P: पालि शब्दावली

संस्कृतपालि तुल्य शब्दावली

पालि भाषा के अधिकांश शब्दों की संस्कृत शब्दों में बहुत अधिक समानता पायी जाती है। दूसरे शब्दों में यों कहें कि पालि शब्द संस्कृत शब्दों से व्युत्पन्न से लगते हैं। नीचे कुछ प्रमुख शब्दों के तुल्य पालि शब्द दिये गये हैं-

संस्कृत — पालि

अच्युत — अच्चुत

अग्नि — अग्ग

अहिंसा — अहिंसा

अक्षर — अक्खर

अमृत — अमत

अनात्मन — अनत्त

अप्रमाद — अप्पमाद

आर्य — अरिय

आत्मन — अत्त / अत्तन

ऋषि — इसि

ऋद्धि — इद्धि

ऋजु — उजु

वृद्ध – वुद्ध

कृत — कत

स्थविर — थेर

औषध — ओसध

राज्य — रज्ज

ईश्वर — इस्सर

तीर्ण — तिण्ण

पूर्व — पुब्ब

शरण — सरण

दोष — दोस

भिक्षु — भिक्खु

ब्रह्मचारिन् — ब्रह्मचारिन्

ब्राह्मण — ब्राह्मण

बुद्ध — बुद्ध

चक्र — चक्क

चन्द्र — चन्द

चित्र — चित्त

चित्त — चित्त

दृढ — दल्ह

दण्ड — दण्ड

दर्शन — दस्सन

देव — देव

धर्म — धम्म

धर्मस्थ — धर्मत्थ

ध्रुव — धुव

दुःख — दुक्ख

गन्धर्व — गन्धब्ब

गुप्त — गुत्त

हंस — हंस

ध्यान — झान

कर्म — कम्म

काम — काम

स्कन्ध — खन्ध

शान्ति — खान्ति / खान्ती

क्षत्रिय — खत्तिय

क्षेत्र — खेत्त

क्रोध — कोध

मर्त्य — मच्च

मृत्यु — मच्चु

मार्ग — मग्ग

मैत्र — मेत्र

मिथ्यादृष्टि — मिच्छादिट्ठि

मोक्ष — मोक्ख

मुक्त — मुत्त

निर्वाण — निब्बान

नित्य — निच्च

प्रव्रजित — पब्बजित (a homeless monk)

प्रकीर्णक — पकिन्नक (scattered, miscellaneous)

प्राण — पान (breath of life)

प्रज्ञा — पन्ना (intelligence, wisdom, insight)

प्रज्ञाशिला — पन्नासिला (higher intelligence and virtue)

परिनिर्वाण — परिनिब्बन

प्रतिमोक्ष — पतिमोक्ख

प्रिय — पिय (dear, friend, amiable)

पुष्प — पुप्फ

पुत्र — पुत्त

सर्व — सब्ब (all, whole)

सत्य — सच्च

श्रद्धा — सद्धा

स्वर्ग — सग्ग

सहस्र — सहस्स (a thousand)

श्रमण — समन (religious recluse)

सम्योजन — सन्नोजन / संयोजन

स्रोतस् — सोत (stream)

शुक्ल — सुक्क (light, pure, bright, white)

शून्यता — सुन्नता (emptiness (nibbana), the Void)

तृष्णा — तन्हा (thirst, craving)

त्रिपिटक — तिपिटक

सूत्र — सुत्त

स्थान – थान (condition, state, stance)

वक् / वच् — वच (voice, word, speech)

वर्ग — वग्ग (chapter, section; all chapter headings)

व्रण — वन (wound, sore)

वन — वन (forest, jungle (of desires))

विजान — विजान (understanding, knowing)

विज्ञान — विन्नान (cognition, consciousness, one of the five khandhas)

वीर्य — विरिय (vigor, energy, exertion)

चार आर्य सत्य

चत्वारि आर्यसत्यानि — चत्तारि अरियसच्चानि (four noble truths)

1) दुःख — दुक्ख

2) समुदय — समुदय (origin, cause of ill)

3) निरोध — निरोध (destruction of ill, cessation of ill)

4) मार्ग — मग्ग (road, way)

आर्याष्टांग मार्ग — अरिय अट्ठांगिक मग्ग (THE NOBLE EIGHTFOLD PATH)

1) सम्यग्दृष्टि — सम्मदिट्ठि (right insight, right understanding, right vision)

2) सम्यक् संकल्प — सम्मसंकप्प (right aspiration, right thoughts [right thoughts in the Theravada terminology denote the thoughts free from ill will, hatred, and jealousy)

3) सम्यग्वाक् — सम्मवाच (right speech)

4) सम्यक् कर्मान्त — सम्मकम्मन्त (right action)

5) सम्यग्जीव — सम्मजीव (right livelihood, right living)

6) सम्यग्व्यायाम — सम्मवयाम (right effort)

7) सम्यक्स्मृति — सम्मसति (right memory, right mindfulness)

8) सम्यक्समाधि — सम्मसमाधि (right concentration)

5 thoughts on “P: पालि शब्दावली

  1. नहीं जनाब जरा अपनी knowledge को update करें कि संस्कृत भाषा ईरान की पुरानी भाषा अवेस्तान से निकली है जिसमें एकवचन , द्विवचन और बहुवचन की grammer है जबकि पालि पुरातन भारतीय भाषा प्राकृत से निकली है
    पालि की grammer एकवचन और बहुवचन पर आधारित है द्विवचन का कोई use नहीं । तो जबरदस्ती पालि को संस्कृत से निकला मत सिद्ध करो । भारतीय भाषाओँ में 90 % से अधिक शब्द ज्यों के त्यों आज भी ऐसे ही बोले जाते हैं । और विश्व की भाषाओं को दो ग्रुप में रखा गया है १-indoiranian २+ indoeuropian families अतः भारतीय पुरातन प्राकृत भाषा के शब्दों की बहुतायत मात्रा ईरानियन और यूरोपियन फैमिलीज़ में है । तो मदर ऑफ़ languages प्राकृत है । पढ़ें ग्रीक,अवेस्तान ,जर्मन ,ऎवम सभी भारतीय भाषाएँ ।

  2. नहीं जनाब जरा अपनी knowledge को update करें कि संस्कृत भाषा ईरान की पुरानी भाषा अवेस्तान से निकली है जिसमें एकवचन , द्विवचन और बहुवचन की grammer है जबकि पालि पुरातन भारतीय भाषा प्राकृत से निकली है
    पालि की grammer एकवचन और बहुवचन पर आधारित है द्विवचन का कोई use नहीं । तो जबरदस्ती पालि को संस्कृत से निकला मत सिद्ध करो । भारतीय भाषाओँ में 90 % से अधिक शब्द ज्यों के त्यों आज भी ऐसे ही बोले जाते हैं । और विश्व की भाषाओं को दो ग्रुप में रखा गया है १-indoiranian २+ indoeuropian families अतः भारतीय पुरातन प्राकृत भाषा के शब्दों की बहुतायत मात्रा ईरानियन और यूरोपियन फैमिलीज़ में है । तो मदर ऑफ़ languages प्राकृत है । पढ़ें ग्रीक,अवेस्तान ,जर्मन ,ऎवम सभी भारतीय भाषाएँ ।अब देखिये जैसे पालि में :- जच्चा तो हिंदी में भी जच्चा , so that see further कच्चा पक्का मट्ठा सट्ठा सत्त पत्त मत्त खट पट छिद्द छिद्दा पिद्धा मिद्ध गिद्ध सिद्ध पक्का सत सति मति पति घुटी मिटि मीट्टी एवं देखिये कैसे मूर्ख ब्रह्मंवादियों ने ठीक से नक़ल भी नहीं मारी जबरदस्ती करने कीकोशिश मात्र है । जैसे इसि का ऋषि कर दिया further more see these सच्च का सत्य सत्त सत्व पठवी पृथ्वी मोक्ख मोक्ष पुत्त पुत्र सत्तू शत्रु पताप प्रताप मात मातृ और इस प्रकार मूर्खों ने कोशिस तो बहुत की पर नहीं बदल पाए जैसे मट्ठा सट्टा बट्टा कुत्ता चेत्ता पोत्ता सोत्ता कितने ही शब्द आज भी गामों में ज्यों के त्यों बोले जाते हैं । तो हमें ना बनाओ मूर्ख क्योंकि मूर्ख तो चोर् होते हैं और हम तो शेर हैं नाग है हाथी हैं अर्हतों के पुत्र हैं भगवान् बुद्ध के औरस पुत्र हैं ।

  3. दूसरों का अर्थात पुरोहित का लिखा इतिहास पढ़कर क्यों बकवास करते हो पहले भाषा विज्ञान पढ़ो और जानों भाषाओं की उत्पत्ति कैसे होती है । कितने सारे शब्द तो आपने गलत ही जबरदस्ती संस्कृत के पालि में रूपांतरित कर दिए बिना जाने पालि को जनाब।
    पालि का अर्थ है वो ज्ञान जो तथागत बुद्ध ने अपनी वाणी से समझाया तो भिक्खुओं ने उसे पा लिया इस लिए भगवान् बुद्ध के वचनों को पालि कहा गया जबकि भाषा तो पुरातन प्राकृत थी भगवान् बुद्ध की बस भगवान् ने उसे जरा simplify कर दिया सुव्यवस्थित कर दिया ।
    पालि से प्राकृत से संस्कृत बनी इसका नाम ही बताता है कि वह भाषा जिसमें संस्कार कर करके बनी इसका नाम तथागत के समय छन्दस् था पढ़ें भगवान् बुद्ध के वचन जब भगवान् ने अपने एक भिक्खु जो ब्राह्मण था उसको मन कर दिया था बुद्ध वचन को छांदस में translate करने से और संस्कृत तो इसका नाम बुद्ध के ४०० वर्ष बाद पड़ा जब पाणिनि ने छांदस की ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद पर आधारित grammer बनायी और बहुत सारे संस्कार ( improvements )किये छांदस में तो संस्कार के कारण संस्कृत कहलायी ।।
    इस लेख यानि संस्कृत पालि तुल्य शब्दावली को तुरंत site से हटायें और जानें हम और हमारा इतिहास ब्राह्मण पुरोहित से ज्यादा प्राचीन और हमारी भाषा से दुनिया की सभी भाषाएँ निकली हैं नहीं तो किसी भी भाषा के शब्दों को पढ़ें और जानें शब्दों का derivation कैसे होता है । नीचे कुछ समझाने का प्रयास किया गया है कृपया ध्यान दें ।।

    धर्म अर्थात अध्यात्म (अ= not,ध्या = concentration ,आत्म= self ,अर्थात मैं पन का ध्यान न करना ही अध्यात्म है = concentration of selflessness is called the real meditation ) अर्थात विश्व /व्यक्ति / शरीर का भीतरी आयतन i.e. internal view =reality of the things or world or all universe .
    सामान्यतः आज के समय में जनसामान्य धर्म को संप्रदाय और संप्रदाय को ही धर्म समझते हैं अपितु धर्म शब्द की उत्पत्ति पुरातन भारतीय भाषाओं :- प्राकृत एवं पालि से हुई है। पुरातन पालि भाषा में धम्म शब्द प्रयुक्त होता था जिसका संस्कृत भाषा में रूपान्तरण होकर धर्म हो जाता है , जबकि धम्म शब्द तो आज तक भी हमारे देश की विभिन्न जातियों ,गोत्रों और कबीर तुलसी के काव्यों में भी पाया जाता है । इतना ही नहीं हमारे देश में जो चार धाम हैं उन्हें धाम इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे धम्म (= धर्म ) स्थल हैं । इस बात का अटूट प्रमाण तो यही है कि जिस प्रकार समय के साथ- साथ सामाजिक परिवर्तन होता जाता है ,ठीक उसी प्रकार किसी देश अथवा क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं में भी परिवर्तन होता जाता है । परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि पुरानी भाषा बिल्कुल बदल जाती है ,बदलाव केवल इतना ही होता है कि पुरानी भाषा में कुछ नये शब्द किसी दूसरे देश अथवा क्षेत्र से आकर बस जाने वाले लोगों की भाषाओं के मिलते जाते हैं । परंतु अत्यधिक संख्या में तो पुरातन भाषा के शब्द ही ऐसे के ऐसे या कुछ विकृत होकर प्रयुक्त होते रहते हैं । जैसे देखिये पालि भाषा में बच्चा तो हिन्दी में भी बच्चा , जच्चा ,पिया , दिया,सच्चा ,कम्म=काम ,यान ,खेत , जोत , जोतना ,पोतना ,खोटना ,पुच्छ=पूछना ,पत्त=पतन=गिरना=झडना ,रतन=रतन=रत्न ,पुत्त=पूत=पुत्र ,चित्त=चित , मन ,चक्क=चक्का=चाकी ,मही=मट्टी=माटी , इसि=ऋषि , देव=देवता ,इस्सर=ईश्वर ,अत्त=आत्म=self ,दीप=दीपक ,चक्खु =चक्षु ,केस=केश =hair ,नक्ख=नाखून ,रस=रस्सा =soup ,सीह=सिंह ,गोत्त=गोत्र ,सोत्त=सोत्र=स्रोत = any stream from ground , पुब्ब=पूर्व=earlier ,सेट्ठ=श्रेष्ठ ,कुम्भ=कुंभकार=कुम्हार , चमर=चँवर=चौर , पुच्छ=पूछना =ask ,भव=happen ,सब्ब=सब=सर्व ,मंगल=भला=nice ,रक्ख=राख़=रखना ,सदा=always ,हिरी=ह्री=लज्जा=shyness ,मुंड=सरदार=गंजे सिर वाला लाल वस्त्र धारी = religious teacher = head , अविज्जा=अविद्दा =unknownness ,संखार=संस्कार , रुक्ख=वृक्ष ,भरोस्सी, आरहा ,खल ,खेम (=क्षेम) जैसे खेमचंद , हल ,पच्च=पचना , धातु , चक्खु= चक्षु आदि अनगिनत शब्द आज भी ज्यों के त्यों उत्तर भारत में बोले जाते हैं , उन सभी शब्दों का उल्लेख इस छोटे से ग्रंथ में करना हमारा उद्देश्य नहीं बल्कि पाठकों को सीधी सी बात को समझाने का प्रयास है । जैसे उत्तर भारत में बोली जाने वाली हिन्दी ही अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ विभिन्नता के साथ बोली जाती है । जिस प्रकार आप देखेंगे कि “ क्या कर रहा है ।’’ हिन्दी का एक किताबी वाक्य है जिसे मुरादाबाद के आगे के क्षेत्र में “ के कर रो है ” , बिजनौर क्षेत्र में “ क्या कर रिया है “ और गंगा पार के क्षेत्र मुजफ्फर नगर , मेरठ , बागपत आदि में “ के करन लाघ रा सै ।” बोला जाता है। जनसामान्य इस बात से बिल्कुल भी परीचित नहीं कि इस जगत में विभिन्न भाषाओं (=बोलीयों ) का विकास होता है उसके बाद लेखनी (=लिपि=writing system ) का विकास (=development ) होता है ।और जैसे –जैसे एक देश अथवा क्षेत्र के लोग किसी दूसरे क्षेत्र में आते जाते हैं या वहाँ बस जाते हैं तो लोग अपनी – अपनी भाषाओं को एक दूसरे को समझाने के प्रयास में अपनी- अपनी भाषाओं के व्याकरण(=grammer) के नियम बनाते हैं परंतु वे सभी नियम चाहे कितने भी सटीक बनायें पर उस भाषा की सम्पूर्ण रूप से व्याख्या नहीं कर पाते , क्योंकि नियम किसी विशेष समय/ काल में कुछ विद्वान लोगों द्वारा बनाये जाते हैं जबकि भाषा का विकास व्याकरण के नियमों और लेखनी से भी अत्यधिक पुरातन काल से नैसर्गिक (=कुदरती ) रूप से होता आया है । इसी कारण चाहे कोई भी व्याकरण चाहे कितना भी सटीक हो ,वह अपनी ही भाषा पर पूरी पकड़ नहीं रखता । सबसे सुव्यवस्थित व्याकरण संस्कृत भाषा का माना जाता है परंतु यह भी पूरी पकड़ अपनी भाषा संस्कृत पर नहीं रखता ।इसका अनुभव तो ऋग्वेद को पढ़कर किया जा सकता है जिसकी भाषा को छांदस कहा जाता है , जैसे आप गायत्री मंत्र को ही देखिये जो छंद की व्याकरण के अनुसार लंगड़ा छंद है । तो कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा का विकास व्याकरण से बहुत पुराना है तथा भाषा निरंतर बदलती जाती है ,इस बदलाव को रोकने का कोई उपाय जनमानस के पास नहीं है, क्योंकि पुरानी कहावत है कि :-कोस-कोस पै पानी बदलै ,चार कोस पै बानी || तो पहले जम्मुद्वीप (आज के भारतवर्ष ) में पुरातन भाषा बोली जाती थी जो कि आज भी जैन धर्म की धार्मिक भाषा है , बाद में जब ईरान की खाड़ी देशों के सजायाफ्ता मुजरिम घुमक्कड़ असभ्य लोगों ने भारतवर्ष में प्रवेश किया तो सिंधु घाटी की पुरातन सौम्य – सुव्यवस्थित – सुसभ्य संस्कृति को छिन्न – भिन्न कर डाला , परंतु वे लोग भी चाहे अपनी पुरानी ईरानियन भाषा अवेस्तान के सूत्रों को बाँचते रहे परंतु उनकी वह पुरातन भाषा सिंधु की पुरातन भाषा प्राकृत-पालि के प्रभाव से अछूती न रह सकी , जिसका फल यह हुआ कि एक नयी मिश्रित भाषा संस्कृत का प्रादुर्भाव हुआ । इसका एक अटूट प्रमाण तो यही है कि संस्कृत की व्याकरण हु-ब-हु (same) अवेस्तान की व्याकरण जैसी है क्योंकि अवेस्तान और संस्कृत भाषा में एक वचन(=singular ) , द्विवचन(=dual ) एवं बहुवचन (= plural ) के आधार पर व्याकरण है जबकि प्राकृत, पालि और दुनिया की अन्य भाषाओं में केवल एकवचन एवं बहुवचन के आधार पर व्याकरण है । जो कि एक नैसर्गिक भाषा की नैसर्गिक रूप से विकसित व्याकरण है । परंतु सिंधु की प्राकृत भाषा के प्रभाव को हम संस्कृत में साफ-साफ देख सकते हैं कि संस्कृत में प्राकृत– पालि के शब्दों को ऐसे का ऐसे ही या थोड़ा विकृत करके प्रयोग किया गया । जैसे :- पालि भाषा संस्कृत भाषा पुरिस पुरुष इसि ऋषि ( ऋ में इ की बोलने की आवाज मौजूद है बस इ के पहले र जोड़ दिया गया है इत्थि (त्+थ+इ=त्री ) स्त्री (इ की बोलने की आवाज मौजूद है केवल इ की जगह स् का प्रयोग कर दिया गया है ) इस्सर ईश्वर मग्ग मार्ग बाल बालक सच्च सत्य सत्त (=जीव ) सत्व वसल (=नीच ) वृषल कम्म कर्म खेम (क का ख और ख का क्ष हो जाता है ) क्षेम i.e. k>kh>ksh गोत्त गोत्र चक्क चक्र चित्त चित पिय प्रिय पियहर (=पीहर)=मायका प्रियजन तं त्वं देव देव धम्म धर्म पुत्त पुत्र मित्त मित्र नोट:-पालि एवं प्राकृत हमारे देश भारतवर्ष की प्राचीनतम भाषाएँ हैं और सबसे मजे की बात यह है कि पतंजलि ऋषि के गुरु पाणिनि ऋषि ने वेदिक साहित्य की व्याकरण बनायी थी जिसे संस्कृत की व्याकरण कहा गया ।पतंजलि लगभग १५० ईसापूर्व हुए जो कि भगवान गोतम बुद्ध के ४०० वर्ष बाद हुए और बुद्ध के जीवित रहते समय ही उनके शिष्य मोग्गलान (=मोद्गल्यान्) ने भगवान गोतम बुद्ध के ८२००० व उनके अर्हत शिष्यों के २००० सूत्रों कुल ८४००० सूत्रों के आधार पर पालि व्याकरण बनाई थी । अतः व्याकरण का निर्माण संस्कृत के पहले पालि का ही हुआ था ।अब पतंजलि के योगसूत्र में देखिये कि योग की अगर बात करें तो प्राचीन भारत में सर्वोत्तम योगी भी गोतम बुद्ध हुए । जिसका प्रैक्टिकल रूप से विवरण बुद्ध द्वारा दीघनिकाय के सतिपट्ठान सुत्त में किया गया है ।बुद्ध ने योग (=अध्यात्म ) के आठ मार्ग बताये हैं (१) सम्मा दिट्ठी (२)सम्मा संकप्पो (३)सम्मा वाचा (४)सम्मा कम्मन्तो (५)सम्मा आजीवो (६)सम्मा वायामो (७)सम्मा सति (८) सम्मा समाधि । इन आठ मार्गों की संज्ञा(=name) और थोडा कर्म बदलकर अपने नाम से अष्ठान्गिक योग बनाया जिसे पतंजलि का योगसूत्र भी कहा जाता है ।जो कि इस प्रकार हैं (१)यम :-अहिंसा ,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह ।(२)नियम:-सौंच (cleanness),संतोष,तप,स्वाध्याय,ईश्वर प्रणिधान (=self surrender to god ) (३)आसन (= relaxable posture of body) (४)प्राणायाम (=आश्वास-प्रश्वास i.e. inspiration-expiration ) (५)प्रत्याहार (=मन को पाँच वाह्य इन्द्रियों के विषयों से अलग कर लेना ) (६)धारणा (=restorative thought about goal=दृढ संकल्प ) (७)ध्यान (=practice of concentration of mind ) (८) समाधि (=fully concentrated mind =मन का मन में अवस्थित हो जाना ) । इन आठ अंगों में पहले ६ तो पंचेंद्रियों को पूर्णतः वश में करने के लिए हैं और ७,८ वें कैवल्य (=मोक्ष ) प्राप्त करने हेतु हैं ।इन आठ की व्याख्या चार भागों में की है (१)-समाधि पाद:- चित की वृत्तियों के निरोध के जो मार्ग हैं उन सबको योग कहा जाता है।अतः चित वृत्तियों के निरोध की अवस्था को समाधि कहा गया है । (२)- साधनपाद :-इन्द्रियों के विषयों को त्याग ध्यान द्वारा मन को समाधिष्ठ करने के जो साधन हैं । जैसे प्रथम ६ साधनों द्वारा ध्यान में अवस्थित होया जाता है । (३)-विभूतिपाद:-पूर्ण ध्यानस्थ अवस्था में साधक विभिन्न प्रकार की दिव्य शक्तियों का अनुभव करने लगता है ,जैसे दिव्य श्रोत , आकाश में शरीर सहित गमन करना,अदृश्य हो जाना आदि ।अतः साधक को कैवल्य अवस्था को प्राप्त करने का ज्ञान हो जाता है । (४)-कैवल्य पाद:-जब साधक का शरीर और मन एक ही हो जाता है अर्थात अविच्छिन समाधि । तब साधक का मोक्ष हो जाता है यानि पुरुष और मन एक हो जाते हैं एवं शरीर और मन में कुछ भी अशुद्धि नहीं रह जाती अर्थात सत्व(=मन) और पुरुष (=शरीर) पूर्णतः राग आदि दोषों का बीज सहित नाश हो जाता है , साधक ब्रह्म अवस्था को प्राप्त हो जाता है । इसे ही कैवल्य कहा जाता है । पतंजलि ने साधनपाद के १३ वें एवं ४९ वें सूत्रों में सति शब्द का प्रयोग किया है जो कि संस्कृत के शब्द नहीं हैं और खूब ढूँढने से भी नहीं मिल पाए जबकि वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत शब्द कोश में भी नहीं है ये सति शब्द । सबसे मजे कि बात तो ये है कि सति शब्द का अर्थ ही नहीं समझ पाए संस्कृत के विद्वान् १३वें सूत्र में जो बताया गया है कि जीवित प्राणी भिन्न-२ प्रकार के विपाक (=फल) भोगता है , उनके मूल (=कारण=causes) के प्रति सति=सजग (=conscious) होना ।एवं ४९ वें सूत्र में प्राणायाम (=inspiration-expiration) करते समय सजग रहना ।जबकि सति शब्द पालि वांग्मय (=बुद्ध वचनों का संग्रह) का एक विशिष्ट शब्द है जैसे भगवान गोतम बुद्ध के द्वारा महासति पट्ठान सुत्त (दीघनिकाय २२.२/९ )में चार सति पट्ठान १-कायानुपस्सना ( = इसमें आसन और आश्वास-प्रश्वास आदि की practice है ) २-वेदानानुपस्सना ३-चित्तानुपस्सना ४- धर्मनुपस्सना को विस्तार पूर्वक समझाया है कि किस प्रकार एक भिक्खु (=साधक) विपस्सना द्वारा सम्यक समाधि प्राप्त करता है ।इससे भी पता चलता है कि पतंजलि ने महावीर और बुद्ध के योग मार्ग को नाम बदलकर प्रयोग किया , पर ढंग से योग को नहीं समझा पाए क्योंकि वो कभी भी बुद्ध महावीर के मार्ग को practically नहीं जिए तो केवल शास्त्रीय गुणगान ही कर सके वो भी क्रमबद्ध तरीके से नहीं किया, क्योंकि केवल काय के योग तक ही सीमित रह गए । सम्यक ध्यान और कैवल्य को भी नहीं जान पाए practically , विपस्सना और निब्बान को तो बेचारे क्या जान पाते।

  4. [6/12, 9:15 AM] dr k k patthak: Saint Peter as painted by Peter Paul Rubens

    Pronunciation/ˈpiːtər/GenderMaleOriginWord/nameGreekMeaningStoneOther namesRelated namesPete, Petey/Petie, Peoter, Pearce,Petero, Per, Peta, Petra, Pierre,Pedro, Piers

    Peter is a common masculine given name. It is derived, via Latin “petra”, from the Greekword πέτρος (petros) meaning “stone” or “rock”.[1]

    According to the New Testament, Jesus gaveSaint Peter (whose given name was Simon) the name Kephas or Cephas meaning “stone” in Aramaic.[2] Saint Peter, according to ancient tradition, became the first bishop ofRome. Roman Catholics consider him to have been the first Pope and all subsequent popes to have been his successors, and therefore sometimes refer to the Pope or the Papacyitself as Peter.
    [6/12, 9:32 AM] dr k k patthak: यह शब्द पीटर प्राकृत पालि के पेत शब्द से बना हिंदी में इसका अर्थ है प्रेत और संस्कृत में भी । परंतु पालि में पेत कहा है पुरुष अर्थात पुनर्जन्म चक्र में जो संखार के कारण नया विज्ञान अर्थात consciousness उत्पन्न हो जाती है ।
    संस्कृत में इसे पितृ =pitri कहा गया और ग्रीक में pet का peter हो गया वहाँ अर्थ है stone ऑफ़ jwell अर्थात मणि ।।
    तो प्राकृत से पालि और पालि से अन्य देशों में शब्दों का विकास हुआ ।
    पढ़ें पेतवत्थु खुद्दक निकाय का एक ग्रन्थ ।
    और भगवान् बुद्ध ने कहा भी है महासम्मत सुत्त दीघनिकाय में कि सृष्टि के आदिम काल में केवल एक ही महादीप के रूप में थी धरती जिसे चारों ओर से समुद्र ने घेर रक्खा था और तब मैं महासम्मत नामक चक्रवर्ती राजा रहा था ।।
    तो जब दुनिया अलग अलग द्वीपों में नहीं थी । इसका प्रमाण जियोग्राफी में दिया गया है कि आदिम कॉल में केवल एक द्वीप था जिसे वौज्ञानिकों ने पैंजिया कहा है ।।

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