5-JAN-2015 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना:आज बहुजन बौद्ध धम्म के तरफ तेज़ी से लौट पड़े हैं पर मैंने देखा है को बहुजन बुद्धवाद और ब्राह्मणवाद की तुलना केवल सिद्धांतों के नज़रिये से ही कर रहा है, इसमें तो बुद्धवाद की विजय निश्चित ही है| पर कड़वी सच्चाई ये है की जब आप अर्थशास्त्र के नज़रिये से देखोगे तो समझ जाओगे की ब्राह्मणवाद के आगे बुद्धवाद का टिकना कितना कठिन है क्योंकि लोगों को सत्य और सिद्धांत नहीं फायदा चाहिए|..समयबुद्धा


dalit to baudhओशो के शब्द हैं

“बुद्ध कहते हैं, तुम स्व कब होओगे? तुम स्वयं कब बनोगे? अप्प दीपो भव! तुम अपने दीए खुद कब बनोगे? तुम कब कहोगे कि दूसरा नहीं है, मैं ही हूं; और मुझे जो भी करना है इस मैं से ही करना है—नर्क बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है, स्वर्ग बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है। दुख पाना है तो भी मुझे ही नियंता होना पड़ेगा, आनंद पाना है तो भी मुझे ही यात्रा करनी होगी। मेरे अतिरिक्त कोई भी नहीं है। इसलिए तो बुद्ध का धर्म भारत में बहुत दिन टिक न सका। क्योंकि यह सत्य पर इतना जोर देते हैं और हम कल्पनाशील लोग सत्य पर इतने जोर के लिए राजी नहीं। यह सत्य तो हमें खतरनाक मालूम होता है। हम बिना स्वप्न के जी ही नहीं सकते। फ्रायड ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में कहा है कि जीवन भर हजारों लोगों का मनोविश्लेषण करके एक नतीजे पर मैं पहुंचा हूं कि मनुष्य सत्य के साथ जी नहीं सकता। असत्य जरूरी है, झूठ जरूरी है, धोखा जरूरी है। यह वक्तव्य दूसरे महान जर्मन विचारक नीत्से के वक्तव्य से बड़ा मेल खाता है। नीत्से ने फ्रायड के पहले भी कहा था कि लोग सोचते हैं, सत्य और जीवन एक है। गलत सोचते हैं। सत्य जीवन—विरोधी है। झूठ जीवन का सहारा है। लोग भ्रम के सहारे जीते हैं। सत्य तो सब सहारे छीन लेता है। सत्य तो तुम्हें निपट नग्न कर जाता है। सत्य तो तुम्हें बचने की जगह ही नहीं छोड़ता। सत्य तो तुम्हें भरी बाजार की भीड़ में नग्न खड़ा कर देता हे। तुम्हें बहाने चाहिए। परमात्मा तुम्हारा सबसे बड़ा बहाना है।-ओशो”

जब हम ‘ब्राह्मणवाद/मनुवाद/पूँजीवाद/शाशकहित’ की तुलना ‘बुद्धवाद/आंबेडकरवाद/श्रमण परंपरा/बहुजन विचारधारा/जनताहित’  आदि से करते हैं तो हम पाते हैं की ब्राह्मणवाद  आम जनता के हित में नहीं है ये शाशक वर्ग के हित में ज्यादा है  जबकि बुद्धवाद का तो मिशन ही बहुजन हिताए बहुजन सुखाये है| यहाँ नोट करे बहुजन मतलब केवल पिछड़े वर्ग नहीं, बहु+जान मतलब बहुत से जन इसका मतलब 90% आम जनता है|कभी आपने सोच की कैसे दस प्रतिशत के हक़ की बात नब्बे प्रतिशत आम जनता के हक़ पर भारी पड़ती है| ये सब अर्थ तंत्र और उसकी रक्षा के लिए शक्ति और नीति तंत्र है| आज बहुजन बौद्ध धम्म के तरफ तेज़ी से चल पड़े हैं पर मैंने देखा है को बहुजन बुद्धवाद और ब्राह्मणवाद की तुलना केवल सिद्धांतों के नज़रिये से ही कर रहा है, इसमें तो बुद्धवाद की विजय निश्चित ही है| पर कड़वी सच्चाई ये है की जब आप अपना नजरिया बदल कर देखोगे और अर्थशास्त्र के नज़रिये से देखोगे तो आप समझ जाओगे की बुद्धवाद का टिकना कितना कठिन है|भले ही बुद्धवाद के सिद्धांत कितने ही अच्छे, सच्चे और जन हितेषी हों पर ये धन बल के आगे सब बेकार है| ये एक ऐसा संगर्ष हैं जहाँ एक तरफ है “फायदा” (किसी भी कीमत पर)  और दूसरी तरफ है सत्य है, किसी को भी सत्य नहीं चाहिए सबको फायदा चाहिए|मैंने अपने निजी जीवन में अनुभव किया है की कोई भी मेरी बात इसलिए नहीं सुनता की वो अच्छी है बल्कि इसलिए सुनता है की क्योंकि मैं अपने निजी जेवण में कामयाब हूँ और हो सकता है उसे कभी मेरी जरूरत पड़े, सत्य  जानने में लोगों का कोई इंट्रेस्ट नहीं होता|मैं तो सत्य बता रहा हूँ अगर मैं झूठ भी बताओं और उसमे उनका फायदा है तब भी मुझे स्वीकार किया जायेगा| दूध देने वाली गाये की लात भी सही जाती है और बिना दूध की सीधी सच्ची गाये को भी घर से निकला जाता है यही है अंतिम सच| इसलिए हे बहुजनों समझो की अच्छे बनने से भी शोषण बंद न होगा आपको फायदेमंद बनना होगा तभी नफरत करने वाले भी आपके पैर पड़ेंगे|

“फायदा” ही वो वजह है जिसकी वजह से लोग किसी भी धर्म, कर्मकांड, देवी देवता आदि से जुड़े रहते हैं, अगर इन सब की सच्चाई भी इनके सामने उजागर कर दी जाए तो भी ये इनका साथ नहीं छोड़ेंगे | बौद्ध धम्म के अच्छे होने के बावजूद जनता और सरकार में इसकी पूछ नहीं और ब्राह्मण धर्म में कई अमानवीय पहलू होने के बावजूद भी  जनता और सरकार इसके पक्ष में रहते हैं|असल में फायदा हो न हो पर मन में ये बात बैठा दी गयी है की ब्राह्मणवाद में ही फायदा है |

उदाहरण के लिए एक बहुजन रामदास अम्बेडकरवादी बौद्ध  है और ब्राह्मणधर्मियों के सम्पूर्ण धार्मिक षडियंत्र को जनता है| अब रामदास  ब्राह्मणवादियों की मार्किट में दुकान खोलना चाहता है या खोल के बैठा है| रामदास के आस पास सभी ब्राह्मणवादी बनिए हैं जिनकी हर बात देवी देवता से शुरू होती है और इन्हीं पर खत्म| अगर रामदास  मुस्लमान या क्रिस्टियन है तो भी एक बार को स्वीकार कर लिया जायेगा पर अम्बेडकरवादी बौद्ध होने के नाते स्वीकार नहीं करते लोग क्योंकि ब्राह्मण सदियों से इनके खिलाफ घृणा (सामूहिक बहिष्कार) का माहौल बनाते आ रहे हैं, ताकि ये लोग कभी उठ ही न सकें| अब रामदास के सामने मजबूरी है की या तो मुसलमान या क्रिस्टियन हो जाऊं या ब्राह्मणवादी हिन्दू होने का नाटक करे ताकि रामदास  मार्किट में धंधा कर सके| ऐसे में उसका अम्बेडकरवादी बौद्ध होना किसी काम का नहीं रह जाता क्योंकि आखिर कर तो रामदास  न चाहते हुए भी ब्राह्मणवाद को बढ़ावा रहा है , जो ब्राह्मण बनिए कर रहे हैं| न चाहते हुए भी चंदा देना पड़ेगा, जागरण, भजन संध्या आदि में शामिल होना पड़ेगा| धंधा करना है तो करना पड़ेगा वरना घृणा का शिकार व्यक्ति टिक नहीं पता ये बहुत बड़ी षडियंत्र नीति होती है, यही हाल नौकरियों में भी है|

कुछ महान हिम्मतवाले अम्बेडकरवादी बौद्धों को छोड़कर हमारा सारा समाज जो न तो पूरी तरह बौद्ध ही हो पाया है न पूरी तरह हिन्दू ही रहा इसी तरह के डबल जीवन शैली जीने को मजबूर है, जानते हैं ऐसा क्यों क्योंकि हमारे समाज में तीन वर्ग के लोग हैं

१. एक जो पूरी तरह मन वचन और कर्म से अम्बेडकरवादी बौद्ध हो गए हैं जाग गए हैं

२.दुसरे वो जो अम्बेडकरवादी बौद्ध हो गए हैं जाग गए हैं पर नौकरी और धंधे की मजबूरी की वजह से डबल जीवन शैली जीने को मजबूर है

३. तीसरे ऐसे लोग है जो आज भी खुद को हिन्दू और अपने पूर्वजों के हत्यारों को अपना देवी देवता मानकर उनकी पूजा कर रहे हैं|

ये तीसरे तरह के लोग इतने हटी गुलाम हैं की ये उसको ही मारने पर आमादा हो जाते हैं जो इनको गुलामी से आज़ादी दिलाने की बात करता है| जो अपनी गुलामी की जंजीरों से प्यार करता है उसको आज़ाद भी कौन कर सकता है| पता नहीं ये लोग क्यों नहीं समझते की आज जो  रोटी कपडा मकान और सम्मान इन्होने पाया है वो अम्बेडकरवादी बहुजन संगर्ष की देन है न की उन देवी देवताओं की जिन्हे ये इसका श्रेय देते हैं|ये लोग पता नहीं क्यों खुद से नहीं पूछते की ये देवी देवता पीछे दो हज़ार साल से कहाँ थे जब तुम गुलामी करते करते भूखे नंगे अपमानित होकर मर जाते या मार दिए जाते थे|तो इन तीसरे तरह के लोगों की ही वजह से दुसरे तरह के लोग हैं, अगर सारा समाज एक सुर में बोले, सभी मन वचन और कर्म से अम्बेडकरवादी बौद्ध हो जाएँ तो फिर किसी को भी छुपने की जरूरन नहीं पड़ेगी, जैसे मुसलमानों या ईसाईयों और सिखों को नहीं पड़ती|फिर बात घूम के वही आ जाती है की जब तक सारा समाज नहीं जागेगा, गुलामी खत्म नहीं होगी| ये बाल्टी में भरे केकड़े जैसी स्तिथि हो जाती है जो भी बहार निकलने की कोशिश करता है बाकि केकड़े उसकी टांग पकड़ कर खीच कर वापस बाल्टी में बुला लेते हैं| अब कोई  बौद्ध अम्बेडकरवादी राजनैतिक शक्ति ही इस मझदार में फसने वाली इस भयानक स्तिथि से छुटकारा दिल सकता है|

रामदास नाम पर आपका ध्यान गया, इसका मतलब है राम+दास अर्थात रामदास| इस नाम को चुनने की भी एक वजह है| इसके लिए मैं अपने बचपन की एक कहानी सुनाता हूँ| बचपन में मेरी माँ कॉलोनी की सभी औरतों की तरह हमारी कॉलोनी के बनिए के यहाँ हर पूर्णिमा पर कथा सुनाने ले जातीं थी| वहां एक पंडित आता था उसने कथा में कहानी सुनाई की

“एक था राजा बलिराज वो सारी जिंदगी लोगों की भलाई में लगा रहा, उसने लोगों की इतनी भलाई की की उसने ब्रह्मोनों को विशेष दर्ज देना बंद कर के कानून की नजरों में इनको भी अन्ये भारतियों के बराबर बना दिया| इसी राजा बलिराज के राज्ये में एक चोर रहता था रामदास, जो सभी प्रकार के दुष्कर्म और अपराध करता था, पर वो अपराध के कमाए हुए धन से हर पूर्णिमा पर कथा करवाता था| एक बार कसी वजह से (वजह नहीं बताई उसने) राजा बलिराज ने ब्राह्मण को मृत्युदंड दे दिया , फिर उसने बताया की इससे राजा के सभी सत्कर्म नस्ट हो गए और वो भयानक बीमार होकर मर गया, इधर चोर रामदास भी मर गया | दोनों बैकुंठ धाम में पहुंचे| वहां पर राजा बलिराज को नरक भेजा गया और रामदास को स्वर्ग मिला| इसपर राजा बलि ने पुछा की ऐसा क्यों हुआ तो बैकुंठ के जज ने बताया की ब्राह्मण हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं इसलिए तुमने कितने भी अच्छे कर्म किये हों कितनी भी बड़ी जनता की भलाई की हो पर क्योंकि तुमने ब्राह्मण को सजा दी इसलिए तुम नर्ग के भागिदार हो| रामदास स्वर्ग इसलिए जायेगा क्योंकि जिसका नाम देवताओं के नाम पर होता है उसके सभी पाप माफ़ कर दिए जाते हैं, दूसरी बात रामदास ने अपने गलत कमाई में से ब्राह्मणों को दान देके उस कमाई को सही कर लिया था| आगे पंडित जी ने कहा की इसीलिए हमें अपने बच्चों के नाम देवी देवताओं के नाम पर रखने चाहिए, इससे उनके पाप माफ़ होकर स्वर्ग में जाते है| ये बात उस वक़्त वहां बैठे सभी लोगों की तरह मुझे भी अच्छी लगी थी| खेर मुद्दे की बात ये है की अब आप समझ सकते हैं की क्यों रामदास नाम रखना ही उचित है|

ब्राह्मण हमारी तरह अपनी दुर्दशा के लिए केवल शिकायत नहीं करता रहता,न ही ये कहते हैं की उनपे धन नहीं है इसलिए वो अपना मिशन आगे नहीं बढ़ाते |
इस उदहारण में आप समझ सकते हो की हमारे धन के दान से वो अपना एजेंडा हमारे दिमाग में डालते रहते हैं|

पर जो भी हो जब जहाँ भी बहुजनों को मौका मिलता है अपना असली रूप दिखा देते हैं, सबसे बड़ी बात है की खुद को पहचान तो गए हैं, छुपना भी सरवायवल की एक कला ही है, जिएंगे बढ़ेंगे तभी तो अपना हक़ छीन पाएंगे| डॉ आंबेडकर द्वारा बौद्ध धम्म वापस करवाने से मात्र पचास साल में ही अपनी जाती से ऊपर उठकर कर  बहुजन एक मजबूत जनसंगठन के रूप में अपनी पहचान बनाता जा रहा है , कोई डर के तो कोई खुल के जहाँ जिसके जैसे हालत हैं हम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं| लगे रही कभी आपने सुना है की अंदर ने सुबह को नहीं होने दिया, अंदर कितना ही घाना क्यों न हो प्रकृति किसी के साथ अन्याय नहीं करती जिसका जितना संगर्ष और क्षमता होती है उसको उतना मिलता है| बस अपना संगर्ष तेज़ करने की जरूरत है |

खेर हम बात कर रहे थे बौद्ध सिद्धांत  और ब्राह्मणवादी फायदे के बीच के खींचा तानी की |ब्राह्मणवादी/मनुवादी  आपका शोषण केवल इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि वो शिक्षित रहा है  बल्कि इसलिए क्योंकि आपका अशिक्षित भाई ब्राह्मण के कहने पर आपको धोखा देने को तैयार रहता है| यही आज भी हो रहा है और अगर हमारे लोग नहीं जागे तो आगे भी होता रहेगा| इसका मूल कारन ये है की हम अपने लोगों को सिद्धांतों के गोंद से जोड़े रखना चाहते हैं जबकि सच्चाई ये है की सिद्धांतों के गोंद से कुछ ही लोग जुड़ सकते हैं पर “फायदे” की गोंद से सभी जुड़े रहेंगे|जैसे ही हमारे कोई बंधू फायदे की बात करता है सभी खिलाफ हो जाते हैं जैसे कसम खा रही हो की न ही हम फायदा लेंगे और न ही लेने देंगे| करोड़ों अच्छाइयों के बावजूद बुद्ध व्यस्था का पतन और करोड़ों बुराइयों के बावजूद ब्राह्मणवादी व्यस्था का सदियों से चलते रहने की पीछे भी यही कारन है की एक तरफ सत्ये, अहिंसा और सिद्धांत हैं वहीँ दूसरी तरफ फायदा के नाम पर सब जायज है| फायदे की भाषा तो  ऐसी है की अपना भाई तो समझेगा ही दुश्मन भी समझेंगे और साथ देंगे|धम्म बंधुओं समझो इस बात की और सिद्धांतों/भाषणों/सूत्रों के साथ साथ अपने लोगों का फायदा करो कराओ, फायदे की भाषा सभी समझते हैं|

इतनी सदियों की गुलामी झेलने के बाद अब तो बहुजन लोग समझ चुके होंगे की “शक्तिशाली और गुणवान की लड़ाई में जीत शक्तिशाली की होती है, नैतिक,गुणवान और ईमानदार को लोग यदा कदा सहानुभूति तो दे सकते हैं पर साथ वो हमेशा शक्तिशाली का ही देंगे”|जनता शक्तिशाली को अपने अस्तित्व से भी ज्यादा चाहती है जिसका प्रमाण है की बुद्धवादी व्यस्था को प्रतिक्रांति कर के दबा दिया गया था जबकि वो व्यस्था जनता के हक़ में थी|भारत में बुद्ध वादी व्यस्था इसलिए हारी क्योंकि यहाँ  सत्य और सिद्दांत अधिक हैं वहीँ दूसरी तरफ ब्राह्मणवादी व्यस्था इसलिए जीती क्योंकि वहां  फायदा और ब्राह्मण विरोधी का दमन अधिक  हैं, फायदा सबको समझ में आता है पर सत्य और सिद्दांत केवल चंद बुद्धिजीवी वर्ग समझता है पर मानता वो भी नहीं| अब मैं सभी बहुजनों से कहता हूँ की आप सत्य और सिद्दांत के साथ साथ फायदा और विरोधी दमन की नीति अपना लो वरना क्रांति कर के भी कोई फायदा न होगा पहले की तरह प्रतिक्रांति कर के दबा दी जाएगी|ध्यान रहे ब्राह्मणवाद का मुकाबला आप केवल ब्राह्मणवाद से ही कर सकते हो अर्थात नीति का जवाब नीति, दयाशून्यता का जवाब दयाशून्यता है, ज्ञान का जवाब ज्ञान से ,स्वार्थीपन का जवाब स्वार्थीपन है, संगठन का जवाब संगठन से, कांटा को कोमल कपडे से कैसे निकलोगे इसके लिए तो कांटा ही चाहिए, क्या ये समझना बहुत कठिन है| बुद्ध का ज्ञान आपकी मदत तब करता है जब आप सुरक्षित और संपन्न हो पर फिर भी दुखी हों, पर जब जब आप असुरक्षित अति पिछड़े ,अति गरीब और सताए हुए हों तब बुद्ध वाक्य ‘अप्प दीपो भव’ काम आएगा अर्थात अपने  दुःख का निदान आपको अपने पौरुष से ही करना होगा, अगर नहीं मानते तो झेलते रहो अन्याय|समयबुद्धा त्रिक्षमता सूत्र अपनाओ और अपनी आजादी पा लो

05.01.2015

….समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

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