब्राह्मण, क्षत्रिय और विषयों ने मूलनिवासियों को वर्ण पर आधारित कानून बना कर शिक्षा (ज्ञान बल), अस्त्र-शस्त्र रखने (शस्त्र बल), और संपति(धन बल) के अधिकार से वंचित कर दिया। इस नियम को ऋग वेद मे डालकर और ऋग वेद को ईश्वरीकृत घोषित कर दिया और इस तरह बहुसंख्यक आबादी को (ज्ञान बल), अस्त्र-शस्त्र रखने (शस्त्र बल), और संपति रखने (धन बल), के अधिकार से वंचित कर मानसिक रूप से गुलाम और लाचार बना दिया। इसे वैदिक संस्कृति, आश्रम संस्कृति या ब्राह्मण संस्कृति कहते है जो श्रेणी बद्ध असमानता का सिधांत पर समाज को चारो वर्णो मे विभक्त करती है।
▶तथागत गौतम बुद्ध (श्रमण संस्कृति का उत्थान) 563 BC-483BC
तथागत बुद्ध ने वैदिक संस्कृति के विरुद्ध आंदोलन किया और अनित्य, अनात्म एवं दुख का दर्शन देकर वेद के “ईश्वरी कृत” होने और “आत्मा” के सिधान्त को चुनौती दी। उन्होने वैदिक संस्कृत के “जन्मना सिधान्त” को नकार “कर्मणा सिधान्त” का प्रतिपादन किया और वर्ण व्यवस्था के सिधान्त को नकार दिया और समतावादी और मानवतावादी दर्शन का प्रचार किया। वैदिक संस्कृति के यज्ञों मे पशुओ की बली दी जाती थी। इस तरह के कर्म कांड को भी तथागत ने नकार दिया। बुद्ध के मानवीय शिक्षाओं के प्रसार के बाद ब्राह्मणों का वैदिक धर्म बुरी तरह हीन माना जाने लगा था। तथागत ने अपने पुरे जीवन को इस दर्शन को स्थापित करने मे लगाया और पुनः श्रमण संस्कृत को स्थापित किया। जोकि मूलनिवासियों की संस्कृति थी। तब भारतीय इतिहास का सम्राट अशोक का स्वर्ण काल आया।

maurya-empire

▶प्रथम बौद्ध संगीति’ का आयोजन (483BC)
‘प्रथम बौद्ध संगीति’ का आयोजन 483 ई.पू. में राजगृह (आधुनिक राजगिरि), बिहार की ‘सप्तपर्णि गुफ़ा’ में किया गया था। तथागत गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद ही इस संगीति का आयोजन हुआ था। इसमें बौद्ध स्थविरों (थेरों) ने भाग लिया और तथागत बुद्ध के प्रमुख शिष्य महाकाश्यप ने उसकी अध्यक्षता की। चूँकि तथागत बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं को लिपिबद्ध नहीं किया था, इसीलिए प्रथम संगीति में उनके तीन शिष्यों-‘महापण्डित महाकाश्यप’, सबसे वयोवृद्ध ‘उपालि’ तथा सबसे प्रिय शिष्य ‘आनन्द’ ने उनकी शिक्षाओं का संगायन किया।

▶द्वितीय बौद्ध संगीति (383 BC)
एक शताब्दी बाद बुद्धोपदिष्ट कुछ विनय-नियमों के सम्बन्ध में भिक्षुओं में विवाद उत्पन्न हो जाने पर वैशाली में दूसरी संगीति हुई। इस संगीति में विनय-नियमों को कठोर बनाया गया और जो बुद्धोपदिष्ट शिक्षाएँ अलिखित रूप में प्रचलित थीं, उनमें संशोधन किया गया।

▶तृतीय बौद्ध संगीति (249 BC)
बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार बुद्ध के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद सम्राट अशोक के संरक्षण में तृतीय संगीति 249 ईसा पूर्व में पाटलीपुत्र में हुई थी। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ ‘कथावत्थु’ के रचयिता तिस्स मोग्गलीपुत्र ने की थी। विश्वास किया जाता है कि इस संगीति में त्रिपिटक को अन्तिम रूप प्रदान किया गया। यदि इसे सही मान लिया जाए कि अशोक ने अपना सारनाथ वाला स्तम्भ लेख इस संगीति के बाद उत्कीर्ण कराया था, तब यह मानना उचित होगा, कि इस संगीति के निर्णयों को इतने अधिक बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों ने स्वीकार नहीं किया कि अशोक को धमकी देनी पड़ी कि संघ में फूट डालने वालों को कड़ा दण्ड दिया जायेगा।

▶चतुर्थ बौद्ध संगीति
चतुर्थ और अंतिम बौद्ध संगीति कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल (लगभग 120-144 ई.) में हुई। यह संगीति कश्मीर के ‘कुण्डल वन’ में आयोजित की गई थी। इस संगीति के अध्यक्ष वसुमित्र एवं उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। अश्वघोष कनिष्क का राजकवि था। इसी संगीति में बौद्ध धर्म दो शाखाओं हीनयान और महायान में विभाजित हो गया।

हुएनसांग के मतानुसार सम्राट कनिष्क की संरक्षता तथा आदेशानुसार इस संगीति में 500 बौद्ध विद्वानों ने भाग लिया और त्रिपिटक का पुन: संकलन व संस्करण हुआ। इसके समय से बौद्ध ग्रंथों के लिए पाली भाषा का प्रयोग हुआ और महायान बौद्ध संप्रदाय का भी प्रादुर्भाव हुआ। इस संगीति में नागार्जुन भी शामिल हुए थे। इसी संगीति में तीनों पिटकों पर टीकायें लिखी गईं, जिनको ‘महाविभाषा’ नाम की पुस्तक में संकलित किया गया। इस पुस्तक को बौद्ध धर्म का ‘विश्वकोष’ भी कहा जाता है।

सम्राट अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिंदुसार का पुत्र था और चंद्रगुप्त का पौत्र था । जिसका जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व में चैत्र शुक्ल अष्टमी को माना जाता है। 272 ईसा पूर्व अशोक को राजगद्दी मिली और 232 ई. पूर्व तक उसने शासन किया। अशोक ने 40 वर्ष राज्य किया। चंद्रगुप्त की सैनिक प्रसार की नीति ने वह स्थायी सफलता नहीं प्राप्त की, जो अशोक की धम्म विजय ने की थी। कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक के शासनकाल में ही पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोगाली पुत्र तिष्या ने की। इसी में अभिधम्मपिटक की रचना हुई और बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया । बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के फ़लस्वरुप अशोक द्वारा यज्ञों पर रोक लगा दिये जाने के बाद यूरेशियन ब्राह्मणों ने “पुरोहित का कर्म त्यागकर” सैनिक वृति को अपना लिया था। पुष्यमित्र शुंग नाम के एक ब्राह्मण ने घुसपैठ करके मौर्य वंश के 10 वे उत्तराधिकारी “वृहदत्त” का सेनापति बनकर एक दिन सेना का निरिक्षण करते समय धोखे से उसका कत्ल कर दिया। उसने ‘सेनानी’ की उपाधि धारण की थी। दीर्घकाल तक मौर्यों की सेना का सेनापति होने के कारण पुष्यमित्र इसी रुप में विख्यात था तथा राजा बन जाने के बाद भी उसने अपनी यह उपाधि बनाये रखी। शुंग काल में संस्कृत भाषा का पुनरुत्थान हुआ तथा मनुस्मृति के वर्तमान स्वरुप की रचना इसी समय में हुई। वैदिक धर्म एवं आदेशों की जो अशोक के शासनकाल में अपेक्षित हो गये थे को पुनः कठोरता से लागू किया। इसी कारण इसका काल वैदिक प्रतिक्रांति अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल कहलाता। पुष्यमित्र शुंग ने घोषणा किया जो बुद्धिस्ट भिख्खु (Monk) का सिर लाकर देगा वो उसे 100 सोने की सिक्के देगा। बहुत कत्ले आम हुआ।

श्रमण संस्कृत के मानने वाले चार वर्ग मे विभक्त हो गए —
1. जो उनकी अधीनता स्वीकार कर लिए वो सछूत शूद्र बने अर्थात आज का ओबीसीOBC
2. जो लड़ाई से दूर जंगल और पहाड़ मे चले गए अर्थात आज का अनुसूचित जन जाति ST
3. जो ब्राह्मणवाद के सामने नहीं झुका वो है आज का अछूत शूद्र अर्थात अनुसूचित जाति SC
4. जो आज भी ब्राह्मणवाद के आगे नहीं झुके है और जंगलों में रहते है अर्थात आदिवासी

मनुस्मृति की रचना के बाद ब्राह्मणों ने एक बहुत बड़ा जातिप्रथा नाम का षड्यंत्र रचा और फिर इस बार मूलनिवासियों (SC, ST, OBC ) को 6743 जतियों/टुकडो में तोड़ कर जन बल से भी वंचित कर दिया गया। ऐसा तंत्र तैयार किया गया कि इसको तोड़ना अत्यंत कठिन रहे। और उनमे श्रेणीबध असमानता का सिधांत अर्थात जातिव्यवस्था का सिधांत, लागु किया और उनको धर्म, वेदों एवं शास्त्रों के माध्यम से मानसिक रूप से गुलाम बनाया।

उसके बाद समय समय पर ब्राह्मणों ने बहुत से धर्म शास्त्रों की रचना करके जो अंधश्रधा और अन्धविश्वास पर आधारित है लिखे और उनको मूलनिवासियों पर जबरदस्ती धर्म के नाम पर थोप दिया। इस प्रकार हम देखते है कि धर्म ही मूलनिवासियों की गुलामी का मुख्य आधार है यही वो षड्यंत्र है जिसके कारण आज भी मिल्निवासी मानसिक तौर से गुलाम है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आज भी इसी षड्यंत्र के माध्यम से देश पर राज कर रहे है।

इतिहास में हजारों मूलनिवासी महापुरुष हुए जिन्होंने मानवता पर आधारित मानव जीवन की शिक्षा दी, लेकिन किसी भी महापुरुष ने ना तो कोई धर्म बनाया और ना ही किसी धर्म की कभी बात की। हमारे महापुरुष जानते थे कि धर्म का सही अर्थ सिर्फ शोषण है। रविदास, नानक, कबीर, ज्योति राव फुले, नारायण गुरु, पेरियार, सावित्री बाई फुले और बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने कोई भी धर्म नहीं बनाया। महापुरुष जानते थे कि अगर हम कोई धर्म बनाते है तो यह वही बात हो जायेगी कि लोगों को एक अंधे कुए से निकल कर दूसरे अंधे कुए में धकेल देना। कोई भी महापुरुष मूलनिवासी लोगों को अंधश्रधा और अविश्वास के कुए में नहीं धकेलना चाहता था। बाबा साहब ने अपने जीवन काल में धर्म का त्याग करके धम्म को अपनाया क्योकि बाबा साहब जानते थे कि आडम्बरों, पाखंडों और ढोंगों पर आधारित धर्मों से कभी भी मूलनिवासियों का भला नहीं हो सकता। इसीलिए बाबा साहब ने धर्म छोड़ कर बुद्धि और तर्क पर आधारित धम्म को अपने का सन्देश दिया।

सभी मूलनिवासियों से प्रार्थना है कि धर्म का त्याग करे और धम्म को अपनाये। शायद कुछ लोग यहाँ तर्क भी करेंगे कि हम धम्म को ही क्यों अपनाये तो उन लोगों से प्रार्थना है कि फालतू में सोच कर या तर्क करके अपना समय और उर्जा खर्च ना करे। आप सभी को ज्ञात ही है कि जब तक हम ब्राह्मण निर्मित धर्म में रहेंगे हम शुद्र, नीच आदि कहलाते रहेंगे। आप सभी धर्म को छोड़ दे और मानवीय मूल्यों के आधार पर जीवन जीना शुरू कर दे। जब आप सभी लोग धर्म को त्याग कर मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन जीना शुरू करेंगे तो निश्चय ही देश के मूलनिवासियों का भला ही होगा।

https://bheemsangh.wordpress.com/2015/02/05/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8/

हाथी तो अपना साथी है, सदा से रहा है सदा ही रहेगा

B732A3 Bull elephant in the Zambezi

B732A3 Bull elephant in the Zambezi

 

1. हाथी जमीन पर रहने वाला सबसे बड़ा पशु है
2.
3. हाथी अकेला ऐसा प्राणी है जो उछल नहीं सकता
4. हाथी का दिमाग काफी विकसित होता है जो इंसान के दिमाग से करीब 3 – 4 गुना बड़ा होता है लेकिन हाथी के शरीर के हिसाब से छोटा ही है
5. हाथी का दिल एक मिनट में केवल 27 बार धड़कता है जो इंसान की तुलना में काफी कम है
6. हाथी की खाल एक इंच मोटी होती है
7. हाथी की द्रष्टि अपेक्षाकृत कमजोर होती है लेकिन सूंघने की क्षमता तेज होती है
8. 16 वर्षीय हाथी वयस्क होता है और बच्चे पैदा कर सकता है
9. हथिनी पूरे जीवन में केवल चार बच्चे ही पैदा कर सकती है
10. हथिनी की गर्भावस्था 22 महीने की होती है जो सबसे ज्यादा है
11. हाथी के बाहरी दो दांत पैने होते हैं जो स्वयं की रक्षा करने, चीजें उठाने और पानी खोदने के काम आते हैं
12. हाथी की दाढ़ का वजन ईंट के बराबर होता है
13. हाथी की सूंढ़ में 40,000 मांसपेशियां होती हैं
14. हाथी अपनी सूंढ़ का प्रयोग पानी पीने और चीजें उठाने के लिए करता है
15. हाथी रोता भी है, हँसता भी है खेलता भी है
16. हाथी अच्छे तैराक होते हैं
17. हाथी के पैर थोड़े गद्देदार होते हैं जो वजन सँभालने और तेज चलने में मदद करते हैं
18. हाथी एक वफादार जानवर है
19. हाथी को लोगों की अच्छी पहचान होती है, हाथी अपने दोस्त और दुश्मन को कभी नहीं भूलता
20. हाथी के दांत सोने से भी कीमती होते हैं
21. हाथी दांत के लिए हाथियों की हत्या कर दी जाती है
२२. हाथी 70 साल तक जीवित रहते हैं

 

हाथी और बौद्ध परंपरा

प्राचीन काल के इतिहास में हाथी बौधों का प्रतीक था और शेर ब्राह्मणवाद का प्रतीक, उस जमाने के ब्राह्मणवादी राजाओं ने ऐसी मूर्तियां बनवाई थी जहाँ हाथी शेर से परास्त होता दिखे, ओर्रिसा के कोमार्क मंदिर के दरवाजे पर ऐसी ही मूर्ती आज भी देखि जा सकती है |बौद्ध संस्कृति में हम ‘हाथी’ को कई प्रकार के राजनेतिक एव धार्मिक चिन्ह के रूप में प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि हमारी हिंसा जंगल में हाथी की हिंसा के सामान है|जिस तरह हाथी मासाहारी जानवरों की तरह पहल करके हिंसा नहीं करता पर जब उसे छेड़ा जाए तो वो इतना हिंसात्मक हो जाता है की सब तहस नहस कर डालता है| उसी तरह भारत का बहुजन या बौद्ध भी है पहल करके बिना वजह हिंसा नहीं करता|हाथी की हिंसा में ध्यान देने वाली बात ये है की उसको हिंसा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि उसकी ताकत का सबको अंदाजा होता है,ये बात हिरन पर लागू नहीं हो सकती|इसीलिए किसी ने सही कहा है की अगर शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तयार रहो|”

भारत में जब अनार्य/बौद्धों की क्रांति हुई और अनार्यों ने जब आर्यों से सत्ता अपने हाथों में ली तब उन युद्धों में “हाथी” का बड़ा योगदान था| हमारे सम्राट अशोक महान की सेना को इतिहासकार ELEPHANT WARRIORS अर्थात हाथी वाले योद्धा कहते थे|

buddha28_med

hathi