निर्विवाद रूप से ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है और आज भी है|डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प:इतिहास की जरुरत…एच0 एल0 दुसाध


डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प:इतिहास की जरुरत   … एच एल दुसाध
tisharan sheel
अगर लोगों से यह पूछा जाय कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या क्या है,बहुत कम लोगो का जवाब होगा-‘आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी’!किन्तु सचाई तो यही है कि हजारों साल से निर्विवाद रूप से ‘आर्थिक और सामाजिक गैर –बराबरी’ ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है और आज भी है.इसी के कारण भूख,कुपोषण,गरीबी,वेश्या वृत्ति, विच्छिन्नतावाद,उग्रवाद जैसी दूसरी अन्य कई समस्यायों की सृष्टि होती रही है.यही वह सबसे बड़ी समस्या है,जिससे निजात दिलाने के लिए ई.पू.काल में भारत में गौतमबुद्ध,चीन में मो-ती,ईरान में मज्दक,तिब्बत में मुने-चुने पां;रेनेंसा उत्तरकाल में पश्चिम में होब्स-लॉक ,रूसो-वाल्टेयर,टॉमस स्पेंस,विलियम गाडविन ,सेंट साइमन ,फुरिये,प्रूधो,रॉबर्ट ओवन,लिंकन,मार्क्स,लेनिन तथा एशिया में माओत्से तुंग,हो चि मिन्ह,फुले,शाहूजी,पेरियार,आंबेडकर,लोहिया,जगदेव प्रसाद, कांशीराम इत्यादि जैसे ढेरों महामानवों का उदय तथा भूरि-भूरि साहित्य का सृजन हुआ एवं लाखों-करोड़ों लोगों ने अपना प्राण-बलिदान किया.इसके खात्मे को लेकर आज भी दुनिया के विभिन्न अंचलों में छोटा-बड़ा आन्दोलन/संघर्ष जारी है.
बहरहाल आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे को लेकर मानव जाति के इतिहास में जो विपुल चिंतन हुआ है उसका ठीक से अनुधावन करने पर यही दिखता है कि पूरी दुनिया में ही इसकी सृष्टि शक्ति के स्रोतों के विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे के कारण होती रही है.ध्यान देने की बात है कि सदियों से ही मानव समाज जाति,नस्ल,लिंग,भाषा,धर्म इत्यादि के आधार पर कुई समूहों में बंटा रहा है,सिर्फ अमीर-गरीब के दो भागों में नहीं जैसा कि मार्क्सवादी दावा करते हैं.जहां तक शक्ति का सवाल है ,सदियों से समाज में इसके तीन प्रमुख स्रोत रहे हैं-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक.शक्ति ये स्रोत जिस सामाजिक समूह के हाथों में जितना ही संकेंद्रित रहे,वह उतना ही शक्तिशाली,विपरीत इसके जो जितना ही इससे दूर रहा वह उतना ही दुर्बल व अशक्त रहा.सदियों से समतामूलक समाज निर्माण के लिए जारी संघर्ष और कुछ नहीं,शक्ति के स्रोतों में वंचितों को उनका प्राप्य दिलाना मात्र रहा है.
यह सही है कि हजारों साल से सारी दुनिया में शासक-वर्ग ही कानून बनाकर शक्ति का बंटवारा कराकर करता रहा है.पर,यदि हम यह जानने का प्रयास करें कि सारी दुनिया के शासकों ने अपनी स्वार्थपरता के तहत कौन सा ‘कॉमन उपाय’अख्तियार कर शक्ति का असमान वंटवारा कराया तो हमें विश्वमय एक विचित्र एकरूपता का दर्शन होगा.हम पाएंगे कि सभी ही शक्ति के स्रोतों में सामाजिक (social)और लैंगिक (gender)विविधता(diversity)का असमान प्रतिबिम्बन कराकर मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या की सृष्टि करते रहे.किन्तु आर्थिक और सामाजिक विषमता के पृष्ठ में सामाजिक और लैंगिक विविधता की क्रियाशीलता की सत्योपलब्धि आधुनिक मानवताबोध के उदय के साथ बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही जाकर पश्चिम के शासक कर पाए.इसकी सत्योपलाब्धि कर अमेरिका ,ब्रिटेन,फ़्रांस,आस्ट्रेलिया,न्यूज़ीलैंड इत्यादि जैसे लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों ने अपने-अपने देशों में शक्ति के सभी स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने की नीति पर काम करना शुरू किया.इसके परिणामस्वरूप उन देशों में महिलाओं,नस्लीय भेदभाव के शिकार अश्वेतों,अल्पसंख्यकों इत्यादि को सत्ता की सभी संस्थाओं,उद्योग-व्यापार,फिल्म-टीवी,शिक्षा के केन्द्रों इत्यादि में सहित शक्ति के तमाम स्रोतों में वाजिब भागीदारी मिलने लगी.ऐसा होने पर उन देशों में आर्थिक और सामाजिक विषमता से उपजी तमाम समस्यायों के खात्मे तथा लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई.
किन्तु विविधता सिद्धांत को सम्मान देनेवाले पश्चिम के देशों से लोकतंत्र का प्राइमरी पाठ पढने सहित कला-संस्कृति-फैशन-टेक्नॉलाजी-अर्थनीति इत्यादि सब कुछ उधार लेने वाले हमारे शासकों ने उनकी विविधता नीति से पूरी तरह परहेज किया.किन्तु उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि विदेशों की तरह विविधता नीति के अवलंबन की प्रत्याशा उनसे भी थी,ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है.इसका साक्ष्य ‘आजादी के बाद का भारत’ जैसा ग्रन्थ है जिसकी भूमिका में कहा गया है-‘1947 में देश अपने आर्थिक पिछड़ेपन ,भयंकर गरीबी ,करीब-करीब निरक्षरता,व्यापक तौर पर फैली महामारी,भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए अपनी लम्बी यात्रा की शुरुआत की थी.15 अगस्त पहला पड़ाव था,यह उपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था:शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था,स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था.भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना,राष्ट्रीय राजसत्ता को सामाजिक रूपांतरण के उपकरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था.यह महसूस किया जा रहा था कि भारतीय एकता को आंख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए.इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय,भाषाई,जातीय एवं धार्मिक विविधताएँ मौजूद हैं.भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न तबकों को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था.’

आज़ादी के बाद के भारत का उपरोक्त अंश को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे शासकों को इस बात का थोडा बहुत इल्म था कि राजसत्ता का इस्तेमाल विविधता के प्रतिबिम्बन के लिए करना है.यही कारण है उन्होंने किया मगर ,प्रतीकात्मक.जैसे हाल के वर्षों में हमने लोकतंत्र के मदिर में अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री,महिला राष्ट्रपति ,मुसलमान उप-राष्ट्रपति,दलित लोकसभा स्पीकर और आदिवासी डिप्टी स्पीकर के रूप में सामाजिक और लैंगिक विविधता का शानदार नमूना देखा.किन्तु यह नमूना सत्ता की सभी संस्थाओं, सप्लाई ,डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-टीवी, शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश,अध्यापन और पौरोहित्य इत्यादि शक्ति के प्रमुख स्रोतों में प्रस्तुत नहीं किया गया.चूँकि शक्ति के स्रोतों में भारत में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन प्रायः नहीं के बराबर हुआ इसलिए भारत जैसी आर्थिक और सामाजिक गैर-बरबी दुनिया में कहीं और नहीं है.विश्व में किसी भी देश परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन 15 प्रतिशत लोगों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है.ऐसी स्थिति एकमात्र दक्षिण अफ्रीका में थी,जहां 9-10 प्रतिशत गोरों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा.किन्तु दो दशकों से वहां मूलनिवासी कालों की सत्ता कायम रहने के कारण वहां भी यह गैर-बराबरी अतीत की बात होकर रह गयी है.भारत के शासकों द्वारा डाइवर्सिटी सिद्धांत से परहेज करने के कारण ही हम महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश और नेपाल जैसे पिछड़े राष्ट्रों से पीछे तथा सच्चर रिपोर्ट में मुसलमानों की बदहाली की तस्वीर देखकर सकते में हैं.इस कारण ही दलित-पिछड़े उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया और पौरोहित्य में दूरवीक्षण यंत्र से देखने की चीज बनकर रह गए हैं.इस कारण ही देश भूख,कुपोषण,गरीबी,उग्रवाद इत्यादि के मामले में विश्व चैम्पियन बन गया है.इससे राष्ट्र को उबारने के लिए विभिन्न संगठन अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं.पर, शायद वे आर्थिक सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के बुनियादी कारणों से नावाकिफ हैं इसलिए टुकड़ों-टुकड़ों में वंचितों को शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे हैं.अगर इस देश के समताकामी संगठन आर्थिक और सामाजिक विषमता जनित समस्यायों से पार पाना चाहते हैं तो उन्हें शासक दलों पर अमेरिका ,इंग्लैण्ड ,दक्षिण अफ्रीका इत्यादि की भांति शक्ति के समस्त स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक लागू करवाने में सर्वशक्ति लगानी होगी.
शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक –विविधता का प्रतिबिम्बन महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश और नेपाल जैसे पिछड़े राष्ट्रों से भी पिछड़े भारत को विश्व की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर देगा.तब सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली की तस्वीर खुशहाली में में बदल जाएगी .पौरोहित्य में डाइवर्सिटी ब्राह्मणशाही का खात्मा कर देगी.इससे इस क्षेत्र में ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी सौ की जगह महज तीन-चार पर सिमट जाएगी और शेष क्षत्रिय,वैश्य और शुद्रातिशुद्रों में बाँट जाएगी.तब किसी दस वर्ष के ब्राह्मण को कोई भू-देवता मानकर दंडवत नहीं करेगा.शक्ति के स्रोतों में डाइवर्सिटी दलित-आदिवासी और पिछड़ों को उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया इत्यादि तमाम क्षेत्रों में ही संख्यानुपात में भागीदारी दिलाकर उनके जीवन में क्या चमत्कार कर सकती है,इसकी कल्पना कोई भी कर सकता है.डाइवर्सिटी लागू होने पर परोक्ष लाभ यह भी होगा कि इससे दलित और महिला उत्पीडन में भारी कमी;लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण;विविधता में शत्रुता की जगह सच्ची एकता;विभिन्न जातियों में आरक्षण की होड़ व भ्रष्टाचार के खात्मे के साथ आर्थिक और सामाजिक विषमताजनित उन अन्य कई समस्यायों के खात्मे का मार्ग प्रशस्त होगा जिनसे हमारा राष्ट्र जूझ रहा है.अगर इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बहुजनों के लिए डाइवर्सिटी ही सर्वोत्तम विचार है तो वंचित वगों के सामाजिक संगठन नए वर्ष में ‘डाइवर्सिटी क्रांति’ का संकल्प लें.‘आम आदमी पार्टी’ की अप्रत्याशित उदय के बाद डाइवर्सिटी क्रांति की जरुरत समय की मांग बन गई है.
काबिले गौर है कि 25 नवम्बर,1949 भारतीय संविधान के जनक डॉ.आंबेडकर ने राष्ट्र को सतर्क करते हुए कहा था,’…हमें निकटतम समय के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा कर लेना होगा अन्यथा विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के मंदिर को विस्फोटित कर सकती है.’ किन्तु आजाद भारत के सवर्ण शासकों ने उनकी चेतावनी को कभी गंभीरता से लिया नहीं,और राहत और भीखनुमा घोषणाओं के सहारे लाचार बहुजनों को प्रलुब्ध कर सत्ता पर काबिज होते रहे.फलतःआज विश्व में सर्वाधिक गैर-बराबरी भारत में है.इस भीषण विषमता से बेपरवाह भाजपा और कांग्रेस जैसे दल एक बार फिर राहत और भीखनुमा घोषणाओं के सहारे अगली बार केंद्र की सत्ता हथियाने की जुगत भिड़ा रहे थे कि 8 दिसंबर,2013 को अचानक ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय हुआ.मीडिया और भूमंडलीकरण के दौर के नव-सृजित अवसरों का लाभ उठाकर ताकतवर बने सवर्ण युवाओं के समर्थन से पुष्ट ‘आप’सामाजिक न्यायवादी दलों को पृष्ठ में धकेलकर भाजपा और कांग्रेस के कतार में जा खड़ी हुई है.कांग्रेस-भाजपा बहुजनों का वोट पाने की लालच में कभी-कभार सामाजिक न्याय की बात कर भी लेती थीं.किन्तु ‘आम’ नेतृत्व की नज़र में आरक्षण लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है.लोकतंत्र को आरक्षण के खतरे बचाने के लिए वजूद में आई यह पार्टी लोकलुभावन सतही नारों और कामों के जरिये बड़ी तेज़ी से बहुजनो को भी आकर्षित करती जा रही है.भारतीय लोकतंत्र के दु:स्वप्न के रूप में उभर रही ‘आप’ को यदि रोकना है तो कुछ ऐसा उपक्रम चलाना होगा जिससे बहुजनों में मंडल के बाद अधिकार चेतना का एक नया उभार शुरू हो.चूँकि यह उभार पैदा करने में डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विचार नहीं है इसलिए डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प लेना हमारा ऐतिहासिक कर्तव्य बन जाता है.हां,अगर डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विकल्प हो तब तो इसे कूड़ेदान के हवाले कर देना चाहिए.

एच एल दुसाध

HL DUSHAD

 

दिनांक: 3 जनवरी,2014
डाइवर्सिटी क्रांति का संकल्प:इतिहास की जरुरत

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