U: शाशकों के प्रकार जानो

जनता को सरकार से ये अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए की वो उनके लिए कुछ करेगी, अगर पोलिटिकल स्टेबिलिटी है और जनता को काम करने पढ़ने लिखने और न्याय पाने की आज़ादी है तो समझ लो वही स्वर्ग है| इसके बावजूद कोई गरीब और मजलूम है तो वो खुद ही निकम्मा है | लार्ड मैकॉले द्वारा शिक्षा को सर्वजन करने व इंडियन पीनल कोड की धाराएं बनाने से लेकर अभी तक भी जनता का स्वर्ण काल चल रहा है, आगे का आगे देखेंगे| पर अगर कोई मेहनत करना चाह रहा है पढ़ना चाह रहा है तो वो अपने जीवन को बदल पायेगा| ऐसा सुनहरा मौका राजतन्त्र में जनता के लिए पहले कभी नहीं था , राजतन्त्र में तो बस वही फलते फूलते हैं जिनपर राज कृपा हो बाकि तो डेन डेन को मोहताज़ होते हैं, इज्ज़्ज़त बेइज़्ज़ती की बात तो क्या चली|

इसलिए लग जाओ ज्ञान और शक्ति इकट्ठी करने में , आड़े वक़्त में बस यही काम आएगी

 

Capitalism2
27-Jan-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- आइए फासीवाद सामंतवाद और पूँजीवाद को जाने ,जब तक इनको हम जानेंगे नहीं इनसे कैसे लड़ेंगे |ये तीनों शैतान आपको निगल जाने को बढ़ रहे हैं और आप गाने बजने क्रिकेट में मस्त हो|इनका जिक्र होते ही आम लोग चैनल बदल देते हैं और नाच गाने में मस्त हो जाते हैं,

फासिस्ट और फासीवाद:

जरा देखें फासिस्ट और फासीवाद का  मतलब क्या होता है – फासीवाद की व्याख्या है – a governmental system led by a dictator having complete power, forcibly suppressing opposition and criticism, regimenting all industry, commerce, etc., and emphasizing an aggressive nationalism and often racism.

याने कि एक तानाशाह के नेतृत्वकी  सर्वशक्तिमान सरकार जो बलपूर्वक टीका और विरोधकोंको कुचल दें, जो सभी उद्योगजगत, व्यापार को अपनी तर्ज पर काम करने को मजबूर करे और एक आक्रमक राष्ट्रवाद का समर्थन करे । ऐसी सरकार वंशवाद का भी समर्थन करती पायी जा सकती है ।

तो ये रहा फासीवाद और इसके तहत चलनेवाले सभी ठहरे फासिस्ट । अब इसका थोड़ा इतिहास देखें । इटली के तानाशाह मुसोलिनी का पक्ष खुद को फासिस्ट कहलाता था । हिटलर की नाझी पार्टी भी फासिस्ट थी । साथ में वंशवादी भी ।

फासीवाद या फ़ासिस्टवाद (फ़ासिज़्म) इटली में बेनितो मुसोलिनी द्वारा संगठित “फ़ासिओ डि कंबैटिमेंटो” का राजनीतिक आंदोलन था जो मार्च, १९१९ में प्रारंभ हुआ। इसकी प्रेरणा और नाम सिसिली के 19वीं सदी के क्रांतिकारियों-“फासेज़”-से ग्रहण किए गए।

फासीवाद के 14 लक्षण….डा. लॉरेंस ब्रिट

ये लक्षण डा. लॉरेंस ब्रिट ने बताए हैं जो एक राजनीतिक विज्ञानी हैं जिन्होंने फासीवादी शासनों – जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) – का अध्ययन किया और निम्नलिखित लक्षणों की निशानदेही की है:

डा. लॉरेंस ब्रिट  – एक राजनीतिक विज्ञानी जिन्होंने फासीवादी शासनों जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो  (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) का अध्ययन  किया और निम्नलिखित 14 लक्षणों की निशानदेही की है;

  1. शक्तिशाली और सतत राष्ट्रवाद — फासिस्ट शासन देश भक्ति के आदर्श वाक्यों, गीतों, नारों , प्रतीकों और अन्य सामग्री का निरंतर उपयोग करते हैं. हर जगह झंडे दिखाई देते हैं जैसे वस्त्रों पर झंडों के प्रतीक और सार्वजानिक स्थानों पर झंडों की भरमार.
  1. मानव अधिकारों के मान्यता प्रति तिरस्कार — क्योंकि दुश्मनों से डर है इसलिए फासिस्ट शासनों द्वारा लोगो को लुभाया जाता है कि यह सब सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वक्त की ज़रुरत है. शासकों के दृष्टिकोण से लोग घटनाक्रम को देखना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे अत्याचार, हत्याओं, और आनन-फानन में सुनाई गयी कैदियों को लम्बी सजाओं का अनुमोदन करना भी शुरू कर देते हैं.
  1. दुश्मन या गद्दार की पहचान एक एकीकृत कार्य बन जाता है — लोग कथित आम खतरे और दुश्मन – उदारवादी; कम्युनिस्टों, समाजवादियों, आतंकवादियों, आदि के खात्मे की ज़रुरत प्रति उन्मांद की हद तक एकीकृत किए जाते हैं.
  1. मिलिट्री का वर्चस्व — बेशक व्यापक घरेलू समस्याएं होती हैं पर सरकार सेना का विषम फंडिंग पोषण करती है. घरेलू एजेंडे की उपेक्षा की जाती है ताकि मिलट्री और सैनिकों का हौंसला बुलंद और ग्लैमरपूर्ण बना रहे.
  1. उग्र लिंग-विभेदीकरण — फासिस्ट राष्ट्रों की सरकारें लगभग पुरुष प्रभुत्व वाली होती हैं. फासीवादी शासनों के अधीन, पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को और अधिक कठोर बना दिया जाता है. गर्भपात का सख्त विरोध होता है और कानून और राष्ट्रीय नीति होमोफोबिया और गे विरोधी होती है
  1. नियंत्रित मास मीडिया – कभी कभी तो मीडिया सीधे सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, लेकिन अन्य मामलों में, परोक्ष सरकार विनियमन, या प्रवक्ताओं और अधिकारियों द्वारा पैदा की गयी सहानुभूति द्वारा मीडिया को नियंत्रित किया जाता है.   सामान्य युद्धकालीन सेंसरशिप विशेष रूप से होती है.
  1. राष्ट्रीय सुरक्षा का जुनून – एक प्रेरक उपकरण के रूप में सरकार द्वारा इस डर का जनता पर प्रयोग किया जाता है.

8.धर्म और सरकार का अपवित्र गठबंधन — फासिस्ट देशों में सरकारें एक उपकरण के रूप में सबसे आम धर्म को आम राय में हेरफेर करने के लिए प्रयोग करती हैं. सरकारी नेताओं द्वारा धार्मिक शब्दाडंबर और शब्दावली का प्रयोग सरेआम होता है बेशक धर्म के प्रमुख सिद्धांत सरकार और सरकारी कार्रवाईयों के विरुद्ध होते हैं.

  1. कारपोरेट पावर संरक्षित होती है – फासीवादी राष्ट्र में औद्योगिक और व्यवसायिक शिष्टजन सरकारी नेताओं को शक्ति से नवाजते हैं जिससे अभिजात वर्ग और सरकार में एक पारस्परिक रूप से लाभप्रद रिश्ते की स्थापना होती है.
  1. श्रम शक्ति को दबाया जाता है – श्रम-संगठनों का पूर्ण रूप से उन्मूलन कर दिया जाता है या कठोरता से दबा दिया जाता है क्योंकि फासिस्ट सरकार के लिए एक संगठित श्रम-शक्ति ही वास्तविक खतरा होती है.
  1. बुद्धिजीवियों और कला प्रति तिरस्कार – फासीवादी राष्ट्र उच्च शिक्षा और अकादमिया के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. अकादमिया और प्रोफेसरों को सेंसर करना और यहाँ तक कि गिरफ्तार करना असामान्य नहीं होता. कला में स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पर खुले आक्रमण किए जाते हैं और सरकार कला की फंडिंग करने से प्राय: इंकार कर देती है.
  1. अपराध और सजा प्रति जुनून – फासिस्ट सरकारों के अधीन कानून लागू करने के लिए पुलिस को लगभग असीमित अधिकार दिए जाते हैं. पुलिस ज्यादितियों के प्रति लोग प्राय: निरपेक्ष होते हैं  यहाँ तक कि वे सिविल आज़ादी तक को देशभक्ति के नाम पर कुर्बान कर देते हैं. फासिस्ट राष्ट्रों में अक्सर असीमित शक्ति वाले  विशेष पुलिस बल होते हैं.
  1. उग्र भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार — फासिस्ट राष्ट्रों का राज्य संचालन मित्रों के समूह द्वारा किया जाता है जो अक्सर एक दूसरे को सरकारी ओहदों पर नियुक्त करते हैं और एक दूसरे को जवाबदेही से बचाने के लिए सरकारी शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग किया जाता है. सरकारी नेताओं द्वारा राष्ट्रीय संसाधनों और खजाने को लूटना असामान्य बात नहीं होती.

14. चुनाव महज धोखाधड़ी होते हैं — कभी-कभी होने वाले चुनाव महज दिखावा होते हैं. विरोधियों के विरुद्ध लाँछनात्मक अभियान चलाए जाते है और कई बार हत्या तक कर दी जाती है , विधानपालिका के अधिकारक्षेत्र का प्रयोग वोटिंग संख्या या राजनीतिक जिला सीमाओं को नियंत्रण करने के लिए और मीडिया का दुरूपयोग करने के लिए किया जाता है.

https://samajvad.wordpress.com/2009/06/19/%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%87-14-%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/

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fascism vs captalism

सामंतवाद /Feudalism

सामंतवाद ऐसी प्रथा होती है जिसमे शीर्ष स्थान में राजा होता है जिसके नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते हैं जो किसी इलाके के 1/2 धन और धरती के मालिक होते हैं और आम जनता सबसे निम्न स्तर में किसान या दास बनकर गुलामी को मजबूर होते है 2/2

सामंतवाद (Feudalism / फ्युडलिज्म) मध्यकालीन युग की प्रथा थी। इन सामंतों की कई श्रेणियाँ थीं जिनके शीर्ष स्थान में राजा होता था। उसके नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते थे और सबसे निम्न स्तर में किसान या दास होते थे। यह रक्षक और अधीनस्थ लोगों का संगठन था। राजा समस्त भूमि का स्वामी माना जाता था। सामंतगण राजा के प्रति स्वामिभक्ति बरतते थे, उसकी रक्षा के लिए सेना सुसज्जित करते थे और बदले में राजा से भूमि पाते थे। सामंतगण भूमि के क्रय-विक्रय के अधिकारी नहीं थे। प्रारंभिक काल में सामंतवाद ने स्थानीय सुरक्षा, कृषि और न्याय की समुचित व्यवस्था करके समाज की प्रशंसनीय सेवा की। कालांतर में व्यक्तिगत युद्ध एवं व्यक्तिगत स्वार्थ ही सामंतों का उद्देश्य बन गया। साधन-संपन्न नए शहरों के उत्थान, बारूद के आविष्कार, तथा स्थानीय राजभक्ति के स्थान पर राष्ट्रभक्ति के उदय के कारण सामंतशाही का लोप हो गया।

भारत में सामंतवाद दसवीं शताब्दी के बाद भारतीय समाज में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इनमें से एक यह था कि विशिष्ट वर्ग के लोगों की शक्ति बहुत बढ़ी जिन्हें सामंत, रानक अथवा रौत्त (राजपूत) आदि पुकारा जाता था। इन वर्गों की उत्पत्ति विभिन्न तरीकों से हुई थी। इनमें से कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी थे जिनको वेतन मुद्रा की जगह ग्रामों में दिया जाता था, जिससे ये कर प्राप्त करते थे। कुछ और ऐसे पराजित राजा थे जिनके समर्थक सीमित क्षेत्रों के कर के अभी भी अधिकारी बने बैठे थे। कुछ और वंशागत स्थानीय सरदार या बहादुर सैनिक थे, जिन्होंने अपने कुछ हथियारबन्द समर्थकों की सहायता से अधिकार क्षेत्र स्थापित कर लिया था। इन लोगों की हैसियत भी अलग-अलग थी। इनमें से कुछ केवल ग्रामों के प्रमुख थे और कुछ का अधिकार कुछ ग्रामों पर था और कुछ ऐसे भी थे जो एक सारे क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो सके थे। इस प्रकार इन सरदारों की निश्चित श्रेणियाँ थी। ये अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए आपस में लगातार संघर्ष किया करते थे। ऐसे ‘लगान’ वाले क्षेत्र[1] जो राजा अपने अधिकारियों या समर्थकों को देता था, वे अस्थायी थे और जिन्हें राजा अपनी मर्जी से जब चाहे, वापस ले सकता था। लेकिन बड़े विद्रोह अथवा विश्वासघात के मामलों में छोड़कर राजा द्वारा ज़मीन शायद ही वापस ली जाती थी। समसामयिक विचारधारा के अनुसार पराजित नरेश की भूमि को भी लेना पाप माना जाता था।

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साभार bhartdiscovery.org

अगर सामंतवाद को धर्म द्वारा लोगों के दिमाग में बिठाकर लोगों से गुलामी करवाई जाये तो उसे ब्राह्मणवाद कहते हैं जिसमें लोग ख़ुशी ख़ुशी धर्म के नाम पर अपना शोषण करवाते हैं, इसी को मानसिक गुलामी कहते हैं जिसमे गुलाम अपने बेड़ियों से ही प्रेम करता है, इनको आज़ाद नहीं करवाया जा सकता है

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पूंजीवाद/Capitalism

पूंजीवाद प्राइवेटिकरन से पनपी आर्थिक व्यस्था को कहते हैं जिसमें उत्पादन के साधन मतलब कम्पनिया,स्कूल,कालेज,माल,हस्पताल,खेती/फसल पर सरकार की जगह कोई सेठ मालिक होते है,सरकारी नियंत्रण नाम मात्र को रह जाता है| ये एक प्रकार का सामंतवाद है जिसमे खेती की जगह कम्पनियाँ हैं जिसमे जनता का शोषण हो सकता है| भारत में जातिवाद और पूँजीवाद ने मिलकर सदियों से शोषण सह रहे भारतवासियों को फिर शोषण की तरफ हांक दिया है

CAPITALISM

पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र की दुर्गति……गुरचरन दास|

भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र।

हमने पिछले दिनों एक और गणतंत्र दिवस मनाया, लेकिन कई भारतीयों के लिए इसमें उत्साह की कोई बात नहीं थी क्योंकि सरकार को लकवा मार जाने से वे हताश हैं। यह अब तक की सबसे कमजोर सरकारों में से एक है और कई लोग दृढ़ एवं निर्णयात्मक नेतृत्व की कामना कर रहे हैं।

प्रसिद्ध सुधारकों के नेतृत्व वाली इस सरकार ने लगभग कोई नया सुधार लागू नहीं किया है और भारत-अमेरिका परमाणु करार के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता जारी है। यह भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण करारों में से एक है, जो हमारे देश को विश्व की बड़ी ताकतों की श्रेणी में ला सकता है और पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंधों को बदलकर रख सकता है। जब से यह सरकार सत्ता में आई है, तब से वाम दलों के व्यवहार को लेकर मध्यम वर्ग में रोष है। गठबंधन प्रणाली में बहुत बड़ी गड़बड़ यह है कि अल्पमत वाला एक छोटा मगर वाचाल वर्ग हमारे राष्ट्रीय हित को बंधक बनाकर रख सकता है।

हमारी हताशा की जड़ इतिहास के एक अदद हादसे में निहित है। भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र। अर्थात पहले समृद्धि की निर्माण किया गया और फिर इस बात पर बहस छिड़ी कि इस समृद्धि का वितरण कैसे किया जाए।

इस ऐतिहासिक हादसे का मतलब यह है कि भारत का भविष्य अकेले पूँजीवाद की देन नहीं होगा। वह जाति, धर्म तथा गाँव की रूढ़िवादी ताकतों, देश के बौद्धिक जीवन पर 60 साल से हावी वामपंथी एवं समाजवादी ताकतों और वैश्विक पूँजीवाद की नई ताकतों के बीच रोजाना के संवाद से उभरकर सामने आएगा।

लोकतंत्र की इन लाख बहसों, हितों की बहुलता और हमारे लोगों के कलहप्रिय व्यवहार को देखते हुए यह आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी ही रहेगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत चीन या एशियाई शेरों की रफ्तार से विकास नहीं करेगा और न ही उनकी तरह शीघ्रता से गरीबी व अशिक्षा को दूर कर पाएगा।

अधिकांश देशों में आधुनिक लोकतंत्र का प्रवेश पूँजीवाद के बाद ही हुआ। ये सब देश औद्योगिक क्रांति से गुजर चुके थे, जिसने संपन्नाता का आधार बना दिया था। इसके बाद ही यूरोप में उन्नीसवीं सदी में क्रमिक रूप से मताधिकार दिया जाने लगा। इसके बाद बड़े राजनीतिक दलों का विकास हुआ। तत्पश्चात लोकतंत्र ने पूँजीवादी संस्थाओं को प्रभावित करना शुरू किया।

वामपंथी दलों और मजदूर यूनियनों ने धन-संपत्ति का पुनर्वितरण करने व राज सहायताएँ देने की कोशिश भी की और इससे पश्चिमी देशों में भी उत्पादकता वृद्धि में कमी आई। इस प्रक्रिया की परिणति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी विश्व में ‘जन-कल्याणकारी राज्य’ के रूप में हुई, जिसमें आम लोगों को बेरोजगारी बीमा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिला।

इसके विपरीत भारत में हमें औद्योगिक क्रांति लाने का मौका मिलता, इससे पहले ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना कर दी गई। रोटी बनाने से पहले ही हम इस बहस में उलझ गए कि रोटियों का वितरण कैसे किया जाए। इससे पहले कि हम भोजन, उर्वरक, बिजली आदि पर सबसिडियाँ देने में समर्थ बनते, हम इन पर सबसिडियाँ देने लग गए। हमारे उद्योग उत्पादन में कुशल बन पाते, इससे पहले ही हमने उन पर विस्तृत नियंत्रण बैठा दिए।

‘कल्याण’ उत्पन्न करने वाले रोजगार सृजित होने से पहले ही हम लोगों का ‘कल्याण’ करने के विषय में सोचने लगे। नतीजा रहा उद्यमशीलता का गला घोंटना, धीमा विकास तथा खोए हुए अवसर। लायसेंस राज ने एक विशाल काली अर्थव्यवस्था का निर्माण किया।

चूँकि हमारे पास गरीबों तक सबसिडियों का लाभ पहुँचाने के लिए संस्थागत ढाँचा था ही नहीं, अतः तमाम सबसिडियाँ रास्ते में ही डकार ली गईं और गरीबों तक पहुँची ही नहीं। यह थी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवाद की असफलता। जब तक हम सार्वजनिक रूप से इस असफलता को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम एक परिपक्व राष्ट्र नहीं बन सकते। हम चोरी-छुपे आर्थिक सुधार लाते रहेंगे और एक झूठ को जीते रहेंगे।

यह है पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र लाने की कीमत, बल्कि बहुत अधिक लोकतंत्र और अपर्याप्त पूँजीवाद लाने की कीमत, जो हम चुका रहे हैं। इस समाजवादी मॉडल ने अंततः हमें 1991 में दिवालिएपन के कगार पर ला दिया और हम सुधार लागू करने पर विवश हुए। यह उस समय हुआ, जब पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का पतन हुआ और सोवियत संघ का अवसान हो गया। तब जाकर हम समझ सके कि किसी राष्ट्र को धन-संपत्ति का वितरण करने से पहले उसका निर्माण कर लेना चाहिए।

आर्थिक सुधारों की बदौलत अंततः हम संपन्नाता का निर्माण कर रहे हैं। भारतीयों की उद्यमशीलता पर लगी बेड़ियाँ खोल दी गई हैं और हमारे निजी क्षेत्र ने भारत को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया है।

लेकिन राजनीतिज्ञों ने इससे कोई सबक नहीं लिया है। चूँकि भारत में गरीब बहुत बड़ी संख्या में हैं, अतः राज्य सरकारों को दिवालिया बना देने वाले वादे करने का प्रलोभन हमेशा बना रहता है। यदि कोई राजनेता दो रुपए किलो में चावल उपलब्ध कराने का वादा करे, जबकि बाजार में वह पाँच रुपए किलो हो, तो वह चुनाव जीत जाता है।

एनटी रामाराव ने 1994 में आंध्रप्रदेश में यही किया। वे चुनाव जीत गए, मुख्यमंत्री बने और राज्य को दिवालिया बना बैठे। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल ने 1997 में किसानों को मुफ्त बिजली और पानी दिया। उन्होंने अपना चुनावी वादा निभाया लेकिन बारह महीनों में पंजाब की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और सरकारी सेवकों को वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं रह गए।

जो सबक हम सब सीख चुके हैं, वह राजनेता नहीं सीख पाए हैं। वे मतदाताओं को मुफ्त का माल तथा सेवाएँ बाँटने की आपस में होड़ लगाते हैं। तब फिर स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने के लिए पैसा कहाँ से आएगा?

इन सब बातों को देखते हुए भारत कभी आर्थिक शेर नहीं बन पाएगा। वह तो हाथी है। लेकिन यह हाथी 8 प्रतिशत की सम्मानजनक दर से आगे बढ़ने लगा है। वह कभी भी गति नहीं पकड़ पाएगा लेकिन दूरी तय अवश्य करेगा।

पूँजीवाद और लोकतंत्र की उलटी गंगा बहने के ऐतिहासिक हादसे को देखते हुए लगता है कि शायद चीन के मुकाबले भारत अधिक स्थिर, शांतिपूर्वक एवं परस्पर सहमतिपूर्वक भविष्य में पदार्पण करेगा। वह बिना तैयारी के पूँजीवादी समाज बनाने के घातक दुष्प्रभावों से भी बच जाएगा, जो कि रूस भुगत रहा है।

(लेखक प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ तथा ‘मुक्त भारत’ के लेखक हैं।)

http://hindi.webdunia.com/current-affairs/%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BF-108020200036_1.htm